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सोमवार, 9 जनवरी 2012

खामोशियाँ


खामोशियाँ!
कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।


वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर


और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है
हमे छील गयीं भीतर तक
कई पुराने छुपे हुए से
ज़ख़्म फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2008

हिंसा, बदले और मानसिकताएं

फर्ज कीजिये राहुल राज का नाम रिजवान उर रहमान होता और उसने मुंबई की जगह अहमदाबाद में बस का अपहरण करने की कोशिश की होती। वहाँ पर वह कहता कि मै नरेंद्र मोदी को सबक सिखाना चाहता हूँ तो क्या होता ?
क्या उसके प्रदेश के नेता बिना पूरे देश की निंदा सहे प्रधान मंत्री से उसके मारे जाने के ख़िलाफ़ अपील कर पाते ?
क्या प्रधान मंत्री द्वारा गुजरात सरकार से स्पष्टीकरण मांगना इतने सहज तरीके से देखा जा पाता?
याद कीजिये बाटला हॉउस मामले को? क्या हर उस इंसान जिसने मुठभेड़ पर सवाल उठाये, को इतनी सहजता से लिया गया? दोनों मामलों में लोग जख्मी हुए। इंस्पेक्टर शर्मा की मौत अस्पताल में हुयी लेकिन क्या कोई कह सकता था कि उनकी मौत अवश्यम्भावी है जब उनको गोली लगी थी? क्या कोई कह सकता था कि जिस व्यक्ति को राहुल की गोली लगी थी वह बच ही जाएगा?
हम पुलिस की कार्यवाही का समर्थन नही कर रहे हैं पर बाटला हॉउस की दलीलें मुंबई में क्यों नही प्रभावी हैं? सभी न्यूज़ चैनल एक ओर से पूछ रहे हैं कि क्या राहुल को बिना मारे हल नही निकल सकता था पर जिन्होंने बाटला हॉउस में पुलिस पर प्रश्न उठाये उन्हें इतनी सहजता से क्यों नही लिया गया और जिन्हें दिल्ली पुलिस पर पूरा उन्हें मुंबई पुलिस पर यकीन क्यों नही है?
जब लालू ने कहा कि अगर नरेंद्र मोदी को सजा मिली होती तो आतंकवादी पैदा नही होते और भर्त्सना पायी पर इस मामले पर उसी तरह की बातें करने वाले सहजता से लिए जा रहे हैं।
याद करिए गुजरात के उस एन्काउन्टर को , बंजारा अभी भी जेल में है और उसे भुना कर मोदी गद्दी पर। अब बाटला हॉउस और मुंबई की बसों को कौन भुनायेगा ये सामने जल्दी आएगा।
आप कहेंगे कि इस दीवाली के पावन दिन ये शख्स ये क्या राग ले कर बैठ गया। पर क्या करें दीवाली पर बधाई देने जैसा कुछ नजर नही आ रहा है? हमारी क्या गलती है अगर हमें अपना घर बँटा हुआ हुआ दिख रहा है । क्या करें पर दिल भी तो खुश होना चाहिए न?
कल महाराष्ट्र के गृह मंत्री को टी वी पर देखा बड़े तैश में थे। गोली का जवाब गोली से बता रहे थे। उन्हें एक बिहारी कि इस हरकत पर इतना गुस्सा आ गया पर महीनों से राज और उसके गुंडों कि हरकतों पर तैश नही आया आखिर क्यों? ये मराठी और बिहारी का मामला है या फ़िर अकेले राहुल को तो गोली से वो निपटा सकते हैं और राज के गुंडों से डर लगता है? कल टी वी पर गृह मंत्री के चेहरे पर नजर आ रहा तैश क्या साबित करता है? क्या वो भी उसी मानसिकता के गुलाम नही हैं जो राज और उसके गुंडों की है। सच है कि अगर कानून व्यवस्था के नाम पर उन्हें तैश पहले आ जाता तो शायद नौबत यहाँ तक नही आती।
लोग बिहार की राजनीति की बुराई करते हैं पर कम से कम उन नेताओं में इतनी नैतिकता तो थी कि सभी दलों के नेताओं ने एकजुट हो कर बिहार में चल रही हिंसाओं की निंदा की। न जाने और लोग इतने समझ दार कब होंगे?

