रविवार, 13 जून 2021

जितिन प्रसाद और उनकी राजनीति

जुलाई 2016 की बात है, हम शाहजहांपुर में थे। प्रशांत किशोर कांग्रेस के 2017 अभियान से जुड़ चुके थे ग़ुलाम नबी आज़ाद और राजबब्बर की अगुवाई में कांग्रेस की 27 साल यु पी बेहाल यात्रा निकल रही थी। हमारे एक परिचित, जो प्रशांत किशोर के संगठन में कार्यरत हैं , भी यात्रा के साथ शाहजहांपुर पहुंच रहे थे।
उनसे मिलने और यात्रा का रिस्पॉन्स देखने को हम भी शाहजहांपुर टाउनहॉल पहुंचे। उस समय देर रात ग़ुलाम नबी आज़ाद उपस्थित भीड़ को संबोधित कर रहे थे। इतनी रात के में भी गुलाम नबी आज़ाद ऊर्जा से भरे हुए थे।उनका छोटा सा संबोधन प्रभावशाली था और इतनी रात वहां उपस्थित भीड़ भी प्रभावशाली थी। राजबब्बर भीड़ में फंसे होने के कारण लोगों को संबोधित करने तक पहुंच नहीं पाए थे। आज़ाद के बगल में जितिन प्रसाद थे। जितिन उस माहौल से पूरी तरह निस्पृह नज़र आ रहे थे जैसे कि उन्हें ज़बरदस्ती साथ रखा गया हो। 
प्रशांत किशोर के लोग काली टीशर्ट और नीली जीन्स मेँ थे और अधिक से अधिक नेपथ्य में रहने की कोशिश कर रहे थे
"जितिन का प्रभाव है यहां "हमने अपने परिचित से कहा. अबतक काफिला होटल पहुंच चुका था और भीड़ राजबब्बर को घेरे हुए थी। हम थोड़ा भीड़ से अलग खड़े थे। 
इसमें जितिन के लोग कम ही हैं। हमारे परिचित ने बताया कि यात्रा प्रबंधन से अधिक परेशानी तो जितिन के प्रबंधन में हुई है। जितिन तो कार्यक्रम को असफल बनाना चाहते थे। उनका बस चलता तो यात्रा के यहां पहुंचने पर वे यहां होते ही न।
कांग्रेस की एक बड़ी समस्या ये जितिन से लोग हैं। इन्हें मैदान में और संघर्ष में उतरना पसंद नही है। अगर किसी मंच पर पहुंचते हैं तो इन्हें महत्वपूर्ण स्थान चाहिए। 
इसके बहुत पहले जिले के एक निष्ठावान कांग्रेसी ने भी ऐसा ही कुछ कहा था यद्यपि वह प्रसाद परिवार के घोर समर्थकों में से एक था।
प्रसाद भवन के और भी नज़दीकियों की बातों में उनकी परेशानी का संकेत था। वे जितेंद्र प्रसाद से कौशल वाले नही थे। चुनाव हारने और सत्ता से दूर रहने पर राजनीति उनकी समझ आए बाहर थी। वे सत्ता में रहकर तो कार्य कर सकते हैं पर विपक्ष में नही। जितिन ही नही ऐसे कई छोटे-बड़े जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय नेता संघर्ष से दूर रहते रहे हैं ये चाहते रहे हैं कि शीर्ष नेतृत्व चमत्कार करे , कार्यकर्ता मेहनत करें और ये फल खाएं।

जितिन को 2016-17 में ही कांग्रेस छोड़ देना था। देर की वजह शायद गंतव्य रहा हो। अगर बसपा में कुछ दम होता तो उनकी पहली पसंद बसपा होती, उनके पिता जितेंद्र प्रसाद के मायावती से अच्छे संबंध रहे थे और उनके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते कांग्रेस व बसपा का गठबंधन भी हुआ था। सपा का खुद 2017 में कांग्रेस से समझौता हो गया था और भाजपा अब तक शायद उन्हें लटकाये रखी हो। पिछले कुछ समय से गंतव्य न मिलने की छटपटाहट उनमे साफ नज़र आ रही थी। 2019 के लोकसभा चुनावों में काफी हद तक आगे बढ़ने के बाद कुछ ठोस न मिल पाने की वजह से उन्हें कदम वापस खींचने पड़े थे। उसके बाद उन्होंने जातिवादी राजनीति को केंद्र बनाते हुए खुद को लाइमलाइट में लाने की कवायद शुरू की उनकी इस नई राजनीति में जातिवाद के अलावा और कोई विचारधारा नही होगी यह उन्होंने विजय मिश्रा वाले बयान से ज़ाहिर कर दिया। बाद में लेटर राजनीति में शामिल होने के पीछे उनकी यही मंशा थी कि और राजनैतिक दल खासकर भाजपा उन्हें विद्रोही माने।

