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सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

बात मानसिकताओं से आगे की


तो दो खतरनाक लोग जिन्हें हम "बिरयानी " खिला रहे थे अंततः अपने अंजाम तक पहुँच गए . नौ फ़रवरी को अफजल गुरु को फांसी पर लटकाए जाने के बाद राजनैतिक तौर पर जो कुछ भी हो मीडिया चीख चीख कर  तो  सकता है कि आतंक के खिलाफ लड़ाई में हम अब साफ्ट नहीं हैं .
राष्ट्रवाद का उफान !
हमें कुछ नहीं कहना है अफजल गुरु की फांसी पर .
 हो सकता है यह शुद्ध रूप से प्रशासनिक फैसला हो या हो सकता है यह एक राजनैतिक चाल हो विपक्ष के हमले को कुंद करने को . या हो सकता है कुछ ख़ास चीजों से ध्यान हटाने का मामला हो .
 सर्वोच्च न्यायालय का फैसला था उसका अनुपालन होना ही था आज नहीं तो कल ! भले ही फैसले में   माननीय न्यायाधीश महोदय "जन भावनाओं को तुष्ट करने " जैसी बात जोड़ देते हैं यह फैसला तो था ही।
फैसले का अनुपालन होना चाहिए और शीघ्र होना चाहिए
उम्मीद है कि सरकार कश्मीर घाटी में स्थितियों को संभालने में सफल  रहेगी
पर पिछले दो दिनों से टी वी , सोशल मीडिया (स्वयंभू  ) और   इंटरनेट पर देशभक्ति , न्याय , आतंक के खिलाफ जंग और शान्ति की बाते सुनते हुए कई बाते दिमाग में आती रहीं
१.  कश्मीरियत की बात करने वाले लोग जम्मू और दिल्ली के कैम्पों में जिंदगी बसर कर रहे अपने भाइयों के बारे में में कश्मीरी हो के क्यों नहीं सोच पाते . क्या कश्मीरियत उसी में मानी जायेगी जिसने बन्दूक उठा ली . पी ओ के और घाटी से भाग कर आये परिवारों के बारे में कश्मीरियों का दिल कब जागेगा .
२ कैम्पों में रह रहे उन लोगों की जिम्मेदारी प्रदेश और केंद्र सरकारों पर भी आती है . क्या वे लोग भारत के नागरिक नहीं हैं ? कश्मीर समस्या पर बात में कभी उन्हें भी शामिल किया जाएगा ?
३  बेअंत सिंह और राजीव के हत्यारों की सजाओं  पर भी फैसला शीघ्र होना चाहिए . जब हम कश्मीर के हालात में ऐसा फैसला ले सकते हैं तो पंजाब और तमिलनाडु अपवाद क्यों बने
४. न्याय शान्ति की पूर्व शर्त होती है . और क्षेत्रवादी , साम्प्रदायिक आदि दंगों की हिंसा भी आतंकवाद है .और ये आतंकवादी चाहे वो दिल्ली के हों गुजरात के हों असम के हों महाराष्ट्र के हों उनके खिलाफ सख्त कार्यवाहियों की शुरुआत करनी चाहिए . चुनाव जीतने से हर अपराधी स्वीकार्य नहीं हो जाता चाहे वो सज्जन कुमार हों या मोदी
मानसिकताओं से आगे निकलना बहुत ही जरुरी है 

रविवार, 11 सितंबर 2011

ग्यारह सितम्बर : सभ्यताओं के संवाद का दिन

२००१ से पहले आप ग्यारह  सितम्बर  को  कैसे  याद करते थे ? निःसंदेह २००१ के ग्यारह सितम्बर के बाद कुछ भी पहले सा नहीं रह पाया पर उससे पहले ग्यारह सितम्बर सभ्यताओं के संघर्ष की जगह सभ्यताओं  के संवाद का दिन था . 

अट्ठारह साल पहले जब हम स्कूल में थे , हमारे स्कूल में स्वामी विवेकानंद के ग्यारह सितम्बर अट्ठारह सौ तिरानबे में शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में दिए गए भाषण की सौवीं वर्षगाँठ मनाई जा  रही थी और इस उपलक्ष्य में होने वाले समारोह में हमें  स्वामी विवेकानद का किरदार निभाना था. उम्र कम थी पर पता था की यह कुछ ख़ास है और हम उस समय जो कुछ भी मिला पढ़ते चले गए . स्वामी विवेकानंद को पढने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि हमें हिन्दू धर्म की एक बेहतर समझ आ गयी . जिसे बाद में तमाम धर्म ग्रंथों ने भी अपने योगदान से बेहतर बनाया .