न्यूज़ चैनलों पर बाढ़ सी आई हुयी है । लोग हिंदू आतंकवाद शब्द लिख लिख कर उसका आनंद उठा रहे हैं। जैसे मालेगांव धमाकों के आरोपियों के हिंदू होने से इन्हे बड़ी तृप्ति हुई हो। जैसे इससे पहले कोई हिंदू आतंकवादी ही न रहा हो। जैसे स्टेन्स के हत्यारे, गुजरात दंगों के अपराधी, उड़ीसा के दंगाई, सभी संत रहे हों। ये बदले की वही पुरानी मानसिकता है जिसके तहत अयोध्या में ढांचा तोडा गया था, जिसके तहत सिख मारे गए थे, जिसके तहत देश भर में आतंवादी घटनाएँ हो रही हैं, जिसके तहत उड़ीसा में ईसाई जलाये जा रहे हैं और जिसके तहत गुजरात में नरसंहार हुआ था।
विश्वास न हो तो बशीर बद्र से पूछ लीजिये वो बताएँगे कि अगर मुसलमानों ने बम विस्फोटों में लोगो को मारा और अब हिंदू उसका बदला ले रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है। (अभी अयोध्या मामलें में उन्होंने ऐसे ही तर्क दिए थे।)। जिस देश में समाज को दिशा देने वाले साहित्यकार ऐसी सोच रखने वाले हो जाएँ उस समाज में त्योहारों का मतलब ही क्या है। क्यों और कैसे स्वीकार करें हम इस दीवाली पर शुभकामनायें?

हम विघ्नसंतोषी नही हैं हम भी खुशी चाहते हैं पर सब गृहमंत्रियों को चयनात्मक तैश आने की बीमारी हो जाए। लोग घटनाओं को नियत चश्मों से देखने लग जायें तो क्या करें आख़िर?
मालेगांव धमाको के संदिग्ध आतंकवादी दोषी हैं या नही इसका फैसला अभी कोर्ट को करना है (जैसे बाकी धमाकों के संदिग्ध आतंकवादियों का ) पर इससे पहले समाज को यह तय करना है कि उसे आतिफ और प्रज्ञा चाहिए या कलाम और अमर्त्य सेन। बाटला हॉउस हो या मुंबई की एक अभागी बस सिर्फ़ पुलिस और मीडिया की कहानी पर यकीन करना है या तथ्यों को आने देने का इंतज़ार?

सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

शिकायत

किया व्यापर दर्द का
दिया दर्द और हर बार दर्द ही तौला
फ़िर समेत कर सारी अधूरी हसरतें
पुराना सा एक म्यूज़ियम बना डाला।

बंद करली खिड़कियाँ सारी
डाल दिया दरवाजों पर ताला
कैद कर ढेर सारी पहचानी रोशनियाँ
एक गुमनाम अँधेरा बना डाला।

बनकर याद तुम्हारे दिल मे ही रही
तुमने ख़ुद अपने ही दिल को छला,
रोया मन जब भी तुम्हारा साथ देने को
मुस्कुराकर तुमने हर बार बेगाना बना डाला।

(ये कविता मैंने अपने ब्लॉग पर लिखी थी आज इसे यहाँ रख रही हूँ। जिन्होंने इसे वहां एक बार पढ़ लिया है उनसे दुबारा कष्ट देने के लिए क्षमा चाहूंगी।)

बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

चुपके से


अंधेरी रात के
गहरे सन्नाटे में
चुपके से
धीरे धीरे
मेरे क़रीब आकर
किसी ने
मुझसे कुछ कहा!

