मौसम एक ऐसा विषय है जो बातचीत में अक्सर सप्लीमेंट का काम करता रहता है। मसलन आप किसी से मिलते हैं जिससे बात करने के लिए आप के पास ज्यादा कुछ नहीं है तो झट से मौसम के ऊपर एक छोटी सी परिचर्चा आयोजित करवा सकते हैं। ऐसा ही विषय राजनीति भी माना जाता रहा है पर पिछले कुछ महीनो से हमें राजनीति की लोकप्रियता में गिरावट देखने को मिल रही है । हो सकता है यह गिरावट सिर्फ हमें ही नजर आ रही हो पर कुछ तो है।
खैर हम मौसम पर थे। तो मान लीजिये आपको कोई मिला जिससे बात क्या करें आपको समझ में नहीं आ रहा हैतो आप क्या करते हैं ज्यादातर लोग बात की शुरुआत आज बहुत गर्मी है या इस बार बारिश लेट हो रही है से शुरू करते हैं। ऐसा नहीं है कि लोग इस बार गर्मी कम है या इस बार बारिश अच्छी हो रही है नहीं कह सकते लेकिन परेशानी तो यह है कि गर्मी बढती जा रही है और बारिश कम होती जा रही है। हर साल यही होता आ रहा है या तो बारिश कम होती है या फिर होती है तो ऐसी कि सबकुछ तहस नहस कर देने वाली । जैसे कि पिछले ही कुछ दिनों से चीन के कई हिस्सों में हो रही है । आपको याद होगी चीन की ओलम्पिक उदघाटन समारोह में बारिश रोक देने वाली शानदार कहानी
हमें याद आती है एक उपन्यास की नाम था "सामर्थ्य और सीमा "
बारिश या तो कम हो रही है या बहुत ज्यादा
या तो सूखा आता है या फिर बाढ़
अभी कुछ दिन पहले किसी ने हमसे क्योटो प्रोटोकाल के बारे में पूछा था हम उसे समझा रहे थे और खुद सोचते जा रहे थे कि हम क्यों नहीं समझ रहे हैं सीधी सी बात
हमें नहीं समझ में आ रहा है कि हम खुद से ही हारते जा रहे हैं । हमें अंत नजर आ रहा है और हम उसकी ओर बेफिक्री से बढ़ते जा रहे हैं।
तो अगर आपके पास बात करने के लिए कुछ नहीं है तो मौसम पर परिचर्चा कर लीजिये। वैसे तो हम सब बहुत बिज़ी हैं
खैर आज हम छुट्टी पर हैं(खाली हैं कुछ करने को नहीं है तभी मौसम नजर आ रहा है ) और लखनऊ में सुन्दर बारिश हो रही है।
दो साल पहले जब भारी बारिश हुई थी तो कुकरैल नाले (शहर में बहने वाला एक नाला )में आई बाढ़ में उसके किनारे बसी (अवैध या वैध पता नहीं )अकबर नगर कालोनी डूब गयी थी।इस बार नाले के किनारे किनारे डॉ आंबेडकर पथ का निर्माण हो रहा है तो नाले की एक तरफ सीमा ढंग से बाँध दी गयी है । दूसरी तरफ पड़ता है अकबर नगर । अगर ज़रा सी भी ठीक बारिश हुई तो अकबर नगर डूबना तय होगा । उम्मीद है वहां के वाशिंदों ने तैयारी कर रखी होगी। अगर सरकार डॉ आंबेडकर पथ बनाने के साथ साथ नाले के प्रवाह का भी ढंग से इंतजाम करती चलती तो डॉ आंबेडकर बुरा नहीं मानते न ही पहचान से जुड़ा कोई संकट खडा होता। राहत की बात है कि निकाय चुनाव नजदीक हैं अगर बाढ़ आई तो निकाय प्रत्याशी कुछ जनसेवा कर लेंगे ।
राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अंतर्गत गावों में जलाशयों का निर्माण हुआ है जिसमें वर्ष जल संचयन का विचार होगा दूर से देख कर तो लगता है कि अच्छा विचार है कभी पास से देखने का मौक़ा मिला तो पता चलेगा कि कितने कारगर जलाशय होंगे ।
अंततः एक बात जिस बच्चे को हम क्योटो प्रोटोकाल के बारे में बता रहे थे उसने एक सवाल पूछा
अमेरिका जिसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बनती थी ग्रीन हाउस गैसों में कमी की वही क्यों पीछे हटा ?