स्वामी विवेकानंद का मंत्रमुग्ध कर देने वाला शिकागो भाषण कुछ इस प्रकार था ;

अमेरिका की बहनों और भाइयो!
आपने हमारा जैसा हार्दिक और स्नेहपूर्ण स्वागत किया है, उसके लिए आभार व्यक्त करने के लिए जब मैं यहां खड़ा हुआ हूं तो मेरा मन एक अकथनीय आनंद से भरा हुआ है.मैं विश्व की सबसे प्राचीन संन्यासियों की पंरपरा की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं; मैं आपको धर्मो की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूं और मैं सभी वर्गो एवं पंथों के करोड़ों हिंदुओं की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं.
इस मंच पर आए उन कुछ वक्ताओं को भी मेरा धन्यवाद, जिन्होंने पूर्व से आए प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए आपको बताया कि दूर देशों से आए हुए ये सज्जन विभिन्न देशों में सहिष्णुता का संदेश पहुंचाने के सम्मान के अधिकारी हो सकते हैं.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने विश्व को सहिष्णुता औ सार्वभौमिक स्वीकार्यता का पाठ पढ़ाया. हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मो की सत्यता को स्वीकार करते हैं.मुझे उसे देश से संबंधित होने में भी गर्व है, जिसने इस प्थ्वी के सभी धर्मो व सभी देशों के सताए हुए लोगों और शरणार्थियों को शरण दी है.
मुझे आपको यह बताने में गर्व है कि हमने उन पवित्र इजराइलियों को अपने कलेजे से लगाया है, जिन्होंने ठीक उसी वर्ष दक्षिण भारत में आकर शरण ली, जब रोमन अत्याचारियों ने उनके पवित्र मंदिर को ध्वस्त कर दिया था.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने महान जोरोस्ट्रियन राष्ट्र के विस्थापितों को शरण दी है और अब भी उनके विकास में सहयोग दे रहे हैं.
भाइयों, मैं आपके सामने उस भजन की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत करूंगा, जिसको मैं अपने बचपन से दोहराता आया हूं और जिसे करोड़ों लोग प्रतिदिन दोहराते हैं -
'जैसे विभिन्न स्रोतों से उद्भूत विभिन्न धाराएं
अपना जल सागर में विलीन कर देती हैं,
वैसे ही हे ईश्वर! विभिन्न प्रवृत्तियों के चलते
जो भिन्न मार्ग मनुष्य अपनाते हैं, वे
भिन्न प्रतीत होने पर भी
सीधे या अन्यथा, तुझ तक ही जाते हैं.'
वर्तमान सम्मेलन, जो अब तक हुई सबसे महान सभाओं में से एक है, स्वयं 'गीत' में बताए उस अद्भुत सिद्धांत का पुष्टीकरण और विश्व के लिए एक घोषणा है -
'जो कोई, किसी भी स्वरूप में
मेरे पास आता है, मुझे पाता है;
सभी मनुष्य उन मार्गो पर
संघर्षरत हैं, जो अंत में उन्हें मुझे तक ही ले आते हैं.'
सांप्रदायिकता कट्टरता और उन्हीं की भयानक उपज धर्माधता ने बहुत समय से इस सुंदर पृथ्वी को ग्रस रखा है. उन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी ही बार उसे मानव रक्त से सराबोर कर दिया है, सभ्यता को नष्ट किया है और समूचे राष्ट्रों को निराशा के गर्त में धकेल दिया है.यदि ये राक्षसी कृत्य नहीं किए जाते तो मानव समाज उससे बहुत अधिकविकसित होता, जितना वह आज है. परंतु उनका अंतकाल आ गया है; और मुझे पूरी आशा है कि इस सम्मेलन के सम्मान में सुबह जो घंटानाद हुआ था, वह सभी प्रकार के कट्टरपन, सभी प्रकार के अत्याचारों, चाहे वे तलवार के जरिए हों या कल के- और व्यक्तियों, जो एक ही उद्देश्य के लिए अग्रसर हैं, के बीच सभी प्रकार की दुर्भावनाओं के लिए मृत्यु का घंटानाद बन जाएगा.
अफ़सोस की  बात है ऐसा नहीं  हो सका
ग्यारह सितम्बर उन्नीस सौ छः  को गांधी जी  ने सत्याग्रह के अनुपम प्रयोग की शुरुआत की 
जोहानसबर्ग , साउथ अफ्रीका में भारतीयों के समूह को उन्होंने एक नए तरह के संघर्ष का पाठ पढ़ाया. नए तरह का आग्रह ; अहिंसात्मक तरीके से सरकार   सत्य का आग्रह , न्याय का आग्रह . 
वह एक रास्ता था असभ्य युद्धों के स्थान पर एक सभी संघर्ष का रास्ता . भारत ने बाद में  देखा, दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य ने भी देखा कि लोगों के जाग कर खड़े होने और चुपचाप apnaa हक़ मांगने में भी बड़ी शक्ति होती है जो बमों और गोलियों  से ज्यादा प्रभावी हो सकती है 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