मैं सहमी
अलसायी
नींद में उलझी,
पूछ बैठी
कौन है?

कोई जवाब नहीं
ना कोई पद चिन्ह
ना कोई परछाई
फिर भी
छोड़ गया
एक निःशब्द सवाल!

मैं कौन हूँ?
मेरा वज़ूद क्या है!


Reference - Turning the wheel

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

अब! जब कि

अब! जब कि
कुछ ही दिनों में हमारे रिश्ते
बीते दिनों की मीठी सी
याद बनकर रह जाने को हैं।

अब! जब कि
हमारी पहचान पुरानी किताबों के सूखे फूल
या अनायास ही लिखे कुछ शब्द देख
होठों पर आ जाने वाली
दर्द भरी मुस्कान बनकर रह जाने को है।

अब! जब कि
सारी शरारतें, सारे सपने
इन गुजरे सालों की
सारी दिलचस्प बकवासें
कुछ खोयी सी कहानियाँ बनकर रह जाने को हैं।

अब! जब कि
हम जानते हैं कि चेहरों पर चिपकी
ये मुस्कुराहटें झूठी हैं
और आंखों में बरस पड़ने को
तैयार हजारों मोती हैं।

अब! जब कि
रात भर नींद नहीं आती
डराता है आने वाला कल
जागी हुई आंखों को
और बचे हुए लम्हों को
कमजोर मुट्ठियों में रोकने की
बेकार कोशिशें जारी हैं।

अब! जब कि
झूठी उम्मीदों पर जीने लगें हैं हम
भीतर ही भीतर बेजार-बेबस हो
छुप-छुप रोने लगे हैं हम।

अब! जब कि
उठाती हैं सवाल
अपनी ही उँगलियाँ ख़ुद पर
और अन्दर बैठा कोई
संभालने, संवारने की
कुछ आखिरी कोशिशों में है निरंतर।

अब! जब कि
कुछ ही दिनों में
दूर, बहुत दूर हमें हो जाना है
और फ़िर याद करके अनकही बातों को
पछताना बस पछताना है।

पर अब भी
ह्रदय में मचलता सागर
होठों से नही निकलेगा
बुन लीं हैं हमने मुश्किलें ऐसीं
कि कोई रास्ता नही निकलेगा।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008

मौसमों का डाकिया

बादलों की उमंगें

तितलियों के रंग

नदियों की खिलखिलाहट

बारिशों की नज्में

बसंत की खुशबुएँ

और भी जाने कैसे कैसे

दिखाता रहा करिश्में

निकाल निकाल

अपनी जादुई पोटली से

जाते जाते मुस्कुराया शरारत से

वो मौसमों का डाकिया

और लिख गया मेरा नाम-पता

उदासियों के पार्सल पर

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

आप संघ के नही हैं तो आप सिमी के हैं?

पिछले दिनों एक ब्लॉग पर उस ब्लॉग को लिखने वाले ने मुझे आमंत्रित किया अपना उपन्यास पढने के लिए। उस ब्लॉग पर पहुँचते ही मेरी नजर पड़ गई संघ की तारीफ़ में लिखे एक लेख पर। उक्त ब्लॉगर ने वह लेख एक अफलातून जी के संघ के ऊपर प्रहारों के विरोध में लिखा था। अफलातून जी ने शायद अपने लेख में संघ के नमूने की देशभक्ति को राष्ट्र के लिए घातक बताया था। मै उक्त ब्लॉगर और अफलातून जी के तर्कों की विवेचना कर पाती इससे पहले मेरी नजर पड़ गई उक्त ब्लॉगर द्वारा अपने लेख पर की गई टिप्पणी पर दिए गए जवाब पर. वो जवाब पढने के बाद मुझे मजबूरन बिना पढ़े ही अफलातून जी के तर्क सही लगने लगे.
उक्त ब्लॉगर के लेख पर किसी ने टिप्पणी की थी "क्या मै संघ का हूँ?"
और उस ब्लॉगर ने जवाब दिया
"तो क्या आप सिमी के हैं?"
जैसा कि मैंने बताया कि अफलातून जी ने संघ प्रकार की देशभक्ति को देश के लिए घातक बताया था।

