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रविवार, 13 जून 2021

जितिन प्रसाद और उनकी राजनीति

जुलाई 2016 की बात है, हम शाहजहांपुर में थे। प्रशांत किशोर कांग्रेस के 2017 अभियान से जुड़ चुके थे ग़ुलाम नबी आज़ाद और राजबब्बर की अगुवाई में कांग्रेस की 27 साल यु पी बेहाल यात्रा निकल रही थी। हमारे एक परिचित, जो प्रशांत किशोर के संगठन में कार्यरत हैं , भी यात्रा के साथ शाहजहांपुर पहुंच रहे थे।
उनसे मिलने और यात्रा का रिस्पॉन्स देखने को हम भी शाहजहांपुर टाउनहॉल पहुंचे। उस समय देर रात ग़ुलाम नबी आज़ाद उपस्थित भीड़ को संबोधित कर रहे थे। इतनी रात के में भी गुलाम नबी आज़ाद ऊर्जा से भरे हुए थे।उनका छोटा सा संबोधन प्रभावशाली था और इतनी रात वहां उपस्थित भीड़ भी प्रभावशाली थी। राजबब्बर भीड़ में फंसे होने के कारण लोगों को संबोधित करने तक पहुंच नहीं पाए थे। आज़ाद के बगल में जितिन प्रसाद थे। जितिन उस माहौल से पूरी तरह निस्पृह नज़र आ रहे थे जैसे कि उन्हें ज़बरदस्ती साथ रखा गया हो। 
प्रशांत किशोर के लोग काली टीशर्ट और नीली जीन्स मेँ थे और अधिक से अधिक नेपथ्य में रहने की कोशिश कर रहे थे
"जितिन का प्रभाव है यहां "हमने अपने परिचित से कहा. अबतक काफिला होटल पहुंच चुका था और भीड़ राजबब्बर को घेरे हुए थी। हम थोड़ा भीड़ से अलग खड़े थे। 
इसमें जितिन के लोग कम ही हैं। हमारे परिचित ने बताया कि यात्रा प्रबंधन से अधिक परेशानी तो जितिन के प्रबंधन में हुई है। जितिन तो कार्यक्रम को असफल बनाना चाहते थे। उनका बस चलता तो यात्रा के यहां पहुंचने पर वे यहां होते ही न।
कांग्रेस की एक बड़ी समस्या ये जितिन से लोग हैं। इन्हें मैदान में और संघर्ष में उतरना पसंद नही है। अगर किसी मंच पर पहुंचते हैं तो इन्हें महत्वपूर्ण स्थान चाहिए। 
इसके बहुत पहले जिले के एक निष्ठावान कांग्रेसी ने भी ऐसा ही कुछ कहा था यद्यपि वह प्रसाद परिवार के घोर समर्थकों में से एक था।
प्रसाद भवन के और भी नज़दीकियों की बातों में उनकी परेशानी का संकेत था। वे जितेंद्र प्रसाद से कौशल वाले नही थे। चुनाव हारने और सत्ता से दूर रहने पर राजनीति उनकी समझ आए बाहर थी। वे सत्ता में रहकर तो कार्य कर सकते हैं पर विपक्ष में नही। जितिन ही नही ऐसे कई छोटे-बड़े जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय नेता संघर्ष से दूर रहते रहे हैं ये चाहते रहे हैं कि शीर्ष नेतृत्व चमत्कार करे , कार्यकर्ता मेहनत करें और ये फल खाएं।

जितिन को 2016-17 में ही कांग्रेस छोड़ देना था। देर की वजह शायद गंतव्य रहा हो। अगर बसपा में कुछ दम होता तो उनकी पहली पसंद बसपा होती, उनके पिता जितेंद्र प्रसाद के मायावती से अच्छे संबंध रहे थे और उनके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते कांग्रेस व बसपा का गठबंधन भी हुआ था। सपा का खुद 2017 में कांग्रेस से समझौता हो गया था और भाजपा अब तक शायद उन्हें लटकाये रखी हो। पिछले कुछ समय से गंतव्य न मिलने की छटपटाहट उनमे साफ नज़र आ रही थी। 2019 के लोकसभा चुनावों में काफी हद तक आगे बढ़ने के बाद कुछ ठोस न मिल पाने की वजह से उन्हें कदम वापस खींचने पड़े थे। उसके बाद उन्होंने जातिवादी राजनीति को केंद्र बनाते हुए खुद को लाइमलाइट में लाने की कवायद शुरू की उनकी इस नई राजनीति में जातिवाद के अलावा और कोई विचारधारा नही होगी यह उन्होंने विजय मिश्रा वाले बयान से ज़ाहिर कर दिया। बाद में लेटर राजनीति में शामिल होने के पीछे उनकी यही मंशा थी कि और राजनैतिक दल खासकर भाजपा उन्हें विद्रोही माने।