गुनहगार

तमाचे से जैसे उसके कान सुन्न से हो गए थे । हाथ लगा कर देखा तो कुछ खून का आभास हुआ होठों पर । अब उसने चारों तरफ़ देखने की कोशिश की तो पाया मारने वाला जा चुका था और आस पास इकट्ठा लोग उसी की तरफ़ देखे जा रहे थे।
ये दिन का कोई एक समय और भरे हुए बाजार में कोई एक जगह थी । समय और जगह महत्वपूर्ण नही थी न ही वो ख़ुद। बस ख़ुद में ही गुम वो कहीं चला जा रहा था कि सामने से आ रहे किसी ने उसे रोका और बिना कुछ पूछे , बिना कुछ कहे एक झन्नाटेदार तमाचा उसे जड़ दिया।
महत्वपूर्ण था वो झन्नाटेदार तमाचा !
दिन के किसी एक समय और भरे बाजार की किसी एक जगह पर बिल्कुल मामूली और महत्वहीन से उस इंसान को लगा कि कम से कम उसे उसकी गलती तो पता होनी चाहिए थी। लेकिन मारने वाला बिल्कुल से तमाचा लगा कर चला गया।
अब जब वो थोड़ा संभला तो पाया कि भरे बाजार में इकठ्ठा भीड़ उसी कि तरफ़ देख रही थी। उनकी आंखों में संवेदना की जगह ख़ुद को लोगों को हुए नही थी। उसने पाया कि सभी लोग उसे ही गुनाहगार मान रहे थे था बहुत दिन क्या सहाय! उस बेहद महत्वहीन इंसान को एक थप्पड़ ने लोगों की नजरों में महत्वपूर्ण बना दिया .
बहुत दिन हुए उसने ख़ुद को लोगों के द्बारा देखते हुए नही पाया था, नही शायद कभी नही पाया था। आज उसने देखा तो पाया कि लोगों की निगाहें बहुत अजीब होती हैं। उसने पाया कि लोग सोचते नही बस देखते हैं और जब लोग देखते हैं तो न जाने क्यों एक गुनाहगार खोजते हैं । उसे लगा कि लोगों को ये उम्मीद ही नही हो सकती कि कोई गुनहगार से हट कर और भी कुछ हो सकता है ।
उसने याद किया कि वो ख़ुद भी लोगों की ही तरह तो है।
जिंदगी के इन तमाम सालों में उसने गुनहगार ही तो खोजें हैं। जिंदगी के इन तमाम सालों में उसे कभी यह नही लगा कि लोग और भी कुछ हो सकते हैं । और कुछ भी ... मसलन बेचारे !
जैसा वह अभी ख़ुद था।
यह चक्रव्यूह है ।
लोगों को बेचारा बना कर उन्हें गुनाहगार बताने का ।
यह चक्रव्यूह है लोगों अलग थलग कर देने का ।
उसने फैसला किया कि उसे अलग थलग नही होना है।
उसने फैसला किया कि उसे वापस उसी गुमनामी में जाना है जहाँ वह लोगों को गुनाहगार समझ सके , लोगों की आरोप लगाती नज़रों से बच सके।
अगले ही पल उसने सबसे नज़दीक एक अपने जैसे लग रहे एक इंसान को खोज निकाला और पूरी मजबूती से एक थप्पड़ उसे जड़ दिया।
आस-पास की भीड़ में एक हलचल सी हुई। वह कांपते हुए किनारे खोजने लगा कि किसी तरह से लोगों कि भीड़ से बच कर भागा जाए
पर यह क्या
वह पहले से ही किनारे था।
लोगों की नजरें किसी और पर टिकी हुईं थी । लोग फुसफुसा कर बातें कर रहे थे । शायद लोग उसी को देख रहे थे जिसे उसने अभी अभी थप्पड़ जड़ा था।
उसने लोगों की निगाहों का अनुसरण किया । भीड़ के बीच एक आदमी खडा था, लोग उसे देखे जा रहे थे।
उसने भी एक उड़ती सी नजर उस पर डाली और उसका मन चिढ से भर गया ।
तो यही है वह गुनाहगार!
वह भूल चुका था कि कुछ देर पहले वह ख़ुद गुनाहगार था ।

बुधवार, 18 मार्च 2009

वरुण की बात में नया क्या है ?

