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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

युद्धोन्मादी समाज में शान्ति की वकालत


बॉर्डर फिल्म के अंत में एक गाना था "मेरे दुश्मन , मेरे भाई"
युद्ध पर बनी इस फिल्म में ये गाना युद्ध की खिलाफत करता हुआ शान्ति की वकालत करता है। उस समय देश देशभक्ति को लेकर इतना संवेदनशील नहीं हुआ था   नहीं तो लोग इस गाने के रचयिता, गायक और फिल्म के निर्माताओं का विरोध करते, अपनी (घृणित) मानसिकताओं का प्रदर्शन करते।  उस समय  लोग इस फिल्म को देखने को ही देशभक्ति मानते थे. 

देश के एक प्रधानमंत्री  बस  जिसे सदा-ए -सरहद का  नाम दिया था उसे लेकर पाकिस्तान गए।  उद्देश्य था जंग के खिलाफ एक मज़बूत  पहल , शान्ति  की वकालत।  शायद लोग जानते नहीं थे  कि   पाकिस्तान  इस देश का दुश्मन है  नहीं तो प्रधानमंत्री  जी लाहौर  चले  तो गए थे पर वापस नहीं आ पाते।  


एक और देशभक्त प्रधानमंत्री अभी कुछ दिनों  अचानक शान्ति और प्रेम की पहल  के साथ  पकिस्तान पहुँच गए।  शायद वे प्रधानमंत्री थे एक मामूली छात्र नही । बड़े लोग कुछ भी कर सकते हैं कभी शांति की वकालत कभी युद्ध का उद्घोष । तोहफों की अदला-बदली या सीमाओं पर गोलियों की अदलाबदली । हमें तो बस वे जो कहें उसे करते जाना है । जब जंग कहें तो सीना तान कर सीमा पर खड़े हो जाना और अपने सगे संबंधियों की मौत को शहादत कह कर गर्व करना और जब शांति कहें तो फूल माला लेकर हुक्मरानों के मेहमानों का स्वागत करने  पहुँच जाना हैं । 
अभी कुछ दिन पहले संसद में एक  निजी विधेयक पर सरकार ने बताया कि पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित नही किया जा सकता ।  गृह मंत्रालय ने इस विधेयक को लेकर अपने विरोध के बारे में राज्य सभा सचिवालय को सूचित कर दिया है. मंत्रालय ने कहा कि ऐसा कदम अंतरराष्ट्रीय संबंधों में 'बाधा' डालने वाले हैं। सरकार तो सरकार होती है उसे कोई कुछ क्यों कहेगा 
हम आवाम हैं हुक्मरान नही ये बात एक बच्ची भूल गई । कोई बीस साल की एक बच्ची ये समझने में तो कामयाब हो गई की उसके पिता की मौत की ज़िम्मेदारी उस सदा चलने वाले युद्ध की है जिसका शिकार अभी और भी न जाने कितने मासूमों को होना है वो यह तो समझ गयी कि युद्ध का ये दौर खत्म हुए बिना देश का हर परिवार अपने सगे संबंधियों को खोने के लिए अभिशप्त है लेकिन वो ये नही समझ सकी कि देशभक्ति के इस दौर में शांति की वकालत आम शहरियों को नही करनी है वो तो हुक्मरानों का डोमेन है। 


जिन घरों के लोग इस उन्माद की भेंट चढ़ते हैं उन्हे शायद कभी युद्ध पसंद न हो लेकिन वे लोग जिन्हें सीमा का "स" भी नही पता होता उनके अंदर देशप्रेम हिलोरें मार रहा होता है। वे युद्धोन्माद के गीत रचते हैं , शहीदों पर गर्व करते हुए सीना तान कर देशभक्ति के नारे गढ़ते हैं और पीठ फिरते ही उनही शहीदों के बच्चों को उनकी औकात बताने लग जाते हैं कि तुम सिर्फ शहादत के लिए हो खुद को अभिव्यक्त करने के लिए नही। 
गुरुमेहर कौर इन प्लेकार्ड्स ने और इसपर आई प्रतिक्रियाओं ने काफी कुछ ऐसा प्रकट किया है जिसे हम सभी को समझने की जरूरत है। तुम से बच्चे हर समाज के लिए  रौशनी की किरण होते हैं। 
अंत में 
प्रिय सरकार ,
सोशल मीडिया पर सदा सर्वदा मौजूद रहने के बाद भी क्या आपके किसी भी सदस्य को कभी यह महसूस नही हुआ कि एक बच्ची की का ये वीडियो देशप्रेम , शांति और समझ की वकालत कर रहा है । क्या आपको कभी ये नही लगा कि ये बच्ची वही कह रही है जो सरकारें अक्सर कहती हैं । 
चलिये  नही लगा तो नही सही पर क्या आपको कभी नही लगा कि इसपर आने वाली कुत्सित प्रतिक्रियाएँ भर्त्सना के लायक हैं? 
नही लगा तो आप नुमाइंदे नही शासक हैं 
-आपकी आवाम 

रविवार, 5 अगस्त 2012

राजनीति में गैंग अन्ना

पहले दिन जब गैंग अन्ना के लोगों ने राजनीतिज्ञों को गालियाँ देना शुरू किया, हमें अनुचित लगा था . किनारे खड़े होकर उपदेश देना गई जिम्मेदारी भरा काम होता है . आपको लगता है कि कुछ गलत है तो आप दूसरों से उसे सुधारने के लिए कहना शुरू करते हैं यह गलत है . कुछ बुरा है उसे सुधारा जाना चाहिए तो दूसरे क्यों आप खुद क्यों नहीं ?
गैंग अन्ना शुरू से राजनैतिक आंदोलन था और इससे राजनीति को अलग ही नहीं किया जा सकता था . राजनीति अलग तब होती जब आप सिर्फ उन सुधारों की बात करते जो आप चाहते हैं , उसके लिए कानूनी , संविधान सम्मत तरीके अपनाते .आपका तरीका सिर्फ और सिर्फ सकारात्मक होना था .  आपकी भाषा सिर्फ आपके उद्देश्य के लिए तय होती. आप एक राजनैतिक दल चुन कर उसका विरोध करने की बात नहीं करते . हम शुरू से ही इस आंदोलन को अपरिपक्व इसी लिए मान रहे थे. वस्तुतः आप किसी चीज के लिए  से हट कर किसी के खिलाफ नजर आने लगते हैं तो इसके मायने कुछ और ही होते हैं.
पिछली अप्रैल और अगस्त में जो जन समर्थन गैंग अन्ना को मिला इन्होने उसका मतलब गलत लगा लिया . भीड़ इनकी खुराक बन गयी और भीड़ ही प्राणवायु
मीडिया की चकाचौंध , रात-दिन कवरेज , मिस्सड काल्स , फेसबुक लाइक्स, कमेंट्स और ट्विटर तो साथ में थे ही . पांच -छह लोगों का समूह खुदा बन गया . खाप पंचायत बन गयी . कौन अच्छा है कौन बुरा , किसे पद में बाँध कर पीता जाना चाहिए किसे "बस एक थप्पड़ लगाना है " जैसी चीजे शुरू हो गयीं. और शुरू हो गया उन्माद परोसा जाना
गैंग के एक सदस्य ने आंदोलन के उफान के दिनों में अपने फेस बुक पर लिखा था
"स्थानीय इंटेलिजेंस के लोग हमारे बारे में पूछ ताछ कर रहे थे 
तो क्या डर जाऊं 
इससे अच्छा है की मर जाऊं "
एक पुरानी ट्वीट को अभी अभी का बता कर पेश किया जाता है कि सरकार खबरे दबा रही है वस्तुतः जितना मीडिया दिखा रहा है जन समर्थन उससे ज्यादा है
पिछली अगस्त में मेरे मोबाइल पर चेन एस एम् एस आते कि अमुक बच्चा जिसकी उम्र सिर्फ अमुक साल है अन्ना के साथ अनशन पर बैठा था आज बेहोश हो गया है डॉ उसकी स्थिति खतरनाक बता रहे हैं और सरकार ने खबर दबा ली है .
इस बार मैसेज आ रहे थे कि इस जगह हजारों की सख्या में लोग गिरफ्तार करके अनशन में पहुँचाने से रोके गए . फेसबुक पर लिखा जाता "तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहें "
सनसनी  फैला कर लोगों को यह अहसास कराया जा रहा था कि जैसे देश एक बड़े से रणक्षेत्र में बदल गया हो और सरकार का दमनचक्र चल रहा हो
अगर सरकार दमन पर उतारू ही थी तो आप कैसे सही सलामत हैं
सरकार का दमन कैसा होता है उनसे पूछिए जिन्हें आपातकाल की याद हो
कैसे आवाज का गला घोंटा जाता है तहलका से पूछिए
खैर !
हम गैंग के राजनीति में आने का स्वागत करते हैं उनकी नीयत पर सौ प्रतिशत अविश्वास होने के बावजूद हम चाहते हैं कि हम गलत साबित हों और गैंग सही साबित हो इस लिए हम चाहते हैं कि यह लोग समझे कि अगर राजनीति करनी है तो एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करें
परम शक्तिशाली लोकपाल ही एक मात्र चीज नहीं है जो हमें चाहिए सिर्फ भ्रष्टाचार का रुकना ही जरुरी नहीं है वैसा कोई दृष्टिकोण हमें आज तक नहीं नजर आया . अगर हम पूरे गैंग के प्रति सकारात्मक होकर भी आंकलन करें तो भी यह एक खाप पंचायत से बढ़कर कुछ नहीं है सुधारवादी परन्तु यथास्थिति वादी
जी नहीं ऐसी सरकार की भारत को जरुरत नहीं है खाप पंचायत की जगह थोड़ी भ्रष्ट सरकार भी चलेगी अगर वो प्रगति वादी विकास वादी और परिवर्तन वादी हो
गैंग को राजनीति जाननी होगी
उसे जानना होगा कि जितना समर्थन उसे उसके उफान के दिनों में मिला था उतना समर्थन भी उसे सिर्फ वोटकटवा पार्टी के रूप में ही खडा कर सकता है और समर्थन बढाने के लिए समग्रता की जरुरत है , अपने दंभ में कमी की जरुरत है . दूसरों को भी कुछ समझने की जरुरत है .
और हाँ
भारत में फिलहाल कोई राजनैतिक दल फेसबुक ट्विटर और मिस्सड काल के भरोसे नहीं खडा किया जा सकता . दिल्ली से बाहर निकलो घरों से बाहर निकलो दिनभर फेसबुक और ट्विटर पर आपके आंदोलन का समर्थन करने वाले कामकाजी लोग वस्तुतः भ्रष्ट ही हैं  क्योंकि वो अपने काम के समय में काम छोड़ कर यह कर रहे हैं 