जितिन को अभी तक कांग्रेस में जो मिलता रहा है वह उनके राजनैतिक कौशल से युक्त पिता की विरासत के कारण ही रहा है। जिले की राजनीति में तो भाजपा ही नही अन्य सभी दलों को भी जोड़ लें तो आज की तारीख में सबसे कद्दावर नेता प्रदेश के संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ही हैं। जितिन को भाजपा में उनके नेतृत्व में कार्य करना होगा। सुरेश खन्ना को तो इतनी बार लगातार विधायक बनने के बाद भी शाहजहांपुर में पैदल घूमते देखा जा सकता है। क्या जितिन ऐसा कर पाएंगे या फिर भाजपा उन्हें सुरेश खन्ना के अधिक महत्वपूर्ण स्थान देगी। यह देखने वाली बात होगी कि भाजपा में जितिन प्रसाद  अपनी सामंती सोच से बाहर निकल पाते हैं या नही क्योंकि उनकी दो सबसे बड़ी योग्यताओं में से पहली , जितेंद्र प्रसाद का पुत्र होना तो अब उनके किसी काम की रही नही (यद्यपि शाही खानदान के होने के चलते बड़े संबंध तो हमेशा उपयोगी रहते हैं) और दूसरी राहुल गांधी का नज़दीकी होने के चलते हो सकता है कि शुरुआत में भाजपा उन्हें कुछ महत्व दे दे, जैसा कि अभी दिया है, पर बाद में भाजपाई बन के तो उन्हें दिखाना ही होगा।
वैसे एक मज़े की बात यह है कि कांग्रेस में अपने आखिरी असाइनमेंट में जितिन ने कांग्रेस को बंगाल के न्यूनतम स्तर पर पहुंचाते हुए परफेक्ट शून्य पाने में मदद की। कांग्रेस के इस प्रदर्शन की लाभार्थी जितिन की नई पार्टी भाजपा रही जिसने नई बंगाल विधानसभा में कांग्रेस की जगह ली है।
हम यह नही कहते कि जितिन इतने प्रभावशाली रहे होंगे कि काँग्रेस को हानि और भाजपा को लाभ दे पाते मगर सोचिये अगर ऐसा होता तो! कोई इतने दिन से पार्टी में आने का इच्छुक हो उसके सामने शर्त लगा दी जाए कि पहले वफादारी साबित करो। ये है टॉस्क!

सोमवार, 26 जून 2017

आपातकाल

हिंसक भीड़ द्वारा संचालित
शासनतंत्र में जीते हम,
आपातकाल के बाद की  पीढ़ी के लोग  

हैरान होते हैं आज
कि लोकतंत्र,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और
विचारों की आज़ादी
को बेड़ियां पहनाने की
कोशिशें तब अनुचित मानी जाती थीं 

