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रविवार, 13 जून 2021

जितिन प्रसाद और उनकी राजनीति

जुलाई 2016 की बात है, हम शाहजहांपुर में थे। प्रशांत किशोर कांग्रेस के 2017 अभियान से जुड़ चुके थे ग़ुलाम नबी आज़ाद और राजबब्बर की अगुवाई में कांग्रेस की 27 साल यु पी बेहाल यात्रा निकल रही थी। हमारे एक परिचित, जो प्रशांत किशोर के संगठन में कार्यरत हैं , भी यात्रा के साथ शाहजहांपुर पहुंच रहे थे।
उनसे मिलने और यात्रा का रिस्पॉन्स देखने को हम भी शाहजहांपुर टाउनहॉल पहुंचे। उस समय देर रात ग़ुलाम नबी आज़ाद उपस्थित भीड़ को संबोधित कर रहे थे। इतनी रात के में भी गुलाम नबी आज़ाद ऊर्जा से भरे हुए थे।उनका छोटा सा संबोधन प्रभावशाली था और इतनी रात वहां उपस्थित भीड़ भी प्रभावशाली थी। राजबब्बर भीड़ में फंसे होने के कारण लोगों को संबोधित करने तक पहुंच नहीं पाए थे। आज़ाद के बगल में जितिन प्रसाद थे। जितिन उस माहौल से पूरी तरह निस्पृह नज़र आ रहे थे जैसे कि उन्हें ज़बरदस्ती साथ रखा गया हो। 
प्रशांत किशोर के लोग काली टीशर्ट और नीली जीन्स मेँ थे और अधिक से अधिक नेपथ्य में रहने की कोशिश कर रहे थे
"जितिन का प्रभाव है यहां "हमने अपने परिचित से कहा. अबतक काफिला होटल पहुंच चुका था और भीड़ राजबब्बर को घेरे हुए थी। हम थोड़ा भीड़ से अलग खड़े थे। 
इसमें जितिन के लोग कम ही हैं। हमारे परिचित ने बताया कि यात्रा प्रबंधन से अधिक परेशानी तो जितिन के प्रबंधन में हुई है। जितिन तो कार्यक्रम को असफल बनाना चाहते थे। उनका बस चलता तो यात्रा के यहां पहुंचने पर वे यहां होते ही न।
कांग्रेस की एक बड़ी समस्या ये जितिन से लोग हैं। इन्हें मैदान में और संघर्ष में उतरना पसंद नही है। अगर किसी मंच पर पहुंचते हैं तो इन्हें महत्वपूर्ण स्थान चाहिए। 
इसके बहुत पहले जिले के एक निष्ठावान कांग्रेसी ने भी ऐसा ही कुछ कहा था यद्यपि वह प्रसाद परिवार के घोर समर्थकों में से एक था।
प्रसाद भवन के और भी नज़दीकियों की बातों में उनकी परेशानी का संकेत था। वे जितेंद्र प्रसाद से कौशल वाले नही थे। चुनाव हारने और सत्ता से दूर रहने पर राजनीति उनकी समझ आए बाहर थी। वे सत्ता में रहकर तो कार्य कर सकते हैं पर विपक्ष में नही। जितिन ही नही ऐसे कई छोटे-बड़े जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय नेता संघर्ष से दूर रहते रहे हैं ये चाहते रहे हैं कि शीर्ष नेतृत्व चमत्कार करे , कार्यकर्ता मेहनत करें और ये फल खाएं।

जितिन को 2016-17 में ही कांग्रेस छोड़ देना था। देर की वजह शायद गंतव्य रहा हो। अगर बसपा में कुछ दम होता तो उनकी पहली पसंद बसपा होती, उनके पिता जितेंद्र प्रसाद के मायावती से अच्छे संबंध रहे थे और उनके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते कांग्रेस व बसपा का गठबंधन भी हुआ था। सपा का खुद 2017 में कांग्रेस से समझौता हो गया था और भाजपा अब तक शायद उन्हें लटकाये रखी हो। पिछले कुछ समय से गंतव्य न मिलने की छटपटाहट उनमे साफ नज़र आ रही थी। 2019 के लोकसभा चुनावों में काफी हद तक आगे बढ़ने के बाद कुछ ठोस न मिल पाने की वजह से उन्हें कदम वापस खींचने पड़े थे। उसके बाद उन्होंने जातिवादी राजनीति को केंद्र बनाते हुए खुद को लाइमलाइट में लाने की कवायद शुरू की उनकी इस नई राजनीति में जातिवाद के अलावा और कोई विचारधारा नही होगी यह उन्होंने विजय मिश्रा वाले बयान से ज़ाहिर कर दिया। बाद में लेटर राजनीति में शामिल होने के पीछे उनकी यही मंशा थी कि और राजनैतिक दल खासकर भाजपा उन्हें विद्रोही माने।

जितिन को अभी तक कांग्रेस में जो मिलता रहा है वह उनके राजनैतिक कौशल से युक्त पिता की विरासत के कारण ही रहा है। जिले की राजनीति में तो भाजपा ही नही अन्य सभी दलों को भी जोड़ लें तो आज की तारीख में सबसे कद्दावर नेता प्रदेश के संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ही हैं। जितिन को भाजपा में उनके नेतृत्व में कार्य करना होगा। सुरेश खन्ना को तो इतनी बार लगातार विधायक बनने के बाद भी शाहजहांपुर में पैदल घूमते देखा जा सकता है। क्या जितिन ऐसा कर पाएंगे या फिर भाजपा उन्हें सुरेश खन्ना के अधिक महत्वपूर्ण स्थान देगी। यह देखने वाली बात होगी कि भाजपा में जितिन प्रसाद  अपनी सामंती सोच से बाहर निकल पाते हैं या नही क्योंकि उनकी दो सबसे बड़ी योग्यताओं में से पहली , जितेंद्र प्रसाद का पुत्र होना तो अब उनके किसी काम की रही नही (यद्यपि शाही खानदान के होने के चलते बड़े संबंध तो हमेशा उपयोगी रहते हैं) और दूसरी राहुल गांधी का नज़दीकी होने के चलते हो सकता है कि शुरुआत में भाजपा उन्हें कुछ महत्व दे दे, जैसा कि अभी दिया है, पर बाद में भाजपाई बन के तो उन्हें दिखाना ही होगा।
वैसे एक मज़े की बात यह है कि कांग्रेस में अपने आखिरी असाइनमेंट में जितिन ने कांग्रेस को बंगाल के न्यूनतम स्तर पर पहुंचाते हुए परफेक्ट शून्य पाने में मदद की। कांग्रेस के इस प्रदर्शन की लाभार्थी जितिन की नई पार्टी भाजपा रही जिसने नई बंगाल विधानसभा में कांग्रेस की जगह ली है।
हम यह नही कहते कि जितिन इतने प्रभावशाली रहे होंगे कि काँग्रेस को हानि और भाजपा को लाभ दे पाते मगर सोचिये अगर ऐसा होता तो! कोई इतने दिन से पार्टी में आने का इच्छुक हो उसके सामने शर्त लगा दी जाए कि पहले वफादारी साबित करो। ये है टॉस्क!

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

आम चुनावों में वोट दें वोटर लिस्ट में अपना नाम डलवाएं

2019 के आम चुनावों की उद्घोषणा हो चुकी है और अलग अलग दल अपनी उम्मीदवारी जता रहे हैं. इन चुनावों में वोट दे कर अपना भविष्य तय करने की जिम्मेवारी आपकी है. कई बार लोग मतदाता सूची में अपना नाम समय की कमी से या किन्ही अन्य कारणों से नहीं डलवा पाते और मतदान से वंचित रहते हैं. चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नाम डलवाने की प्रक्रिया ऑनलाइन कर राखी है जो बहुत ही सुगम है और आप मिनटों में स्वयं को मतदाता के रूप में रजिस्टर करवा सकते हैं.
इसके लिए आपको राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल या NVSP की वेबसाइट पर जाना होगा जिसके लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं  आप किसी भी सर्च इंजन पर NVSP सर्च करके भी इस वेबसाइट पर जा सकते हैं.
इस वेबसाइट पर आपको निम्न सेवाएं उपलब्ध हैं

  1. मतदाता के रूप में रजिस्ट्रेशन या एक चुनाव क्षेत्र से दूसरे चुनाव क्षेत्र में स्थानांतरण 
  2. अनिवासी मतदाता के रूप में पंजीकरण 
  3. निर्वाचक नामावली में नाम सम्मिलित किए जाने या निर्वाचक नामावली से नाम हटाए जाने पर आपत्ति के लिए आवेदन
  4. निर्वाचक नामावली में प्रविष्टि विशिष्टियों की शुद्धि के लिए आवेदन
  5. निर्वाचक नामावली में प्रविष्‍टि को अन्‍यत्र रखने के लिए आवेदन (एक निर्वाचन क्षेत्र में निवास स्‍थान को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर स्‍थानांतरित करने के मामले में)
  6. नया वोटर आई कार्ड (EPIC ) इशू करवाने हेतु आवेदन एवं 
  7. अपने आवेदन की स्थिति 

मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आपको ऊपर दिए लिंक पर जाना होगा पंजीकरण शुरू करने से पूर्व अपने पास निम्न डाक्यूमेंट तैयार रखें 
  1. अपनी फोटो सॉफ्ट कॉपी में 
  2. यदि पहली बार पंजीकरण करवा रहे हैं तो आयु सम्बन्धी घोषणा हस्ताक्षर करके सॉफ्ट कॉपी में।  यह उद्घोषणा आपको पंजीकरण के पेज पर ही डाउनलोड के लिए उपलब्ध रहेगी. इस उद्घोषणा की आवश्यकता तब होती है जब आपकी आयु 21 वर्ष से अधिक हो. 
  3. आयु प्रमाण पत्र  जैसे कि PAN Card , आधार कार्ड , जन्म प्रमाणपत्र, अंकपत्र , पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस 
  4. पते का प्रमाणपत्र जैसे कि पासपोर्ट , ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड , टेलीफोन बिल, बिजली का बिल किसान बही, बैंक या पोस्टऑफिस की पासबुक, पानी का बिल , गैस का बिल , राशन कार्ड , आपके पते पर डाक विभाग के द्वारा प्राप्त कोई पत्र , टैक्स असेस्मेंट आर्डर, किरायानामा इत्यादि की सॉफ्ट कॉपी
ध्यान रखें मतदाता रजिस्ट्रेशन आपके क्षेत्र में चुनाव हेतु नामांकन के दस दिन पूर्व तक किया जा सकता है. 