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

बिकने को तैयार लोग, खरीदारों की खोज और दलाल

 तहलका की खोजी पत्रकारिता और सच तक पहुँचने की उसकी जिद के हम हमेशा से कायल रहें हैं. तहलका एक ऐसे स्तम्भ की भांति है जो आज पास की लहरों की चोटों  से अनजान सच की खोज और उसको दुनिया के सामने लाने के लिए हमेशा लगा रहता है. इसी क्रम में तहलका की ताज़ी तहकीकात , वोट के बदले नोट कांड पर की तहकीकात पढ़ने को मिली. इसे विस्तार से आप भाग १ व भाग २ में पढ़ सकते हैं . यह  तहकीकात विकिलीक्स में किसी छुटभैये सहयोगी की खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की उत्कंठा से कही गई बातों से ज्यादा प्रमाणिक हैं .
जुलाई 2008 के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कई कुचक्र एक साथ काम कर रहे थे. कांग्रेस और उसके सहयोगियों के सरकार बचाने के कुचक्र, वाम दलों की ऐंठ की किसी तरह यह सरकार गिरा कर अपनी ताकत दिखायें , बसपा और भाजपा को सरकार गिरनेके बाद मिल सकने वाली गद्दी की आस और छिटपुट सांसदों को इस मौके में अधिक से अधिक फ़ायदा उठा लेने की आस.
भाजपा को समर्थन न देने की मजबूरी के बाद जब वाम दलों ने बसपा की और रुख किया तो भाजपा को नजर आने लगा कि बसपा तो अनायास ही लाभ की स्थिति में आ गयी. भाजपा उत्तर  प्रदेश में बसपा को समर्थन दे कर उसकी  कीमत भुगत चुकी है . भाजपा को उम्मीद थी कि केंद्र में वह अगुवाई करेगी और बसपा उसका समर्थन करेगी. पर यहां तो उसका उलटा हो रहा था . वामदलों की शह पर बसपा सरकार बनाने का सपना देखने लगी थी और इसी लिए सरकार गिराने की जोड़तोड़ में वह आगे निकलती नजर आने लगी. वाम दलों को शायद बसपा के खरीद-फरोख्त के तौर तरीके अच्छे नहीं लगे इसलिए अविश्वास प्रस्ताव के आखिरी मुकाम पर पहुँचते पहुँचते उसने संसद के बाहर की सक्रिय भागीदारी छोड़ कर  खुद को संसदीय चर्चा तक ही सीमित कर लिया.
तहलका की तहकीकात खुलासा करती है, कि भाजपा सरकार के सामने किस तरह से चारे फेंकने में जुटी थी. भाजपा की पूरी कोशिश थी की बिकने को तैयार उसके नेताओं को किसी तरह कांग्रेस खरीदने में पकड़ी जाए और वह इस बात पर वाहवाही और फिर वोट समेटे . इसके लिए उसने बिकने को तैयार लोगों और दलालों को सक्रिय कर रखा था. इस अभियान को खुद भाजपा के  प्रधानमन्त्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवानी व कद्दावर नेता अरुण जेटली की देखरेख में चलाया जा रहा था.
इस तहकीकात के खुलासे के बाद  वाजिब सवाल उठते हैं 
इस तरह के बनाए हुए मामले में अगर भाजपा का उद्देश्य सिर्फ भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश ही था तो यह जानने के बाद वह कांग्रेस के किसी नेता को नहीं फंसा पायी है और उसके हाथ कुछ ख़ास नहीं लगा है  तो उसने संसद नोट लहरा कर व्यर्थ में संसद की गरिमा क्यों गिराई और सुधीन्द्र कुलकर्णी , अरुण जेटली जैसों की भागीदारी की बात भाजपा ने क्यों नहीं स्वीकारी ?

सोमवार, 19 जुलाई 2010

बारिश, बारिश पानी पानी

मौसम एक ऐसा विषय है जो बातचीत में अक्सर सप्लीमेंट का काम करता रहता है। मसलन आप किसी से मिलते हैं जिससे बात करने के लिए आप के पास ज्यादा कुछ नहीं है तो झट से मौसम के ऊपर एक छोटी सी परिचर्चा आयोजित करवा सकते हैं। ऐसा ही विषय राजनीति भी माना जाता रहा है पर पिछले कुछ महीनो से हमें राजनीति की लोकप्रियता में गिरावट देखने को मिल रही है । हो सकता है यह गिरावट सिर्फ हमें ही नजर आ रही हो पर कुछ तो है।
खैर हम मौसम पर थे। तो मान लीजिये आपको कोई मिला जिससे बात क्या करें आपको समझ में नहीं आ रहा हैतो आप क्या करते हैं ज्यादातर लोग बात की शुरुआत आज बहुत गर्मी है या इस बार बारिश लेट हो रही है से शुरू करते हैं। ऐसा नहीं है कि लोग इस बार गर्मी कम है या इस बार बारिश अच्छी हो रही है नहीं कह सकते लेकिन परेशानी तो यह है कि गर्मी बढती जा रही है और बारिश कम होती जा रही है। हर साल यही होता आ रहा है या तो बारिश कम होती है या फिर होती है तो ऐसी कि सबकुछ तहस नहस कर देने वाली । जैसे कि पिछले ही कुछ दिनों से चीन के कई हिस्सों में हो रही है । आपको याद होगी चीन की ओलम्पिक उदघाटन समारोह में बारिश रोक देने वाली शानदार कहानी
हमें याद आती है एक उपन्यास की नाम था "सामर्थ्य और सीमा "
बारिश या तो कम हो रही है या बहुत ज्यादा
या तो सूखा आता है या फिर बाढ़
अभी कुछ दिन पहले किसी ने हमसे क्योटो प्रोटोकाल के बारे में पूछा था हम उसे समझा रहे थे और खुद सोचते जा रहे थे कि हम क्यों नहीं समझ रहे हैं सीधी सी बात
हमें नहीं समझ में आ रहा है कि हम खुद से ही हारते जा रहे हैं । हमें अंत नजर आ रहा है और हम उसकी ओर बेफिक्री से बढ़ते जा रहे हैं।
तो अगर आपके पास बात करने के लिए कुछ नहीं है तो मौसम पर परिचर्चा कर लीजिये। वैसे तो हम सब बहुत बिज़ी हैं
खैर आज हम छुट्टी पर हैं(खाली हैं कुछ करने को नहीं है तभी मौसम नजर आ रहा है ) और लखनऊ में सुन्दर बारिश हो रही है।
दो साल पहले जब भारी बारिश हुई थी तो कुकरैल नाले (शहर में बहने वाला एक नाला )में आई बाढ़ में उसके किनारे बसी (अवैध या वैध पता नहीं )अकबर नगर कालोनी डूब गयी थी।इस बार नाले के किनारे किनारे डॉ आंबेडकर पथ का निर्माण हो रहा है तो नाले की एक तरफ सीमा ढंग से बाँध दी गयी है । दूसरी तरफ पड़ता है अकबर नगर । अगर ज़रा सी भी ठीक बारिश हुई तो अकबर नगर डूबना तय होगा । उम्मीद है वहां के वाशिंदों ने तैयारी कर रखी होगी। अगर सरकार डॉ आंबेडकर पथ बनाने के साथ साथ नाले के प्रवाह का भी ढंग से इंतजाम करती चलती तो डॉ आंबेडकर बुरा नहीं मानते न ही पहचान से जुड़ा कोई संकट खडा होता। राहत की बात है कि निकाय चुनाव नजदीक हैं अगर बाढ़ आई तो निकाय प्रत्याशी कुछ जनसेवा कर लेंगे ।

राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अंतर्गत गावों में जलाशयों का निर्माण हुआ है जिसमें वर्ष जल संचयन का विचार होगा दूर से देख कर तो लगता है कि अच्छा विचार है कभी पास से देखने का मौक़ा मिला तो पता चलेगा कि कितने कारगर जलाशय होंगे ।
अंततः एक बात जिस बच्चे को हम क्योटो प्रोटोकाल के बारे में बता रहे थे उसने एक सवाल पूछा
अमेरिका जिसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बनती थी ग्रीन हाउस गैसों में कमी की वही क्यों पीछे हटा ?
जवाब सीधा है पर फिर भी खटकता है ।
सरकार पीछे हट गई तो क्या महान अमेरिका के नागरिक भी नहीं सोचते कुछ
"एक असुविधाजनक सच" जैसी बाते ही होती रहेंगी या कुछ और भी होगा
नोबल पुरस्कार अंतिम सच है क्या कोई काम हाथ में लेने का

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

डिजिटली बी पी एल होने की व्यथा

रात के एक बजे थे अचानक मोबाइल की एस एम् एस टोन गुहार लगाती है ।
एस एम् एस एक दोस्त का था जो दिल्ली में बैठा हुआ था । अभी थोडी देर पहले तक वो जिद कर रहा था कि ऑनलाइन आओ कुछ बात करनी है। तमाम कोशिशों के बाद भी जब नेट कनेक्ट नही हो पाया तो हमने हथियार डाल दिए और वो मायूस होकर चुप होगया।
यु आर डिजिटली बी पी एल!
एस एम् एस कहता है।
डिजिटली बी पी एल होना आज के युग में एक बड़ी परेशानी की बात हो गई है।
दिल्ली और लखनऊ में रहने वाले के लिए ३जी न होना बी पी एल होना है डिजिटली बी पी एल !
देश के जिस हिस्से में आजकल हम हैं वहां पर लोग कई तरह से बी पी एल हैं
२००१ की जनगणना के हिसाब से ५१००० के आस पास की आबादी वाले इस इलाके में करीब १०००० के आस-पास बी पी एल राशन कार्ड हैं। पाँच सदस्यों वाले परिवार का हिसाब लगायें तो कोई पचास हज़ार बी पी एल!
राशन कार्ड में गरीबी जम के झलकती है । कोटेदार के कोई बीस हज़ार रूपये खर्च होते हैं अलग अलग लोगों को खुश करने में। अब इसके बाद उसकी कमाई भी होती होगी। तो फ़िर गरीबी कमाई का अच्छा साधन हुआ। एक बी पी एल परिवार कितने लोगों की गरीबी दूर करता है इसका हिसाब लगाने पर पता चलता है कि बी पी एल होना कितना जरूरी है।
लखनऊ में सामजिक परिवर्तन स्थल से गुजरें तो सामाजिक परिवर्तन नजर आता है । चुंधियाती हुई रौशनी ! पूरा इलाका रात में भी दिन को मात देता हुआ सा लगता है।
लखनऊ से बाहर निकलते ही पता चलता है कि बाकी के इलाके बिजली के हिसाब से बी पी एल हैं। अभी हम जहाँ बैठे हैं वहां हफ्ते-वार बिजली की व्यवस्था चलती है । एक हफ्ते में दिन में लाईट आती है (आती जाती है ) , तो अगले हफ्ते रात में (आती-जाती है )। सामाजिक परिवर्तन लखनऊ में नजर आता है लखनऊ से बाहर गायब हो जाता है।
खैर जो चीजें सिर्फ़ दिखाने की हैं वो लखनऊ और दिल्ली में ही शोभा देती हैं । सामाजिक परिवर्तन दिखाने की ही चीज है शायद होने की नही।
एक इलाके में पहुंचे वहाँ बोर्ड लगा हुआ था -
मोबाइल चार्जिंग - पाँच रूपये मात्र।
बिजली नही पहुँची लेकिन मोबाइल मौजूद है अब मोबाइल है तो चार्ज भी होना होगा। लोग डिजिटल बैकवर्ड नेस से बाहर निकल चुके हैं बिजली आए न आए।
मोबाइल कंपनियाँ नए नए मोबाइल निकाल रही हैं बिजली आए न आए मोबाइल चलता जाए!
उन्हें धंधा चलाना है बिजली आए न आए , उन्हें धंधा चलाना है लोगों की जेब में जितना भी पैसा हो उसे ध्यान में रखते हुए ।

कुछ दिन पहले एक थोडा ख़ुद को गिनाने वाले ने हमें धमकी दी थी
-रहना तो यही है न !
हमें सुनकर गुस्सा आ गया
- क्यों यहाँ कौन से सुरखाब के पर लगे हुए हैं ? और यार तुम लोग एक लाईट तो अपनी सही नही करवा पाते आ जाते हो छोटी -छोटी बातों पर धमकी देने
हमारी बात सुनकर वो चुप हो गया हमने उसकी दुखती राग पर हाथ रखा था। वो सामाजिक परिवर्तन स्थल वाले दल का कार्यकर्त्ता था