एक संघ समर्थक का बुश की शैली में ये जवाब कि अगर आप हमारे साथ नही हैं तो आप दुश्मन के साथ हैं वास्तव में देश के लिए घातक ही है. और अगर संघ ऐसे ही सोचता है तो वह राष्ट्र के लिए घातक ही है.
क्या संघ अकेला देशभक्त संघटन है? क्या अब लोगो को अपनी देशभक्ति संघ से प्रमाणित करवाने की जरूरत पड़ने लगेगी? देश के लोगों को संघ और सिमी दो पालों में तोड़ देने वाले लोग किस तरह से राष्ट्रभक्त हो सकते हैं मुझे नही पता.
उस ब्लॉगर से मैंने उसकी इस गलती की चर्चा की तो पता चला कि वह महोदय उन बंद दिमाग लोगों में से हैं जिन्होंने सोचने समझने की शक्ति का कभी इस्तेमाल ही नही किया होगा. मेरी आपत्ति के जवाब में उन्होंने सीधे मुझे अफज़ल जैसे लोगो का हमदर्द बताना शुरू कर दिया. मेरे ये कहने पर कि मैंने अफज़ल का कभी समर्थन नही किया है उन्होंने मुझे कहा कि नही किया है तो करोगी. और गुप्त रूप से करती होगी.
मुझे याद आया उन चर्चाओं का कि कैसे अति राष्ट्रवादी अन्य सभी को हेय साबित करने के लिए ख़ुद की बनाई मान्यताओं का प्रयोग करते हैं.
मुझे याद आया कि इसी तरह हर मौके पर कैसे अन्य सभी को एक उस पाले में धकेलने की कोशिश की जाती है जिसमे वो कभी रहे ही नही और तब क्या ग़लत होता है जब इस तरह धकियाये लोगों में से कुछ सचमुच उस पाले में ख़ुद को खड़ा पाते हैं.
इसी तरह तो तोडा जाता है राष्ट्र को
इसी तरह से तो बनाया जाता है अविश्वास का वातावरण.
शायद वो उन्ही फलसफों पर बढ़ते हैं जो हिटलर जैसे लोगों ने खड़े किए थे

---जो आप से सहमत नही हैं उन्हें ख़त्म कर दो


फिलहाल मै जानती हूँ अपनी आस्था मुझे किसी के प्रमाणपत्र की जरुरत नही है देशभक्ति साबित करने के लिए। इस देश की होने के चलते मुझे हक़ है हर चीज में बोलने का, सवाल उठाने का और जवाब पाने का और मै समझती हूँ सभी को यह महसूस करना चाहिए, हिंदू हो या मुसलमान सभी को
विघटन कारी शक्तियों के मनसूबे तभी नेस्तनाबूत होंगे

बुधवार, 13 अगस्त 2008

स्वार्थ!