सोमवार, 26 जून 2017

आपातकाल

हिंसक भीड़ द्वारा संचालित
शासनतंत्र में जीते हम,
आपातकाल के बाद की  पीढ़ी के लोग  

हैरान होते हैं आज
कि लोकतंत्र,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और
विचारों की आज़ादी
को बेड़ियां पहनाने की
कोशिशें तब अनुचित मानी जाती थीं 

रविवार, 5 अगस्त 2012

राजनीति में गैंग अन्ना

पहले दिन जब गैंग अन्ना के लोगों ने राजनीतिज्ञों को गालियाँ देना शुरू किया, हमें अनुचित लगा था . किनारे खड़े होकर उपदेश देना गई जिम्मेदारी भरा काम होता है . आपको लगता है कि कुछ गलत है तो आप दूसरों से उसे सुधारने के लिए कहना शुरू करते हैं यह गलत है . कुछ बुरा है उसे सुधारा जाना चाहिए तो दूसरे क्यों आप खुद क्यों नहीं ?
गैंग अन्ना शुरू से राजनैतिक आंदोलन था और इससे राजनीति को अलग ही नहीं किया जा सकता था . राजनीति अलग तब होती जब आप सिर्फ उन सुधारों की बात करते जो आप चाहते हैं , उसके लिए कानूनी , संविधान सम्मत तरीके अपनाते .आपका तरीका सिर्फ और सिर्फ सकारात्मक होना था .  आपकी भाषा सिर्फ आपके उद्देश्य के लिए तय होती. आप एक राजनैतिक दल चुन कर उसका विरोध करने की बात नहीं करते . हम शुरू से ही इस आंदोलन को अपरिपक्व इसी लिए मान रहे थे. वस्तुतः आप किसी चीज के लिए  से हट कर किसी के खिलाफ नजर आने लगते हैं तो इसके मायने कुछ और ही होते हैं.
पिछली अप्रैल और अगस्त में जो जन समर्थन गैंग अन्ना को मिला इन्होने उसका मतलब गलत लगा लिया . भीड़ इनकी खुराक बन गयी और भीड़ ही प्राणवायु
मीडिया की चकाचौंध , रात-दिन कवरेज , मिस्सड काल्स , फेसबुक लाइक्स, कमेंट्स और ट्विटर तो साथ में थे ही . पांच -छह लोगों का समूह खुदा बन गया . खाप पंचायत बन गयी . कौन अच्छा है कौन बुरा , किसे पद में बाँध कर पीता जाना चाहिए किसे "बस एक थप्पड़ लगाना है " जैसी चीजे शुरू हो गयीं. और शुरू हो गया उन्माद परोसा जाना
गैंग के एक सदस्य ने आंदोलन के उफान के दिनों में अपने फेस बुक पर लिखा था
"स्थानीय इंटेलिजेंस के लोग हमारे बारे में पूछ ताछ कर रहे थे 
तो क्या डर जाऊं 
इससे अच्छा है की मर जाऊं "
एक पुरानी ट्वीट को अभी अभी का बता कर पेश किया जाता है कि सरकार खबरे दबा रही है वस्तुतः जितना मीडिया दिखा रहा है जन समर्थन उससे ज्यादा है
पिछली अगस्त में मेरे मोबाइल पर चेन एस एम् एस आते कि अमुक बच्चा जिसकी उम्र सिर्फ अमुक साल है अन्ना के साथ अनशन पर बैठा था आज बेहोश हो गया है डॉ उसकी स्थिति खतरनाक बता रहे हैं और सरकार ने खबर दबा ली है .
इस बार मैसेज आ रहे थे कि इस जगह हजारों की सख्या में लोग गिरफ्तार करके अनशन में पहुँचाने से रोके गए . फेसबुक पर लिखा जाता "तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहें "
सनसनी  फैला कर लोगों को यह अहसास कराया जा रहा था कि जैसे देश एक बड़े से रणक्षेत्र में बदल गया हो और सरकार का दमनचक्र चल रहा हो
अगर सरकार दमन पर उतारू ही थी तो आप कैसे सही सलामत हैं
सरकार का दमन कैसा होता है उनसे पूछिए जिन्हें आपातकाल की याद हो
कैसे आवाज का गला घोंटा जाता है तहलका से पूछिए
खैर !
हम गैंग के राजनीति में आने का स्वागत करते हैं उनकी नीयत पर सौ प्रतिशत अविश्वास होने के बावजूद हम चाहते हैं कि हम गलत साबित हों और गैंग सही साबित हो इस लिए हम चाहते हैं कि यह लोग समझे कि अगर राजनीति करनी है तो एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करें
परम शक्तिशाली लोकपाल ही एक मात्र चीज नहीं है जो हमें चाहिए सिर्फ भ्रष्टाचार का रुकना ही जरुरी नहीं है वैसा कोई दृष्टिकोण हमें आज तक नहीं नजर आया . अगर हम पूरे गैंग के प्रति सकारात्मक होकर भी आंकलन करें तो भी यह एक खाप पंचायत से बढ़कर कुछ नहीं है सुधारवादी परन्तु यथास्थिति वादी
जी नहीं ऐसी सरकार की भारत को जरुरत नहीं है खाप पंचायत की जगह थोड़ी भ्रष्ट सरकार भी चलेगी अगर वो प्रगति वादी विकास वादी और परिवर्तन वादी हो
गैंग को राजनीति जाननी होगी
उसे जानना होगा कि जितना समर्थन उसे उसके उफान के दिनों में मिला था उतना समर्थन भी उसे सिर्फ वोटकटवा पार्टी के रूप में ही खडा कर सकता है और समर्थन बढाने के लिए समग्रता की जरुरत है , अपने दंभ में कमी की जरुरत है . दूसरों को भी कुछ समझने की जरुरत है .
और हाँ
भारत में फिलहाल कोई राजनैतिक दल फेसबुक ट्विटर और मिस्सड काल के भरोसे नहीं खडा किया जा सकता . दिल्ली से बाहर निकलो घरों से बाहर निकलो दिनभर फेसबुक और ट्विटर पर आपके आंदोलन का समर्थन करने वाले कामकाजी लोग वस्तुतः भ्रष्ट ही हैं  क्योंकि वो अपने काम के समय में काम छोड़ कर यह कर रहे हैं 

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

क्या जनरल सिंह अपनी व्यक्तिगत अहमन्यता की पुष्टि के लिए सैन्य बलों के सम्मान को मुद्दा बना रहे हैं ?

जनरल सिंह के उम्र विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय जाने के बाद सियासी हलकों में तूफ़ान उठना स्वाभाविक था पर देखा यह जाना चाहिए कि यह मामला कहाँ तक जाता है.
जनरल सिंह ने याचिका दायर करते समय दलील दी कि यह उनके व्यक्तिगत सम्मान और निष्ठा से जुड़ा मामला है और इसका सैन्यबलों के मनोबल पर कोई असर नहीं पडेगा . प्रश्न उठता है कि जब यह उनके व्यक्तिगत सम्मान और निष्ठा का मामला है तो फिर तेरह लाख सैनिकों के सम्मान को क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है.

जिन्हें भी सरकारी सेवाओं और उसमे पदोन्नति से जुड़े मामलों की जानकारी होगी वह जानते होंगे कि आधिकारिक रिकार्ड में जो जन्मतिथि होती है उसका सेवा के दौरान पदोन्नति आदि पर सीधा असर पड़ता है . यदि आधिकारिक रिकार्ड में जनरल सिंह की जन्मतिथि उन्नीस सौ इक्यावन रही है तो उन्हें उस हिसाब से पदोन्नति मिलती रही होगी और अगर यह उन्नीस सौ पचास है तो पदोन्नति के मामलों में यह निर्णायक रही होगी. अब अगर रक्षा मंत्रालय यह मान रहा है कि रिकार्ड्स में यह उन्नीस सौ पचास है तो जाहिर है सेनाप्रमुख समेत तमाम पदोन्नतियों में उन्हें इसका लाभ मिलता रहा होगा क्यों कि पदोन्नति के समय अधिक उम्र वालों को इसका लाभ मिलता है.
क्या जनरल सिंह पदोन्नति लेते समय यह नहीं जानते रहे हैं? क्या यह उचित है कि पदोन्नति के लिए वह अलग जन्मतिथि माने और सेवानिवृत्ति के लिए अलग?
दूसरा मुद्दा है यु पी एस सी का राष्ट्रीय रक्षा अकादमी का फार्म भरते समय दी जाने वाली जन्मतिथि?
क्या जनरल सिंह ने फार्म भरते समय गलत जन्मतिथि दी? जनरल सिंह की दलील है कि  यह लिपिकीय गलती से हुआ होगा . क्या फार्म यु पी एस सी के लिपिक भरते हैं ?
यह मानना कि जनरल सिंह सिर्फ एक वर्ष और सेवा में रहने के लिए जन्मतिथि विवाद को लेकर इतने गंभीर हो गए हैं सही नहीं लगता . जनरल सिंह जिस पद पर हैं और अपने जीवन के जिस मुकाम पर हैं वहाँ एक वर्ष और सेवा में रहने की बात बहुत छोटी है . तो फिर मुद्दा क्या है?
क्या यह सिर्फ खुद को सही करने की जिद है? अगर यह बस सम्मान और निष्ठा का मामला है तो जनरल सिंह इसे इतना इतना तूल देकर स्वयं उसे खोते जा रहे हैं .
परन्तु क्या मामला सिर्फ इतना छोटा है? आशा की जानी चाहिए  कि जनरल के इस कदम के पीछे और कोई मामला या संगठन न हो  क्योंकि ऐसी स्थिति जितनी घातक हो सकती है इसका अंदाजा लगा पाना कठिन है .