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

गुनहगार

तमाचे से जैसे उसके कान सुन्न से हो गए थे । हाथ लगा कर देखा तो कुछ खून का आभास हुआ होठों पर । अब उसने चारों तरफ़ देखने की कोशिश की तो पाया मारने वाला जा चुका था और आस पास इकट्ठा लोग उसी की तरफ़ देखे जा रहे थे।
ये दिन का कोई एक समय और भरे हुए बाजार में कोई एक जगह थी । समय और जगह महत्वपूर्ण नही थी न ही वो ख़ुद। बस ख़ुद में ही गुम वो कहीं चला जा रहा था कि सामने से आ रहे किसी ने उसे रोका और बिना कुछ पूछे , बिना कुछ कहे एक झन्नाटेदार तमाचा उसे जड़ दिया।
महत्वपूर्ण था वो झन्नाटेदार तमाचा !
दिन के किसी एक समय और भरे बाजार की किसी एक जगह पर बिल्कुल मामूली और महत्वहीन से उस इंसान को लगा कि कम से कम उसे उसकी गलती तो पता होनी चाहिए थी। लेकिन मारने वाला बिल्कुल से तमाचा लगा कर चला गया।
अब जब वो थोड़ा संभला तो पाया कि भरे बाजार में इकठ्ठा भीड़ उसी कि तरफ़ देख रही थी। उनकी आंखों में संवेदना की जगह ख़ुद को लोगों को हुए नही थी। उसने पाया कि सभी लोग उसे ही गुनाहगार मान रहे थे था बहुत दिन क्या सहाय! उस बेहद महत्वहीन इंसान को एक थप्पड़ ने लोगों की नजरों में महत्वपूर्ण बना दिया .
बहुत दिन हुए उसने ख़ुद को लोगों के द्बारा देखते हुए नही पाया था, नही शायद कभी नही पाया था। आज उसने देखा तो पाया कि लोगों की निगाहें बहुत अजीब होती हैं। उसने पाया कि लोग सोचते नही बस देखते हैं और जब लोग देखते हैं तो न जाने क्यों एक गुनाहगार खोजते हैं । उसे लगा कि लोगों को ये उम्मीद ही नही हो सकती कि कोई गुनहगार से हट कर और भी कुछ हो सकता है ।
उसने याद किया कि वो ख़ुद भी लोगों की ही तरह तो है।
जिंदगी के इन तमाम सालों में उसने गुनहगार ही तो खोजें हैं। जिंदगी के इन तमाम सालों में उसे कभी यह नही लगा कि लोग और भी कुछ हो सकते हैं । और कुछ भी ... मसलन बेचारे !
जैसा वह अभी ख़ुद था।
यह चक्रव्यूह है ।
लोगों को बेचारा बना कर उन्हें गुनाहगार बताने का ।
यह चक्रव्यूह है लोगों अलग थलग कर देने का ।
उसने फैसला किया कि उसे अलग थलग नही होना है।
उसने फैसला किया कि उसे वापस उसी गुमनामी में जाना है जहाँ वह लोगों को गुनाहगार समझ सके , लोगों की आरोप लगाती नज़रों से बच सके।
अगले ही पल उसने सबसे नज़दीक एक अपने जैसे लग रहे एक इंसान को खोज निकाला और पूरी मजबूती से एक थप्पड़ उसे जड़ दिया।
आस-पास की भीड़ में एक हलचल सी हुई। वह कांपते हुए किनारे खोजने लगा कि किसी तरह से लोगों कि भीड़ से बच कर भागा जाए
पर यह क्या
वह पहले से ही किनारे था।
लोगों की नजरें किसी और पर टिकी हुईं थी । लोग फुसफुसा कर बातें कर रहे थे । शायद लोग उसी को देख रहे थे जिसे उसने अभी अभी थप्पड़ जड़ा था।
उसने लोगों की निगाहों का अनुसरण किया । भीड़ के बीच एक आदमी खडा था, लोग उसे देखे जा रहे थे।
उसने भी एक उड़ती सी नजर उस पर डाली और उसका मन चिढ से भर गया ।
तो यही है वह गुनाहगार!
वह भूल चुका था कि कुछ देर पहले वह ख़ुद गुनाहगार था ।

सोमवार, 11 मई 2009

उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य -2

शेष से आगे

बसपा की २००७ की चुनावी सफलता के कई आयाम थे। उनमे से एक प्रमुख आयाम चुनाव आयोग की कडाई औरलोगों का वोट देने कम निकलना था । चुनाव आयोग की कडाई के चलते बड़े पैमाने पर होने वाली बूथ कैप्चरिंग नसिर्फ़ रुकी बल्कि समाज के निचले तबके के लोगों ने, जो बसपा के प्रतिबद्ध वोटर हैं, खुल कर वोट दिया। अन्यवर्गों के लोग हमेशा से कम वोट देते रहे थे और ऐसा ही उन्होंने उस बार भी किया।
इसके अतिरिक्त बसपा को एक प्रमुख लाभ उम्मीदवारों की फ्रेशनेस का भी मिला । बसपा के अधिकतर उम्मीदवारचुनावी जंग में ही नही राजनीति में भी नए थे जिसका फायदा उन्हें उनकी जातियों के वोटों के रूप में भी मिला ।
इसके अलावा लोगों की सपा सरकार के प्रति नाराजगी भी महत्वपूर्ण रही थी। एक नारा भी बहुत जोर शोर से चलाथा
चढ़ गुंडों की छाती पर
मुहर लगाओ हाथी पर

लोकसभा और विधान सभा और बसपा

विधानसभा चुनावों के उलट लोकसभा चुनावों का परिदृश्य अलग होता है। एक सीधा सा गणित देखते हैं मान लेतेहैं एक लोकसभा क्षेत्र में ५ विधानसभा की सीटें आती हैं (जैसा उत्तर प्रदेश में औसत है.) तो कोई एक पार्टी उसलोकसभा क्षेत्र के चार विधान सभा क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी पांचवी में हार के चलते पूरी सीट हारसकती है। अतः विधानसभा में प्राप्त सीटें सारे समीकरण पहले जैसे रहने के बावजूद उसी अनुपात में लोकसभासीटों में बदल जाएँ ये जरूरी नही है।
इसके अतिरिक्त विधान सभा चुनाओं की तरह के मुद्दे कमसे कम उत्तरप्रदेश में लोकसभा चुनावों में तो लागू नहीरहते । उदहारण के लिए कांग्रेस का पिछले दो लोकसभा और विधान सभा चुनावों में प्रदर्शन देख लें । पिछले दोविधानसभा चुनावों में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में २५ के आस-पास सीटें मिली जबकि लोकसभा में यह संख्या ९-१०रही। साफ़ है कि कांग्रेस विधानसभा चुनावों में बुरा प्रदर्शन करने के बाद भी लोकसभा चुनावों में अपेक्षाकृत कमबुरा प्रदर्शन करती रही है।

बसपा की इन चुनावों में कमियां

बसपा ने इन चुनावों में दूसरी पार्टियों से आनेवाले लोगों को जमकर टिकट दिया है । दूसरी पार्टियों से आने वालेलोग जहाँ अपना कुछ जनाधार लेकर आते हैं वहीँ कुछ नकारात्मक आधार भी ले आते हैं। एक उदाहरण के लिएबसपा के अम्बेडकरनगर से उम्मीदवार राकेश पाण्डेय की बात करें तो वहां पर उनके परिवार की बसपा के वहीँ सेमंत्री और प्रमुख नेता रामअचल राजभर से शत्रुता रही है । अब बसपा के कैडर के लिए राकेश पाण्डेय के पक्ष मेंप्रचार कर पाना कठिन लग रहा है। उल्लेखनीय है कि यह सीट बसपा प्रमुख मायावती की सीट रही है और इस सीटपर बसपा की हार का खतरा नजर आ रहा है।
लब्बोलुआब यहं है की बसपा ने फ्रेशनेस का लाभ गवां दिया है जिसका असर लोकसभा के चुनाव परिणामों मेंनजर आना लाजिमी है।

नारा हट गया!


लगता है बसपा के कार्यकर्ताओं को चढ़ गुंडों की छाती पर..... नारा प्रयोग न करने की भी हिदायत सी दी गई है ।इन चुनावों में इस नारे का प्रयोग नजर नही आया। कारण सपा सांसद अफजाल अंसारी और उनके भाई मुख्तारअंसारी दोनों बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, बाहुबली नेता और पूर्व विधायक हरिशंकर तिवारी के परिवार मेंतीन लोकसभा टिकट दी गए। इसके अतिरिक्त बसपा के अनेक विधायकों की कारगुजारियां लोगों के सामने हैं ।

भाजपा और कांग्रेस की स्थिति भी जैसी बुरी थी वैसी नजर नही आ रही है
जारी है

रविवार, 10 मई 2009

उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य-1

आज फ़िर बहुत दिनों के बाद लिखना हो पा रहा है इस बीच जहाँ कुछ लिखना सम्भव नही हो पा रहा है वहीँ अपनेमनपसंद ब्लॉग पढने का समय नही मिल पा रहा है ।

आम चुनाव

आम चुनाव अपने आखिरी चरण में पहुँच गया है । पहले जहाँ नेता जीत के दावे करते फ़िर रहे थे वहीँ अबएक-दूसरे को रिझाना शुरू कर दिया है। वोटर को रिझाना ख़त्म हुआ अब पार्टियों और नेताओं की बारी है।
चुनाव शुरू होने से पहले उत्तर प्रदेश के बारे में कुछ ख़ास तरीके से सोचा जा रहा था। इस सोच में शामिल कुछ बातेंथीं:
१- मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तरप्रदेश से ही कम से कम ४० सीटें तो पा ही सकती है।
२- कांग्रेस और भाजपा दोनों की स्थिति प्रदेश में बहुत ही बुरी है।
३- एक कांग्रेस - समाजवादी पार्टी गठबंधन स्वाभाविक गठबंधन है और अगर ये गठबंधन हो जाता है तोबसपा को घाटा पहुंचेगा।