बुधवार, 11 जनवरी 2012

हताशा के भाजपा के अनुभव



लगता है भाजपा पर चुनावी बुखार इस कदर चढ़ गया है की वह यह समझ पाने में सक्षम नहीं रह गयी है की किस मुद्दे पर कैसे हमला बोलना है .
आज खबर आई है कि भाजपा के मुखपत्र कमल - सन्देश में राहुल गांधी पर हमला बोला गया है. और मुद्दे तो ठीक हैं पर उसमे राहुल गांधी को शादी न होने की वजह से हताश बताने पर समझ में नहीं आया कि यह भाजपा राहुल पर हमला बोल रही थी कि अपना दर्द बयान कर रही थी. गौरतलब है कि भाजपा में कुंवारे नेताओं की संख्या सर्वाधिक है . अटल विहारी वाजपेयी लम्बे समय तक भाजपा के शीर्ष पर रहे और उनके नाम पर भाजपा आज भी गौरवान्वित होने का दावा करती है. उत्तर प्रदेश चुनावों में भाजपा की प्रचार की कमान संभाल रही उमा भारती से लेकर देश के हर हिस्से में कुंवारे नेताओं की संख्या और दलों की अपेक्षा ज्यादा है . ऐसे में यह समझ में आने में कठिनाई हो रही है कि भाजपा अटल और उमा जैसे नेताओं की हताशा जानने के अपने अनुभव के चलते ऐसा कह रही है या फिर संघ के अविवाहित प्रचारकों की अपनी पार्टी में अनावश्यक दखलंदाजी से उपजी चिढ के चलते यह सोचने पर मजबूर हुई है कि अविवाहित लोगों में हताशा अधिक होती है . कुछ भी हो पर भाजपा को अपने अविवाहित सदस्यों के चलते इस हताशा से उबरने और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के तौर तरीके पता होंगे . अच्छा होता कि राहुल के दुःख के कारण की खोज के साथ उसके निवारण के लिए अटल विहारी वाजपेयी के निजी अनुभव भी बांट दिए जाते .
वैसे गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में चारों प्रमुख दलों में से तीन दलों के शीर्ष प्रचारक अविवाहित ही हैं . भाजपा के ये अनुभव सबके काम आ जाते तो बेहतर होता .
खैर!
वैसे भाजपा की खुद पर हमला करने की आदत इन दिनों काफी बढ़ गयी है. बाबू सिंह कुशवाहा नामक खोज जो आडवानी जी ने अपनी भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा की परिणाम स्वरुप प्राप्त की तो सभी को पता है . भाजपा प्रवक्ता ने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा  भ्रष्टाचार में निरुद्ध सभी नेताओं के लिए गंगा बनने  की ओर अग्रसर है . हमें लगता है कि नकवी के इस बयान के बाद राजा और कलमाड़ी काफी हल्का महसूस कर रहे होंगे . आखिर कोई तो है जो उनके बारे में सोच रहा है .
वैसे ऐसा भी कहा जा रहा है कि इन चुनावों में भाजपा और बसपा में कुछ समझौता हो गया है . भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे जिस भी नेता को बसपा निकालेगी उसे भाजपा अपने साथ ले लेगी जिससे लोग बसपा पर हमला छोड़ कर भाजपा पर हमला करने लगेंगे . जिससे बसपा विरोधों  से बच जायेगी 
भाजपा का सेन्स ऑफ़ ह्यूमर गजब का है वह लोकायुक्त की आठ सालों से नियुक्ति पर रोक और सशक्त लोकपाल के लिए जबानी संघर्ष दोनों एक साथ कर सकती है .
 उम्मीद है कि यह सेन्स ऑफ़ ह्यूमर चुनावों के बाद भी जारी रहेगा