बुधवार, 11 जनवरी 2012

हताशा के भाजपा के अनुभव



लगता है भाजपा पर चुनावी बुखार इस कदर चढ़ गया है की वह यह समझ पाने में सक्षम नहीं रह गयी है की किस मुद्दे पर कैसे हमला बोलना है .
आज खबर आई है कि भाजपा के मुखपत्र कमल - सन्देश में राहुल गांधी पर हमला बोला गया है. और मुद्दे तो ठीक हैं पर उसमे राहुल गांधी को शादी न होने की वजह से हताश बताने पर समझ में नहीं आया कि यह भाजपा राहुल पर हमला बोल रही थी कि अपना दर्द बयान कर रही थी. गौरतलब है कि भाजपा में कुंवारे नेताओं की संख्या सर्वाधिक है . अटल विहारी वाजपेयी लम्बे समय तक भाजपा के शीर्ष पर रहे और उनके नाम पर भाजपा आज भी गौरवान्वित होने का दावा करती है. उत्तर प्रदेश चुनावों में भाजपा की प्रचार की कमान संभाल रही उमा भारती से लेकर देश के हर हिस्से में कुंवारे नेताओं की संख्या और दलों की अपेक्षा ज्यादा है . ऐसे में यह समझ में आने में कठिनाई हो रही है कि भाजपा अटल और उमा जैसे नेताओं की हताशा जानने के अपने अनुभव के चलते ऐसा कह रही है या फिर संघ के अविवाहित प्रचारकों की अपनी पार्टी में अनावश्यक दखलंदाजी से उपजी चिढ के चलते यह सोचने पर मजबूर हुई है कि अविवाहित लोगों में हताशा अधिक होती है . कुछ भी हो पर भाजपा को अपने अविवाहित सदस्यों के चलते इस हताशा से उबरने और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के तौर तरीके पता होंगे . अच्छा होता कि राहुल के दुःख के कारण की खोज के साथ उसके निवारण के लिए अटल विहारी वाजपेयी के निजी अनुभव भी बांट दिए जाते .
वैसे गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में चारों प्रमुख दलों में से तीन दलों के शीर्ष प्रचारक अविवाहित ही हैं . भाजपा के ये अनुभव सबके काम आ जाते तो बेहतर होता .
खैर!
वैसे भाजपा की खुद पर हमला करने की आदत इन दिनों काफी बढ़ गयी है. बाबू सिंह कुशवाहा नामक खोज जो आडवानी जी ने अपनी भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा की परिणाम स्वरुप प्राप्त की तो सभी को पता है . भाजपा प्रवक्ता ने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा  भ्रष्टाचार में निरुद्ध सभी नेताओं के लिए गंगा बनने  की ओर अग्रसर है . हमें लगता है कि नकवी के इस बयान के बाद राजा और कलमाड़ी काफी हल्का महसूस कर रहे होंगे . आखिर कोई तो है जो उनके बारे में सोच रहा है .
वैसे ऐसा भी कहा जा रहा है कि इन चुनावों में भाजपा और बसपा में कुछ समझौता हो गया है . भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे जिस भी नेता को बसपा निकालेगी उसे भाजपा अपने साथ ले लेगी जिससे लोग बसपा पर हमला छोड़ कर भाजपा पर हमला करने लगेंगे . जिससे बसपा विरोधों  से बच जायेगी 
भाजपा का सेन्स ऑफ़ ह्यूमर गजब का है वह लोकायुक्त की आठ सालों से नियुक्ति पर रोक और सशक्त लोकपाल के लिए जबानी संघर्ष दोनों एक साथ कर सकती है .
 उम्मीद है कि यह सेन्स ऑफ़ ह्यूमर चुनावों के बाद भी जारी रहेगा


सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

जिम्मेदारी लेना सीखो अन्ना !

अन्ना हजारे और उनके साथियों की कांग्रेस को हराने की अपील को लेकर कांग्रेस में काफी कुछ कहा जा रहा है . मजेदार बात यह है कि अन्य राजनैतिक दल इस बात पर खामोश हैं. शायद उनकी खामोशी इस बात को लेकर है कि कल को अगर इसी तरह की अपील उनके खिलाफ आ जाती है तो वो क्या करेंगे.?
ख़ैर जैसा कि अन्ना हजारे के एक साथी ने कहा कि सत्ताधारी दल होने के चलते लोकपाल बिल पास करवाने की जिम्मेदारी कांग्रेस की बनती है , अभी तूफ़ान का सामना कांग्रेस को करना लाजिमी है. कांग्रेस के लिए यह बड़ी ही अप्रिय स्थिति बन आई है और वह निश्चित ही इसे लेकर परेशानी में है. 
हमारा मानना है कि जनतांत्रिक देश के जिम्मेदार नागरिक होने के चलते अन्ना और उनके साथियों को चुनावों के लिए मुद्दे तय करने और जन साधारण से उन मुद्दों पर किसी को वोट देने या न देने की अपील करने का पूरा हक़ है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है चाहे यह किसी एक राजनैतिक दल या पूरी की पूरी राजनैतिक व्यवस्था को कितना भी नागवार क्यों न गुजरे. इससे पहले भी सिर्फ एक मुद्दे को लेकर चुनाव हुए हैं अगर किसी को यह महसूस होता है कि चुनाव में मत देने के लिए कई मुद्दों को एक साथ देखा जाना जरूरी है उसे शायद "वो मेरी ही माँ नहीं पूरे देश की माँ थीं "  या "राम लला हम आयेंगे मंदिर वही बनायेंगे " नारों या ऐसे ही तमाम नारों के साथ लडे चुनाव नहीं याद हैं . जब ऐसे मुद्दों पर चुनाव लडे जा सकते हैं तो लोकपाल मुद्दे पर क्यों नहीं.
यह तमाम बाते अना और उनके साथियों की सही हैं और हमेशा सही रहेंगी बस हमारा प्रश्न है कि क्या अन्ना जिम्मेदार नागरिक नहीं हो सकते थे?
हमारा स्पष्ट मत है कि सही मांग और सही बात के बावजूद अन्ना और उनके साथी शुरू से गैर जिम्मेदार हैं. 
१ . जब लोकपाल बिल के लिए संयुक्त कमेटी बनायी गयी थी और उसमे सरकार से इतर कुछ लोग और शामिल किये गए थे जिन्हें अन्ना हजारे ने चुना था तो क्या अन्ना हजारे उस कमेटी में अन्य दलों के सदस्यों की सदस्यता की मांग नहीं कर सकते थे? उन्होंने ऐसा नहीं किया (उनका बाद में यह कहना कि वह चाह रहे थे पर सरकार नहीं मानी स्वीकार्य नहीं है क्योंकि उन्होंने उस समय इस मुद्दे की चर्चा तक नहीं की थी ) क्योंकि उन्हें लगता रहा है कि वह जो सोच रहें हैं वही अंतिम सत्य है बाकी पूरे देश में कोई कुछ सोच ही नहीं सकता .
२. जब ऐसी किसी संयुक्त कमेटी को हजारे और उनके साथी स्वीकार कर रहे थे तो क्या उनकी यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह इस कमेटी को एक सही अंजाम तक पहुंचाने का प्रयास करते. दलील फिर दी जाती है कि सरकार नहीं तैयार थी. लेकिन आये दिन अखबारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में वह और उनके साथी सिर्फ और सिर्फ धमकाने की मुद्रा में ही नजर आते रहे. एक भी बयान किसी ने ऐसा दिया था कि हम प्रयास कर रहे हैं या और कुछ ऐसा जो जिम्मेदारी का बोध कराता हो? कड़ा लगेगा पर तथाकथित टीम अन्ना के लोगों  (अन्ना हजारे समेत ) के आचरण और भाषा हमेशा उन राजनेताओं से भी गयी गुजरी रही जिनकी वह आलोचना करते हैं. 
 ख़ैर बीच में रामलीला मैदान हुआ . उसमे क्या रहा कैसा रहा यह सभी ने देखा. अब सीधे आते हैं चुनाव के मुद्दे पर 
अन्ना के एक साथी ने यह पूछने पर कि सपा और बसपा तो खुले रूप में जन लोकपाल की विरोधी है तो आप उनके खिलाफ प्रचार करने कि बात क्यों नहीं करते, उन्होंने बताया कि इन दलों का लोकपाल बिल पास करवाने में कोई योगदान नहीं होगा इसलिए वह सिर्फ कांग्रेस को हराने की बात कर रहे हैं. अब क्या यह लोग बताएँगे कि अगर यही बात है  तो राज्यों के विधानसभा चुनावों में आप प्रचार की बात क्यों कर रहे हैं . राज्य की विधानसभा तो लोकपाल बिल पास कर नहीं सकती. अगर कांग्रेस भ्रष्ट है इसलिए आप कांग्रेस के खिलाफ हैं तो बाकी भ्रष्टों पर इनायत क्यों कर रहे हैं और अगर सिर्फ लोकपाल ही मुद्दा है भ्रष्टाचार नहीं तो राज्यों की विधान सभाओं से तो कोई लेना देना ही नहीं है