जितिन को अभी तक कांग्रेस में जो मिलता रहा है वह उनके राजनैतिक कौशल से युक्त पिता की विरासत के कारण ही रहा है। जिले की राजनीति में तो भाजपा ही नही अन्य सभी दलों को भी जोड़ लें तो आज की तारीख में सबसे कद्दावर नेता प्रदेश के संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ही हैं। जितिन को भाजपा में उनके नेतृत्व में कार्य करना होगा। सुरेश खन्ना को तो इतनी बार लगातार विधायक बनने के बाद भी शाहजहांपुर में पैदल घूमते देखा जा सकता है। क्या जितिन ऐसा कर पाएंगे या फिर भाजपा उन्हें सुरेश खन्ना के अधिक महत्वपूर्ण स्थान देगी। यह देखने वाली बात होगी कि भाजपा में जितिन प्रसाद  अपनी सामंती सोच से बाहर निकल पाते हैं या नही क्योंकि उनकी दो सबसे बड़ी योग्यताओं में से पहली , जितेंद्र प्रसाद का पुत्र होना तो अब उनके किसी काम की रही नही (यद्यपि शाही खानदान के होने के चलते बड़े संबंध तो हमेशा उपयोगी रहते हैं) और दूसरी राहुल गांधी का नज़दीकी होने के चलते हो सकता है कि शुरुआत में भाजपा उन्हें कुछ महत्व दे दे, जैसा कि अभी दिया है, पर बाद में भाजपाई बन के तो उन्हें दिखाना ही होगा।
वैसे एक मज़े की बात यह है कि कांग्रेस में अपने आखिरी असाइनमेंट में जितिन ने कांग्रेस को बंगाल के न्यूनतम स्तर पर पहुंचाते हुए परफेक्ट शून्य पाने में मदद की। कांग्रेस के इस प्रदर्शन की लाभार्थी जितिन की नई पार्टी भाजपा रही जिसने नई बंगाल विधानसभा में कांग्रेस की जगह ली है।
हम यह नही कहते कि जितिन इतने प्रभावशाली रहे होंगे कि काँग्रेस को हानि और भाजपा को लाभ दे पाते मगर सोचिये अगर ऐसा होता तो! कोई इतने दिन से पार्टी में आने का इच्छुक हो उसके सामने शर्त लगा दी जाए कि पहले वफादारी साबित करो। ये है टॉस्क!

रविवार, 14 मार्च 2021

क्यूबिकल के नए मरीज

 

हमारे क्युबिकल में उनकी एंट्री शाम के लगभग 7 बजे हुयी। एसजीपीजीआई लखनऊ के राजधानी कोरोना हॉस्पिटल में हमारे क्युबिकल के छह बेड्स पर अब सिर्फ तीन मरीज थे। क्युबिकल थोड़ा खाली खाली लगता है तो अच्छा लगता है कि मरीज कम हो रहे हैं और हमारे भी जल्दी ही ठीक होकर जाने की संभावना बेहतर है। दोपहर के तीन-चार बजे जब पता चला कि वार्ड में  कुछ नए मरीज आने वाले हैं तो हम मना रहे थे कि नए मरीज किसी और क्युबिकल में जाएँ। वार्ड में  आने वाले कुछ मरीज किसी और क्युबिकल में गए भी पर आखिरकार शाम के सात  बजे आने वाले दो नए मरीज हमारे क्युबिकल में ही आए।