शनिवार, 16 अप्रैल 2011

बिकने को तैयार लोग, खरीदारों की खोज और दलाल

 तहलका की खोजी पत्रकारिता और सच तक पहुँचने की उसकी जिद के हम हमेशा से कायल रहें हैं. तहलका एक ऐसे स्तम्भ की भांति है जो आज पास की लहरों की चोटों  से अनजान सच की खोज और उसको दुनिया के सामने लाने के लिए हमेशा लगा रहता है. इसी क्रम में तहलका की ताज़ी तहकीकात , वोट के बदले नोट कांड पर की तहकीकात पढ़ने को मिली. इसे विस्तार से आप भाग १ व भाग २ में पढ़ सकते हैं . यह  तहकीकात विकिलीक्स में किसी छुटभैये सहयोगी की खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की उत्कंठा से कही गई बातों से ज्यादा प्रमाणिक हैं .
जुलाई 2008 के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कई कुचक्र एक साथ काम कर रहे थे. कांग्रेस और उसके सहयोगियों के सरकार बचाने के कुचक्र, वाम दलों की ऐंठ की किसी तरह यह सरकार गिरा कर अपनी ताकत दिखायें , बसपा और भाजपा को सरकार गिरनेके बाद मिल सकने वाली गद्दी की आस और छिटपुट सांसदों को इस मौके में अधिक से अधिक फ़ायदा उठा लेने की आस.
भाजपा को समर्थन न देने की मजबूरी के बाद जब वाम दलों ने बसपा की और रुख किया तो भाजपा को नजर आने लगा कि बसपा तो अनायास ही लाभ की स्थिति में आ गयी. भाजपा उत्तर  प्रदेश में बसपा को समर्थन दे कर उसकी  कीमत भुगत चुकी है . भाजपा को उम्मीद थी कि केंद्र में वह अगुवाई करेगी और बसपा उसका समर्थन करेगी. पर यहां तो उसका उलटा हो रहा था . वामदलों की शह पर बसपा सरकार बनाने का सपना देखने लगी थी और इसी लिए सरकार गिराने की जोड़तोड़ में वह आगे निकलती नजर आने लगी. वाम दलों को शायद बसपा के खरीद-फरोख्त के तौर तरीके अच्छे नहीं लगे इसलिए अविश्वास प्रस्ताव के आखिरी मुकाम पर पहुँचते पहुँचते उसने संसद के बाहर की सक्रिय भागीदारी छोड़ कर  खुद को संसदीय चर्चा तक ही सीमित कर लिया.
तहलका की तहकीकात खुलासा करती है, कि भाजपा सरकार के सामने किस तरह से चारे फेंकने में जुटी थी. भाजपा की पूरी कोशिश थी की बिकने को तैयार उसके नेताओं को किसी तरह कांग्रेस खरीदने में पकड़ी जाए और वह इस बात पर वाहवाही और फिर वोट समेटे . इसके लिए उसने बिकने को तैयार लोगों और दलालों को सक्रिय कर रखा था. इस अभियान को खुद भाजपा के  प्रधानमन्त्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवानी व कद्दावर नेता अरुण जेटली की देखरेख में चलाया जा रहा था.
इस तहकीकात के खुलासे के बाद  वाजिब सवाल उठते हैं 
इस तरह के बनाए हुए मामले में अगर भाजपा का उद्देश्य सिर्फ भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश ही था तो यह जानने के बाद वह कांग्रेस के किसी नेता को नहीं फंसा पायी है और उसके हाथ कुछ ख़ास नहीं लगा है  तो उसने संसद नोट लहरा कर व्यर्थ में संसद की गरिमा क्यों गिराई और सुधीन्द्र कुलकर्णी , अरुण जेटली जैसों की भागीदारी की बात भाजपा ने क्यों नहीं स्वीकारी ?

सोमवार, 11 मई 2009

उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य -2

शेष से आगे

बसपा की २००७ की चुनावी सफलता के कई आयाम थे। उनमे से एक प्रमुख आयाम चुनाव आयोग की कडाई औरलोगों का वोट देने कम निकलना था । चुनाव आयोग की कडाई के चलते बड़े पैमाने पर होने वाली बूथ कैप्चरिंग नसिर्फ़ रुकी बल्कि समाज के निचले तबके के लोगों ने, जो बसपा के प्रतिबद्ध वोटर हैं, खुल कर वोट दिया। अन्यवर्गों के लोग हमेशा से कम वोट देते रहे थे और ऐसा ही उन्होंने उस बार भी किया।
इसके अतिरिक्त बसपा को एक प्रमुख लाभ उम्मीदवारों की फ्रेशनेस का भी मिला । बसपा के अधिकतर उम्मीदवारचुनावी जंग में ही नही राजनीति में भी नए थे जिसका फायदा उन्हें उनकी जातियों के वोटों के रूप में भी मिला ।
इसके अलावा लोगों की सपा सरकार के प्रति नाराजगी भी महत्वपूर्ण रही थी। एक नारा भी बहुत जोर शोर से चलाथा
चढ़ गुंडों की छाती पर
मुहर लगाओ हाथी पर

