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गुरुवार, 16 मई 2013

सूनी यज्ञशाला !

जौनपुर वाराणसी मार्ग पर एक खाली पड़ी यज्ञशाला 

यज्ञशाला के समीप नदी 

संभवतः यहाँ कुछ समय पहले कोई बड़ा यज्ञ हुआ था उसके बाद यज्ञशाला यूँ ही खाली पड़ी है 

यज्ञशाला देख के हमें अपने गाँव में हुए शतचंडी यज्ञ की याद आई जो संभवतः हमारे जन्म से पूर्व हुआ था  पर लोग आज तक उसकी  चर्चा करते हैं 

समय कम था और आस पास भी कोई नहीं था जिससे इस यज्ञशाला के बारे में कुछ और पता लगता 
फोटो : रौशन 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

भीगा दिन !

फोटो : रौशन 
स्थान : नैनीताल 


सुबह सूरज को बादलों पर टांग देना 

दिन भीगा है रात भर 

सूखने को डालना है ।



रविवार, 22 जुलाई 2012

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

कुछ नया लाओ न

ऊबली हुई चाय की पत्तियों के जैसे ।
बेअसर से हो चले हैं पुराने दर्द ॥
कुछ नया लाओ न।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

बारिश, बारिश पानी पानी

मौसम एक ऐसा विषय है जो बातचीत में अक्सर सप्लीमेंट का काम करता रहता है। मसलन आप किसी से मिलते हैं जिससे बात करने के लिए आप के पास ज्यादा कुछ नहीं है तो झट से मौसम के ऊपर एक छोटी सी परिचर्चा आयोजित करवा सकते हैं। ऐसा ही विषय राजनीति भी माना जाता रहा है पर पिछले कुछ महीनो से हमें राजनीति की लोकप्रियता में गिरावट देखने को मिल रही है । हो सकता है यह गिरावट सिर्फ हमें ही नजर आ रही हो पर कुछ तो है।
खैर हम मौसम पर थे। तो मान लीजिये आपको कोई मिला जिससे बात क्या करें आपको समझ में नहीं आ रहा हैतो आप क्या करते हैं ज्यादातर लोग बात की शुरुआत आज बहुत गर्मी है या इस बार बारिश लेट हो रही है से शुरू करते हैं। ऐसा नहीं है कि लोग इस बार गर्मी कम है या इस बार बारिश अच्छी हो रही है नहीं कह सकते लेकिन परेशानी तो यह है कि गर्मी बढती जा रही है और बारिश कम होती जा रही है। हर साल यही होता आ रहा है या तो बारिश कम होती है या फिर होती है तो ऐसी कि सबकुछ तहस नहस कर देने वाली । जैसे कि पिछले ही कुछ दिनों से चीन के कई हिस्सों में हो रही है । आपको याद होगी चीन की ओलम्पिक उदघाटन समारोह में बारिश रोक देने वाली शानदार कहानी
हमें याद आती है एक उपन्यास की नाम था "सामर्थ्य और सीमा "
बारिश या तो कम हो रही है या बहुत ज्यादा
या तो सूखा आता है या फिर बाढ़
अभी कुछ दिन पहले किसी ने हमसे क्योटो प्रोटोकाल के बारे में पूछा था हम उसे समझा रहे थे और खुद सोचते जा रहे थे कि हम क्यों नहीं समझ रहे हैं सीधी सी बात
हमें नहीं समझ में आ रहा है कि हम खुद से ही हारते जा रहे हैं । हमें अंत नजर आ रहा है और हम उसकी ओर बेफिक्री से बढ़ते जा रहे हैं।
तो अगर आपके पास बात करने के लिए कुछ नहीं है तो मौसम पर परिचर्चा कर लीजिये। वैसे तो हम सब बहुत बिज़ी हैं
खैर आज हम छुट्टी पर हैं(खाली हैं कुछ करने को नहीं है तभी मौसम नजर आ रहा है ) और लखनऊ में सुन्दर बारिश हो रही है।
दो साल पहले जब भारी बारिश हुई थी तो कुकरैल नाले (शहर में बहने वाला एक नाला )में आई बाढ़ में उसके किनारे बसी (अवैध या वैध पता नहीं )अकबर नगर कालोनी डूब गयी थी।इस बार नाले के किनारे किनारे डॉ आंबेडकर पथ का निर्माण हो रहा है तो नाले की एक तरफ सीमा ढंग से बाँध दी गयी है । दूसरी तरफ पड़ता है अकबर नगर । अगर ज़रा सी भी ठीक बारिश हुई तो अकबर नगर डूबना तय होगा । उम्मीद है वहां के वाशिंदों ने तैयारी कर रखी होगी। अगर सरकार डॉ आंबेडकर पथ बनाने के साथ साथ नाले के प्रवाह का भी ढंग से इंतजाम करती चलती तो डॉ आंबेडकर बुरा नहीं मानते न ही पहचान से जुड़ा कोई संकट खडा होता। राहत की बात है कि निकाय चुनाव नजदीक हैं अगर बाढ़ आई तो निकाय प्रत्याशी कुछ जनसेवा कर लेंगे ।

राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अंतर्गत गावों में जलाशयों का निर्माण हुआ है जिसमें वर्ष जल संचयन का विचार होगा दूर से देख कर तो लगता है कि अच्छा विचार है कभी पास से देखने का मौक़ा मिला तो पता चलेगा कि कितने कारगर जलाशय होंगे ।
अंततः एक बात जिस बच्चे को हम क्योटो प्रोटोकाल के बारे में बता रहे थे उसने एक सवाल पूछा
अमेरिका जिसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बनती थी ग्रीन हाउस गैसों में कमी की वही क्यों पीछे हटा ?
जवाब सीधा है पर फिर भी खटकता है ।
सरकार पीछे हट गई तो क्या महान अमेरिका के नागरिक भी नहीं सोचते कुछ
"एक असुविधाजनक सच" जैसी बाते ही होती रहेंगी या कुछ और भी होगा
नोबल पुरस्कार अंतिम सच है क्या कोई काम हाथ में लेने का

सोमवार, 10 मई 2010

ब्लोगिंग में वापसी की कोशिश!