(इस प्रसंग के पात्र काल्पनिक नही हैं और वास्तविक जिन्दगी से उनका गहरा रिश्ता है। ये प्रसंग दिमाग में ऑरकुट पर एक स्क्रैप देख कर उपजा है।)
नीलू ने झटके से स्कूटी रोक दी अब वो कहीं दूर देख रही थी।
-दी! वो रही आपकी पंखुडी ब्लू सूट में। उन लोगो का क्लास ख़त्म हो गया है मै आपको उससे मिलवा दूँ?
नही मैं मिल लूँगी तुझे लेट हो रही होगी।-
हाँ वो तो है। अच्छा अब मै चलती हूँ। ये स्कूटी यही खड़ी कर देना और मुझे टाइम पर लेने आ जाना।
नीलू उछलते कूदते चल पड़ी अपने क्लास की ओर और मै रुक कर देखने लगी।तो ये है पंखुड़ी। मैने सोचा। मै स्कूटी पर ही बैठी रही. अचानक मुझे डर लगने लगा. अनिमेष कि बातें याद आने लगी. उसके अपने अंदाज में उसने सोचते हुए कहा था. शायद अच्छी लगती है पता नही पर मै बात बढ़ाना नही चाहता इसीलिए मैने आजतक उससे बात तक नही की है. वो अनिमेष जिसे मै चाहती थी और सोचती थी की कभी ना कभी उसके भी दिल में मेरे लिए ऐसा ही कुछ जागेगा, किसी और के प्रति आकर्षित था और उसकी आँखें कहती थी की ये आकर्षण कुछ ज़्यादा ही है.
मै क्यों मिलना चाहती थी पंखुड़ी से ये तो मुझे नही पता था पर उसे देख कर ऐसा लग रहा था की मै अनिमेष को खो ही चुकी हूँ। कितनी स्वीट दिख रही थी वो. मैने स्कूटी के शीशे में खुद को देखा. आँख मे जलन के भाव थे और मुझे अपना चेहरा अच्छा नही लगा।
वो एक और लड़की के साथ थी और अब एक पेड़ के गोल चबूतरे पर आ के दोनो बैठ गयीं। मैने साहस बटोरा और उसकी तरफ बढ़ गयी।
-एक्सक्यूस मी ये थर्ड ईयर बॉटेनी की क्लास कहाँ होती है?
मैने सीधे उसी से पूछा वो जैसे किसी सोच में थी उसके साथ की लड़की ने एक तरफ इशारा किया मैने उस दिशा में देखा तक नही।
-आप किस क्लास की हैं?
-थर्ड ईयर बॉटेनी
फिर साथ वाली लड़की ही बोली मैं थोड़ा झिझकी
- ये अनिमेष आपके ही क्लास में है ना? वो चला गया क्या?
अनिमेष नाम सुनते ही जैसे उसके कान खड़े हो गये दोनो मुझे एकदम से देखने लगीं।
-आपको अनिमेष से मिलना है?
साथ वाली लड़की ही बोली
-हाँ वो मेरा पुराना क्लासमेट है मै यहाँ आई थी तो सोचा की उससे मिल लूँ।
दोनों अभी भी मुझे घूर सी रही थी लगभग पंखुड़ी की आँखे कह रही थी कि इसे अनिमेष से कुछ मतलब तो ज़रूर है मेरा डर एकदम से पुख़्ता हो गया।
तू तो गयी बेटा। ये लड़की ले जाएगी अनिमेष को तुझसे छीन कर।
दोनो ने एक दूसरे को देखा। पंखुड़ी अब कुछ असहज सी थी। साथ वाली लड़की ही बोली फिर से
-वो आज नही आया है। शायद कही गया है
-मतलब शहर मे नही है?
- शहर में होता है तो कॉलेज ज़रूर आता है पर वो कल भी नही आया था।
ये पंखुड़ी गूंगी है क्या
मैने मन में सोचा। अब और पूछने को कुछ नही था मै भी अधिक असहज हुई जा रही थी।
- अच्छा थॅंक्स मै चलती हूँ।
मैंने बेमन से कहा मै मुड़ने को ही हुई तो अचानक एक दूसरी आवाज़ सुनाई दी।
- आपके पास उसका नंबर होगा पूछ लीजिए शायद हो ही शहर में
-ओह तो आप बोलती भी हैं
मैने मन मे सोचा