जवाब सीधा है पर फिर भी खटकता है ।
सरकार पीछे हट गई तो क्या महान अमेरिका के नागरिक भी नहीं सोचते कुछ
"एक असुविधाजनक सच" जैसी बाते ही होती रहेंगी या कुछ और भी होगा
नोबल पुरस्कार अंतिम सच है क्या कोई काम हाथ में लेने का
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सोमवार, 19 जुलाई 2010
सोमवार, 16 मार्च 2009
पाकिस्तान: बुनियाद का दंश
अभी-अभी समाचार मिल रहा है कि पकिस्तान के प्रधान मंत्री की जस्टिस चौधरी सहित अन्य जजों को बहालकरने की घोषणा के बाद नवाज़ शरीफ ने अपना लोंग-मार्च वापस ले लिया है । अब सभी निगाहें २१ मार्च कीप्रस्तावित बहाली पर लग गयीं हैं।
जस्टिस चौधरी की बहाली के आगे क्या क्या परिणाम हो सकते हैं यह तो समय ही बताएगा पर आज कीपाकिस्तान की बुरी स्थिति की जिम्मेदारी अगर उसकी बुनियाद पर डाली जाय तो ग़लत नही होगा।
पाकिस्तान के निर्माण के लिए दिए गए तर्कों को अलग रख दें तो भी पाकिस्तान निर्माण के बाद शुरू से हीपकिस्तान के नेताओं ने जो परम्पराएं डालनी शुरू कर दीं वो आगे चल कर परेशानी का सबब बनने वाली ही थीं ।
मज़हब के आधार पर बने हुए देश में मज़हबी जूनून रखने वालों को सत्ता से अलग कर पाना बहुत ही कठिन था।इसके लिए जरूरी था कि देश के रहनुमा कड़े फैसले लेने वाले होते और अपना उदाहरण सकारात्मक रूप में लोगोंके सामने रख पाते।
जिन्ना इस कसौटी पर खरे नही उतर सके।
जिन्ना डावांडोल प्रकृति वाले नेता थे। विभाजन की घोषणा तक उन्हें पता नही था कि वो जो पाकिस्तान चाहते हैंवो कैसा होना चाहिए। उसे भारत से अलग होना है या एक ढीले ढाले संघ में रहना है उन्हें नही पता था उन्हें ये भीनही पता था कि पाकिस्तान में कौन कौन से इलाके रहने हैं। उन्हें बस पकिस्तान चाहिए था । पकिस्तान मिलजाने के बाद भी उसके भविष्य को लेकर उनके पास कोई कार्ययोजना नही थी। कभी मज़हब के आधार पर बने देशको वो सेकुलर बनाना चाहते थे तो कभी तरह तरह के अंदरूनी दबावों के आगे झुक झुक कर इधर उधर के फैसलेलेते रहे।
जिन्ना ने जिस एक चीज की नींव डाली-जो पाकिस्तान को अभी भी परेशान कर रही है- वह थी एकाधिकार कीप्रवृत्ति । जिन्ना को माउन्टबेटन ने सलाह दी कि उन्हें गवर्नर जनरल की जगह प्रधान मंत्री बनना चाहिए क्योंकिसंसदीय शासन की प्रणाली में प्रधान मंत्री अधिक महत्त्व पूर्ण होता है। परन्तु जिन्ना ने गवर्नर जनरल बनने केसाथ सत्ता अपने पास रखना चुना। जब शासन का ध्येय किसी तरह से सत्ता बचाए रखना और पूरी सत्ता अपने पासरखना हो जाता है तो चीजें ग़लत होनी शुरू हो जाती हैं । इस तरह की जवाबदेही विहीन सत्ता अन्य लोगों कोआकर्षित करती है।
जल्दी ही सत्ता खिसकनी शुरू हो गई। जिन्ना से लियाकत अली और फ़िर धीरे धीरे श्रंखला चल निकली। सेना काराजनीति के लिए प्रयोग हुआ और फ़िर सेना ने राजनीति शुरू कर दी।
२००७ के चुनावों के बाद ज़रदारी ने कहा कि वो पाकिस्तान के सोनिया गांधी बनना चाहते हैं । लेकिन सोनियागांधी बनना यूँ आसान नही था ज़ल्दी ही ज़रदारी एक और जिन्ना बन कर राष्ट्रपति बन बैठे। ज़रदारी के राष्ट्रपतिबनने के साथ ही उनके पराभव की कहानी शुरू हो चुकी थी। ये आश्चर्यजनक है कि वो अभी तक सत्ता में बने हुए हैं।