जब हमने अपनी पिछली पोस्ट डिजिटली बी पी एल होने की व्यथा लिखी तो तो अंदाजा नहीं था कि अगली पोस्ट के लिए यह बी पी एल होना इतना इंतज़ार करायेगा। हमने पिछली पोस्ट १३ नवम्बर को लिखी थी और तब से अब आज जा के लिखने का मौक़ा मिल पा रहा है।
डिजिटली बी पी एल होना मतलब एक ऐसी जगह पर रहना जहां इन्टरनेट का कनेक्शन मिल पाना कठिन हो जाय। हम रिलायंस का डाटा कार्ड इस्तेमाल करते हैं जो कि जिस जगह पर हम रह रहे हैं वहां इतनी थकी हुई चाल से चलता है कि रोना आ जाय उसपर ट्रांसलिटरेशन का दर्द ! इतनी थकी चाल में तो ऑनलाइन ट्रांसलिटरेशन संभव ही नहीं हो पाता। कई बार कोशिश की कि ऑफलाइन ट्रांसलिटरेशन का इस्तेमाल करके लिखें और फिर ब्लॉगर पर पेस्ट कर दें तो लिख कर रखा और ब्लॉगर खोलने कि असफल कोशिशें करते रहे और थक के ये तरीका भी छोड़ दिया।
अगला प्रयास था ऑफलाइन ट्रांसलिटरेशन के जरिये लिखें और फिर उसे ई मेल के जरिये भेजें । ऐसा करने में फोंट साइज क्या रहेगी और पब्लिश होने के बाद पोस्ट पढने में आएगी भी या नहीं इस बात की दिक्कत थी । खैर कोशिश की! पर मामला जमा नहीं ।
पिछले साल जब हमने मोबाइल रहते हुए कनेक्टिविटी की समस्या का हल खोजने की कोशिश में अपने ब्लॉग पर ये पोस्ट लिखी थी तो रवि रतलामी जी ने ई वी डी ओ का विकल्प सुझाया था। ये विकल्प काफी आकर्षक था पर पहले थो लखनऊ में ई वी डी ओ शुरू नहीं हुआ था , जब शुरू हुआ तो शहर के अन्दर ही काम कर रहा है बाहर नहीं ।
तिलहर कस्बा, जहाँ हम रह रहे हैं शाहजहांपुर जिला मुख्यालय से मात्र २४
किमी की दूरी पर है पर शाहजहांपुर में बी एस एन एल की थ्री जी सेवा का वहाँ तक कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है।
खैर ! ब्लॉग लिखने में परेशानी है पर मोबाइल पर ब्लॉग तो पढ़े ही जा सकते हैं । पढने में ट्रांसलिटरेशन बाधा नहीं है , हाँ टिप्पणी देने में फिर बाधा आती है तो फिर हमने टिप्पणी देना भी छोड़ दिया।
देखते हैं इस समस्या का हल कब तक मिल पाता है और कब हम मनमाफिक तरीके ब्लोगिंग फिर से शुरू कर पाते हैं
आपके पास कोई सुझाव हो तो जरूर बताईयेगा
इस बीच में ब्लॉग जगत से बिना बताये गायब रहने के बावजूद हमें याद रखने के लिए चिट्ठाचर्चा और प्रवीण जी को धन्यवाद (बिना कुछ लिखे चिट्ठाचर्चा में जगह! , काश साल में जन्मदिन कई बार आते । वैसे हम दो बार मनाते हैं)
वैसे चिट्ठाचर्चा से एक शिकायत भी है इसका हालिया टेम्पलेट धीमे कनेक्शन पर खुलने में बड़ी देर लेता है । मोबाइल पर साइड बार तो दीखते ही नहीं कि क्या है उनमें । खैर !