लोकसभा और विधान सभा और बसपा

विधानसभा चुनावों के उलट लोकसभा चुनावों का परिदृश्य अलग होता है। एक सीधा सा गणित देखते हैं मान लेतेहैं एक लोकसभा क्षेत्र में ५ विधानसभा की सीटें आती हैं (जैसा उत्तर प्रदेश में औसत है.) तो कोई एक पार्टी उसलोकसभा क्षेत्र के चार विधान सभा क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी पांचवी में हार के चलते पूरी सीट हारसकती है। अतः विधानसभा में प्राप्त सीटें सारे समीकरण पहले जैसे रहने के बावजूद उसी अनुपात में लोकसभासीटों में बदल जाएँ ये जरूरी नही है।
इसके अतिरिक्त विधान सभा चुनाओं की तरह के मुद्दे कमसे कम उत्तरप्रदेश में लोकसभा चुनावों में तो लागू नहीरहते । उदहारण के लिए कांग्रेस का पिछले दो लोकसभा और विधान सभा चुनावों में प्रदर्शन देख लें । पिछले दोविधानसभा चुनावों में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में २५ के आस-पास सीटें मिली जबकि लोकसभा में यह संख्या ९-१०रही। साफ़ है कि कांग्रेस विधानसभा चुनावों में बुरा प्रदर्शन करने के बाद भी लोकसभा चुनावों में अपेक्षाकृत कमबुरा प्रदर्शन करती रही है।

बसपा की इन चुनावों में कमियां

बसपा ने इन चुनावों में दूसरी पार्टियों से आनेवाले लोगों को जमकर टिकट दिया है । दूसरी पार्टियों से आने वालेलोग जहाँ अपना कुछ जनाधार लेकर आते हैं वहीँ कुछ नकारात्मक आधार भी ले आते हैं। एक उदाहरण के लिएबसपा के अम्बेडकरनगर से उम्मीदवार राकेश पाण्डेय की बात करें तो वहां पर उनके परिवार की बसपा के वहीँ सेमंत्री और प्रमुख नेता रामअचल राजभर से शत्रुता रही है । अब बसपा के कैडर के लिए राकेश पाण्डेय के पक्ष मेंप्रचार कर पाना कठिन लग रहा है। उल्लेखनीय है कि यह सीट बसपा प्रमुख मायावती की सीट रही है और इस सीटपर बसपा की हार का खतरा नजर आ रहा है।
लब्बोलुआब यहं है की बसपा ने फ्रेशनेस का लाभ गवां दिया है जिसका असर लोकसभा के चुनाव परिणामों मेंनजर आना लाजिमी है।

नारा हट गया!


लगता है बसपा के कार्यकर्ताओं को चढ़ गुंडों की छाती पर..... नारा प्रयोग न करने की भी हिदायत सी दी गई है ।इन चुनावों में इस नारे का प्रयोग नजर नही आया। कारण सपा सांसद अफजाल अंसारी और उनके भाई मुख्तारअंसारी दोनों बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, बाहुबली नेता और पूर्व विधायक हरिशंकर तिवारी के परिवार मेंतीन लोकसभा टिकट दी गए। इसके अतिरिक्त बसपा के अनेक विधायकों की कारगुजारियां लोगों के सामने हैं ।

भाजपा और कांग्रेस की स्थिति भी जैसी बुरी थी वैसी नजर नही आ रही है
जारी है

रविवार, 10 मई 2009

उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य-1

आज फ़िर बहुत दिनों के बाद लिखना हो पा रहा है इस बीच जहाँ कुछ लिखना सम्भव नही हो पा रहा है वहीँ अपनेमनपसंद ब्लॉग पढने का समय नही मिल पा रहा है ।

आम चुनाव

आम चुनाव अपने आखिरी चरण में पहुँच गया है । पहले जहाँ नेता जीत के दावे करते फ़िर रहे थे वहीँ अबएक-दूसरे को रिझाना शुरू कर दिया है। वोटर को रिझाना ख़त्म हुआ अब पार्टियों और नेताओं की बारी है।
चुनाव शुरू होने से पहले उत्तर प्रदेश के बारे में कुछ ख़ास तरीके से सोचा जा रहा था। इस सोच में शामिल कुछ बातेंथीं:
१- मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तरप्रदेश से ही कम से कम ४० सीटें तो पा ही सकती है।
२- कांग्रेस और भाजपा दोनों की स्थिति प्रदेश में बहुत ही बुरी है।
३- एक कांग्रेस - समाजवादी पार्टी गठबंधन स्वाभाविक गठबंधन है और अगर ये गठबंधन हो जाता है तोबसपा को घाटा पहुंचेगा।