वे माँ-बेटे थे । पता चला कि वे वाराणसी से एंबुलेंस से आए हैं और इसी वजह से उन्हे आने में लेट हुई। वाराणसी में बीएचयू जैसा उत्कृष्ट संस्थान होने के बाद भी उनका एंबुलेंस से इतनी दूर लखनऊ आना हमे समझ में नही आ रहा  था। उन्हे सैटेल होने में समय लग रहा था । इसी समय पता चला कि दरअसल वे कुल तीन लोग थे -माँ-बाप और बेटा । पिता की स्थिति क्रिटिकल थी इसलिए उन्हे आईसीयू में रखा गया था। माँ – बेटे की स्थिति थोड़ा बेहतर थी इसलिए वे हमारे वार्ड में आए। पीजीआई में उनका परिचय था इसलिए उन्हे उम्मीद थी कि तीनों जन साथ में रहेंगे और इस तरह पिता का बेहतर ख्याल रखा जा सकेगा परंतु कोरोना की गंभीरता को देखते हुये डॉक्टर्स इस तरह की कोई सुविधा देने में असमर्थ थे।

क्युबिकल में हम सीनियर थे तो उन्हे हॉस्पिटल के तौर तरीकों की जानकारी देना हमारी भी जिम्मेदारी थी। एक दूसरे का सहयोग ही कोरोना वार्ड में सहारा होता है क्योंकि आपके परिजन तो आपसे मिलने आ नही सकते। नए मरीजों के जानने के लिए कई चीजें होती हैं; मसलन पीने के लिए गुनगुना पानी कहाँ से और कैसे मिलेगा, ओढ़ने के लिए एक और कंबल मांग लेना बेहतर रहेगा, भाप लेने के लिए कप में बोतल का पानी नही नल का पानी डालना होता है और रात का खाना आ चुका है इसलिए उन्हे हॉस्पिटल में पता करना पड़ेगा कि एक्स्ट्रा खाना है या फिर बाहर अपने परिजनों को फोन करके उनसे खाना भिजवाने के लिए कहना है।

उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि आईसीयू में अकेले पड़ गए उनके पिता के पास आवश्यक चीजें पहुँच पा रहीं हैं या नही। वे घर से अपने समान के बैग इस उम्मीद में लाये थे कि सभी साथ रहेंगे पर अब पिता के अलग रहने की स्थिति में उनका सामान एक बैग में करके भिजवाया तो वह मिसप्लेस हो गया। लगातार फोन करते रहने से संतुष्ट न होने पर बेटा वार्ड से निकल कर आईसीयू चला गया। कोरोना हॉस्पिटल  में इस तरह का मूवमेंट प्रतिबंधित है। बाहर से आया कोई सामान  वार्ड के गेट पर ट्रांसपोर्ट (सामान या मरीजों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए नियत हॉस्पिटल स्टाफ ) छोड़ जाता था जिसे वार्ड का स्टाफ अलग अलग क्युबिकल में मरीजों के पास पहुंचाता था। इसी तरह मरीजों को विभिन्न जांच इत्यादि के लिए ट्रांसपोर्ट वार्ड के गेट से ले जाता था और वापस वार्ड के गेट तक छोड़ जाता था। वार्ड से कोई भी सामान बाहर नही भेजा जा सकता था। बेटे के आईसीयू वार्ड चले जाने से एक असामान्य स्थिति उत्पन्न हो गई ।

उधर आईसीयू वार्ड में अकेले पड़े उनके पिता भी अत्यंत परेशानी महसूस कर रहे थे । वृद्धावस्था में व्यक्ति समान्यतः अपने परिजनों पर निर्भर हो जाता है । यद्यपि बातचीत से पता चला कि उनके पिता इतने अशक्त नही थे कि आईसीयू स्टाफ से सहयोग न मांग सकें परंतु कई वर्षों से चली आ रही परिजनों पर उनकी निर्भरता उन्हे हॉस्पिटल स्टाफ पर भरोसा करने या उनसे सहयोग मांगने से रोक रही थी। इधर माँ-बेटा और उधर पिता परेशान और हॉस्पिटल के बाहर उनके परिजन परेशान।