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

डिजिटली बी पी एल होने की व्यथा

रात के एक बजे थे अचानक मोबाइल की एस एम् एस टोन गुहार लगाती है ।
एस एम् एस एक दोस्त का था जो दिल्ली में बैठा हुआ था । अभी थोडी देर पहले तक वो जिद कर रहा था कि ऑनलाइन आओ कुछ बात करनी है। तमाम कोशिशों के बाद भी जब नेट कनेक्ट नही हो पाया तो हमने हथियार डाल दिए और वो मायूस होकर चुप होगया।
यु आर डिजिटली बी पी एल!
एस एम् एस कहता है।
डिजिटली बी पी एल होना आज के युग में एक बड़ी परेशानी की बात हो गई है।
दिल्ली और लखनऊ में रहने वाले के लिए ३जी न होना बी पी एल होना है डिजिटली बी पी एल !
देश के जिस हिस्से में आजकल हम हैं वहां पर लोग कई तरह से बी पी एल हैं
२००१ की जनगणना के हिसाब से ५१००० के आस पास की आबादी वाले इस इलाके में करीब १०००० के आस-पास बी पी एल राशन कार्ड हैं। पाँच सदस्यों वाले परिवार का हिसाब लगायें तो कोई पचास हज़ार बी पी एल!
राशन कार्ड में गरीबी जम के झलकती है । कोटेदार के कोई बीस हज़ार रूपये खर्च होते हैं अलग अलग लोगों को खुश करने में। अब इसके बाद उसकी कमाई भी होती होगी। तो फ़िर गरीबी कमाई का अच्छा साधन हुआ। एक बी पी एल परिवार कितने लोगों की गरीबी दूर करता है इसका हिसाब लगाने पर पता चलता है कि बी पी एल होना कितना जरूरी है।
लखनऊ में सामजिक परिवर्तन स्थल से गुजरें तो सामाजिक परिवर्तन नजर आता है । चुंधियाती हुई रौशनी ! पूरा इलाका रात में भी दिन को मात देता हुआ सा लगता है।
लखनऊ से बाहर निकलते ही पता चलता है कि बाकी के इलाके बिजली के हिसाब से बी पी एल हैं। अभी हम जहाँ बैठे हैं वहां हफ्ते-वार बिजली की व्यवस्था चलती है । एक हफ्ते में दिन में लाईट आती है (आती जाती है ) , तो अगले हफ्ते रात में (आती-जाती है )। सामाजिक परिवर्तन लखनऊ में नजर आता है लखनऊ से बाहर गायब हो जाता है।
खैर जो चीजें सिर्फ़ दिखाने की हैं वो लखनऊ और दिल्ली में ही शोभा देती हैं । सामाजिक परिवर्तन दिखाने की ही चीज है शायद होने की नही।
एक इलाके में पहुंचे वहाँ बोर्ड लगा हुआ था -
मोबाइल चार्जिंग - पाँच रूपये मात्र।
बिजली नही पहुँची लेकिन मोबाइल मौजूद है अब मोबाइल है तो चार्ज भी होना होगा। लोग डिजिटल बैकवर्ड नेस से बाहर निकल चुके हैं बिजली आए न आए।
मोबाइल कंपनियाँ नए नए मोबाइल निकाल रही हैं बिजली आए न आए मोबाइल चलता जाए!
उन्हें धंधा चलाना है बिजली आए न आए , उन्हें धंधा चलाना है लोगों की जेब में जितना भी पैसा हो उसे ध्यान में रखते हुए ।

कुछ दिन पहले एक थोडा ख़ुद को गिनाने वाले ने हमें धमकी दी थी
-रहना तो यही है न !
हमें सुनकर गुस्सा आ गया
- क्यों यहाँ कौन से सुरखाब के पर लगे हुए हैं ? और यार तुम लोग एक लाईट तो अपनी सही नही करवा पाते आ जाते हो छोटी -छोटी बातों पर धमकी देने
हमारी बात सुनकर वो चुप हो गया हमने उसकी दुखती राग पर हाथ रखा था। वो सामाजिक परिवर्तन स्थल वाले दल का कार्यकर्त्ता था

रविवार, 20 सितंबर 2009

ब्लोगिंग में सात साल

सात साल पहले
सितम्बर 2002 की बात है हम इंडिया टुडे पढ़ रहे थे। उसमे एक स्टोरी ब्लोगिंग को लेकर थी । हमें बात जम गई बस तुंरत फैसला किया कि जैसा भी होता हो हमें ब्लॉग चाहिए ही चाहिए । दो-तीन ब्लॉग्गिंग साइट्स के नाम रटे, इंडिया टुडे को एक कोने में उछाला और निकल पड़े नजदीकी साइबर कैफे की खोज में ।
उन दिनों हमें इन्टरनेट के इस्तेमाल के अलावा कंप्यूटर के बारे में कोई जानकारी नही थी। २-३ ब्राउजर पहचानते थे की बोर्ड पहचानते थे, माउस पहचानते थे और जानते थे कि माउस क्लिक करना होता है। ब्लोगर वाकई सरल था हमने बाकियों को किनारे किया और ब्लोगिंग शुरू कर दी । सही तारीख तो नही याद है पर ब्लॉग बनने के हफ्ते भर के अन्दर पहली पोस्ट डाली थी । जो 20 सितम्बर 2002 की तारीख बतलाती है । तो इस लिहाज़ से हमें ब्लोगिंग करते आज 7 साल पूरे हो गए हैं।
शुरूआती ब्लॉगर बड़ा अजीबोगरीब टाइप का होता था। हम आपनी शुरूआती पोस्ट्स में टाइटल का लिंक नही देखते हैं । पता नही टाइटल देने की सुविधा नही थी या फ़िर हम अज्ञानी समझ नही पाते थे ।

परिवर्तनों की शुरुआत

1999 में शुरू हुए ब्लॉगर में जब हमने प्रवेश किया तो उसी समय ब्लॉगर को खरीदने के बारे में गूगल और ब्लॉगर के स्वामित्व वाली पायरा लैब्स में बातचीत चल रही थी।

2003 की शुरुआत में किसी समय पता चला कि पायरा लैब्स अब गूगल की है और ब्लॉगर भी।

ब्लोगर में गूगल ने परिवर्तन लाना शुरू कर दिया और इसी परिवर्तनों की यात्रा में साथ -साथ बहते हुए हम भी सीखते रहे जाने क्या क्या।

और भी कुछ


2003 में हमने एक और ब्लॉगर अकाउंट खोला और एक दूसरा ब्लॉग बनाया । ये ब्लॉग छद्म नाम से थोड़ा आक्रामक होकर लिखने को बनाया था . अब तक हम टिप्पणियाँ देने के महत्त्व से परिचित हो चले थे इसलिए ये ब्लॉग चल निकला . हमारा पहला ब्लॉग जहाँ विजिटर्स का मोहताज था वहीँ दूसरा ब्लॉग अच्छा चल रहा था. २००३-२००५ तक के सालों में हमने जम के झगडा किया और सिरदर्द मोल लिया अंत में दिन ब्लॉग डिलीट करके ओरवेल के १९८४ उपन्यास के पात्रों की तरह गायब हो गए . मजा तो ये है कि हम मौजूद रहते हुए भी गायब हैं । कभी कभी अपने उन पुराने दोस्तों के ब्लोग्स पर घूम आते हैं ।
इन दो सालों में हमने जितना झगडा किया उतना जिंदगी भर नही किया होगा ।