कांग्रेस-सपा गठबंधन

कांग्रेस-सपा गठबंधन को स्वाभाविक गठबंधन मानने वाले संभवतः इस एक बात को महत्त्व नही दे रहे थे कि दोनोंके अपने अलग पहलु हैं। जहाँ सपा उत्तर प्रदेश में सिमटी हुई पार्टी है वहीँ कांग्रेस उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रदेश सेजनाधार गवां चुकी पार्टी है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अधिक स्पेस देने का मतलब सपा के लिए अपने पाँव परकुल्हाडी मारने जैसा था और कांग्रेस के लिए सपा का प्रभुत्व मान लेने का मतलब था कि वो उत्तर प्रदेश को हमेशाके लिए गवां बैठे। बिहार में राजद के साथ हुए गठबंधन के चलते वहाँ के कांग्रेसियों में चल रही कशमकश कोदेखने वाले जान सकते थे कि कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में १५ सीटों पर समझौता कर पाना फिलहाल कितनाकठिन होगा और सपा के लिए १५ से ज्यादा सीटें दे पाना कितना कठिन होगा ।
वैसे ये तो सच है कि एकसपा-कांग्रेस गठबंधन की आहट ने बसपा के नेताओं के चेहरे पर परेशानी ला ही दी थी।

बसपा और लोकसभा चुनाव

बसपा की २००७ के विधानसभा चुनावों में सफलता ने तमाम समीक्षकों को अचंभित कर दिया था। उस सफलताको कुछ ने बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का नतीजा बताया कुछ ने और सारे कयास लगाये । हमारा मानना हैकि बसपा की इस सफलता के एक नही अनेक पहलु थे।
जारी है

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

माल के सामने वो तीन बच्चे

मार्च के अन्तिम सप्ताह की बात है हम दिल्ली में थे। एक दोपहरी एक दोस्त से मिलने की बात तय हुई हम एकऔर दोस्त के साथ साकेत जा पहुंचे । जिससे मिलना था वो अभी तक आया नही था । थोड़ा बहुत इधर-उधरचक्कर काटने के बाद हम पी वी आर के सामने लगी बेंचों में से एक पर जा बैठे।
वहाँ बैठने के थोडी देर बाद ही हमारा ध्यान खींचा तीन बच्चों ने । वस्तुतः माल के चकाचौंध वाले माहौल में वो तीनबच्चे पूरी तरह से बाहरी नज़र आ रहे थे और इस बात पर ध्यान दिए बिना वो एक छोटी सी अत्यधिक उछलनेवाली गेंद से खेलने में मग्न थे।
बच्चों की उम्र कोई नौ-दस साल की रही होगी । उसमे एक लड़का थोड़ा लंबा था और वो ज़रा शर्मीला सा दिख रहाथा । बाकी दोनों लगभग एक ही कद के थे और उम्र के अनुरूप बेइंतिहा ऊर्जा से भरे हुए गेंद के पीछे इधर-उधरभाग रहे थे। अचानक उनकी गेंद तेजी से उछली और सड़क से गुजर रहे ट्रैफिक में जाने कहाँ गुम हो गई। वो तीनोंसड़क की ओर भाग निकले ।
दोस्त को सिगरेट की तलब लग गई थी और वो उठ के सिगरेट लेने गया । इतनी देर में हमने हवा के रुख कोसमझा और उठ के अपने बैठने की जगह में परिवर्तन किया जिससे जब वो बगल बैठ के सिगरेट पिए तो उसकाधुंआ हमारी तरफ़ न आए। न जाने सार्वजानिक स्थल पर धूम्रपान पर लगी रोक का मतलब क्या होता है।
थोडी देर बाद हमने पाया कि वो तीनों बच्चे बेंचों पर बैठे लोगों को निगाहों से टटोलते हुए हमारी तरफ़ बढ़ रहे हैं । आख़िर थोड़ा झिझकने के बाद वो तीनो हमारे सामने खड़े थे और उनके हाथ में पी वी आर का एक टिकट था । हमेंलगा कि ये कहीं टिकट तो ब्लैक नही कर रहे हैं पर मामला दूसरा था । उसमे से एक बच्चे ने टिकट को मजबूती सेपकड़े हुए हमें दिखाया और पूछा ये टिकट चालू है?
टिकट वस्तुतः ब्लैन्क था । उसपर सिर्फ़ नंबर पड़ा था ज़ाहिर है वो किसी काम का नही था।
दोस्त ने अरुचि दिखाते हुए दूसरी तरफ़ देखना शुरू कर दिया था ।
"ये बेकार टिकट है तुम्हे कहाँ मिला "
--"बेकार नही है देखो इसपे लिखा है " एक बच्चे ने इनसिस्ट किया तो हम मुस्कुराए बिना नही रह पाये।
"ये देखो ये सारी जगह खाली है । चालू टिकट में यहाँ सब फ़िल्म का नाम सीट नंबर और टाइम लिखा होता है । इसटिकट पर सिर्फ़ नंबर पड़ा है और वो किसी काम का नही है। "
--"बुद्धू बना रहे हो न !" एक बच्चे ने मुस्कुरा कर पूछा । हमारे दोस्त महोदय को ये नागवार गुज़रा उन्होंने कुछकहना शुरू किया तो हमने उन्हें रोक दिया ।
"अगर तुम ये टिकट लेकर जाओगे तो वो गार्ड खड़ा है न वो तुम्हे भगा देगा "
बच्चों को यकीन नही हुआ अगली बेंच पर एक जोड़ा बैठा हुआ था । लड़की के हाथ में कोल्ड ड्रिंक था और लड़के केहाथ में चिप्स का पैकेट।
"दीदी कोल्ड ड्रिंक दो न " बड़े आराम से एक बच्चे ने जिद की जैसे वो सचमुच अपनी बड़ी दीदी से मांग रहा हो।

लड़की मुस्कुराने लगी और लड़के ने हलके से धमकाया पर धमकी में कटुता नही थी और बच्चों ने भी उसे गंभीरतासे नही लिया ।
"अच्छा तुम चिप्स देदो कोल्ड ड्रिंक रहने दो। " दूसरे बच्चे ने समझौता प्रस्ताव पेश किया
अब लड़के ने तीन चिप्स के टुकड़े निकाल कर तीनो को पकडा दिया और भागने को बोला। जिस बच्चे के हाथ मेंटिकट था उसने टिकट दिखाया।
"ये चालू है?"
हाँ जल्दी जाओ शो छूट रहा है टाइम हो गया है लड़के ने कहा।
तीनों बच्चों ने मुड़कर हमें देखा फ़िर उसे और अंत में उसमे से एक ने बाकी दोनों को बताया कि ये चूतिया बना रहाहै और तीनों फ़िर हमारे पास आ गए।
"ये चालू क्यों नही है " उसने हमसे पूछा
"स्कूल जाते हो?"
"नही नारियल बेच रहा था ख़त्म हो गया है घर गए तो और बेचने को दे दिया जाएगा । ये चालू क्यों नही है "
"तुम्हे कहाँ से मिला ?"
"तुमको भी चाहिए ? "
हमने नही कहा तब तक तीनों भाग के कोने पर लगी टिकट डिस्पेंसर मशीन तक पहुँच गए थे । दो बच्चे दो किनारोंपर खड़े हो गए तीसरे ने मशीन को नीचे से खोला और उसमे लगे रोल में से थोड़ा सा हिस्सा फाड़ लिया । फ़िर तीनोंहमारी तरफ़ भाग कर आए ।
"देखो तुमने जो टिकट निकाला है ये खाली कागज है जब उस मशीन इसपर बाकी चीजें छप जाती हैं तो ये टिकटबन जाता है और चालू टिकट ऊपर से निकलता है नीचे से नही। "
तीनों की समझ में आ चुका था । वो उदास होके फ़िर घूमने लगे । हम जिसका इंतज़ार कर रहे थे वो दूर से नज़रआ रहा था ।
"ये साले अभी इतने शातिर हैं बड़े होकर क्या करेंगे " दोस्त ने कहा

हम भी सोचते रहे कि ये बड़े होकर क्या करेंगे ! डॉ अनुराग ने हमारी पिछली एक पोस्ट पर टिप्पणी दी थी किमुफ़लिसी का एंटीडॉट नही होता । हम सोच रहे हैं क्या सचमुच नही होता!