राजधानी कोरोना हॉस्पिटल पिछले कई महीनों से कोरोना प्रोटोकाल्स के तहत कार्य कर रहा था और इस तरह की स्थितियों से निपटने में वे समझ का परिचय दे रहे थे। पिता की कई राउंड की काउंसलिंग के बाद अंततः हॉस्पिटल के इंचार्ज ने उन्हे और हमारे क्युबिकल में आकर माँ-बेटे को समझाया। इंचार्ज के सहानुभूति भरे स्वर ने पिछली रात से चली आ रही उनकी शिकायत पर मरहम का कार्य किया। अब तक मिस्प्लेस्ड सामान भी मिल चुका था। इस तरह से वे माँ-बेटे अब सामान्य हो चुके थे। पिता से फोन पर हो रही उनकी बात से समझ आ रहा था कि अब वे भी नई परिस्थियों के अनुरूप स्वयं को ढाल रहे हैं।

उनके परिवार में कुल छह लोग थे। माँ-बाप, बेटा और उसकी पत्नी और उनके दो आठ और दस वर्षीय बच्चे। पिछले माह उनके किसी परिजन के घर में विवाह था और कुछ मेहमान उनके घर भी रुके थे। सारी सावधानी के बाद भी कोरोना ने उनके घर दस्तक दे ही दी। माँ-बाप की अधिक उम्र और मोहल्ले में कोरोना संक्रमित होने की बात फैलने  के डर ने उन्हे वाराणसी से दूर लखनऊ आने के लिए मजबूर किया। बेटे की पत्नी का कोरोना टेस्ट नही करवाया गया। पति टेस्ट करवा कर पॉज़िटिव होकर माँ-बाप के साथ था, पत्नी की भी रिपोर्ट पॉज़िटिव होती तो बच्चों को कौन संभालता ! अब स्थिति यह थी कि पत्नी और बच्चे घर पर बंद हैं। जिस परिजन के घर विवाह था उनका पूरा परिवार पॉज़िटिव हो गया था । कोरोना संक्रमित होने के बाद एक बड़ी ज़िम्मेदारी मोहल्ले में बात छुपाने की भी होती है अन्यथा घर में बंद होकर रहने में भी जीना मुश्किल हो जाता है।

अगले दिन राउंड पर आए डॉक्टर्स ने माँ-बेटे को बताया कि पिता की स्थिति पहले से बेहतर है और आश्वासन दिया कि एंटी वायरल का कोर्स पूरा होने तक कोई कांप्लीकेशन नही होती है तो उन्हे भी इस वार्ड में शिफ्ट किया जा सकता है। माँ-बेटे अपने परिजनों से बात करते हुये हॉस्पिटल स्टाफ और सुविधाओं की प्रशंसा कर रहे थे , यद्यपि पहली रात वे अत्यंत असंतुष्ट एवं नाराज थे

कोरोना बीमारी एक अभूतपूर्व स्थिति है । अभूतपूर्व इसलिए कि हॉस्पिटल के बाहर बैठे मरीज के परिजन उससे नही मिल सकते हैं। ऐसे में हॉस्पिटल स्टाफ का रोल अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। संभव है कि शुरुआत में कोरोना के बारे में जानकारी के अभाव ने सरकारी मेडिकल और पैरा-मेडिकल स्टाफ में डर फैलाया रहा हो पर मेरे अपने अनुभव यह कहते हैं कि इस बीमारी के खिलाफ लड़ाई में सरकारी मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ ने अभूतपूर्व कार्य किया। हमें याद है कि जुलाई  माह में एक आवश्यकता (कोरोना से इतर मामले में) पड़ने पर एक बेहद लोकप्रिय  निजी चिकित्सक ने फोन पर भी बात करने से यह कह कर मना कर दिया कि “मान लीजिये अभी मै डॉ हूँ ही नही।” वहीं जिला अस्पताल में कार्यरत एक चिकित्सक ने स्वयं रुचि लेकर सहयोग दिया जबकि उस समय वे स्वयं कोरोना संक्रमित होकर घर पड़े हुये थे। राजधानी कोरोना हॉस्पिटल लखनऊ के मेरे अनुभवों ने मेरी इस सोच को और मजबूत किया कि हमें सार्वजनिक  स्वास्थ्य व्यवस्था को और सुदृढ़ और समृद्ध करने की आवश्यकता है और स्वास्थ्य व्यवस्था हर हालत में सरकार के हाथ में रहनी चाहिए। जन स्वास्थ्य को लाभप्रदता के भंवरजाल से दूर रखा ही जाना चाहिए।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

वह अनाम व्यक्ति!