प्राइवेट डायरी


ब्लॉग नामक टूल का एक अच्छा इस्तेमाल निजी डायरी बनाने में भी अच्छे से हो सकता है ॥ ऐसा कुछ जो आप अपने कुछ ख़ास दोस्तों को ही पढाना चाहते हों।
हमने नोटिस किया है कि अपने हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ एक लोग पासवर्ड प्रोटेक्टेड ब्लॉग भी रखते हैं। ये पासवर्ड प्रोटेक्शन हर किसी को उस ब्लॉग तक पहुँचने से रोक देता है । हमने भी इसका इस्तेमाल किया है इसका इस्तेमाल करते हुए हमें लगता है कि हम फ़िर से क्लास में बैठे हैं और दोस्तों से कागज़ की छोटी छोटी पर्चियों पर लिख कर बात कर रहे हों। छोटी पर्चियों संभालने में दिक्कत होती थी तो हमने एक बार बड़े से पेज पर लिखना शुरू कर दिया। वह पेज उन्ही लोगों के हाथो से गुजरता था जो उस बातचीत में शामिल रहते थे। और जिसे जो कुछ कहना होता था वह लिख कर साइन कर देता था।
ऐसे कई पेज तो समय के साथ गुम होते गए पर कुछ आज भी बचे हुए हैं । उन्हें पढ़ना हमेशा आनंद देता है।
ऐसे ही पासवर्ड प्रोटेक्टेड ब्लोग्स हैं।

छोटे से समूह का अपनी सुविधानुसार लोगों की नजरों से ओझल रहते हुए लगातार चलने वाला वार्तालाप ।
जिन्होंने ट्राई किया है वो जानते होंगे कि ये वाकई मजेदार है ।

टिप्पणी प्रसंग !
कुछ नियम
प्रत्येक नए ब्लॉग पर की गई प्रतिक्रिया आपके ब्लॉग के पाठकों में एक और पाठक और टिप्पणी देने वालों में एक और टिप्पणी देने वाला जोड़ सकता है।
आप कुछ भी लिखते हैं तो उस लेखन पर आने वाली टिप्पणियाँ आपके द्वारा दूसरे ब्लोगों पर दी गई टिप्पणियों के समानुपाती होती हैं।
विवाद लोगों को आकर्षित करने का अचछा माध्यम होता है पर इसके लिए आपको थोड़ा सा नामचीन होना पड़ेगा।

हमने अपनी इंग्लिश ब्लोगिंग में ये तीनों नियम इस्तेमाल किए हैं और सफलता पायी है । कहाँ क्या अच्छा है इससे ज्यादा लोगों की रूचि कहाँ क्या बुरा है खोजने में ज्यादा रहती है।

खैर!


अभी हाल ही में चिट्ठाचर्चा पर कुश ने एक ब्लॉग और उसपर आई टिप्पणियाँ उजागर की । ज्यादा कुछ कहना बेकार है क्योंकि कुश ने सबकुछ कह डाला है पर कभी जब हम अपने ब्लॉग पर आई हुई टिप्पणियाँ पढ़ रहे होते हैं तो अक्सर किसी टिप्पणी को देख कर दिल से आह निकलती है
..... उफ़ बिना पोस्ट पढ़े या बिना समझे टिप्पणी मार दी गई होगी।
आप में से कईयों को ऐसा ही लगता होगा

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कागज की हवेली है


आज जैसे ही हम घर से निकले बारिश की बूँदें शुरू हो गयीं । पहले हौले-हौले और फ़िर तेज। आपना तरीका वही कुश भाई वाला रहा है भाग जाओ या फ़िर भीग जाओ। भीग जाने को ललचाये अपने मन को हमने कपडों और ऑफिस का हवाला दिया , लैपटॉप की और इशारा किया और मुट्ठी बंद है या खुली इसकी परवाह किए बिना भाग खड़े हुए।
पनाह ली एक दूकान के सामने थोडी सी छाया में।
बारिशे आकर्षित करती हैं पर सच तो यह है की हर आकर्षित करने वाली चीज के मानिंद ये भी परेशानी खड़ी करने वाली होती हैं। यह ज्ञान हमें आज ही प्राप्त हुआ।
कुछ लोग भीगते हुए निकल रहे थे उनसे हमें रश्क हुआ ।
कुछ लोग छाते ताने निकल रहे थे उनसे भी हमें रश्क हुआ।
कुल मिला कर टोटल सेंस ऑफ़ डेप्राईवेशन !
भीग न सकने की लाचारी
बरसते पानी में निकल न पाने की लाचारी
हम छाते नही पसंद हैं। आख़िर ये भी कोई बात हुई कि बूंदे अपना दिल खोल के बरस रहीं हों और आप छाता ताने उनको जलाते हुए चले जा रहे हों। पिछ्ले साल की घनघोर में भी हमने छातों और रेनकोट से परहेज बनाये रखा। बारिश होती रही और बाइक के बैग में रखे रेनकोट को ऐसे इग्नोर करते रहे जैसे वो टीवी पर आने वाला जनहित में जारी विज्ञापन हो।
खैर!
इंतज़ार ख़त्म हुआ बारिश बंद हुई । हम थोडी ही दूर आए थे, बूंदे फ़िर जी ललचाने आ गयीं इसबार हमने हाथ में लिए अखबार को अपने सर पर रख लिया ।
ऑफिस पहुँचते पहुँचते अखबार बुरी तरह से भीग चुका था । हमने अखबार को एक किनारे रखा और एक शेर मन ही मन गुनगुनाने लगे
मासूम मोहब्बत का इतना सा फ़साना है
कागज़ की हवेली है, बारिश का ज़माना है।
शायद बारिशों से की जाने वाली मासूम मोहब्बतें ऐसे ही न भीग पाने की लाचारियों की भेंट चढ़ती चली जातीं हैं
शायद छाते भी कसमसाते होंगे अपने नीचे बिना भीगे चले जाते लोगों की लाचारी पर , शायद रेनकोट .........
पता नही ...........................
कुश ने अभी अपने ब्लॉग पर लिखा था हर बारिश की अपनी अलग कहानी होती है।
हर साल की बारिश भी ऐसे ही अलग अलग कहानी लेकर आती है

