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सोमवार, 26 जून 2017

आपातकाल

हिंसक भीड़ द्वारा संचालित
शासनतंत्र में जीते हम,
आपातकाल के बाद की  पीढ़ी के लोग  

हैरान होते हैं आज
कि लोकतंत्र,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और
विचारों की आज़ादी
को बेड़ियां पहनाने की
कोशिशें तब अनुचित मानी जाती थीं 

गुरुवार, 18 जून 2015

मोदी जी (ललित) और मोदी जी (प्रधानमंत्री)


ये फ़ितना आदमी की ख़ानावीरानी को क्या कम है
हुये तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमां क्यों हो

ये लाइनें अब मोदी जी (ललित) के लिए उनके दोस्तों की जुबान पर होगा आजकल। पहले सुषमा स्वराज फिर वसुंधरा राजे । वहाँ मोदी जी वैकेशन पे वैकेशन  मारे जा रहे हैं । उनकी जिंदगी एक लंबी छुट्टी की तरह है। सैर कर दुनिया की गाफिल ज़िंदगानी फिर कहाँ ।
छुट्टियों के अपने अलग अंदाज हैं। पत्नी का इलाज हो तो एक देश में, इंटरव्यू देना हो तो दूसरे देश में । किसी पुराने दोस्त से मिलना हो तो किसी और देश में , बदनाम होना हो तो किसी और देश में । सोते किसी और देश में होंगे उठते किसी और देश में । बाथरूम किसी देश में जाते होंगे तो चाय किसी देश में ।
सच्चे अर्थों में अंतर्राष्ट्रीय नागरिक !
लगता है हमारे मोदी  जी (प्रधानमंत्री)ने मोदी जी(ललित) से काफी कुछ सीखा होगा । वैसे भी मोदी मोदी से नहीं सीखेगा तो क्या वाजपेयी से सीखेगा?
मोदी जी (प्रधानमंत्री) भी तो सच्चे अंतराष्ट्रीय नागरिक लगते हैं । उनके पाँव ही नहीं आँख, नाक, कान, उंगलिया (ट्वीट करने के लिए ) और मोबाइल सीमा के बाहर ही रहते हैं।
दूरदृष्टि वाले नेता हैं सीमा के अंदर  दिखाई ही नहीं देता
देश को एक और प्रधानमंत्री चुन लेना चाहिए था । मोदी जी (प्रधानमंत्री) देश के बाहर के प्रधानमंत्री होते और दूसरा वाला देश के अंदर का प्रधानमंत्री होता।
दोनों मोदियों (प्रधानमंत्री और ललित ) की विवादों में काफी रुचि है। कभी कभी ऐसा लगता है कि विवाद न हों तो इन बेचारों के जीवन में होगा क्या। बेचारे मोदी जी (ललित) को लोगबाग भूल चुके थे ये विवाद ही तो थे जो उन्हे वापस ले आए लाईमलाइट में। अपने मोदी जी (प्रधानमंत्री) जी भी गुजरात के मुख्यमंत्री कैसे बनते अगर गुजरात भूकंप में केशुभाई की छीछालेदार न होती।
लोग तो यह भी कहते हैं कि उनके मुख्यमंत्री बने रहने में गोधरा कांड, फर्जी(अब असली) एंकाउंटरों ,राज्यबदर सहयोगियों का भी हाथ रहा है ।
अब देखिये न समय समय पर होने वाले विवाद लोगों को याद दिलाते रहते हैं कि कैसे देश के कुछ नासमझ (कोई 69%) कैसे मोदी जी (प्रधानमंत्री) को अभी भी पसंद नहीं करते ।
खैर हमे पता है कि मोदी जी (ललित) इस मुद्दे पर चाहे जितना बोल लें पर मोदी जी (प्रधानमंत्री) बिलकुल नहीं बोलेंगे ।
खैर छोड़िए आपलोग राहुल गांधी पर चुट्कुले बनाइये ।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

बात मानसिकताओं से आगे की


तो दो खतरनाक लोग जिन्हें हम "बिरयानी " खिला रहे थे अंततः अपने अंजाम तक पहुँच गए . नौ फ़रवरी को अफजल गुरु को फांसी पर लटकाए जाने के बाद राजनैतिक तौर पर जो कुछ भी हो मीडिया चीख चीख कर  तो  सकता है कि आतंक के खिलाफ लड़ाई में हम अब साफ्ट नहीं हैं .
राष्ट्रवाद का उफान !
हमें कुछ नहीं कहना है अफजल गुरु की फांसी पर .
 हो सकता है यह शुद्ध रूप से प्रशासनिक फैसला हो या हो सकता है यह एक राजनैतिक चाल हो विपक्ष के हमले को कुंद करने को . या हो सकता है कुछ ख़ास चीजों से ध्यान हटाने का मामला हो .
 सर्वोच्च न्यायालय का फैसला था उसका अनुपालन होना ही था आज नहीं तो कल ! भले ही फैसले में   माननीय न्यायाधीश महोदय "जन भावनाओं को तुष्ट करने " जैसी बात जोड़ देते हैं यह फैसला तो था ही।
फैसले का अनुपालन होना चाहिए और शीघ्र होना चाहिए
उम्मीद है कि सरकार कश्मीर घाटी में स्थितियों को संभालने में सफल  रहेगी
पर पिछले दो दिनों से टी वी , सोशल मीडिया (स्वयंभू  ) और   इंटरनेट पर देशभक्ति , न्याय , आतंक के खिलाफ जंग और शान्ति की बाते सुनते हुए कई बाते दिमाग में आती रहीं
१.  कश्मीरियत की बात करने वाले लोग जम्मू और दिल्ली के कैम्पों में जिंदगी बसर कर रहे अपने भाइयों के बारे में में कश्मीरी हो के क्यों नहीं सोच पाते . क्या कश्मीरियत उसी में मानी जायेगी जिसने बन्दूक उठा ली . पी ओ के और घाटी से भाग कर आये परिवारों के बारे में कश्मीरियों का दिल कब जागेगा .
२ कैम्पों में रह रहे उन लोगों की जिम्मेदारी प्रदेश और केंद्र सरकारों पर भी आती है . क्या वे लोग भारत के नागरिक नहीं हैं ? कश्मीर समस्या पर बात में कभी उन्हें भी शामिल किया जाएगा ?
३  बेअंत सिंह और राजीव के हत्यारों की सजाओं  पर भी फैसला शीघ्र होना चाहिए . जब हम कश्मीर के हालात में ऐसा फैसला ले सकते हैं तो पंजाब और तमिलनाडु अपवाद क्यों बने
४. न्याय शान्ति की पूर्व शर्त होती है . और क्षेत्रवादी , साम्प्रदायिक आदि दंगों की हिंसा भी आतंकवाद है .और ये आतंकवादी चाहे वो दिल्ली के हों गुजरात के हों असम के हों महाराष्ट्र के हों उनके खिलाफ सख्त कार्यवाहियों की शुरुआत करनी चाहिए . चुनाव जीतने से हर अपराधी स्वीकार्य नहीं हो जाता चाहे वो सज्जन कुमार हों या मोदी
मानसिकताओं से आगे निकलना बहुत ही जरुरी है 

hamarivani

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