वह व्यक्ति अनाम ही रहा। एक मुख़्तसर सी मुलाक़ात में नाम जानने का समय ही नही मिला। कभी -कभी नाम जानना इतना जरूरी भी नही होता है।
SGPGI लखनऊ के राजधानी कोरोना हॉस्पिटल में ऐडमिट होने के बाद सबसे अधिक नज़र आने वाला व्यक्ति वही था। PPE किट में लिपटे हॉस्पिटल के स्टाफ की कोई इंडिविजुअल पहचान तो होती ही नही। किट पर ही लिखा, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ , पेशेंट हेल्पर और अटैंडेंट देखकर बस इतना पता चल पाता है कि ये हॉस्पिटल का स्टाफ है। मरीज़ की पहचान साफ होती है । सामान्य डील-डौल वाला वह व्यक्ति कुर्ता-पायजामा और बिना बांह का स्वेटर पहने लगातार पूरे वार्ड में चहलकदमी करता नज़र आ रहा था। ऐडमिट होते समय डॉ वार्ड में ही टहलते रहने को कहते भी हैं। कोरोना संक्रमित व्यक्ति की दुनिया तो वार्ड के गेट के अंदर तक ही होती है।
ऐडमिट होने के बाद की तमाम प्रक्रियाएं पूरी करते हुए हम उसे टहलते हुए देखते रहे। 
उसका टहलना देर रात तक जारी रहा। हॉस्पिटल पहुंचने के बाद पहला दिन तो हॉस्पिटल पहुंचने के शॉक में ही ख़त्म हो जाता है। जितनी जल्दी आप शॉक से उबर कर हॉस्पिटल की रूटीन से खुद को सिंक्रोनाइज कर लेते हैं उतना ही अच्छा है।
हॉस्पिटल में सुबह जल्दी होती है।और जगहों का नही पता पर यहां सुबह साढ़े पांच बजे ही हॉस्पिटल स्टॉफ विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी पैरामीटर्स की रिकार्डिंग शुरू कर देता है तो मज़बूरन आपको जागना ही पड़ता है। वैसे तो इस वार्ड में कुल छह क्युबिकल्स में 36 बेड हैं, ऐडमिट होते समय वार्ड में 15 मरीज़ थे। जब 15 पेशेंट्स एक वार्ड में हैं तो टॉयलेट्स लगातार स्वच्छ रह पाना बहुत कठिन होता है। टॉयलेट्स में वही टहलते रहने वाले सज्जन वाश बेसिन के शीशे साफ करते नज़र आये।
"साफ-सफ़ाई रखना मेरी आदत है। घर रहने पर भी सफाई मैं खुद ही करता हूँ। टॉयलेट्स की रेगुलर सफाई बहुत जरूरी होती है। यहां हूँ तो यहां की सफाई करता रह रहा हूँ। "
उन्होंने खुद ही बताया। 
उन्होंने शीशा चमकाने के बाद वाश बेसिन साफ करना शुरू कर दिया।
-पानी की केतली खाली कर के उसमें नया पानी भर लो फिर गरम करो।
हम गरम पानी लेने पहुंचे फिर वे वहां टहलते हुए मिले। 
-एक बार में ज्यादा पानी मत लो ज़रूरत पड़ने पर फिर आके ले लेना।
पानी गर्म होने तक उनसे बात करना हुआ। बात इकतरफा ही थी वही बोल रहे थे, हम सुन रहे थे। 
- दस दिन हो गए हमें यहाँ। डायबिटीज है, ब्लड प्रेशर है और पता नही क्या-क्या है। 69 साल उम्र है। मार्च से बचा रहा हूँ कि इस बीमारी से बचा रहूँ क्योंकि लग रहा था कि अगर मुझे हुई तो फिर ज़िंदा नही बचूंगा।
-जब पॉजिटिव हुआ तो अस्पताल आने का मन नही था लेकिन सब ने कहा कि यही बेहतर है। यहां आ कर लगा कि अच्छा किया कि आ गया। बेहतर ट्रीटमेंट मिल गया। अब देखिए कल सैंपल गया था बस थोड़ी देर में रिपोर्ट आने वाली है नेगटिव हो गए तो फिर शाम तक घर चला जाऊंगा। 
ये अंतिम बार था जब वे नज़र आये।
लंच वितरित हो ही रहा था कि लोगों के कदमों की आवाजें बढ़ गयी। PPE किट पहने हॉस्पिटल स्टाफ के चलने की आवाज अलग ही होती है।
बाहर जा कर देखा तो पता चला कि बगल वाले क्यूबिकल में एक पेशेंट सीरियस हो गया था। पूरे वार्ड का स्टाफ क्यूबिकल में उसके बेड के पास इकट्ठा था। कोई लगातार सीपीआर दे रहा था। वार्ड का स्टाफ तेज तेज बातें करते हुए उस मरीज़ को बचाने की कोशिश कर रहा था।
हमारे क्यूबिकल में उस समय कम मरीज़ थे।
- पता नही क्या हो गया बैठे-बैठे। बस खाना खाने की तैयारी कर रहे थे अचानक पीछे की ओर गिर गए
उस पेशेंट के बगल के बेड का पेशेंट हमारे क्यूबिकल में आ गया। उसने बताया
- शायद अटैक पड़ा होगा। 
-कितनी उम्र होगी
मैंने पूछा
-सत्तर के होने वाले थे। बताते थे। वैसे तो फिट थे दिन भर टहलते रहते थे। सुबह से उठ कर टॉयलेट्स की सफाई करते रहते थे।
हम हैरान रह गए।
-वही जो कुर्ता-पायजामा में घूमते रहते थे।
मन अजीब सा हो उठा। ऐसे कैसे हो सकता है। बिल्कुल चलता फिरता आदमी। 
स्वस्थ-प्रसन्न!
कोई एक घण्टे तक पूरा वार्ड स्टाफ उसे बचाने की कोशिश में जुटा रहा। फिर उसे ICU में भेज दिया गया।
हम सोच रहे थे कि कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट क्या आयी होगी। कोलैप्स करने के पहले उसे पता चला होगा कि नही।
अगले दिन पता चला कि वे नही रहे।
रिपोर्ट फिर से पॉजिटिव ही आयी थी।