आते हैं हिसार की बात पर ! वहाँ कांग्रेस पहले ही कमजोर स्थिति में थी. लड़ाई तो ओम प्रकाश चौटाला के बेटे अजय चौटाला और भजनलाल के बेटे कुलदीप  विश्नोई में थी . हजारे ने कहा था कि अगर लोकपाल बिल शीतकालीन सत्र में पास नहीं हुआ तो वह कांगेस के खिलाफ प्रचार करेंगे . मजे की बात तो यह है कि इतना बोलने के बाद याद आया कि शीत कालीन सत्र तो अभी शुरू नहीं हुआ है , हजारे और उनके साथियों ने तय कर लिया कि शीत कालीन सत्र का इन्तजार क्यों करें अभी से कांगेस के खिलाफ प्रचार शुरू कर देते हैं और पहुँच गए हिसार . प्रश्न यह उठता है कि अगर कांग्रेस भ्रष्टाचार का दूसरा नाम है इसलिए उसे हराना है तो फिर जिताना किसे है ? अगर हजारे में जिम्मेदारी का भाव होता तो वह एक प्रत्याशी खडा करते और कहते कि यह हमारा प्रत्याशी है स्वच्छ है और लोकपाल का समर्थक है . आप इसे वोट दें . उस प्रत्याशी को (केजरीवाल तो अभी सरकारी सेवा में हैं चुनाव लड़ नहीं सकते , किरण बेदी या फिर शान्ति भूषण लड़ सकते थे ) आसानी से जिताया जा सकता था और वह सांसद बन कर शीतकालीन सत्र में लोकपाल के सपने को यथार्थ में लाने के लिए खडा हो सकता था. 

तो हिसार में अन्ना ने नहीं कहा कि किसे जिताना है. कुलदीप विश्नोई या अजय चौटाला ? उम्मीद है हजारे को इनका इतिहास पता होगा. 
अन्ना प्रत्याशी नहीं उतार सकते वो वोटबैंक की नहीं लोगों की राजनीति करते हैं एक सहज प्रश्न उठता है कि जब देश के सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा के अध्यक्ष ने पत्र अन्ना को भरोसा दिलाया है कि वह जन लोकपाल के प्रावधानों से सहमत हैं तो अन्ना भाजपा को समर्थन की अपील क्यों नहीं कर देते? कांग्रेस को हराने के लिए इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है . लोगों के पास एक विकल्प  होगा . भाजपा को समर्थन मिल जाय तो वह सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है. लेकिन अन्ना के साथी वह भी नहीं कर सकते इन सब के लिए जिम्मेदारी लेनी पड़ती. आकांक्षाओं के समुद्र में गोते लगाना पड़ता . अगर शौक दूसरों को गैर जिम्मेदार बोलना ही हो गया हो तो जिम्मेदारी क्यों रास आने लगी .
श्रीमान अन्ना हजारे  दूसरों को नसीहत देना और पागलखाने जाने की सलाह देना थोड़े दिन के लिए रोक के   एक बार जिम्मेदारी लेना भी सीखो . बहुतों ने भरोसा किया है तुम पर 

रविवार, 11 सितंबर 2011

ग्यारह सितम्बर : सभ्यताओं के संवाद का दिन

२००१ से पहले आप ग्यारह  सितम्बर  को  कैसे  याद करते थे ? निःसंदेह २००१ के ग्यारह सितम्बर के बाद कुछ भी पहले सा नहीं रह पाया पर उससे पहले ग्यारह सितम्बर सभ्यताओं के संघर्ष की जगह सभ्यताओं  के संवाद का दिन था . 

अट्ठारह साल पहले जब हम स्कूल में थे , हमारे स्कूल में स्वामी विवेकानंद के ग्यारह सितम्बर अट्ठारह सौ तिरानबे में शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में दिए गए भाषण की सौवीं वर्षगाँठ मनाई जा  रही थी और इस उपलक्ष्य में होने वाले समारोह में हमें  स्वामी विवेकानद का किरदार निभाना था. उम्र कम थी पर पता था की यह कुछ ख़ास है और हम उस समय जो कुछ भी मिला पढ़ते चले गए . स्वामी विवेकानंद को पढने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि हमें हिन्दू धर्म की एक बेहतर समझ आ गयी . जिसे बाद में तमाम धर्म ग्रंथों ने भी अपने योगदान से बेहतर बनाया .

स्वामी विवेकानंद का मंत्रमुग्ध कर देने वाला शिकागो भाषण कुछ इस प्रकार था ;

अमेरिका की बहनों और भाइयो!
आपने हमारा जैसा हार्दिक और स्नेहपूर्ण स्वागत किया है, उसके लिए आभार व्यक्त करने के लिए जब मैं यहां खड़ा हुआ हूं तो मेरा मन एक अकथनीय आनंद से भरा हुआ है.मैं विश्व की सबसे प्राचीन संन्यासियों की पंरपरा की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं; मैं आपको धर्मो की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूं और मैं सभी वर्गो एवं पंथों के करोड़ों हिंदुओं की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं.
इस मंच पर आए उन कुछ वक्ताओं को भी मेरा धन्यवाद, जिन्होंने पूर्व से आए प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए आपको बताया कि दूर देशों से आए हुए ये सज्जन विभिन्न देशों में सहिष्णुता का संदेश पहुंचाने के सम्मान के अधिकारी हो सकते हैं.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने विश्व को सहिष्णुता औ सार्वभौमिक स्वीकार्यता का पाठ पढ़ाया. हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मो की सत्यता को स्वीकार करते हैं.मुझे उसे देश से संबंधित होने में भी गर्व है, जिसने इस प्थ्वी के सभी धर्मो व सभी देशों के सताए हुए लोगों और शरणार्थियों को शरण दी है.
मुझे आपको यह बताने में गर्व है कि हमने उन पवित्र इजराइलियों को अपने कलेजे से लगाया है, जिन्होंने ठीक उसी वर्ष दक्षिण भारत में आकर शरण ली, जब रोमन अत्याचारियों ने उनके पवित्र मंदिर को ध्वस्त कर दिया था.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने महान जोरोस्ट्रियन राष्ट्र के विस्थापितों को शरण दी है और अब भी उनके विकास में सहयोग दे रहे हैं.
भाइयों, मैं आपके सामने उस भजन की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत करूंगा, जिसको मैं अपने बचपन से दोहराता आया हूं और जिसे करोड़ों लोग प्रतिदिन दोहराते हैं -
'जैसे विभिन्न स्रोतों से उद्भूत विभिन्न धाराएं
अपना जल सागर में विलीन कर देती हैं,
वैसे ही हे ईश्वर! विभिन्न प्रवृत्तियों के चलते
जो भिन्न मार्ग मनुष्य अपनाते हैं, वे
भिन्न प्रतीत होने पर भी
सीधे या अन्यथा, तुझ तक ही जाते हैं.'
वर्तमान सम्मेलन, जो अब तक हुई सबसे महान सभाओं में से एक है, स्वयं 'गीत' में बताए उस अद्भुत सिद्धांत का पुष्टीकरण और विश्व के लिए एक घोषणा है -
'जो कोई, किसी भी स्वरूप में
मेरे पास आता है, मुझे पाता है;
सभी मनुष्य उन मार्गो पर
संघर्षरत हैं, जो अंत में उन्हें मुझे तक ही ले आते हैं.'
सांप्रदायिकता कट्टरता और उन्हीं की भयानक उपज धर्माधता ने बहुत समय से इस सुंदर पृथ्वी को ग्रस रखा है. उन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी ही बार उसे मानव रक्त से सराबोर कर दिया है, सभ्यता को नष्ट किया है और समूचे राष्ट्रों को निराशा के गर्त में धकेल दिया है.यदि ये राक्षसी कृत्य नहीं किए जाते तो मानव समाज उससे बहुत अधिकविकसित होता, जितना वह आज है. परंतु उनका अंतकाल आ गया है; और मुझे पूरी आशा है कि इस सम्मेलन के सम्मान में सुबह जो घंटानाद हुआ था, वह सभी प्रकार के कट्टरपन, सभी प्रकार के अत्याचारों, चाहे वे तलवार के जरिए हों या कल के- और व्यक्तियों, जो एक ही उद्देश्य के लिए अग्रसर हैं, के बीच सभी प्रकार की दुर्भावनाओं के लिए मृत्यु का घंटानाद बन जाएगा.
अफ़सोस की  बात है ऐसा नहीं  हो सका
ग्यारह सितम्बर उन्नीस सौ छः  को गांधी जी  ने सत्याग्रह के अनुपम प्रयोग की शुरुआत की 
जोहानसबर्ग , साउथ अफ्रीका में भारतीयों के समूह को उन्होंने एक नए तरह के संघर्ष का पाठ पढ़ाया. नए तरह का आग्रह ; अहिंसात्मक तरीके से सरकार   सत्य का आग्रह , न्याय का आग्रह . 
वह एक रास्ता था असभ्य युद्धों के स्थान पर एक सभी संघर्ष का रास्ता . भारत ने बाद में  देखा, दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य ने भी देखा कि लोगों के जाग कर खड़े होने और चुपचाप apnaa हक़ मांगने में भी बड़ी शक्ति होती है जो बमों और गोलियों  से ज्यादा प्रभावी हो सकती है 

