आज सुबह मैंने जी मेल में मेल लिखने के लिए कंपोज आप्शन देखा तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ .
जी मेल पर ऑरकुट एवं ब्लोगर की ही तरह अब भारतीय भाषाओँ में लिखने की सुविधा मिल गयी है । इसके लिए आपका ब्राउजर एक्स्प्लोरर में ७ और मोजिला में ३ से ऊपर का होना चाहिए . तो देर किस बात की है शुरू कीजिये न !
और हाँ ये अप्रैल फूल नहीं है
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बुधवार, 1 अप्रैल 2009
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009
कमेन्ट मोडरेशन को तानाशाही मानने वाले विरोध के तरीके का मोडरेशन करना चाहते हैं
नोटपैड नामक ब्लॉग पर सुजाता जी ने एक बड़ी ही सार्थक पहल की - बहस का फोकस तय करना । उन्होंने जो कुछ कहा है वह बहुत ही सटीक है मेरा उसे यहाँ दुहराने का कोई मन नही है । एक ही चीज बार बार पढाने से क्या फायदा।
वहीँ से लिंक मिला एक और ब्लॉग का जहाँ निशा के विरोध के तरीके पर सवाल उठाया गया था । सवाल तो वो बहुत से उठाते हैं पर मुझे याद आया की कुछ दिन पहले इन्होने जोरदार ढंग से कमेन्ट मोडरेशन को तानाशाही काप्रतीक बताया था । वो अपने ब्लॉग पर कमेन्ट मोडरेशन नही करते होंगे। पर दूसरों के तरीकों का मोडरेशन करनाचाहते हैं। चाहते हैं की स्त्रियाँ एक सीमा का अनुसरण करें, चाहते हैं की विरोध करना ही है तो उनसे सीख लें ।
भले ही वो विरोध का तरीका वही पुरुषोचित तरीका हो जिसका उन्होंने भी विरोध किया है (?)
शायद उनके लिए कमेन्ट आम आजादी से बड़ी चीज है ।
सुजाता जी ने सही ही कहा है कि बहस का फोकस तय होना चाहिए। मोडरेशन वाली तानाशाही के विरोधी औरउनका समूह इस पूरी चर्चा को हाइजैक करके संस्कृति वगैरह से जोड़ना चाहता हो । जिन्हें महिलाओं के इस विरोधसे परेशानी है उनके पास चारा ही यही है संस्कृति की दुहाई देना , सवाल उठाने वालों पर उँगलियाँ उठाना औरउनकी जानकारियों पर सवाल उठाना ।
बहस का फोकस लगातार शराब , पब, पेज थ्री की और खींचने की कोशिश हो रही है
शायद उन्हें आजादी सहन नही वो भी महिलाओं की ?
वहीँ से लिंक मिला एक और ब्लॉग का जहाँ निशा के विरोध के तरीके पर सवाल उठाया गया था । सवाल तो वो बहुत से उठाते हैं पर मुझे याद आया की कुछ दिन पहले इन्होने जोरदार ढंग से कमेन्ट मोडरेशन को तानाशाही काप्रतीक बताया था । वो अपने ब्लॉग पर कमेन्ट मोडरेशन नही करते होंगे। पर दूसरों के तरीकों का मोडरेशन करनाचाहते हैं। चाहते हैं की स्त्रियाँ एक सीमा का अनुसरण करें, चाहते हैं की विरोध करना ही है तो उनसे सीख लें ।
भले ही वो विरोध का तरीका वही पुरुषोचित तरीका हो जिसका उन्होंने भी विरोध किया है (?)
शायद उनके लिए कमेन्ट आम आजादी से बड़ी चीज है ।
सुजाता जी ने सही ही कहा है कि बहस का फोकस तय होना चाहिए। मोडरेशन वाली तानाशाही के विरोधी औरउनका समूह इस पूरी चर्चा को हाइजैक करके संस्कृति वगैरह से जोड़ना चाहता हो । जिन्हें महिलाओं के इस विरोधसे परेशानी है उनके पास चारा ही यही है संस्कृति की दुहाई देना , सवाल उठाने वालों पर उँगलियाँ उठाना औरउनकी जानकारियों पर सवाल उठाना ।
बहस का फोकस लगातार शराब , पब, पेज थ्री की और खींचने की कोशिश हो रही है
शायद उन्हें आजादी सहन नही वो भी महिलाओं की ?
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008
सबसे खूबसूरत पारी!
सबसे खूबसूरत वो पारी है
जो अभी खेली जानी बाकी है
सचिन के लिए .
मुझे क्रिकेट में कोई ख़ास रूचि नही है पर जब भी मैच होता है सचिन का खेल देखने बैठ जाती हूँ . कभी कभी तो ऐसा मन होता है कि ओपनिंग करने वाले और सचिन के पहले आने वाले आउट हो जाय जिससे सचिन क्रीज पर आ जायें और ........