रविवार, 20 दिसंबर 2020

कोरोना में मुस्कान!



उस बच्ची का नाम मुस्कान है पर चेहरे पर बस उदासी या आंसू नज़र आते हैं। हॉस्पिटल के रिकार्ड में 15 साल उम्र है पर दिखने में और छोटी लगती है।
पिछले कुछ दिनों से कोरोना से संक्रमित होने के कारण हम SJPGI के राजधानी कोरोना हॉस्पिटल में कोविड वार्ड में ऐडमिट हैं। हमारे क्यूबिकल में वह पांचवीं मरीज है। उसके ऐडमिट होने के बाद डॉक्टरों के राउंड में उनकी आपसी बातचीत में पता चला कि उसका दो वर्षों से SGPGI, लखनऊ से इलाज़ चल रहा है। केस हिस्ट्री में डायबिटीज  शामिल है, नियमित इन्सुलिन लगता है तथा डॉक्टरों की आपसी बातचीत में पता चला कि उन्हें लगता है कि उसे कुछ मानसिक समस्या भी है। 
एक 15 साल से कम उम्र की बच्ची  अगर अपने घर वालों से अलग हॉस्पिटल में अकेली बीमार  पड़ी है तो उसे मानसिक समस्या नही होगी तो क्या होगा।
मुस्कान विपन्न परिवार से है और महोबा की रहने वाली है। घर में दादी का पैर टूटा हुआ है कोई दिखाने वाला वहां नही है। उसके पिता किसी से कर्ज लेकर उसके नियमित इलाज़ के कंसल्टेशन के लिए दिखाने आये थे, यहां वह जांच में कोरोना पॉजिटिव निकल आयी तो हॉस्पिटल में अकेले डाल दी गयी। 
बताती है कि महोबा में 3 बार चेकअप हुआ हर बार निगेटिव आयी यहां टेस्ट हुआ तो पॉजिटिव हो गयी। उसे कोविड के सिम्टम्स तो नही हैं पर लगता है उसकी सीवियर मेडिकल हिस्ट्री के चलते  उसे कोरोना हॉस्पिटल में डाल दिया गया अब  निगेटिव होने के बाद ही अपने परिवार वालों से बात कर पायेगी या मिल पाएगी।
मुस्कान की हालत सोचिये! ऐसी निर्मम बीमारी जो सबसे पहले आपको आपके परिवार से, अपनो से अलग कर देती है। सोचिये कि अपने घर से कोसों दूर   बिल्कुल अज़नबियों के बीच बीमार पड़ी एक बच्ची ! ऐसी स्थिति जिसमें अपनों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, कोई भी व्यक्ति अकेला होगा तो परेशान ही होगा वो तो बस छोटी सी बच्ची है। इसलिए जब वह अचानक फूट फूट कर रोना शुरू करती है तो समझ में नही आता कि क्या कहें।
आज उसके लिए बाहर से कुछ सामान आया। सामान खोल कर देखा तो पिंक कलर की नई चप्पलें थीं। जिन चप्पलों को देखकर सामान्य परिस्थितियों में  वह प्रफुल्लित हो उठती, फूट-फूट कर रोने लगी।
क्या कहें!
(यह पोस्ट कोरोना वार्ड से लिखी गई है)