पाकिस्तान का उदहारण यह बताता है कि ग़लत बुनियाद का फल सही हो यह सम्भव नही है । अब देखना यहहोगा कि आगे आने वाले नेता इस चीज को समझ पाते हैं या नही।
जस्टिस चौधरी की बहाली के आगे क्या क्या परिणाम हो सकते हैं यह तो समय ही बताएगा पर आज कीपाकिस्तान की बुरी स्थिति की जिम्मेदारी अगर उसकी बुनियाद पर डाली जाय तो ग़लत नही होगा।
पाकिस्तान के निर्माण के लिए दिए गए तर्कों को अलग रख दें तो भी पाकिस्तान निर्माण के बाद शुरू से हीपकिस्तान के नेताओं ने जो परम्पराएं डालनी शुरू कर दीं वो आगे चल कर परेशानी का सबब बनने वाली ही थीं ।
मज़हब के आधार पर बने हुए देश में मज़हबी जूनून रखने वालों को सत्ता से अलग कर पाना बहुत ही कठिन था।इसके लिए जरूरी था कि देश के रहनुमा कड़े फैसले लेने वाले होते और अपना उदाहरण सकारात्मक रूप में लोगोंके सामने रख पाते।
जिन्ना इस कसौटी पर खरे नही उतर सके।
जिन्ना डावांडोल प्रकृति वाले नेता थे। विभाजन की घोषणा तक उन्हें पता नही था कि वो जो पाकिस्तान चाहते हैंवो कैसा होना चाहिए। उसे भारत से अलग होना है या एक ढीले ढाले संघ में रहना है उन्हें नही पता था उन्हें ये भीनही पता था कि पाकिस्तान में कौन कौन से इलाके रहने हैं। उन्हें बस पकिस्तान चाहिए था । पकिस्तान मिलजाने के बाद भी उसके भविष्य को लेकर उनके पास कोई कार्ययोजना नही थी। कभी मज़हब के आधार पर बने देशको वो सेकुलर बनाना चाहते थे तो कभी तरह तरह के अंदरूनी दबावों के आगे झुक झुक कर इधर उधर के फैसलेलेते रहे।
जिन्ना ने जिस एक चीज की नींव डाली-जो पाकिस्तान को अभी भी परेशान कर रही है- वह थी एकाधिकार कीप्रवृत्ति । जिन्ना को माउन्टबेटन ने सलाह दी कि उन्हें गवर्नर जनरल की जगह प्रधान मंत्री बनना चाहिए क्योंकिसंसदीय शासन की प्रणाली में प्रधान मंत्री अधिक महत्त्व पूर्ण होता है। परन्तु जिन्ना ने गवर्नर जनरल बनने केसाथ सत्ता अपने पास रखना चुना। जब शासन का ध्येय किसी तरह से सत्ता बचाए रखना और पूरी सत्ता अपने पासरखना हो जाता है तो चीजें ग़लत होनी शुरू हो जाती हैं । इस तरह की जवाबदेही विहीन सत्ता अन्य लोगों कोआकर्षित करती है।
जल्दी ही सत्ता खिसकनी शुरू हो गई। जिन्ना से लियाकत अली और फ़िर धीरे धीरे श्रंखला चल निकली। सेना काराजनीति के लिए प्रयोग हुआ और फ़िर सेना ने राजनीति शुरू कर दी।
२००७ के चुनावों के बाद ज़रदारी ने कहा कि वो पाकिस्तान के सोनिया गांधी बनना चाहते हैं । लेकिन सोनियागांधी बनना यूँ आसान नही था ज़ल्दी ही ज़रदारी एक और जिन्ना बन कर राष्ट्रपति बन बैठे। ज़रदारी के राष्ट्रपतिबनने के साथ ही उनके पराभव की कहानी शुरू हो चुकी थी। ये आश्चर्यजनक है कि वो अभी तक सत्ता में बने हुए हैं।
पाकिस्तान का उदहारण यह बताता है कि ग़लत बुनियाद का फल सही हो यह सम्भव नही है । अब देखना यहहोगा कि आगे आने वाले नेता इस चीज को समझ पाते हैं या नही।
गुरुवार, 4 दिसंबर 2008
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