रविवार, 31 मई 2009

बस यूँ ही




बरेली में भटकते हुए एक जगह ये दृश्य दिख गया तो हमने सोचा आप सबके लिए ले कर चलें ।
शुक्र कूड़ा कम ही है ।

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

एक मूरत अचानक नजर आ गई

पिछले दिन

पिछले कुछ समय यूँ ही इधर-उधर भटकना लगा रहा इन्टरनेट पर पहुंचना मुश्किल सा रहा ।
ब्लॉग जगत से दूर रहना खला तो कई ऐसी जगहों पर भी जाना हुआ जहाँ जाना अच्छा लगा । दिल्ली के भारतीयइस्लामिक सांस्कृतिक केन्द्र के छोटे से मगर प्रेरणादायक सम्मेलन से लेकर ऋषिकेश की गंगा की उछालभरीधाराओं तक बहुत कुछ ऐसा है, जिसे शेयर करने का मन है। कोशिश करेंगे जल्दी ही ॥

चुनाव

न जाने क्यों इस बार चुनावों में मन नही लग पा रहा है। हम बड़ी छोटी सी उम्र से ही चुनावों में हमेशा रूचि रखते रहेहैं और एक-एक सीट का हिसाब जबानी रटा रहता था। इस बार बड़ा बोरिंग सा दिख रहा है सब कुछ।
न्यूज़ पेपर्स में निकल रहा है कि पहले कैसे कैसे जन-प्रतिनिधि होते थे और कैसे -कैसे चुनाव होते थे।
राजनीति में कमियाँ नई नही है । १९३७ के चुनावों के बाद भी कुछ लोग बदल गए थे , उनपर सत्ता का रंग चढ़ गयाथा। लेकिन पहले ये कमियाँ कम होती थीं।
राजनीति में अच्छी बातें भी कोई बहुत पुरानी नही हैं। अच्छे लोग अभी भी हैं लेकिन अब कम हैं ।

एक पुरानी सी याद

पापा की पोस्टिंग उन दिनों अविभाजित फैजाबाद में थी।
हमारी उम्र कोई सात-आठ साल की रही होगी , होली का समय था और हमारे लिए पिचकारी आ गई थी। हमपिचकारी में फीका सा रंग भर कर शिकार पर निकले हुए थे । घर वापस पहुँचने पर हमने पाया कि पापा के साथकोई झक सफ़ेद कुरते में बैठा हुआ था । हमारा मन मचल गया उस सफेदी पर पिचकारी चलाने को पर कुरते केमालिक ने हमारी पिचकारी पकड़ ली। पिचकारी टूट गई और हमने बुक्का फाड़ कर रोना शुरू कर दिया । अब उनकुरता-धारी ने हमें मनाने की कोशिश शुरू की ।
उन्होंने वादा किया कि वो हमें पिचकारी टूटने का हर्जाना देंगे ।कुछ दिनों बाद जब वो फ़िर से हमारे घर आए तो उन्होंने हमें एक पेज दिया बतौर हर्जाना । पेज पर एक ग़ज़ललिखी थी। (तब हमें ग़ज़ल नही पता होती थी क्या होती है। हमें बड़ी गुस्सा आई थी। बाद में समझ आया कि वोसबसे कीमती चीज किसी को दे सकते थे वो वही था जो उन्होंने हमें दिया था।)
लाइने थीं-
एक सूरत अचानक नजर आ गई,
मन विकल हो गया है नमन के लिए।
वो सज्जन थे स्थानीय कांग्रेसी विधायक और ग़ज़ल सम्राट नाम से विख्यात जिया राम शुक्ल "विकल साकेती "।
विकल साकेती उन नेताओं में शामिल रहे हैं जिनके लिए राजनीति ताकत अर्जन का माध्यम कभी नही रही। कोईदस साल विधायक रहते हुए भी वो वैसे ही रहे जैसे हो सकते थे। उनका घर औसत ग्रामीण घरों जैसा ही बना रहा , घर पर आने वाले को विकल साकेती गुड खिला कर पानी पिलाते और प्रेम से मिलते , और तो और सरकारी हैण्डपम्प तक उनके घर से दूर लगा था ।
१९८९ में वो चुनाव हार गए। पापा का स्थानांतरण चुनाव के पहले ही हो चुका था पर हमारी रूचि कटेहरी विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में बनी हुई थी। विकल साकेती ने चुनाव हारने को भी मनोविनोद का माध्यम बनाया । उन्हेंहराने वाले जनता दल के उम्मीदवार का मुह थोड़ा सा टेढा था । विकल साकेती ने चुनाव के नतीजे आने परप्रतिक्रिया दी
वोट डालने गई थी जनता पीकर भांग,
हार गए श्री विकल जी, जीत गया विकलांग।

विजयी उम्मीदवार ने इसका बुरा नही माना था ।

मेरी वाली ग़ज़ल

विकल साकेती ने जो ग़ज़ल हमें लिख के दी थी वो कहीं गुम हो गई उसकी दो-एक लाइने पापा के गुनगुनाते रहनेसे याद रह पायी हैं
जो किनारे रहे वारुणी पा गए,
हमको विष मिल गया आचमन के लिए।
प्यार की बूँद बनके बरस जाइए,
एक शोला विकल है शमन के लिए।
एक मूरत अचानक नज़र आ गई,
मन विकल हो गया है नमन के लिए ।

अफ़सोस कि पूरी याद नही रह सकी ।

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

रौशन के जन्म दिन पर !