रविवार, 31 मई 2020

गुमनाम सी मंत्रिपरिषद!


संतोष गंगवार जी बरेली से 2009 को छोड़कर 1989 से लगातार सांसद चुने जा रहे हैं। वे अटल सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कद्दावर भाजपा नेताओं में गिने जाते हैं। हमें हमेशा लगता रहा है कि वर्तमान सरकार में स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री का पद उनके कद और अनुभव के लिहाज़ से कम है। वैसे अन्य तमाम मंत्रियों की तरह वे भी थोड़ा गुमनाम से हो चले हैं तो देश को ये जानकारी न होना कि वे आजकल कौन सा मंत्रालय देख रहे हैं, मंत्री हैं भी या नही या फिर श्रम मंत्री कौन है आश्चर्यजनक नही है।
 भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया राजनैतिक कद, उम्र और अनुभव हर लिहाज से संतोष गंगवार से कमतर ही हैं। गौरव भाटिया और संतोष गंगवार एक ही राज्य से आते हैं
सत्ताधारी दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता को देश के श्रम मंत्री का नाम मालूम न होना यह बताता है कि देश में संवैधानिक संस्थाओं का कितना क्षरण हो चुका है। 
यह क्षरण अचानक नही हुआ है जो लोग देखना चाहते हैं और देखने के बाद समझना भी चाहते हैं और अंत में समझने के बाद स्वीकार करने का साहस रखते हैं उन्हें यह क्षरण लगातार नज़र आ रहा है।

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

पेरिस में सुबह


पेरिस में उतरने पर पता चला कि बारिश हो रही है। जब लखनऊ से निकले थे तब भी बारिश हो रही थी। अपनी ही एक पुरानी बात याद आ गयी

सफर में बादलों की छांव साथ रहती हैं।

नदियों के वारिस हैं हम, बारिशें साथ रहती हैं।।


एयरपोर्ट से निकलने पर सड़कें धुली धुली सी नज़र आ रही थीं । सड़क के एक तरफ बुझा बुझा से चाँद दिख रहा था और दूसरी तरफ अलसाया सा सूरज जैसे सोच रहा हो कि अभी चाँद गया नही आऊं कि नही। दोनों में एक तरह से शांतिपूर्ण सहअस्तित्व सा नज़र आ रहा था जैसे सूरज बोल रहा हो कि भाई तू अपना टाइम ले ले मैं वेट कर लूंगा। 
सड़के खाली सी दिख रही थीं।
 टूर ऑपरेटर ने बताया कि पेरिस में पेंशन को लेकर हड़ताल चल रही है। 
पेंशन को लेकर हड़ताल सुनते ही सभी के चेहरे पे खुशी की लहर सी आ गयी लेकिन ये बस लहर ही थी जैसे आयी वैसे ही चली गयी। हम भारतीयों के पास रोज़गार, सेवा शर्तों, पेंशन जैसे मुद्दों के लिए टाइम कहाँ । हम लोग तो सदियों के झगड़ों के हिसाब चुकता करने में लगे हैं।
हड़तालें नागरिकों का सरकार के खिलाफ हथियार होती हैं। वैसे सरकारें भी हड़ताल करती हैं लेकिन उसे वे लोग कर्फ्यू कहते हैं। आवाजाही और संचार को ठप्प कर दिया वो कुछ जो सरकार के हाथ में है।
टूर ऑपरेटर के प्रतिनिधि का नाम किरन है। उसने आग्रह  के साथ बताया कि साथ में Mr लगाना है। तबतक लोगों ने किरन को कहीं और जोड़ते हुए उसे शाहरुख खान कहना शुरू कर दिया। अगर हमने किसी का नाम बिगाड़ दिया तो उसका नाम ठीक से याद हो जाएगा।
अब तक सूरज ने अपनी "किरन" बिखेरनी शुरू कर दी थी।
दिन चमक उठा था।
रातभर बारिश से धोकर,
सुबह सूरज से पोंछ दिया
दिन नए शीशे सा चमक रहा था।
हम होटल के सामने उतरे तो ख़ुश्की लिए तेज ठंडी हवाओं ने हमारा स्वागत किया।