हर टेस्ट के पहले सोचती हूँ कि इस टेस्ट में सचिन ४०० क्रास कर जाएँ . हर वनडे के पहले मन होता है कि काश इस मैच में सचिन २०० क्रास कर जाए . मेरे दोस्त कहते हैं मुझे क्रिकेट की समझ नही है . मै हूँ जानती वो सही हैं.
पर सचिन आइकोन सिर्फ़ अपने क्रिकेट के लिए ही नही बने हैं. उनकी सरलता , उनकी लगन , उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति सब कुछ मिलकर उन्हें आइकोन बनाती है. २००३ के वर्ल्ड कप में पहले दो मैचों के बाद कप्तान और कोच नही सचिन को प्रेस कांफ्रेंस करे को कहा गया कि भारतीय क्रिकेट प्रेमी भरोसा रखें . वो एक ऐसा चह हैं जिनमे अपने आप भरोसा हो जाता है .
कुछ दिन पहले किसी ने कहा था कि ओबामा अमेरिका के लिए वही है जो क्रिकेट के लिए सचिन हैं. पता नही इन समानताओं में क्या होता है क्या नही .
कभी कभी सोचती हूँ कि भारतीय राजनीति को उसका अपना सचिन कब मिलेगा ,
जिसमे भरोसा हो सबको
जो खरा उतरे उन भरोसों पर
भले ही प्रश्न उठें पर वो उत्तर देने को हमेशा तत्पर रहे .
बुधवार, 22 अक्टूबर 2008
चुपके से
गहरे सन्नाटे में
चुपके से
धीरे धीरे
मेरे क़रीब आकर
किसी ने
मुझसे कुछ कहा!
मैं सहमी
अलसायी
नींद में उलझी,
पूछ बैठी
कौन है?
कोई जवाब नहीं
ना कोई पद चिन्ह
ना कोई परछाई
फिर भी
छोड़ गया
एक निःशब्द सवाल!
मैं कौन हूँ?
मेरा वज़ूद क्या है!
Reference - Turning the wheel
शुक्रवार, 26 सितंबर 2008
आप संघ के नही हैं तो आप सिमी के हैं?
पिछले दिनों एक ब्लॉग पर उस ब्लॉग को लिखने वाले ने मुझे आमंत्रित किया अपना उपन्यास पढने के लिए। उस ब्लॉग पर पहुँचते ही मेरी नजर पड़ गई संघ की तारीफ़ में लिखे एक लेख पर। उक्त ब्लॉगर ने वह लेख एक अफलातून जी के संघ के ऊपर प्रहारों के विरोध में लिखा था। अफलातून जी ने शायद अपने लेख में संघ के नमूने की देशभक्ति को राष्ट्र के लिए घातक बताया था। मै उक्त ब्लॉगर और अफलातून जी के तर्कों की विवेचना कर पाती इससे पहले मेरी नजर पड़ गई उक्त ब्लॉगर द्वारा अपने लेख पर की गई टिप्पणी पर दिए गए जवाब पर. वो जवाब पढने के बाद मुझे मजबूरन बिना पढ़े ही अफलातून जी के तर्क सही लगने लगे.
उक्त ब्लॉगर के लेख पर किसी ने टिप्पणी की थी "क्या मै संघ का हूँ?"
और उस ब्लॉगर ने जवाब दिया
"तो क्या आप सिमी के हैं?"
जैसा कि मैंने बताया कि अफलातून जी ने संघ प्रकार की देशभक्ति को देश के लिए घातक बताया था।
एक संघ समर्थक का बुश की शैली में ये जवाब कि अगर आप हमारे साथ नही हैं तो आप दुश्मन के साथ हैं वास्तव में देश के लिए घातक ही है. और अगर संघ ऐसे ही सोचता है तो वह राष्ट्र के लिए घातक ही है.
क्या संघ अकेला देशभक्त संघटन है? क्या अब लोगो को अपनी देशभक्ति संघ से प्रमाणित करवाने की जरूरत पड़ने लगेगी? देश के लोगों को संघ और सिमी दो पालों में तोड़ देने वाले लोग किस तरह से राष्ट्रभक्त हो सकते हैं मुझे नही पता.
उस ब्लॉगर से मैंने उसकी इस गलती की चर्चा की तो पता चला कि वह महोदय उन बंद दिमाग लोगों में से हैं जिन्होंने सोचने समझने की शक्ति का कभी इस्तेमाल ही नही किया होगा. मेरी आपत्ति के जवाब में उन्होंने सीधे मुझे अफज़ल जैसे लोगो का हमदर्द बताना शुरू कर दिया. मेरे ये कहने पर कि मैंने अफज़ल का कभी समर्थन नही किया है उन्होंने मुझे कहा कि नही किया है तो करोगी. और गुप्त रूप से करती होगी.