कांग्रेस-सपा गठबंधन

कांग्रेस-सपा गठबंधन को स्वाभाविक गठबंधन मानने वाले संभवतः इस एक बात को महत्त्व नही दे रहे थे कि दोनोंके अपने अलग पहलु हैं। जहाँ सपा उत्तर प्रदेश में सिमटी हुई पार्टी है वहीँ कांग्रेस उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रदेश सेजनाधार गवां चुकी पार्टी है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अधिक स्पेस देने का मतलब सपा के लिए अपने पाँव परकुल्हाडी मारने जैसा था और कांग्रेस के लिए सपा का प्रभुत्व मान लेने का मतलब था कि वो उत्तर प्रदेश को हमेशाके लिए गवां बैठे। बिहार में राजद के साथ हुए गठबंधन के चलते वहाँ के कांग्रेसियों में चल रही कशमकश कोदेखने वाले जान सकते थे कि कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में १५ सीटों पर समझौता कर पाना फिलहाल कितनाकठिन होगा और सपा के लिए १५ से ज्यादा सीटें दे पाना कितना कठिन होगा ।
वैसे ये तो सच है कि एकसपा-कांग्रेस गठबंधन की आहट ने बसपा के नेताओं के चेहरे पर परेशानी ला ही दी थी।

बसपा और लोकसभा चुनाव

बसपा की २००७ के विधानसभा चुनावों में सफलता ने तमाम समीक्षकों को अचंभित कर दिया था। उस सफलताको कुछ ने बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का नतीजा बताया कुछ ने और सारे कयास लगाये । हमारा मानना हैकि बसपा की इस सफलता के एक नही अनेक पहलु थे।
जारी है

बुधवार, 18 मार्च 2009

वरुण की बात में नया क्या है ?

वरुण के बयानों को लेकर हंगामा सा मचा हुआ है । आश्चर्य हमें भाजपा के विरोधियों की प्रतिक्रिया से नही है हमेंआश्चर्य भाजपा के नेताओं की प्रतिक्रिया पर हो रहा है । वरुण गांधी ने ऐसा कुछ नही कहा है जो भाजपा कीविचारधारा में शामिल नही रहा है । विश्वास न हो तो बस इसी हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ छद्म राष्ट्रवादियों की जगहजगह पर प्रतिक्रियाओं को देख लें ।

थोड़ा समय पीछे चलते हैं और लखनऊ में विधानसभा चुनाओं के पहले भाजपा नेताओं द्वारा जारी की गई सी डीको याद करते हैं। वरुण की बातें और उस सी डी में बातें एक ही जैसी कही गई हैं। उस सी डी को बाकायदा भाजपा केमंच से भाजपा के जमे जमाये नेताओं ने जारी किया था। उस सी डी के मामले में बाकायदा चुनाव आयोग नेमामला भी दर्ज किया था । अब चुनाव आयोग (जिसके एक स्वघोषित निष्पक्ष सदस्य दूसरे को कांग्रेसी घोषितकर चुके हैं ) उस मामले को दबा कर बैठा है । हो सकता है वरुण का मुद्दा भी वैसे ही दबा लिया जाय।

हम उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। फैजाबाद समेत अलग अलग जगहों पर रह चुके हैं और ९ साल की उम्र से चुनावसभाओं को देख समझ रहे हैं । संत, साध्वी कहे जाने वाले लोगों को सुना है , संघ परिवार की कार्यप्रणाली को बहुतनजदीक से देखा और समझा है , शिशु मंदिरों में पढ़ाई की है और वो समय अयोध्या के बहुत नजदीक गुजारा हैजब राम मन्दिर आन्दोलन चरम विन्दु पर था। हम देश के कोने कोने से आए कार सेवकों को नजदीक से देख सुनऔर समझ चुके हैं।

इतना देखने सुनने के बाद आज आश्चर्य नही होता कि कोई भाजपा का तथाकथित उभरता नेता कैसे बोल सकताहै। आश्चर्य इस बात पर होता है कि शाहनवाज और मुख्तार जैसे लोग सिर्फ़ दिखाने के लिए उस पर विरोध जतातेहैं।
इन्हे
अटल बिहारी का गोवा भाषण सही लगा था, २००२ का गुजरात सही लगा था , २००७ की सी डी सही लगीथी तो आज वरुण के भाषण पर ही ड्रामा करने की जरुरत क्या थी?