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

बिकने को तैयार लोग, खरीदारों की खोज और दलाल

 तहलका की खोजी पत्रकारिता और सच तक पहुँचने की उसकी जिद के हम हमेशा से कायल रहें हैं. तहलका एक ऐसे स्तम्भ की भांति है जो आज पास की लहरों की चोटों  से अनजान सच की खोज और उसको दुनिया के सामने लाने के लिए हमेशा लगा रहता है. इसी क्रम में तहलका की ताज़ी तहकीकात , वोट के बदले नोट कांड पर की तहकीकात पढ़ने को मिली. इसे विस्तार से आप भाग १ व भाग २ में पढ़ सकते हैं . यह  तहकीकात विकिलीक्स में किसी छुटभैये सहयोगी की खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की उत्कंठा से कही गई बातों से ज्यादा प्रमाणिक हैं .
जुलाई 2008 के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कई कुचक्र एक साथ काम कर रहे थे. कांग्रेस और उसके सहयोगियों के सरकार बचाने के कुचक्र, वाम दलों की ऐंठ की किसी तरह यह सरकार गिरा कर अपनी ताकत दिखायें , बसपा और भाजपा को सरकार गिरनेके बाद मिल सकने वाली गद्दी की आस और छिटपुट सांसदों को इस मौके में अधिक से अधिक फ़ायदा उठा लेने की आस.
भाजपा को समर्थन न देने की मजबूरी के बाद जब वाम दलों ने बसपा की और रुख किया तो भाजपा को नजर आने लगा कि बसपा तो अनायास ही लाभ की स्थिति में आ गयी. भाजपा उत्तर  प्रदेश में बसपा को समर्थन दे कर उसकी  कीमत भुगत चुकी है . भाजपा को उम्मीद थी कि केंद्र में वह अगुवाई करेगी और बसपा उसका समर्थन करेगी. पर यहां तो उसका उलटा हो रहा था . वामदलों की शह पर बसपा सरकार बनाने का सपना देखने लगी थी और इसी लिए सरकार गिराने की जोड़तोड़ में वह आगे निकलती नजर आने लगी. वाम दलों को शायद बसपा के खरीद-फरोख्त के तौर तरीके अच्छे नहीं लगे इसलिए अविश्वास प्रस्ताव के आखिरी मुकाम पर पहुँचते पहुँचते उसने संसद के बाहर की सक्रिय भागीदारी छोड़ कर  खुद को संसदीय चर्चा तक ही सीमित कर लिया.
तहलका की तहकीकात खुलासा करती है, कि भाजपा सरकार के सामने किस तरह से चारे फेंकने में जुटी थी. भाजपा की पूरी कोशिश थी की बिकने को तैयार उसके नेताओं को किसी तरह कांग्रेस खरीदने में पकड़ी जाए और वह इस बात पर वाहवाही और फिर वोट समेटे . इसके लिए उसने बिकने को तैयार लोगों और दलालों को सक्रिय कर रखा था. इस अभियान को खुद भाजपा के  प्रधानमन्त्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवानी व कद्दावर नेता अरुण जेटली की देखरेख में चलाया जा रहा था.
इस तहकीकात के खुलासे के बाद  वाजिब सवाल उठते हैं 
इस तरह के बनाए हुए मामले में अगर भाजपा का उद्देश्य सिर्फ भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश ही था तो यह जानने के बाद वह कांग्रेस के किसी नेता को नहीं फंसा पायी है और उसके हाथ कुछ ख़ास नहीं लगा है  तो उसने संसद नोट लहरा कर व्यर्थ में संसद की गरिमा क्यों गिराई और सुधीन्द्र कुलकर्णी , अरुण जेटली जैसों की भागीदारी की बात भाजपा ने क्यों नहीं स्वीकारी ?

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

डिजिटली बी पी एल होने की व्यथा

रात के एक बजे थे अचानक मोबाइल की एस एम् एस टोन गुहार लगाती है ।
एस एम् एस एक दोस्त का था जो दिल्ली में बैठा हुआ था । अभी थोडी देर पहले तक वो जिद कर रहा था कि ऑनलाइन आओ कुछ बात करनी है। तमाम कोशिशों के बाद भी जब नेट कनेक्ट नही हो पाया तो हमने हथियार डाल दिए और वो मायूस होकर चुप होगया।
यु आर डिजिटली बी पी एल!
एस एम् एस कहता है।
डिजिटली बी पी एल होना आज के युग में एक बड़ी परेशानी की बात हो गई है।
दिल्ली और लखनऊ में रहने वाले के लिए ३जी न होना बी पी एल होना है डिजिटली बी पी एल !
देश के जिस हिस्से में आजकल हम हैं वहां पर लोग कई तरह से बी पी एल हैं
२००१ की जनगणना के हिसाब से ५१००० के आस पास की आबादी वाले इस इलाके में करीब १०००० के आस-पास बी पी एल राशन कार्ड हैं। पाँच सदस्यों वाले परिवार का हिसाब लगायें तो कोई पचास हज़ार बी पी एल!
राशन कार्ड में गरीबी जम के झलकती है । कोटेदार के कोई बीस हज़ार रूपये खर्च होते हैं अलग अलग लोगों को खुश करने में। अब इसके बाद उसकी कमाई भी होती होगी। तो फ़िर गरीबी कमाई का अच्छा साधन हुआ। एक बी पी एल परिवार कितने लोगों की गरीबी दूर करता है इसका हिसाब लगाने पर पता चलता है कि बी पी एल होना कितना जरूरी है।
लखनऊ में सामजिक परिवर्तन स्थल से गुजरें तो सामाजिक परिवर्तन नजर आता है । चुंधियाती हुई रौशनी ! पूरा इलाका रात में भी दिन को मात देता हुआ सा लगता है।
लखनऊ से बाहर निकलते ही पता चलता है कि बाकी के इलाके बिजली के हिसाब से बी पी एल हैं। अभी हम जहाँ बैठे हैं वहां हफ्ते-वार बिजली की व्यवस्था चलती है । एक हफ्ते में दिन में लाईट आती है (आती जाती है ) , तो अगले हफ्ते रात में (आती-जाती है )। सामाजिक परिवर्तन लखनऊ में नजर आता है लखनऊ से बाहर गायब हो जाता है।
खैर जो चीजें सिर्फ़ दिखाने की हैं वो लखनऊ और दिल्ली में ही शोभा देती हैं । सामाजिक परिवर्तन दिखाने की ही चीज है शायद होने की नही।
एक इलाके में पहुंचे वहाँ बोर्ड लगा हुआ था -
मोबाइल चार्जिंग - पाँच रूपये मात्र।
बिजली नही पहुँची लेकिन मोबाइल मौजूद है अब मोबाइल है तो चार्ज भी होना होगा। लोग डिजिटल बैकवर्ड नेस से बाहर निकल चुके हैं बिजली आए न आए।
मोबाइल कंपनियाँ नए नए मोबाइल निकाल रही हैं बिजली आए न आए मोबाइल चलता जाए!
उन्हें धंधा चलाना है बिजली आए न आए , उन्हें धंधा चलाना है लोगों की जेब में जितना भी पैसा हो उसे ध्यान में रखते हुए ।

कुछ दिन पहले एक थोडा ख़ुद को गिनाने वाले ने हमें धमकी दी थी
-रहना तो यही है न !
हमें सुनकर गुस्सा आ गया
- क्यों यहाँ कौन से सुरखाब के पर लगे हुए हैं ? और यार तुम लोग एक लाईट तो अपनी सही नही करवा पाते आ जाते हो छोटी -छोटी बातों पर धमकी देने
हमारी बात सुनकर वो चुप हो गया हमने उसकी दुखती राग पर हाथ रखा था। वो सामाजिक परिवर्तन स्थल वाले दल का कार्यकर्त्ता था

सोमवार, 11 मई 2009

उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य -2

शेष से आगे

बसपा की २००७ की चुनावी सफलता के कई आयाम थे। उनमे से एक प्रमुख आयाम चुनाव आयोग की कडाई औरलोगों का वोट देने कम निकलना था । चुनाव आयोग की कडाई के चलते बड़े पैमाने पर होने वाली बूथ कैप्चरिंग नसिर्फ़ रुकी बल्कि समाज के निचले तबके के लोगों ने, जो बसपा के प्रतिबद्ध वोटर हैं, खुल कर वोट दिया। अन्यवर्गों के लोग हमेशा से कम वोट देते रहे थे और ऐसा ही उन्होंने उस बार भी किया।
इसके अतिरिक्त बसपा को एक प्रमुख लाभ उम्मीदवारों की फ्रेशनेस का भी मिला । बसपा के अधिकतर उम्मीदवारचुनावी जंग में ही नही राजनीति में भी नए थे जिसका फायदा उन्हें उनकी जातियों के वोटों के रूप में भी मिला ।
इसके अलावा लोगों की सपा सरकार के प्रति नाराजगी भी महत्वपूर्ण रही थी। एक नारा भी बहुत जोर शोर से चलाथा
चढ़ गुंडों की छाती पर
मुहर लगाओ हाथी पर