- असल में बहुत दिनो से हम मिले नही हैं तो नंबर भी नही है कोई। अगर आप के पास हो तो। वो बुरा नही मानेगा असल मे खुश ही होगा हम बहुत पुराने दोस्त हैं।
दोनो फिर एकदुसरे को देखती रहीं
-प्लीज़ उसे मत बताइएगा कि हमने दिया है नंबर
पंखुड़ी झिझकते हुए बोली।
- आपने अपना नाम ही कहाँ बताया है जो मै उसे बता दूँगी कि आपने दिया है
मै मुस्कुराइ
- ओह मै पंखुड़ी और ये सोनाली
वो अपना बैग खोलते हुए बोली
- मतलब उसे बताना है कि नंबर पंखुड़ी और सोनाली ने दिया है
- ओह नही प्लीज़ मै तो आपको नाम बता रही थी उसे मत कहियेगा
उसका हाथ रुक गया और वो घबडा सी गयी
- ट्रस्ट मी वो बुरा नही मानेगा। लेकिन आप कह रहीं हैं तो मै उसे नही कहूँगी हाँ अगर आप लोग ही ना बता दें।
जिन लोगो ने कभी किसी को चाहा होगा वो जानते होंगे कि कब किसी का नाम सुनकर किसी के हाथ कापने लग जाते हैं कब और क्यों किसी के बारे में बात करने का मन भी करते है और बात हो भी नही पाती और कब किसी और के मूह से उसका नाम सुनकर और ये जान कर कि कोई और उसके बारे मे हमसे ज़्यादा जानता है दिल बेतहाशा धड़कने लगता है। मैने पंखुड़ी के सामने ही अनिमेष के घर फ़ोन किया मुझे पता था कि वो घर पर नही है पर पूछा और अपना संदेश छोड़ा। मुझे पता था कि अगर उसके मन मे अनिमेष के लिए कुछ होगा तो मुझे पता चल जाएगा। और पता चल गया। मै जान चुकी थी कि सिर्फ़ अनिमेष ही नही चाहता उसे बल्कि वो भी चाहती है अनिमेष को। मै उदास हो चली थी. मै जानती थी कि दोनो एक क्लास मे पढ़ते हैं और कभी ना कभी दोनो एक दूसरे कि फीलिंग्स जान ही जाएँगे और तब मै खो दूँगी अनिमेष को हमेशा के लिए. मै मनाती रही कि दोनो एक दूसरे से कुछ ना कह पाएँ. ये थर्ड ईयर है साल ख़त्म होते ही दोनो के लिंक्स टूट जाएँगे. काश!. मैने तय किया कि मै अनिमेष को अपनी रीडिंग नही बताने वाली. कहीं कोई अपना बुरा खुद करता है. क्या हुआ कि वो नही चाहता मुझे पर कल किसने देखा है.
कहते हैं कि कभी कभी आपकी ज़ुबान पर सरस्वती का वास होता है और आप जो भी कहते हैं सच हो जाता है. साल ख़त्म हो गया. दोनो एक दूसरे से कुछ नही कह पाए. और अलग हो गये. मै अक्सर अनिमेष से पंखुड़ी के बारे में पूछती रही और वो हंस के टालता रहा. पर जब आप किसी को सच्चे मन से चाहते हैं तो उसकी उदासी पढ़ सकते हैं. आज इतने दिनो बाद भी जब अनिमेष उसके बारे मे सुनकर हंस के टाल देता है तो मुझे अंदर से कुछ चुभता है कि मै दोनो कि फीलिंग्स जानती थी मै दोनो के लिए कुछ कर सकती थी पर मैने नही किया.मुझे सबसे बुरा तो तब लगा जब मैने ये पूरी बात अनिमेष को बताई. मै पढ़ सकती थी उसके मन में क्या है. पर उसने मुस्कुरा कर मुझे डांटा कि जबर्दस्ती मै आपने को दोषी क्यों मानती हूँ. वो मुझे समझना लगा कि वो खुद इस बात को वही पर रोकना चाहता था. कहते हैं कि सच्चा प्यार खुशी देता है स्वार्थी नही होता. जब स्वार्थ आ जाता है तो प्यार नही मिल पाता. सच मे नही मिला ना पंखुड़ी को ना अनिमेष को, खैर मुझे तो मिलना ही नही था

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