कहावत है कि एक सेब रोजाना लेते रहने से आप बीमारियों से दूर रहते हैं ।

ऐसा ही शायद कुछ लोगों के साथ भी होता है । कुछ लोगों से रोज मिलते रहने या बात करते रहने भर से चिंतामुक्त रहा जा सकता है। ऐसा ही रौशन के साथ है ।

एक ऐसा दोस्त साथ बात करने के बाद महसूस होता है किजो कोई भी परेशानी मन में कहीं भी थी वो ख़त्म हो चुकी है। जिसके साथ बात करने के बाद महसूस होता है कि हर किसी परेशानी का हल खोजा जा सकता है और वो हल ख़ुद ही खोजा जा पाना सम्भव है ।


आज रौशन का जन्म दिन है । अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से (हिन्दी कैलेंडर के हिसाब से कल था , और वो दोनों जन्मदिन मनाता है )

जन्म दिन पर ढेर सारी शुभकामनाएं

जी मेल अब भारतीय भाषाओँ में भी

आज सुबह मैंने जी मेल में मेल लिखने के लिए कंपोज आप्शन देखा तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ .
जी मेल पर ऑरकुट एवं ब्लोगर की ही तरह अब भारतीय भाषाओँ में लिखने की सुविधा मिल गयी है । इसके लिए आपका ब्राउजर एक्स्प्लोरर में ७ और मोजिला में ३ से ऊपर का होना चाहिए . तो देर किस बात की है शुरू कीजिये न !
और हाँ ये अप्रैल फूल नहीं है

रविवार, 29 मार्च 2009

बालश्रम और भीख !

बस छोटी सी एक बात है जो देखने में अजीब लगती है पर अजीब तो न जाने क्या क्या होता रहता है
कभी कभी नीति नियंताओं की बातें समझ में नही आती
कभी कभी तो ख़ुद भी समझ में नही आता कि होना क्या चाहिए।
१४ वर्ष से कम उम्र के बच्चों का काम करना बाल श्रम कहलाता है उन्हें काम पे लगाने वाला दोषी होता है
अलबत्ता वो भीख मांगने के लिए छोड़ दिए जाते हैं
बालश्रम करने वाले बच्चे आगे चल कर कुछ काम तो कर सकते हैं
पर भीख मांगते बच्चे थोड़ा बड़े हो कर क्या करेंगे ।
क्या समाज और व्यवस्था कीजिम्मेदारी बालश्रम रोककर ख़त्म हो जानी चाहिए ?