लोकसभा और विधान सभा और बसपा

विधानसभा चुनावों के उलट लोकसभा चुनावों का परिदृश्य अलग होता है। एक सीधा सा गणित देखते हैं मान लेतेहैं एक लोकसभा क्षेत्र में ५ विधानसभा की सीटें आती हैं (जैसा उत्तर प्रदेश में औसत है.) तो कोई एक पार्टी उसलोकसभा क्षेत्र के चार विधान सभा क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी पांचवी में हार के चलते पूरी सीट हारसकती है। अतः विधानसभा में प्राप्त सीटें सारे समीकरण पहले जैसे रहने के बावजूद उसी अनुपात में लोकसभासीटों में बदल जाएँ ये जरूरी नही है।
इसके अतिरिक्त विधान सभा चुनाओं की तरह के मुद्दे कमसे कम उत्तरप्रदेश में लोकसभा चुनावों में तो लागू नहीरहते । उदहारण के लिए कांग्रेस का पिछले दो लोकसभा और विधान सभा चुनावों में प्रदर्शन देख लें । पिछले दोविधानसभा चुनावों में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में २५ के आस-पास सीटें मिली जबकि लोकसभा में यह संख्या ९-१०रही। साफ़ है कि कांग्रेस विधानसभा चुनावों में बुरा प्रदर्शन करने के बाद भी लोकसभा चुनावों में अपेक्षाकृत कमबुरा प्रदर्शन करती रही है।

बसपा की इन चुनावों में कमियां

बसपा ने इन चुनावों में दूसरी पार्टियों से आनेवाले लोगों को जमकर टिकट दिया है । दूसरी पार्टियों से आने वालेलोग जहाँ अपना कुछ जनाधार लेकर आते हैं वहीँ कुछ नकारात्मक आधार भी ले आते हैं। एक उदाहरण के लिएबसपा के अम्बेडकरनगर से उम्मीदवार राकेश पाण्डेय की बात करें तो वहां पर उनके परिवार की बसपा के वहीँ सेमंत्री और प्रमुख नेता रामअचल राजभर से शत्रुता रही है । अब बसपा के कैडर के लिए राकेश पाण्डेय के पक्ष मेंप्रचार कर पाना कठिन लग रहा है। उल्लेखनीय है कि यह सीट बसपा प्रमुख मायावती की सीट रही है और इस सीटपर बसपा की हार का खतरा नजर आ रहा है।
लब्बोलुआब यहं है की बसपा ने फ्रेशनेस का लाभ गवां दिया है जिसका असर लोकसभा के चुनाव परिणामों मेंनजर आना लाजिमी है।

नारा हट गया!


लगता है बसपा के कार्यकर्ताओं को चढ़ गुंडों की छाती पर..... नारा प्रयोग न करने की भी हिदायत सी दी गई है ।इन चुनावों में इस नारे का प्रयोग नजर नही आया। कारण सपा सांसद अफजाल अंसारी और उनके भाई मुख्तारअंसारी दोनों बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, बाहुबली नेता और पूर्व विधायक हरिशंकर तिवारी के परिवार मेंतीन लोकसभा टिकट दी गए। इसके अतिरिक्त बसपा के अनेक विधायकों की कारगुजारियां लोगों के सामने हैं ।

भाजपा और कांग्रेस की स्थिति भी जैसी बुरी थी वैसी नजर नही आ रही है
जारी है

रविवार, 10 मई 2009

उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य-1

आज फ़िर बहुत दिनों के बाद लिखना हो पा रहा है इस बीच जहाँ कुछ लिखना सम्भव नही हो पा रहा है वहीँ अपनेमनपसंद ब्लॉग पढने का समय नही मिल पा रहा है ।

आम चुनाव

आम चुनाव अपने आखिरी चरण में पहुँच गया है । पहले जहाँ नेता जीत के दावे करते फ़िर रहे थे वहीँ अबएक-दूसरे को रिझाना शुरू कर दिया है। वोटर को रिझाना ख़त्म हुआ अब पार्टियों और नेताओं की बारी है।
चुनाव शुरू होने से पहले उत्तर प्रदेश के बारे में कुछ ख़ास तरीके से सोचा जा रहा था। इस सोच में शामिल कुछ बातेंथीं:
१- मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तरप्रदेश से ही कम से कम ४० सीटें तो पा ही सकती है।
२- कांग्रेस और भाजपा दोनों की स्थिति प्रदेश में बहुत ही बुरी है।
३- एक कांग्रेस - समाजवादी पार्टी गठबंधन स्वाभाविक गठबंधन है और अगर ये गठबंधन हो जाता है तोबसपा को घाटा पहुंचेगा।


कांग्रेस-सपा गठबंधन

कांग्रेस-सपा गठबंधन को स्वाभाविक गठबंधन मानने वाले संभवतः इस एक बात को महत्त्व नही दे रहे थे कि दोनोंके अपने अलग पहलु हैं। जहाँ सपा उत्तर प्रदेश में सिमटी हुई पार्टी है वहीँ कांग्रेस उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रदेश सेजनाधार गवां चुकी पार्टी है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अधिक स्पेस देने का मतलब सपा के लिए अपने पाँव परकुल्हाडी मारने जैसा था और कांग्रेस के लिए सपा का प्रभुत्व मान लेने का मतलब था कि वो उत्तर प्रदेश को हमेशाके लिए गवां बैठे। बिहार में राजद के साथ हुए गठबंधन के चलते वहाँ के कांग्रेसियों में चल रही कशमकश कोदेखने वाले जान सकते थे कि कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में १५ सीटों पर समझौता कर पाना फिलहाल कितनाकठिन होगा और सपा के लिए १५ से ज्यादा सीटें दे पाना कितना कठिन होगा ।
वैसे ये तो सच है कि एकसपा-कांग्रेस गठबंधन की आहट ने बसपा के नेताओं के चेहरे पर परेशानी ला ही दी थी।

बसपा और लोकसभा चुनाव

बसपा की २००७ के विधानसभा चुनावों में सफलता ने तमाम समीक्षकों को अचंभित कर दिया था। उस सफलताको कुछ ने बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का नतीजा बताया कुछ ने और सारे कयास लगाये । हमारा मानना हैकि बसपा की इस सफलता के एक नही अनेक पहलु थे।
जारी है

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

एक मूरत अचानक नजर आ गई

पिछले दिन

पिछले कुछ समय यूँ ही इधर-उधर भटकना लगा रहा इन्टरनेट पर पहुंचना मुश्किल सा रहा ।
ब्लॉग जगत से दूर रहना खला तो कई ऐसी जगहों पर भी जाना हुआ जहाँ जाना अच्छा लगा । दिल्ली के भारतीयइस्लामिक सांस्कृतिक केन्द्र के छोटे से मगर प्रेरणादायक सम्मेलन से लेकर ऋषिकेश की गंगा की उछालभरीधाराओं तक बहुत कुछ ऐसा है, जिसे शेयर करने का मन है। कोशिश करेंगे जल्दी ही ॥

चुनाव

न जाने क्यों इस बार चुनावों में मन नही लग पा रहा है। हम बड़ी छोटी सी उम्र से ही चुनावों में हमेशा रूचि रखते रहेहैं और एक-एक सीट का हिसाब जबानी रटा रहता था। इस बार बड़ा बोरिंग सा दिख रहा है सब कुछ।
न्यूज़ पेपर्स में निकल रहा है कि पहले कैसे कैसे जन-प्रतिनिधि होते थे और कैसे -कैसे चुनाव होते थे।
राजनीति में कमियाँ नई नही है । १९३७ के चुनावों के बाद भी कुछ लोग बदल गए थे , उनपर सत्ता का रंग चढ़ गयाथा। लेकिन पहले ये कमियाँ कम होती थीं।
राजनीति में अच्छी बातें भी कोई बहुत पुरानी नही हैं। अच्छे लोग अभी भी हैं लेकिन अब कम हैं ।

एक पुरानी सी याद

पापा की पोस्टिंग उन दिनों अविभाजित फैजाबाद में थी।
हमारी उम्र कोई सात-आठ साल की रही होगी , होली का समय था और हमारे लिए पिचकारी आ गई थी। हमपिचकारी में फीका सा रंग भर कर शिकार पर निकले हुए थे । घर वापस पहुँचने पर हमने पाया कि पापा के साथकोई झक सफ़ेद कुरते में बैठा हुआ था । हमारा मन मचल गया उस सफेदी पर पिचकारी चलाने को पर कुरते केमालिक ने हमारी पिचकारी पकड़ ली। पिचकारी टूट गई और हमने बुक्का फाड़ कर रोना शुरू कर दिया । अब उनकुरता-धारी ने हमें मनाने की कोशिश शुरू की ।
उन्होंने वादा किया कि वो हमें पिचकारी टूटने का हर्जाना देंगे ।कुछ दिनों बाद जब वो फ़िर से हमारे घर आए तो उन्होंने हमें एक पेज दिया बतौर हर्जाना । पेज पर एक ग़ज़ललिखी थी। (तब हमें ग़ज़ल नही पता होती थी क्या होती है। हमें बड़ी गुस्सा आई थी। बाद में समझ आया कि वोसबसे कीमती चीज किसी को दे सकते थे वो वही था जो उन्होंने हमें दिया था।)
लाइने थीं-
एक सूरत अचानक नजर आ गई,
मन विकल हो गया है नमन के लिए।
वो सज्जन थे स्थानीय कांग्रेसी विधायक और ग़ज़ल सम्राट नाम से विख्यात जिया राम शुक्ल "विकल साकेती "।
विकल साकेती उन नेताओं में शामिल रहे हैं जिनके लिए राजनीति ताकत अर्जन का माध्यम कभी नही रही। कोईदस साल विधायक रहते हुए भी वो वैसे ही रहे जैसे हो सकते थे। उनका घर औसत ग्रामीण घरों जैसा ही बना रहा , घर पर आने वाले को विकल साकेती गुड खिला कर पानी पिलाते और प्रेम से मिलते , और तो और सरकारी हैण्डपम्प तक उनके घर से दूर लगा था ।
१९८९ में वो चुनाव हार गए। पापा का स्थानांतरण चुनाव के पहले ही हो चुका था पर हमारी रूचि कटेहरी विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में बनी हुई थी। विकल साकेती ने चुनाव हारने को भी मनोविनोद का माध्यम बनाया । उन्हेंहराने वाले जनता दल के उम्मीदवार का मुह थोड़ा सा टेढा था । विकल साकेती ने चुनाव के नतीजे आने परप्रतिक्रिया दी
वोट डालने गई थी जनता पीकर भांग,
हार गए श्री विकल जी, जीत गया विकलांग।