मुझे याद आया उन चर्चाओं का कि कैसे अति राष्ट्रवादी अन्य सभी को हेय साबित करने के लिए ख़ुद की बनाई मान्यताओं का प्रयोग करते हैं.
मुझे याद आया कि इसी तरह हर मौके पर कैसे अन्य सभी को एक उस पाले में धकेलने की कोशिश की जाती है जिसमे वो कभी रहे ही नही और तब क्या ग़लत होता है जब इस तरह धकियाये लोगों में से कुछ सचमुच उस पाले में ख़ुद को खड़ा पाते हैं.
इसी तरह तो तोडा जाता है राष्ट्र को
इसी तरह से तो बनाया जाता है अविश्वास का वातावरण.
शायद वो उन्ही फलसफों पर बढ़ते हैं जो हिटलर जैसे लोगों ने खड़े किए थे
---जो आप से सहमत नही हैं उन्हें ख़त्म कर दो
फिलहाल मै जानती हूँ अपनी आस्था मुझे किसी के प्रमाणपत्र की जरुरत नही है देशभक्ति साबित करने के लिए। इस देश की होने के चलते मुझे हक़ है हर चीज में बोलने का, सवाल उठाने का और जवाब पाने का और मै समझती हूँ सभी को यह महसूस करना चाहिए, हिंदू हो या मुसलमान सभी को
विघटन कारी शक्तियों के मनसूबे तभी नेस्तनाबूत होंगे
उक्त ब्लॉगर के लेख पर किसी ने टिप्पणी की थी "क्या मै संघ का हूँ?"
और उस ब्लॉगर ने जवाब दिया
"तो क्या आप सिमी के हैं?"
जैसा कि मैंने बताया कि अफलातून जी ने संघ प्रकार की देशभक्ति को देश के लिए घातक बताया था।
एक संघ समर्थक का बुश की शैली में ये जवाब कि अगर आप हमारे साथ नही हैं तो आप दुश्मन के साथ हैं वास्तव में देश के लिए घातक ही है. और अगर संघ ऐसे ही सोचता है तो वह राष्ट्र के लिए घातक ही है.
क्या संघ अकेला देशभक्त संघटन है? क्या अब लोगो को अपनी देशभक्ति संघ से प्रमाणित करवाने की जरूरत पड़ने लगेगी? देश के लोगों को संघ और सिमी दो पालों में तोड़ देने वाले लोग किस तरह से राष्ट्रभक्त हो सकते हैं मुझे नही पता.
उस ब्लॉगर से मैंने उसकी इस गलती की चर्चा की तो पता चला कि वह महोदय उन बंद दिमाग लोगों में से हैं जिन्होंने सोचने समझने की शक्ति का कभी इस्तेमाल ही नही किया होगा. मेरी आपत्ति के जवाब में उन्होंने सीधे मुझे अफज़ल जैसे लोगो का हमदर्द बताना शुरू कर दिया. मेरे ये कहने पर कि मैंने अफज़ल का कभी समर्थन नही किया है उन्होंने मुझे कहा कि नही किया है तो करोगी. और गुप्त रूप से करती होगी.
मुझे याद आया उन चर्चाओं का कि कैसे अति राष्ट्रवादी अन्य सभी को हेय साबित करने के लिए ख़ुद की बनाई मान्यताओं का प्रयोग करते हैं.
मुझे याद आया कि इसी तरह हर मौके पर कैसे अन्य सभी को एक उस पाले में धकेलने की कोशिश की जाती है जिसमे वो कभी रहे ही नही और तब क्या ग़लत होता है जब इस तरह धकियाये लोगों में से कुछ सचमुच उस पाले में ख़ुद को खड़ा पाते हैं.
इसी तरह तो तोडा जाता है राष्ट्र को
इसी तरह से तो बनाया जाता है अविश्वास का वातावरण.
शायद वो उन्ही फलसफों पर बढ़ते हैं जो हिटलर जैसे लोगों ने खड़े किए थे
---जो आप से सहमत नही हैं उन्हें ख़त्म कर दो
फिलहाल मै जानती हूँ अपनी आस्था मुझे किसी के प्रमाणपत्र की जरुरत नही है देशभक्ति साबित करने के लिए। इस देश की होने के चलते मुझे हक़ है हर चीज में बोलने का, सवाल उठाने का और जवाब पाने का और मै समझती हूँ सभी को यह महसूस करना चाहिए, हिंदू हो या मुसलमान सभी को
विघटन कारी शक्तियों के मनसूबे तभी नेस्तनाबूत होंगे
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