वस्तुतः भाजपा के चहेते बन चुके नरेंद्र मोदी का उदहारण भाजपा के अन्य नेताओं के सामने है। अपनी विचारधाराको डंके की चोट पर लागू करो (भाजपा की विचारधारा यही है जो नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के भाषणों में नजरआती है ) और फ़िर भाजपा के अन्दर भी कोई विरोध करने की हालत में नही रह पायेगा। २००२ के चुनावों के समयआडवाणी तक नरेंद्र मोदी से हरेन पंड्या के मुद्दे पर हार चुके हैं तो औरों की क्या बिसात। अब भाजपा केमहत्वाकांक्षी लोग जानते हैं कि उन्हें आगे बढ़ना है तो नरेंद्र मोदी से आगे निकलना होगा ।
वरुण
गांधी जो कर रहेहैं वह यही है ।
भाजपा
में आगे निकलने का यही रास्ता है।


सोमवार, 9 मार्च 2009

लोकसभा चुनावों में मेरा वोट

पिछले दिनों अपने गाँव गई तो मुझे पता चला कि मेरा नाम वहाँ की वोटर लिस्ट में शामिल है । मैंने तय किया कि लोकसभा चुनावों में मैं वोट करुँगी। इसके चलते मैंने पता करना शुरू किया फैजाबाद लोकसभा सीट से राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों के नाम।
निवर्तमान लोकसभा में फैजाबाद लोकसभा सीट बसपा के पास थी और यहाँ से सांसद रहे मित्रसेन यादव। मित्रसेन यादव बाहुबली नेताओं में गिने जाते हैं और वो कम्युनिस्ट पार्टी, सपा, बसपा होते हुए अब फ़िर से सपा में आ गए हैं और उन्हें सपा ने यहाँ से टिकट दिया है। उन्हें वोट दे पाना मेरे लिए सम्भव नही ही है।
भाजपा ने अयोध्या के विधायक लल्लू सिंह को टिकट दिया है । लल्लू सिंह कि छवि ठीक ठाक रही है पर अयोध्या जाने वाला कोई भी इंसान ये बता सकता है कि इतने समय से विधायक रहने के बाद भी लल्लू सिंह ने अयोध्या के लिए कुछ ऐसा नही किया है जिसे देख कर उन्हें लोकसभा में भी भेजा जाय, वो भी तब जब वो जिस पार्टी से हैं उसकी राजनीति अयोध्या के बूते पर ही खड़ी हुई है। इतना तो है की भाजपा ने अयोध्या के साथ जितना हो सकता है उससे ज्यादा खिलवाड़ किया है। हो सकता है बाकी लोग सोच भी लें भाजपा और लल्लू सिंह को वोट देने को पर मैं तो नही ही सोच सकती हूँ।
बसपा ने अयोध्या के राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र को फैजाबाद से टिकट दिया है । सुनने में आया है कि ये अच्छे प्रत्याशी हो सकते हैं ।
कांग्रेस ने फैजाबाद से अस्सी के दशक में सांसद रहे निर्मल खत्री को टिकट दिया है। निर्मल खत्री अच्छे नेताओं में गिने जाते हैं । फैजाबाद में उनके समय में विकास के काम भी हुए थे । राजनीति में रूचि रखने वाले लोगों के लिए वो राष्ट्रीय स्तर पर फैजाबाद के एक निर्विवादित चेहरे हैं।
अन्य प्रत्याशियों के बारे में अभी कोई ख़ास जानकारी नही है।
तो बसपा के विमलेन्द्र मिश्र और कांग्रेस के निर्मल खत्री में से चुनाव आसान दिखता है मेरे लिए। उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार देखने के बाद ये समझ में आता है की राष्ट्रीय स्तर पर बसपा की सरकार बने ये देश के लिए बुरा ही होगा।
पिछले पाँच सालों के कांग्रेस सरकार के काम-काज से बहुत संतुष्टि न भी मिले तो भी यह उपलब्ध विकल्पों में श्रेष्ठतम है।
दल और प्रत्याशी दोनों को देखने और समझने के बाद निर्मल खत्री मुझे फैजाबाद से सबसे अच्छे उम्मीदवार नजर आ रहे हैं।
मैंने तय किया है की आने वाले चुनावों में मैं निर्मल खत्री को वोट दे रही हूँ और उम्मीद करुँगी की देश में अगली सरकार कांग्रेस की ही बने ।