विजयी उम्मीदवार ने इसका बुरा नही माना था ।

मेरी वाली ग़ज़ल

विकल साकेती ने जो ग़ज़ल हमें लिख के दी थी वो कहीं गुम हो गई उसकी दो-एक लाइने पापा के गुनगुनाते रहनेसे याद रह पायी हैं
जो किनारे रहे वारुणी पा गए,
हमको विष मिल गया आचमन के लिए।
प्यार की बूँद बनके बरस जाइए,
एक शोला विकल है शमन के लिए।
एक मूरत अचानक नज़र आ गई,
मन विकल हो गया है नमन के लिए ।

अफ़सोस कि पूरी याद नही रह सकी ।

बुधवार, 18 मार्च 2009

वरुण की बात में नया क्या है ?

वरुण के बयानों को लेकर हंगामा सा मचा हुआ है । आश्चर्य हमें भाजपा के विरोधियों की प्रतिक्रिया से नही है हमेंआश्चर्य भाजपा के नेताओं की प्रतिक्रिया पर हो रहा है । वरुण गांधी ने ऐसा कुछ नही कहा है जो भाजपा कीविचारधारा में शामिल नही रहा है । विश्वास न हो तो बस इसी हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ छद्म राष्ट्रवादियों की जगहजगह पर प्रतिक्रियाओं को देख लें ।

थोड़ा समय पीछे चलते हैं और लखनऊ में विधानसभा चुनाओं के पहले भाजपा नेताओं द्वारा जारी की गई सी डीको याद करते हैं। वरुण की बातें और उस सी डी में बातें एक ही जैसी कही गई हैं। उस सी डी को बाकायदा भाजपा केमंच से भाजपा के जमे जमाये नेताओं ने जारी किया था। उस सी डी के मामले में बाकायदा चुनाव आयोग नेमामला भी दर्ज किया था । अब चुनाव आयोग (जिसके एक स्वघोषित निष्पक्ष सदस्य दूसरे को कांग्रेसी घोषितकर चुके हैं ) उस मामले को दबा कर बैठा है । हो सकता है वरुण का मुद्दा भी वैसे ही दबा लिया जाय।

हम उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। फैजाबाद समेत अलग अलग जगहों पर रह चुके हैं और ९ साल की उम्र से चुनावसभाओं को देख समझ रहे हैं । संत, साध्वी कहे जाने वाले लोगों को सुना है , संघ परिवार की कार्यप्रणाली को बहुतनजदीक से देखा और समझा है , शिशु मंदिरों में पढ़ाई की है और वो समय अयोध्या के बहुत नजदीक गुजारा हैजब राम मन्दिर आन्दोलन चरम विन्दु पर था। हम देश के कोने कोने से आए कार सेवकों को नजदीक से देख सुनऔर समझ चुके हैं।

इतना देखने सुनने के बाद आज आश्चर्य नही होता कि कोई भाजपा का तथाकथित उभरता नेता कैसे बोल सकताहै। आश्चर्य इस बात पर होता है कि शाहनवाज और मुख्तार जैसे लोग सिर्फ़ दिखाने के लिए उस पर विरोध जतातेहैं।
इन्हे
अटल बिहारी का गोवा भाषण सही लगा था, २००२ का गुजरात सही लगा था , २००७ की सी डी सही लगीथी तो आज वरुण के भाषण पर ही ड्रामा करने की जरुरत क्या थी?

वस्तुतः भाजपा के चहेते बन चुके नरेंद्र मोदी का उदहारण भाजपा के अन्य नेताओं के सामने है। अपनी विचारधाराको डंके की चोट पर लागू करो (भाजपा की विचारधारा यही है जो नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के भाषणों में नजरआती है ) और फ़िर भाजपा के अन्दर भी कोई विरोध करने की हालत में नही रह पायेगा। २००२ के चुनावों के समयआडवाणी तक नरेंद्र मोदी से हरेन पंड्या के मुद्दे पर हार चुके हैं तो औरों की क्या बिसात। अब भाजपा केमहत्वाकांक्षी लोग जानते हैं कि उन्हें आगे बढ़ना है तो नरेंद्र मोदी से आगे निकलना होगा ।
वरुण
गांधी जो कर रहेहैं वह यही है ।
भाजपा
में आगे निकलने का यही रास्ता है।


सोमवार, 16 मार्च 2009

पाकिस्तान: बुनियाद का दंश

अभी-अभी समाचार मिल रहा है कि पकिस्तान के प्रधान मंत्री की जस्टिस चौधरी सहित अन्य जजों को बहालकरने की घोषणा के बाद नवाज़ शरीफ ने अपना लोंग-मार्च वापस ले लिया है । अब सभी निगाहें २१ मार्च कीप्रस्तावित बहाली पर लग गयीं हैं।
जस्टिस चौधरी की बहाली के आगे क्या क्या परिणाम हो सकते हैं यह तो समय ही बताएगा पर आज कीपाकिस्तान की बुरी स्थिति की जिम्मेदारी अगर उसकी बुनियाद पर डाली जाय तो ग़लत नही होगा।
पाकिस्तान के निर्माण के लिए दिए गए तर्कों को अलग रख दें तो भी पाकिस्तान निर्माण के बाद शुरू से हीपकिस्तान के नेताओं ने जो परम्पराएं डालनी शुरू कर दीं वो आगे चल कर परेशानी का सबब बनने वाली ही थीं ।
मज़हब के आधार पर बने हुए देश में मज़हबी जूनून रखने वालों को सत्ता से अलग कर पाना बहुत ही कठिन था।इसके लिए जरूरी था कि देश के रहनुमा कड़े फैसले लेने वाले होते और अपना उदाहरण सकारात्मक रूप में लोगोंके सामने रख पाते।
जिन्ना इस कसौटी पर खरे नही उतर सके।
जिन्ना डावांडोल प्रकृति वाले नेता थे। विभाजन की घोषणा तक उन्हें पता नही था कि वो जो पाकिस्तान चाहते हैंवो कैसा होना चाहिए। उसे भारत से अलग होना है या एक ढीले ढाले संघ में रहना है उन्हें नही पता था उन्हें ये भीनही पता था कि पाकिस्तान में कौन कौन से इलाके रहने हैं। उन्हें बस पकिस्तान चाहिए था । पकिस्तान मिलजाने के बाद भी उसके भविष्य को लेकर उनके पास कोई कार्ययोजना नही थी। कभी मज़हब के आधार पर बने देशको वो सेकुलर बनाना चाहते थे तो कभी तरह तरह के अंदरूनी दबावों के आगे झुक झुक कर इधर उधर के फैसलेलेते रहे।
जिन्ना ने जिस एक चीज की नींव डाली-जो पाकिस्तान को अभी भी परेशान कर रही है- वह थी एकाधिकार कीप्रवृत्ति । जिन्ना को माउन्टबेटन ने सलाह दी कि उन्हें गवर्नर जनरल की जगह प्रधान मंत्री बनना चाहिए क्योंकिसंसदीय शासन की प्रणाली में प्रधान मंत्री अधिक महत्त्व पूर्ण होता है। परन्तु जिन्ना ने गवर्नर जनरल बनने केसाथ सत्ता अपने पास रखना चुना। जब शासन का ध्येय किसी तरह से सत्ता बचाए रखना और पूरी सत्ता अपने पासरखना हो जाता है तो चीजें ग़लत होनी शुरू हो जाती हैं । इस तरह की जवाबदेही विहीन सत्ता अन्य लोगों कोआकर्षित करती है।
जल्दी ही सत्ता खिसकनी शुरू हो गई। जिन्ना से लियाकत अली और फ़िर धीरे धीरे श्रंखला चल निकली। सेना काराजनीति के लिए प्रयोग हुआ और फ़िर सेना ने राजनीति शुरू कर दी।
२००७ के चुनावों के बाद ज़रदारी ने कहा कि वो पाकिस्तान के सोनिया गांधी बनना चाहते हैं । लेकिन सोनियागांधी बनना यूँ आसान नही था ज़ल्दी ही ज़रदारी एक और जिन्ना बन कर राष्ट्रपति बन बैठे। ज़रदारी के राष्ट्रपतिबनने के साथ ही उनके पराभव की कहानी शुरू हो चुकी थी। ये आश्चर्यजनक है कि वो अभी तक सत्ता में बने हुए हैं।

पाकिस्तान का उदहारण यह बताता है कि ग़लत बुनियाद का फल सही हो यह सम्भव नही है । अब देखना यहहोगा कि आगे आने वाले नेता इस चीज को समझ पाते हैं या नही।