रविवार, 29 मार्च 2009

बालश्रम और भीख !

बस छोटी सी एक बात है जो देखने में अजीब लगती है पर अजीब तो न जाने क्या क्या होता रहता है
कभी कभी नीति नियंताओं की बातें समझ में नही आती
कभी कभी तो ख़ुद भी समझ में नही आता कि होना क्या चाहिए।
१४ वर्ष से कम उम्र के बच्चों का काम करना बाल श्रम कहलाता है उन्हें काम पे लगाने वाला दोषी होता है
अलबत्ता वो भीख मांगने के लिए छोड़ दिए जाते हैं
बालश्रम करने वाले बच्चे आगे चल कर कुछ काम तो कर सकते हैं
पर भीख मांगते बच्चे थोड़ा बड़े हो कर क्या करेंगे ।
क्या समाज और व्यवस्था कीजिम्मेदारी बालश्रम रोककर ख़त्म हो जानी चाहिए ?

बुधवार, 18 मार्च 2009

वरुण की बात में नया क्या है ?

वरुण के बयानों को लेकर हंगामा सा मचा हुआ है । आश्चर्य हमें भाजपा के विरोधियों की प्रतिक्रिया से नही है हमेंआश्चर्य भाजपा के नेताओं की प्रतिक्रिया पर हो रहा है । वरुण गांधी ने ऐसा कुछ नही कहा है जो भाजपा कीविचारधारा में शामिल नही रहा है । विश्वास न हो तो बस इसी हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ छद्म राष्ट्रवादियों की जगहजगह पर प्रतिक्रियाओं को देख लें ।

थोड़ा समय पीछे चलते हैं और लखनऊ में विधानसभा चुनाओं के पहले भाजपा नेताओं द्वारा जारी की गई सी डीको याद करते हैं। वरुण की बातें और उस सी डी में बातें एक ही जैसी कही गई हैं। उस सी डी को बाकायदा भाजपा केमंच से भाजपा के जमे जमाये नेताओं ने जारी किया था। उस सी डी के मामले में बाकायदा चुनाव आयोग नेमामला भी दर्ज किया था । अब चुनाव आयोग (जिसके एक स्वघोषित निष्पक्ष सदस्य दूसरे को कांग्रेसी घोषितकर चुके हैं ) उस मामले को दबा कर बैठा है । हो सकता है वरुण का मुद्दा भी वैसे ही दबा लिया जाय।

हम उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। फैजाबाद समेत अलग अलग जगहों पर रह चुके हैं और ९ साल की उम्र से चुनावसभाओं को देख समझ रहे हैं । संत, साध्वी कहे जाने वाले लोगों को सुना है , संघ परिवार की कार्यप्रणाली को बहुतनजदीक से देखा और समझा है , शिशु मंदिरों में पढ़ाई की है और वो समय अयोध्या के बहुत नजदीक गुजारा हैजब राम मन्दिर आन्दोलन चरम विन्दु पर था। हम देश के कोने कोने से आए कार सेवकों को नजदीक से देख सुनऔर समझ चुके हैं।

इतना देखने सुनने के बाद आज आश्चर्य नही होता कि कोई भाजपा का तथाकथित उभरता नेता कैसे बोल सकताहै। आश्चर्य इस बात पर होता है कि शाहनवाज और मुख्तार जैसे लोग सिर्फ़ दिखाने के लिए उस पर विरोध जतातेहैं।
इन्हे
अटल बिहारी का गोवा भाषण सही लगा था, २००२ का गुजरात सही लगा था , २००७ की सी डी सही लगीथी तो आज वरुण के भाषण पर ही ड्रामा करने की जरुरत क्या थी?

वस्तुतः भाजपा के चहेते बन चुके नरेंद्र मोदी का उदहारण भाजपा के अन्य नेताओं के सामने है। अपनी विचारधाराको डंके की चोट पर लागू करो (भाजपा की विचारधारा यही है जो नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के भाषणों में नजरआती है ) और फ़िर भाजपा के अन्दर भी कोई विरोध करने की हालत में नही रह पायेगा। २००२ के चुनावों के समयआडवाणी तक नरेंद्र मोदी से हरेन पंड्या के मुद्दे पर हार चुके हैं तो औरों की क्या बिसात। अब भाजपा केमहत्वाकांक्षी लोग जानते हैं कि उन्हें आगे बढ़ना है तो नरेंद्र मोदी से आगे निकलना होगा ।
वरुण
गांधी जो कर रहेहैं वह यही है ।
भाजपा
में आगे निकलने का यही रास्ता है।


मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

यहाँ कोई रोक-टोक नही है अभी

लखनऊ में कपूरथला चौराहा उन जगहों में शामिल है जहाँ हम कुछ दोस्त अक्सर मिला करते हैं । कपूरथलाचौराहे पर ख़ास बात युनिवर्सल बुक डिपो में है जहाँ का हिन्दी और और अंग्रेजी दोनों ही सेक्शन अच्छा है । एकऔर ख़ास बात नेस्कैफे के स्टाल में है जहाँ फुटपाथ और काफ़ी दोनों का आनंद एक साथ लिया जा सकता है ।
दो-तीन दिन पहले हम दो दोस्त युनिवर्सल बुक डिपो के दोनों सेक्शन छान कर नेस्कैफे के बगल काफ़ी ले कर बैठेतो अचानक सूखे मेवे लेकर फेरी लगाने वाला एक कश्मीरी दिख गया। हमें अंजीर और कश्मीर दोनों बहुत पसंद है। अंजीर तो उसके पास ख़त्म हो चुका था पर कश्मीर बाकी था । हम दोनों उसके साथ कश्मीर के बारे में बात करनेलगे।
कश्मीर के चुनाव के बाद अक्सर अलगाव वादी आरोप लगते रहे कि इन चुनावों में लोगो को जबरदस्ती वोट डालनेपर मजबूर किया गया था । हमने फैज़ल (उस कश्मीरी युवक का नाम फैज़ल था ) से पहली बात यही पूछी। फैज़लसे पता चला कि कश्मीर में पिछले कुछ टाइम में काफ़ी कुछ बदला है और लोग खुशहाल हुए हैं । नेताओं कोअंदाजा नही था कि लोग वोट डालना चाहते हैं उन्हें अंदाजा होता तो वो भी चुनाव लड़ते। हमें अच्छा नही लगा जबउसने कहा कि फौजी परेशान करते हैं पर याद किया तो समझ में आया कि फौज का व्यवहार नागरिकों के बीच मेंहमेशा कोई बहुत शानदार नही रहता है। ट्रेनों में उनका व्यवहार देख कर अगर हमें बुरा लगता है तो कश्मीरियों कोक्यों नही लग सकता ?
फैज़ल ने बताया कि अगर नए मुख्यमंत्री उमर अपने पिता फारुख की तरह रहते हैं तो लोगों में उपजा भरोसा ख़त्महो जायेगा । अगर थोड़ा भी अच्छा रहे तो इनको कोई हटा नही पायेगा ।
हमारे दोस्त ने पूछा कि लखनऊ में जो लोग मिलते हैं उनका व्यवहार कैसा लगता है तो उसने बिना लाग-लपेट केबता दिया कि अधिकतर लोग खुश होते हैं पर कुछ लोग कभी कभी उल्टा सीधा भी कहते हैं। हमने सोचा किआख़िर फेरी लगाने आए कश्मीरी उल्टा सीधा बोल कर किसी को क्या संतुष्टि मिलती होगी।
अंत में उसने एक बात कही जो हम जैसों को जो लखनऊ जैसी अपेक्षाकृत शांत जगह रहते हैं उन्हें कभी समझ मेंनही आ सकती है। उसने कहा कि लखनऊ में उसे बहुत अच्छा लगता है क्योंकि यहाँ कोई रोक टोक नही है चाहेजहाँ घूमो फिरो चाहे जितने देर तक घूमो फिरो।
हम सोचने लगे कि कैसा लगता होगा किसी भी जगह के रहने वालों को जब उन्हें आते जाते पूछा जाता होगा किकहा जा रहे हो कहाँ से आ रहे हो, कैसा लगता होगा जब शाम के एक निश्चित समय के बाद घर से बाहर निकलनावर्जित होता होगा, कैसा लगता होगा जब उनके अपने शहर में उनके अपने इलाके में औचित्य की जरुरत पड़तीहोगी कहीं रहने के लिए।
कैसा लगता होगा उन्हें जिन्हें अपने घर छोड़ कर कैम्पों में जिंदगी काटनी पड़ती होगी एक दो महीने , एक दो सालकश्मीरी पंडितों के लिए तो शायद एक दो पीढियां या और भी ज़ियादा।
फैज़ल ने बताया कि अभी भी टाइम लगेगा कश्मीरी पंडितों की वापसी में । उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि समस्या कासमाधान कश्मीरी पंडितों को जम्मू कैम्प से उठा कर श्री नगर के कैम्प में डालने में नही है। समस्या का समाधानहै उस स्थिति का निर्माण जिसमे कश्मीरी पंडित ख़ुद अपने आप अपने घरों में जा सकें। हम सहमत हैं उमर साहबपर बीस साल एक लंबा अरसा होता है । लोग निराश हैं।
क्या कश्मीरियों का भी फ़र्ज़ नही बनता था कि अपने ही भाइयों के हक़ में आगे बढ़ के बोलें। क्या लोग जमीन सेज्यादा कीमती हैं?
लेकिन लोग अपने वंचित भाइयों के बारे में नही सोचते।
कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए आन्दोलन नही छेड़ेंगे।
गुजरात के लोग सरदार सरोवर बाँध से तृप्त तो होंगे लेकिन नर्मदा के विस्थापितों के अधिकार की नही सोचेंगे। जोउनके अधिकारों को समर्थन देगा उसके ख़िलाफ़ गुंडागर्दी पर उतर आयेंगे (यहाँ हम कश्मीर और गुजरात के आमलोगों की बात कर रहे हैं नेताओं के समर्थक भावुक न हों )।
ओह कहाँ से शुरू किया था कहाँ आ गए । मुआफ कीजियेगा इधर उधर भटकने के लिए ये यहाँ सिर्फ़ इसलिए होपाया क्योकि अभी तक यहाँ भी
कोई रोक टोक नही है कुछ भी करो कहीं भी भटको , कोई नही पूछता । कल इसतरह से मौका मिले न मिले ।