गुरुवार, 19 मार्च 2009

विश्वनाथ मन्दिर और आस्थाओं के सवालात

डॉ अनुराग आर्य की बनारस यात्रा और विश्वनाथ मन्दिर के बारे में पढ़ कर हमें अपनी एक विश्वनाथ मन्दिर कीयात्रा याद आ गई।
बारहवीं की बोर्ड परिक्षा देने के बाद हम और हमारे एक मित्र योगेश वाराणसी एक परीक्षा देने गए थे। वाराणसीहमेशा से हमें आकर्षित करने वाले शहरों में से रहा है। परीक्षा देने के बाद हम दोनों ने निश्चय किया कि घर के लिएरवाना होने से पहले थोडा घूम फ़िर लिया जाय। वाराणसी में यूँ अपने मन से घूमने का विचार कभी दिमाग मेंआया ही नही था सो पता नही था कि अगर घूमना है तो कहाँ घूमना है ऊपर से तुर्रा यह कि हमें बहती धारा की तरहयूँ ही निकल जाने में मज़ा आती है तो किसी से पूछना भी मंज़ूर नही था । योगेश के साथ बड़ी लम्बी बहस के बादतय हुआ कि एक एक करके उसकी और हमारी पसंद की ज़गहों को देखा जायेगा । पहले हमारा नंबर था तो हमभटकते हुए दशाश्वमेध घाट पहुंचे । गंगा का गहरे तक पैठा आकर्षण घाट के किनारे और फ़िर गंगा में इधर उधरफैली गन्दगी देख कर काफूर हो गया । हमारा मन खिन्न हो उठा था । अब योगेश की बारी थी और तब तक वहनास्तिक नही था। हम विश्वनाथ मन्दिर की गलियों में मुड़ चले।
विश्वनाथ मन्दिर जैसे जैसे नज़दीक आता गया पण्डे हमें घेरते गए। हमने योगेश को सिखा रखा था कि किसी पण्डेको साथ नही लेना है हम ख़ुद से मन्दिर देखेंगे । बस हमें बिना इधर उधर देखे मन्दिर की ओर बढ़ते जाना है लेकिनयोगेश जिज्ञासु प्रवृत्ति का होने के चलते एक पण्डे के जाल में फंस ही गया । अब हम पण्डे के मार्गदर्शन में बढ़ने कोविवश थे।
चढावा खरीदकर जब हम मन्दिर के अन्दर पहुंचे तो दर्शन के बाद पण्डे ने हमें बाबा विश्वनाथ के नाम पर वहां केपुजारी को कुछ दान देने को कहा । योगेश अभिभूत था उसने १०० का एक नोट पुजारी को अर्पण किया । अब पण्डेने हमारी तरफ़ निगाह बढ़ाई । हम मन्दिर वन्दिर में चढावे के नाम पर हमेशा से कंजूस रहे हैं पर उसकी नजरों नेहमें भी जेब में हाथ डालने को मजबूर कर दिया। हमारी जेब से भी एक नोट बाहर आया फर्क बस इतना था कि वो१० का था।
हम दर्शन करके बाहर निकलने को उतावले थे पर पंडा हमें आगे ले गया। यहाँ पर उसने हमें अन्नपूर्णा देवी परमाता-पिता के लिए कुछ चढाने को कहा। हम योगेश का हाथ पकड़ने को बढे ही थे कि उसने फ़िर से १०० का नोटआगे कर दिया था । अब माता-पिता के नाम पर क्या कंजूसी ! हमें भी मजबूरन १० का नोट बढ़ाना पड़ा।
हमें लगा था कि अब हम मन्दिर से निकल जायेंगे पर पंडा तो योगेश की जेब की गहराई नापने की सोच चुका था और हमें लेकर वो मन्दिर में न जाने किस ओर एक अंतहीन सी लगने वाली यात्रा पर निकल चुका था। थोडा आगे बढ़ने के बाद मन्दिर में दर्शनार्थी दिखना बंद हो गए। चारों ओर बस सन्नाटा ही सन्नाटा था। मन्दिर में हम किस दिशा में थे, कहाँ थे अंदाजा मिलना बंद हो गया था। हमें एकअनजान सी फ़िल्म याद आने लगी जिसमे पण्डे मन्दिर में आने वालों को लूटा करते थे।
अब योगेश भी ५० और फ़िर १० की ओर बढ़ रहा था और हम तो बस सर झुकाने लग गए थे।
तीन और जगहों पे जाने के बाद हमने कनखियों से देखा कि थोडी दूर पर पुलिस के दो सिपाही एक जगह पर बैठे हैं हमने तयकर लिया कि अब आगे नही जाना है। पंडा आगे आगे चल रहा था हमने योगेश की जेब से पर्स लिया और अपनाऔर उसका दोनों का पर्स छिपा लिया । योगेश को भी डर लगने लगा था । अगला पड़ाव सिपाहियों से ज्यादा दूरनही था जब उसने एक और जगह कुछ चढाने को कहा।
योगेश को पीछे करके हम आगे आ गए और उससे कहा कि अब आपकी दक्षिणा के लिए ही पैसा बचाना हो तोवापस चलिए अब हमारे पास पैसा बिल्कुल नही है। हमने तय किया था कि अगर इसने कुछ आना-कानी की तोअब यहाँ से पुलिस वालों के पास जायेंगे। हमने हाथापाई की पूरी तैयारी कर रखी थी।
फिलहाल थोडी बहस के बाद वो तैयार हो गया हम वापस लौटे। हमने उसे दक्षिणा में ११ रूपये दी तो वो भड़क उठा । उसने हम दोनों के १०१-१०१ मांगे । पर हम चलते बने। उसने काफ़ी दूर तक हमारा पीछा किया फ़िर गालियाँ देनेलगा । "फ़िर आना मन्दिर देखूंगा " की धमकी देकर उसने हमारा पीछा छोड़ा।
इस अनुभव के बाद हमारा मन खट्टा हो चला था और हम सीधे बस स्टैंड की ओर चल पड़े।
हम अभी भी आस्तिक बने हुए हैं पर योगेश नास्तिक हो गया है।
वैसे वाराणसी हमें अभी भी पसंद है वहाँ अक्सर जाते रहते हैं पर अब विश्वनाथ मन्दिर जाने की इच्छा नही होती। गंगा तट भी जाने का मन नही होता बस संकट मोचन होकर वापस आ जाते हैं

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

तमिल में बोलने के लिए रहमान को बधाई !

स्लमडॉग को लेकर हमारी असहमतियां जो भी रही हों वो अभी भी हैं और इसे आस्कर मिलना न मिलना कोईमायने नही रखता हमारे लिए। एक आम सुबह की तरह न्यूज़ देखते हुए एक चीज बहुत अच्छी लगी वो थी रहमानका तमिल में बोलना ।
रहमान हमेशा से हमारे पसंदीदा संगीत निर्देशक रहे हैं और जहाँ भी उनका नाम जुड़ जाता है पक्का हो जाता है किवहां संगीत अच्छा ही होगा।
स्लमडॉग का संगीत कोई बहुत ख़ास नही था पर इसके लिए उन्हें आस्कर मिलने का मतलब है कि रहमान काऔसत संगीत भी विश्व स्तर पर औरों से बेहतर है . रहमान ने पुरस्कार लेते समय अपनी बात तमिल में रखी जोरहमान को और भी स्पेशल बना देती है ।
पुरस्कार लेते समय भाषा का चयन दिखाता है कि रहमान ख़ुद को अपनी मातृभाषा से जोड़ कर प्रस्तुत करनापसंद करते हैं। उनका "मेरे पास माँ है " का उल्लेख ये दिखाता है कि आस्कर पुरस्कारों में वो ख़ुद को भारतीयफ़िल्म उद्योग के एक प्रतिनिधि के रूप में रख रहे थे।
शायद यही जमीन से जुडाव और उस जुडाव की समुचित अभिव्यक्ति ही वो विशेषता है जो रहमान को नित नईरचनात्मंकता की क्षमता देती है ।
रहमान को बधाई न सिर्फ़ आस्कर के लिए बल्कि अपनी अभिव्यक्ति के लिए भी