सोमवार, 1 अप्रैल 2019

आम चुनावों में वोट दें वोटर लिस्ट में अपना नाम डलवाएं

2019 के आम चुनावों की उद्घोषणा हो चुकी है और अलग अलग दल अपनी उम्मीदवारी जता रहे हैं. इन चुनावों में वोट दे कर अपना भविष्य तय करने की जिम्मेवारी आपकी है. कई बार लोग मतदाता सूची में अपना नाम समय की कमी से या किन्ही अन्य कारणों से नहीं डलवा पाते और मतदान से वंचित रहते हैं. चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नाम डलवाने की प्रक्रिया ऑनलाइन कर राखी है जो बहुत ही सुगम है और आप मिनटों में स्वयं को मतदाता के रूप में रजिस्टर करवा सकते हैं.
इसके लिए आपको राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल या NVSP की वेबसाइट पर जाना होगा जिसके लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं  आप किसी भी सर्च इंजन पर NVSP सर्च करके भी इस वेबसाइट पर जा सकते हैं.
इस वेबसाइट पर आपको निम्न सेवाएं उपलब्ध हैं

  1. मतदाता के रूप में रजिस्ट्रेशन या एक चुनाव क्षेत्र से दूसरे चुनाव क्षेत्र में स्थानांतरण 
  2. अनिवासी मतदाता के रूप में पंजीकरण 
  3. निर्वाचक नामावली में नाम सम्मिलित किए जाने या निर्वाचक नामावली से नाम हटाए जाने पर आपत्ति के लिए आवेदन
  4. निर्वाचक नामावली में प्रविष्टि विशिष्टियों की शुद्धि के लिए आवेदन
  5. निर्वाचक नामावली में प्रविष्‍टि को अन्‍यत्र रखने के लिए आवेदन (एक निर्वाचन क्षेत्र में निवास स्‍थान को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर स्‍थानांतरित करने के मामले में)
  6. नया वोटर आई कार्ड (EPIC ) इशू करवाने हेतु आवेदन एवं 
  7. अपने आवेदन की स्थिति 

मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आपको ऊपर दिए लिंक पर जाना होगा पंजीकरण शुरू करने से पूर्व अपने पास निम्न डाक्यूमेंट तैयार रखें 
  1. अपनी फोटो सॉफ्ट कॉपी में 
  2. यदि पहली बार पंजीकरण करवा रहे हैं तो आयु सम्बन्धी घोषणा हस्ताक्षर करके सॉफ्ट कॉपी में।  यह उद्घोषणा आपको पंजीकरण के पेज पर ही डाउनलोड के लिए उपलब्ध रहेगी. इस उद्घोषणा की आवश्यकता तब होती है जब आपकी आयु 21 वर्ष से अधिक हो. 
  3. आयु प्रमाण पत्र  जैसे कि PAN Card , आधार कार्ड , जन्म प्रमाणपत्र, अंकपत्र , पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस 
  4. पते का प्रमाणपत्र जैसे कि पासपोर्ट , ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड , टेलीफोन बिल, बिजली का बिल किसान बही, बैंक या पोस्टऑफिस की पासबुक, पानी का बिल , गैस का बिल , राशन कार्ड , आपके पते पर डाक विभाग के द्वारा प्राप्त कोई पत्र , टैक्स असेस्मेंट आर्डर, किरायानामा इत्यादि की सॉफ्ट कॉपी
ध्यान रखें मतदाता रजिस्ट्रेशन आपके क्षेत्र में चुनाव हेतु नामांकन के दस दिन पूर्व तक किया जा सकता है. 

hamarivani

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