चलते-चलते : गुलज़ार साब ने फ़िल्म यहाँ के लिए एक गाना लिखा था पूछे जो कोई मेरी निशानी ।
उसमे एक लाइन है
आओ
न आओ न जेहलम में बह लेंगे ।
कोई वादी के मौसम भी एक दिन तो बदलेंगे ॥
आमीन

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या...!

शर्म नही आती इन राजनेताओं को अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने में! अपनी मातृ संस्कृति - सभ्यता कीबोली लगाने में! अपनी ओछी महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए धर्म को हथियार बनाने में! देश भक्ति के नाम अपनीग़लत शक्ति की मनमानी करने में! वेश्यावृति करने में, और अपने पुरुषत्व पर! अरे हाँ, मैं भूल गयी थी कि इनकेपास सारी संपत्ति तो है, लेकिन लज़्ज़ा की संपत्ति के मामले में कंगाल हैं! "बोया पेड़ बबुल का तो आम कहाँ से होये?” ये संपत्ति ना उधार ली जा सकती है, ना ही दी जा सकती है। इसे तो अपने बुद्धि विवेक से अर्जित किया जाताहै, और यही परिपक्वता है समाज़ की, राष्ट्र की, व्यक्ति की, और पूरे विश्व की!

अगर उम्र के पड़ाव को पार करने से ही परिपक्वता आती है, तो मुझे खेद है कुछ हिन्दी ब्लॉंगर्स पर जो उम्र के अवसान पर हैं, लेकिन इतना भी संज्ञान नही है कि वो अपने ब्लॉग में क्या और कैसी चीज़ों को तस्वीरों के साथ परोस रहे हैं! वो ये कैसे भूल जाते हैं कि उनकी पीढ़ियाँ भी कल उनका ब्लॉग पढ़ेंगी? कितने शर्मनाक तरीके से पोस्ट लिखे जा रहे हैं, और बहिष्कार कर रहे हैं। बहिष्कार कीजिए! शौक से कीजिए! लेकिन थोड़ा लिहाज़ करना भी ज़रूरी है! कलम में समाज़ को सशक्त बनाने की ताक़त होती है, कृपया राजनेताओं की तरह संस्कृति की बोली मत लगाइए, बल्कि युग निर्माण में सकारात्मक भागीदारी निभाएँ.

"नाच न जाने आँगन टेढ़ा!" अपने व्यक्तित्व का निर्माण तो कर नही सकते, और चले आते हैं राष्ट्र निर्माण का राग अलापने! इन्हें किसने हक़ दिया है क़ानून को अपने हाथ में लेने का? समस्या है तो समाधान भी है, लेकिन ये किसी का अधिकार नही बनता कि वो किसी पर हाथ उठाए। बंदर की तरह उछल कूद करने से अच्छा है कि एक सभ्य इंसान की तरह, सभ्यता की राह पर चलकर भी हालातों को बदला जा सकता है!

मेरी समझ से मुद्दा ये है कि समाज में कुछ ग़लत हो रहा है, और उसमें कैसे बदलाव लाना है इस पर कोई बात नहीहो रही. क्या एक ग़लत कदम को रोकने के लिए फिर दूसरे ग़लत कदम का उठाया जाना ही समस्या का समाधानहै? जिन्हें इस बात का आभास है कि वो समाज़ को एक नयी सकारात्मक दिशा दे सकते हैं, अगर वे समस्या केसमाधान पर पहल कर सकते हैं तो मैं उनके विचारों को आमंत्रित करती हूँ!


नोट: - ।
samaylive.com/news/brosis-beaten-up-by-bajrang-dal-activists/608632.html">http://www।samaylive.com/news/brosis-beaten-up-by-bajrang-dal-activists/608632.html

http://rewa.wordpress.com/2009/02/15/padhe-likhe-ko-farsi-kya/ ‍

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

डंडा और झंडा

लखनऊ में एक राजनैतिक दल का लोकसभा प्रत्याशी काफ़ी दिनों से जम के प्रचार में जुटा हुआ है । उसके झंडे और बैनर देख कर महीनो से लग रहा है कि लोकसभा चुनाव हफ्ते भर में ही है। पता नही इस तरह पानी की तरह बहाए जा रहे पैसे को चुनाव आयोग उम्मीदवार के चुनाव खर्च में मानेगा या नही । सोचने वाली बात यह है जो चुनाव के एक साल पहले से चुनावी तौर तरीके से प्रचार में पैसा बहा रहा है उसने वो पैसा कमाया कैसे होगा ।
खैर!
दो दिन पहले हम सब्जी खरीद रहे थे तो हमने पाया कि पूरी सब्जी मण्डी में उसी प्रत्याशी के झंडे और बैनर हुए हैं।
हमने सब्जी वाले से पूछा कि बहुत बैनर लगा रखे हैं भाई! तो उसने बताया कि पार्टी वाले दे गए थे तो लगाना मजबूरी है । हमने पूछा कि ऐसी क्या मजबूरी है । तो पास वाले सब्जी वाले ने कहा कि जिसके हाथ में पुलिस है उसके बैनर लगना मजबूरी ही है भैया।
ऐसे चल रहा है उन महोदय का प्रचार
आख़िर डंडे के सहारे ही लगता है झंडा !

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

सुभाष बाबू !

आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्मदिन है सुभाष चन्द्र बोस उन दो बंगाली विभूतियों में से रहे हैं जिनके व्यक्तित्व और विचारों ने हमेशा से हमें प्रभावित किया है।
1897 में कटक जन्मे सुभाष बाबू अपने 14 भाई बहनों में नौवें थे। पिता के दबाव के चलते आई सी एस की कठिन और प्रतिष्टापूर्ण परीक्षा महज आठ महीनों के श्रम से उत्तीर्ण करने वाले सुभाष बाबू को देश की आजादी के लिए संघर्ष का रास्ता पसंद था और उन्होंने बिना किसी हिचक के आई सी एस से त्यागपत्र दे दिया। 1922 में स्वराज पार्टी के बैनर तले कलकत्ता के महापौर बने देशबंधु चितरंजन दास ने उन्हें नगर पालिका का मुख्यकार्यकारी नियुक्त किया। सुभाष बाबू की प्रशासनिक क्षमता और राष्ट्रीय सरोकार उनके कार्यकाल में नगर पालिका की कार्यप्रणाली में स्पष्ट देखा जा सकता है । बाद में सुभाष बाबू ख़ुद भी महापौर बने। बाद में अपने कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में राष्टीय योजना समिति की स्थापना की । इसी विचार का प्रतिनिधित्व आजादी के बाद बने योजना आयोग ने किया । इसी के साथ उन्होंने एक विज्ञान परिषद् की भी स्थापना की थी।
सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अन्दर पूर्ण स्वराज के संकल्प को लेकर जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर युवाओं का नेतृत्व किया। युवा नेताओं का यह समूह समाजवादी विचारों से प्रेरित था और भारत को एक प्रगतिशील रूढियों से मुक्त देश के रूप में देखना चाहता था। उनके व उनके साथियों के समाजवादी विचारों का कांग्रेस के अन्दर का दक्षिणपंथी समूह पसंद नही करता था । अपनी बीमारी के समय यूरोप प्रवास में उन्होंने विट्ठल भाई पटेल के साथ काम किया. कांग्रेस के उस समय के नेतृत्व से असंतुष्ट इन नेताओं ने बोस -पटेल विश्लेषण में अपने विचारों को स्पष्ट रूप से रखा. अपनी अस्वस्थता के दौरान नेताजी द्वारा की गई सेवा और उनके विचारों के चलते विट्ठल भाई ने अपनी संपत्ति वसीयत वसीयत द्वारा सुभाषबाबू के नाम करदी। विट्ठल भाई के छोटे भाई इस वसीयत से अप्रसन्न थे और उन्होंने मुक़दमे में सुभाषबाबू को पराजित करके विट्ठल भाई की संपत्ति प्राप्त कर ली परन्तु इससे दोनों महत्वपूर्ण और बड़े नेताओं में कटुता आ गई। वस्तुतः पटेल कांग्रेस के दक्षिणपंथी माने जाने वाले नेताओं में से थे और कांग्रेस संगठन पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखते थे (आजादी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने जवाहरलाल के उम्मीदवार के विरुद्ध अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी किया था )। गांधी जी की खुली असहमति के बावजूद सुभाष बाबू कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीतने में सफल रहे। इसपर कांग्रेस कार्यसमिति के 14 में से 12 सदस्यों ने कार्यसमिति से इस्तीफा दे दिया (सिर्फ़ जवाहरलाल और शरत चन्द्र बोस कार्यसमिति में बने रहे थे। ) कार्यसमिति के विरोध के चलते उन्हें त्यागपत्र देना पडा।
नेता जी इस समय अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का लाभ उठा कर भारत को आजादी दिलाने के लिए एक बड़े संघर्ष का आगाज करने के पक्षधर थे परन्तु अधिकतर नेता इस मौके पर सावधानी पूर्ण कदम उठाने के इच्छुक थे।
इसी समय नेताजी और उनके लंबे समय तक साथी रहे जवाहरलाल में भी मतभेद हो गए। जवाहरलाल मतभेदों के वैयक्तिकरण के ख़िलाफ़ थे। उन्होंने सुभाष को लिखा कि चाल इतनी तेज नही हो कि साथी पीछे छूट जाएँ। उन दोनों में मित्र और धुरी राष्ट्रों को लेकर भी मतभेद रहे।
विश्वयद्ध के दौरान सुभाष बाबू ने निष्क्रिय बने रहने से इनकार कर दिया और नजरबंदी से भाग निकले । अफगानिस्तान, रूस होते हुए जर्मनी पहुँच कर उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संगठन की स्थापना की । इस दौरान उन्होंने जियाउद्दीन खान और ओरलान्दो मात्सूता नामों से यात्रा की। जर्मनी में हिटलर से मतभेदों और उससे मिली निराशा के चलते वो जापान गए और वहाँ पर आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला । उन्होंने आजाद हिंद की अंतरिम सरकार का भी गठन किया जिसे धुरी राष्ट्रों से मान्यता मिली थी।
आजाद हिंद फौज जापान के सहयोग से भारत की आजादी के लिए संघर्ष छेड़ दिया । अपने मतभेदों को किनारे करते हुए नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो के माध्यम से गांधी जी को संबोधित करते हुए जापान के सहयोग से भारत को आजाद कराने की अपनी योजना के बारे में बताया। यह वही संबोधन है जिसमे उन्होंने गांधी जी को राष्ट्र पिता कह कर पुकारा (यह उपाधि नेता जी की ही दी हुई है और गांधी जी ने सुभाष को नेता जी की उपाधि दी थी। )। हालांकि नेता जी की योजनायें भारत में पहले ही पहुँच रही थी और गांधी जी के नेतृत्व में एक तबका महसूस कर रहा था कि जापानियों का आगमन भारत के लिए बेहतर हो सकता है।
शुरूआती सफलताओं (जिसमें अंडमान निकोबार को जीतना शामिल था ) के बाद मित्र राष्ट्र भारी पड़ने लगे और आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पडा। 18 अगस्त 1945 का नेता जी की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। यह दुर्घटना और मृत्यु आज भी रहस्यपूर्ण है ।
आज हमारे लिए बहुत आसान है यह सोचना कि शायद जापानियों की जीत और उनका ताकतवर होना भारत की आजादी के लिए घातक हो सकता था , या फ़िर जापानियों या धुरी राष्ट्रों की मदद लेना ग़लत हो सकता था पर उस समय की परिस्थितियों की देखें तो धुरी राष्ट्रों के उफान के एक समय इक्का-दुक्का नेताओं को छोड़ कर सभी जापान और आजाद हिंद फौज के बढ़ते क़दमों को लेकर आशान्वित थे। उस समय के तमाम नेताओं ने अपने हिसाब से चीजों को समझने की कोशिश की और उन्हें जो बेहतर समझ में आया किया । आज यह कहना आसान हो सकता है कि सुभाष ग़लत रास्ते पर निकल चुके थे या गाँधी अनुचित आग्रह कर रहे थे या भगत सिंह और उनके साथी अपनी हिंसा में ग़लत थे, पर हमें लगता है कि यह सभी एक दूसरे के पूरक थे। युवाओं में आत्म बलिदान के उच्च आदर्श जहाँ भगत सिंह और उनके साथियों से मिल रहे थे वहीँ गांधी ने आजादी की लड़ाई को आम आदमी तक पहुँचाया और उसे उससे जोड़ा । सुभाष ने 1857 के विद्रोह की टूटी कड़ी को जोड़ते हुए एक पूरी पूरी सेना का न सिर्फ़ गठन किया बल्कि अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों में जुडाव की एक भावना भरी। इसका प्रमाण था कि आजाद हिंद फौज के ट्रायल के समय उनके समर्थन में हो रही सभाओं में सैनिक वर्दी में शामिल हो रहे थे।
आख़िर सेना ही तो अंग्रेजों का अन्तिम दुर्ग था! सुभाष की सफलता की कहानी अंडमान और निकोबार जीतने या सेना गठित करने में नही थी। उनकी सफलता यहाँ हिन्दुस्तान में उस भावना की थी जो उन्होंने जगाई थी । उनकी सफलता उन तमाम आजाद हिंद सैनिकों में थी जो अंग्रेजो द्वारा बंदी बना कर लाये गए थे और उनपर मुक़दमे चल रहे थे। वो लाये थे अपने साथ अदम्य इच्छशक्ति की वो कहानियाँ जो नौसेना के विद्रोह के साथ मिलकर अंग्रेजी साम्राज्य के ताबूत में अन्तिम कील साबित हुयी।

सुभाष बचपन से हमारे आदर्शों में रहे हैं। समय के साथ इतिहास के अलग अलग विन्दुओं के अध्ययन में हमने उनकी कमियों और भूलों को भी देखा और समझा इसके बावजूद उनका स्थान अभी भी वही है जहाँ तब था जब उनके साहसिक व्यक्तित्व को पहली बार जाना था।
महान लोगों की गलतियों और कमियों के बारे में जानना जरूरी है यह कहने के लिए नही कि ओह यह ऐसे निकले, उन्हें गाली देने के लिए भी नही, बल्कि यह समझने के लिए कि हम उनसे सीख लें यह समझने के लिए कि आख़िर वो इंसान थे ।

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