सोमवार, 8 दिसंबर 2008

चुनावी परिणाम

मतदाताओं के नब्ज की समझ कर पाना वास्तव में कठिन होता जा रहा है । प्राप्त रुझान और नतीजे बताते हैं कि पाँच राज्यों के मतदाताओं में सरकार विरोधी सोच कम ही थी । तभी तो जनता ने दिल्ली , छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में निवर्तमान सरकार को दुबारा मौका दिया है जबकि राजस्थान में परिवर्तन को वोट दिया है। वस्तुतः पहली तीन सरकारें अपने काम-काज को अधिक प्रचारित कर रही थी जबकि राजस्थान में मुख्यमंत्री लगातार केन्द्र सरकार पर प्रहार करती नजर आ रहीं थी। जनता ने अपनी बात करने वालों पर ज्यादा भरोसा किया है।
दिल्ली में प्रो विजय कुमार मल्होत्रा नगर निगम चुनावों के नतीजों और मंहगाई के भरोसे दिल्ली विजय को ले कर आश्वस्त थे और उन्होंने मुख्यमंत्री जैसा व्यवहार भी करना शुरू कर दिया था । 26 नवम्बर के मुंबई हमले के बाद भाजपा नेता अन्दर ही अन्दर अधिक आश्वस्त नजर आने लग गए थे । उनकी उम्मीद अधिक मतदान से बढ़ भी गई थी।
पर मतदाताओं ने इस सोच को चकमा देते हुए शीला दीक्षित को एक बार फ़िर मौका देने का निश्चय कर लिया। चुनाव आयोग के ताजा आंकडों के अनुसार कांग्रेस 7 सीटें जीत चुकी है और 31 पर आगे चल रही है जबकि भाजपा १ जीतकर 23 पर आगे है। अन्य के खाते में अभी तक ७ सीटें हैं । ७० सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए ३६ सीटों की आवश्यकता है
मध्यप्रदेश में मतदाताओं ने कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई को नकारते हुए शिवराज सिंह में पुनः भरोसा जताया है । अभी तक प्राप्त रुझानों में भाजपा १२६, कांग्रेस ७७, बसपा १० और उमा भरती की लोजश ६ सीटों पर आगे है । यहाँ कुल सीटें २३० हैं इस हिसाब से भाजपा बहुमत का आंकडा पार कर चुकी है
छतीसगढ़ में भाजपा के रमन सिंह की छवि उनका साथ देते हुए नजर आ रही है। ९० सीटों वाली विधानसभा में भाजपा ४३ सीटों पर आगे चल रही है जबकि कांग्रेस २९ पर।
राज्यों के उलट राजस्थान ने परिवर्तन को चुना है। वसुंधरा राजे का आतंकवाद पर केंद्रित संदेश भी लोगों को खुश न कर सका यहाँ ९५ सितो पर बढ़त के साथ कांग्रेस बहुमत के लिए आवश्यक १०१ के करीब है । भाजपा को ७३ और बसपा को ७ सीटों पर बढ़त है।
मिजोरम में कांग्रेस को अभी तक प्राप्त २६ रुझानों में से २२ पर बढ़त है और यह बहुमत के लिए जरूरी २१ से ज्यादा है ।
ताजा नतीजे और रुझान
दिल्ली
कुल सीटें - 70
चुनाव हुए - 69
कांग्रेस - 42
भाजपा - 23
अन्य - 04


राजस्थान
कुल सीटें - 200
चुनाव हुए - 200
कांग्रेस- 96
भाजपा - 78
अन्य - 26



मध्य प्रदेश
कुल सीटें - 230
चुनाव हुए - 230
भाजपा- 136
कांग्रेस - 66
अन्य - 28


छत्तीसगढ़
कुल सीटें- 90
चुनाव हुए- 90
भाजपा- 47
कांग्रेस- 38
अन्य- 05

मिजोरम
कुल सीटें- 40
चुनाव हुए- 40
कांग्रेस- 28
एम् एन ऍफ़ - 3
अन्य- 3

hamarivani

www.hamarivani.com