सोमवार, 9 मार्च 2009

लोकसभा चुनावों में मेरा वोट

पिछले दिनों अपने गाँव गई तो मुझे पता चला कि मेरा नाम वहाँ की वोटर लिस्ट में शामिल है । मैंने तय किया कि लोकसभा चुनावों में मैं वोट करुँगी। इसके चलते मैंने पता करना शुरू किया फैजाबाद लोकसभा सीट से राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों के नाम।
निवर्तमान लोकसभा में फैजाबाद लोकसभा सीट बसपा के पास थी और यहाँ से सांसद रहे मित्रसेन यादव। मित्रसेन यादव बाहुबली नेताओं में गिने जाते हैं और वो कम्युनिस्ट पार्टी, सपा, बसपा होते हुए अब फ़िर से सपा में आ गए हैं और उन्हें सपा ने यहाँ से टिकट दिया है। उन्हें वोट दे पाना मेरे लिए सम्भव नही ही है।
भाजपा ने अयोध्या के विधायक लल्लू सिंह को टिकट दिया है । लल्लू सिंह कि छवि ठीक ठाक रही है पर अयोध्या जाने वाला कोई भी इंसान ये बता सकता है कि इतने समय से विधायक रहने के बाद भी लल्लू सिंह ने अयोध्या के लिए कुछ ऐसा नही किया है जिसे देख कर उन्हें लोकसभा में भी भेजा जाय, वो भी तब जब वो जिस पार्टी से हैं उसकी राजनीति अयोध्या के बूते पर ही खड़ी हुई है। इतना तो है की भाजपा ने अयोध्या के साथ जितना हो सकता है उससे ज्यादा खिलवाड़ किया है। हो सकता है बाकी लोग सोच भी लें भाजपा और लल्लू सिंह को वोट देने को पर मैं तो नही ही सोच सकती हूँ।
बसपा ने अयोध्या के राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र को फैजाबाद से टिकट दिया है । सुनने में आया है कि ये अच्छे प्रत्याशी हो सकते हैं ।
कांग्रेस ने फैजाबाद से अस्सी के दशक में सांसद रहे निर्मल खत्री को टिकट दिया है। निर्मल खत्री अच्छे नेताओं में गिने जाते हैं । फैजाबाद में उनके समय में विकास के काम भी हुए थे । राजनीति में रूचि रखने वाले लोगों के लिए वो राष्ट्रीय स्तर पर फैजाबाद के एक निर्विवादित चेहरे हैं।
अन्य प्रत्याशियों के बारे में अभी कोई ख़ास जानकारी नही है।
तो बसपा के विमलेन्द्र मिश्र और कांग्रेस के निर्मल खत्री में से चुनाव आसान दिखता है मेरे लिए। उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार देखने के बाद ये समझ में आता है की राष्ट्रीय स्तर पर बसपा की सरकार बने ये देश के लिए बुरा ही होगा।
पिछले पाँच सालों के कांग्रेस सरकार के काम-काज से बहुत संतुष्टि न भी मिले तो भी यह उपलब्ध विकल्पों में श्रेष्ठतम है।
दल और प्रत्याशी दोनों को देखने और समझने के बाद निर्मल खत्री मुझे फैजाबाद से सबसे अच्छे उम्मीदवार नजर आ रहे हैं।
मैंने तय किया है की आने वाले चुनावों में मैं निर्मल खत्री को वोट दे रही हूँ और उम्मीद करुँगी की देश में अगली सरकार कांग्रेस की ही बने ।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

यहाँ कोई रोक-टोक नही है अभी

लखनऊ में कपूरथला चौराहा उन जगहों में शामिल है जहाँ हम कुछ दोस्त अक्सर मिला करते हैं । कपूरथलाचौराहे पर ख़ास बात युनिवर्सल बुक डिपो में है जहाँ का हिन्दी और और अंग्रेजी दोनों ही सेक्शन अच्छा है । एकऔर ख़ास बात नेस्कैफे के स्टाल में है जहाँ फुटपाथ और काफ़ी दोनों का आनंद एक साथ लिया जा सकता है ।
दो-तीन दिन पहले हम दो दोस्त युनिवर्सल बुक डिपो के दोनों सेक्शन छान कर नेस्कैफे के बगल काफ़ी ले कर बैठेतो अचानक सूखे मेवे लेकर फेरी लगाने वाला एक कश्मीरी दिख गया। हमें अंजीर और कश्मीर दोनों बहुत पसंद है। अंजीर तो उसके पास ख़त्म हो चुका था पर कश्मीर बाकी था । हम दोनों उसके साथ कश्मीर के बारे में बात करनेलगे।
कश्मीर के चुनाव के बाद अक्सर अलगाव वादी आरोप लगते रहे कि इन चुनावों में लोगो को जबरदस्ती वोट डालनेपर मजबूर किया गया था । हमने फैज़ल (उस कश्मीरी युवक का नाम फैज़ल था ) से पहली बात यही पूछी। फैज़लसे पता चला कि कश्मीर में पिछले कुछ टाइम में काफ़ी कुछ बदला है और लोग खुशहाल हुए हैं । नेताओं कोअंदाजा नही था कि लोग वोट डालना चाहते हैं उन्हें अंदाजा होता तो वो भी चुनाव लड़ते। हमें अच्छा नही लगा जबउसने कहा कि फौजी परेशान करते हैं पर याद किया तो समझ में आया कि फौज का व्यवहार नागरिकों के बीच मेंहमेशा कोई बहुत शानदार नही रहता है। ट्रेनों में उनका व्यवहार देख कर अगर हमें बुरा लगता है तो कश्मीरियों कोक्यों नही लग सकता ?
फैज़ल ने बताया कि अगर नए मुख्यमंत्री उमर अपने पिता फारुख की तरह रहते हैं तो लोगों में उपजा भरोसा ख़त्महो जायेगा । अगर थोड़ा भी अच्छा रहे तो इनको कोई हटा नही पायेगा ।
हमारे दोस्त ने पूछा कि लखनऊ में जो लोग मिलते हैं उनका व्यवहार कैसा लगता है तो उसने बिना लाग-लपेट केबता दिया कि अधिकतर लोग खुश होते हैं पर कुछ लोग कभी कभी उल्टा सीधा भी कहते हैं। हमने सोचा किआख़िर फेरी लगाने आए कश्मीरी उल्टा सीधा बोल कर किसी को क्या संतुष्टि मिलती होगी।
अंत में उसने एक बात कही जो हम जैसों को जो लखनऊ जैसी अपेक्षाकृत शांत जगह रहते हैं उन्हें कभी समझ मेंनही आ सकती है। उसने कहा कि लखनऊ में उसे बहुत अच्छा लगता है क्योंकि यहाँ कोई रोक टोक नही है चाहेजहाँ घूमो फिरो चाहे जितने देर तक घूमो फिरो।
हम सोचने लगे कि कैसा लगता होगा किसी भी जगह के रहने वालों को जब उन्हें आते जाते पूछा जाता होगा किकहा जा रहे हो कहाँ से आ रहे हो, कैसा लगता होगा जब शाम के एक निश्चित समय के बाद घर से बाहर निकलनावर्जित होता होगा, कैसा लगता होगा जब उनके अपने शहर में उनके अपने इलाके में औचित्य की जरुरत पड़तीहोगी कहीं रहने के लिए।
कैसा लगता होगा उन्हें जिन्हें अपने घर छोड़ कर कैम्पों में जिंदगी काटनी पड़ती होगी एक दो महीने , एक दो सालकश्मीरी पंडितों के लिए तो शायद एक दो पीढियां या और भी ज़ियादा।
फैज़ल ने बताया कि अभी भी टाइम लगेगा कश्मीरी पंडितों की वापसी में । उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि समस्या कासमाधान कश्मीरी पंडितों को जम्मू कैम्प से उठा कर श्री नगर के कैम्प में डालने में नही है। समस्या का समाधानहै उस स्थिति का निर्माण जिसमे कश्मीरी पंडित ख़ुद अपने आप अपने घरों में जा सकें। हम सहमत हैं उमर साहबपर बीस साल एक लंबा अरसा होता है । लोग निराश हैं।
क्या कश्मीरियों का भी फ़र्ज़ नही बनता था कि अपने ही भाइयों के हक़ में आगे बढ़ के बोलें। क्या लोग जमीन सेज्यादा कीमती हैं?
लेकिन लोग अपने वंचित भाइयों के बारे में नही सोचते।
कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए आन्दोलन नही छेड़ेंगे।
गुजरात के लोग सरदार सरोवर बाँध से तृप्त तो होंगे लेकिन नर्मदा के विस्थापितों के अधिकार की नही सोचेंगे। जोउनके अधिकारों को समर्थन देगा उसके ख़िलाफ़ गुंडागर्दी पर उतर आयेंगे (यहाँ हम कश्मीर और गुजरात के आमलोगों की बात कर रहे हैं नेताओं के समर्थक भावुक न हों )।
ओह कहाँ से शुरू किया था कहाँ आ गए । मुआफ कीजियेगा इधर उधर भटकने के लिए ये यहाँ सिर्फ़ इसलिए होपाया क्योकि अभी तक यहाँ भी
कोई रोक टोक नही है कुछ भी करो कहीं भी भटको , कोई नही पूछता । कल इसतरह से मौका मिले न मिले ।

चलते-चलते : गुलज़ार साब ने फ़िल्म यहाँ के लिए एक गाना लिखा था पूछे जो कोई मेरी निशानी ।
उसमे एक लाइन है
आओ
न आओ न जेहलम में बह लेंगे ।
कोई वादी के मौसम भी एक दिन तो बदलेंगे ॥
आमीन

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