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

यहाँ कोई रोक-टोक नही है अभी

लखनऊ में कपूरथला चौराहा उन जगहों में शामिल है जहाँ हम कुछ दोस्त अक्सर मिला करते हैं । कपूरथलाचौराहे पर ख़ास बात युनिवर्सल बुक डिपो में है जहाँ का हिन्दी और और अंग्रेजी दोनों ही सेक्शन अच्छा है । एकऔर ख़ास बात नेस्कैफे के स्टाल में है जहाँ फुटपाथ और काफ़ी दोनों का आनंद एक साथ लिया जा सकता है ।
दो-तीन दिन पहले हम दो दोस्त युनिवर्सल बुक डिपो के दोनों सेक्शन छान कर नेस्कैफे के बगल काफ़ी ले कर बैठेतो अचानक सूखे मेवे लेकर फेरी लगाने वाला एक कश्मीरी दिख गया। हमें अंजीर और कश्मीर दोनों बहुत पसंद है। अंजीर तो उसके पास ख़त्म हो चुका था पर कश्मीर बाकी था । हम दोनों उसके साथ कश्मीर के बारे में बात करनेलगे।
कश्मीर के चुनाव के बाद अक्सर अलगाव वादी आरोप लगते रहे कि इन चुनावों में लोगो को जबरदस्ती वोट डालनेपर मजबूर किया गया था । हमने फैज़ल (उस कश्मीरी युवक का नाम फैज़ल था ) से पहली बात यही पूछी। फैज़लसे पता चला कि कश्मीर में पिछले कुछ टाइम में काफ़ी कुछ बदला है और लोग खुशहाल हुए हैं । नेताओं कोअंदाजा नही था कि लोग वोट डालना चाहते हैं उन्हें अंदाजा होता तो वो भी चुनाव लड़ते। हमें अच्छा नही लगा जबउसने कहा कि फौजी परेशान करते हैं पर याद किया तो समझ में आया कि फौज का व्यवहार नागरिकों के बीच मेंहमेशा कोई बहुत शानदार नही रहता है। ट्रेनों में उनका व्यवहार देख कर अगर हमें बुरा लगता है तो कश्मीरियों कोक्यों नही लग सकता ?
फैज़ल ने बताया कि अगर नए मुख्यमंत्री उमर अपने पिता फारुख की तरह रहते हैं तो लोगों में उपजा भरोसा ख़त्महो जायेगा । अगर थोड़ा भी अच्छा रहे तो इनको कोई हटा नही पायेगा ।
हमारे दोस्त ने पूछा कि लखनऊ में जो लोग मिलते हैं उनका व्यवहार कैसा लगता है तो उसने बिना लाग-लपेट केबता दिया कि अधिकतर लोग खुश होते हैं पर कुछ लोग कभी कभी उल्टा सीधा भी कहते हैं। हमने सोचा किआख़िर फेरी लगाने आए कश्मीरी उल्टा सीधा बोल कर किसी को क्या संतुष्टि मिलती होगी।
अंत में उसने एक बात कही जो हम जैसों को जो लखनऊ जैसी अपेक्षाकृत शांत जगह रहते हैं उन्हें कभी समझ मेंनही आ सकती है। उसने कहा कि लखनऊ में उसे बहुत अच्छा लगता है क्योंकि यहाँ कोई रोक टोक नही है चाहेजहाँ घूमो फिरो चाहे जितने देर तक घूमो फिरो।
हम सोचने लगे कि कैसा लगता होगा किसी भी जगह के रहने वालों को जब उन्हें आते जाते पूछा जाता होगा किकहा जा रहे हो कहाँ से आ रहे हो, कैसा लगता होगा जब शाम के एक निश्चित समय के बाद घर से बाहर निकलनावर्जित होता होगा, कैसा लगता होगा जब उनके अपने शहर में उनके अपने इलाके में औचित्य की जरुरत पड़तीहोगी कहीं रहने के लिए।
कैसा लगता होगा उन्हें जिन्हें अपने घर छोड़ कर कैम्पों में जिंदगी काटनी पड़ती होगी एक दो महीने , एक दो सालकश्मीरी पंडितों के लिए तो शायद एक दो पीढियां या और भी ज़ियादा।
फैज़ल ने बताया कि अभी भी टाइम लगेगा कश्मीरी पंडितों की वापसी में । उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि समस्या कासमाधान कश्मीरी पंडितों को जम्मू कैम्प से उठा कर श्री नगर के कैम्प में डालने में नही है। समस्या का समाधानहै उस स्थिति का निर्माण जिसमे कश्मीरी पंडित ख़ुद अपने आप अपने घरों में जा सकें। हम सहमत हैं उमर साहबपर बीस साल एक लंबा अरसा होता है । लोग निराश हैं।
क्या कश्मीरियों का भी फ़र्ज़ नही बनता था कि अपने ही भाइयों के हक़ में आगे बढ़ के बोलें। क्या लोग जमीन सेज्यादा कीमती हैं?
लेकिन लोग अपने वंचित भाइयों के बारे में नही सोचते।
कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए आन्दोलन नही छेड़ेंगे।
गुजरात के लोग सरदार सरोवर बाँध से तृप्त तो होंगे लेकिन नर्मदा के विस्थापितों के अधिकार की नही सोचेंगे। जोउनके अधिकारों को समर्थन देगा उसके ख़िलाफ़ गुंडागर्दी पर उतर आयेंगे (यहाँ हम कश्मीर और गुजरात के आमलोगों की बात कर रहे हैं नेताओं के समर्थक भावुक न हों )।
ओह कहाँ से शुरू किया था कहाँ आ गए । मुआफ कीजियेगा इधर उधर भटकने के लिए ये यहाँ सिर्फ़ इसलिए होपाया क्योकि अभी तक यहाँ भी
कोई रोक टोक नही है कुछ भी करो कहीं भी भटको , कोई नही पूछता । कल इसतरह से मौका मिले न मिले ।

चलते-चलते : गुलज़ार साब ने फ़िल्म यहाँ के लिए एक गाना लिखा था पूछे जो कोई मेरी निशानी ।
उसमे एक लाइन है
आओ
न आओ न जेहलम में बह लेंगे ।
कोई वादी के मौसम भी एक दिन तो बदलेंगे ॥
आमीन

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