वरुण के बयानों को लेकर हंगामा सा मचा हुआ है । आश्चर्य हमें भाजपा के विरोधियों की प्रतिक्रिया से नही है हमेंआश्चर्य भाजपा के नेताओं की प्रतिक्रिया पर हो रहा है । वरुण गांधी ने ऐसा कुछ नही कहा है जो भाजपा कीविचारधारा में शामिल नही रहा है । विश्वास न हो तो बस इसी हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ छद्म राष्ट्रवादियों की जगहजगह पर प्रतिक्रियाओं को देख लें ।

थोड़ा समय पीछे चलते हैं और लखनऊ में विधानसभा चुनाओं के पहले भाजपा नेताओं द्वारा जारी की गई सी डीको याद करते हैं। वरुण की बातें और उस सी डी में बातें एक ही जैसी कही गई हैं। उस सी डी को बाकायदा भाजपा केमंच से भाजपा के जमे जमाये नेताओं ने जारी किया था। उस सी डी के मामले में बाकायदा चुनाव आयोग नेमामला भी दर्ज किया था । अब चुनाव आयोग (जिसके एक स्वघोषित निष्पक्ष सदस्य दूसरे को कांग्रेसी घोषितकर चुके हैं ) उस मामले को दबा कर बैठा है । हो सकता है वरुण का मुद्दा भी वैसे ही दबा लिया जाय।

हम उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। फैजाबाद समेत अलग अलग जगहों पर रह चुके हैं और ९ साल की उम्र से चुनावसभाओं को देख समझ रहे हैं । संत, साध्वी कहे जाने वाले लोगों को सुना है , संघ परिवार की कार्यप्रणाली को बहुतनजदीक से देखा और समझा है , शिशु मंदिरों में पढ़ाई की है और वो समय अयोध्या के बहुत नजदीक गुजारा हैजब राम मन्दिर आन्दोलन चरम विन्दु पर था। हम देश के कोने कोने से आए कार सेवकों को नजदीक से देख सुनऔर समझ चुके हैं।

इतना देखने सुनने के बाद आज आश्चर्य नही होता कि कोई भाजपा का तथाकथित उभरता नेता कैसे बोल सकताहै। आश्चर्य इस बात पर होता है कि शाहनवाज और मुख्तार जैसे लोग सिर्फ़ दिखाने के लिए उस पर विरोध जतातेहैं।
इन्हे
अटल बिहारी का गोवा भाषण सही लगा था, २००२ का गुजरात सही लगा था , २००७ की सी डी सही लगीथी तो आज वरुण के भाषण पर ही ड्रामा करने की जरुरत क्या थी?

वस्तुतः भाजपा के चहेते बन चुके नरेंद्र मोदी का उदहारण भाजपा के अन्य नेताओं के सामने है। अपनी विचारधाराको डंके की चोट पर लागू करो (भाजपा की विचारधारा यही है जो नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के भाषणों में नजरआती है ) और फ़िर भाजपा के अन्दर भी कोई विरोध करने की हालत में नही रह पायेगा। २००२ के चुनावों के समयआडवाणी तक नरेंद्र मोदी से हरेन पंड्या के मुद्दे पर हार चुके हैं तो औरों की क्या बिसात। अब भाजपा केमहत्वाकांक्षी लोग जानते हैं कि उन्हें आगे बढ़ना है तो नरेंद्र मोदी से आगे निकलना होगा ।
वरुण
गांधी जो कर रहेहैं वह यही है ।
भाजपा
में आगे निकलने का यही रास्ता है।


सोमवार, 1 दिसंबर 2008

मुंबई हमलों के पीछे कौन है मोसाद या अमरीका?

एक जानने वाले के साथ बैठने का मौका मिला । वो भाई साहब एक वामपंथी संगठन से जुड़े हुए हैं। मुंबई हमले की चर्चा होने लगी।
-"रौशन भाई ये मोसाद का काम है" उन्होंने फ़रमाया
इन वामपंथियों की कुछ बातें हमें हमेशा से समझ में नही आती रही हैं ये हमेशा दूर की ही सोचते हैं नजदीक दिख रही चीजों पर गौर ही नही करते।
-पर सबूतों का इशारा तो पकिस्तान की खुफिया एजेंसी की तरफ़ जाता दिख रहा है
हमने प्रतिकार करने की कोशिश की।
- आप नही जानते मोसाद को ये कुछ भी करा सकती है।
उन्होंने हमें बताया
-लेकिन मेरे भाई एक आतंकी पकड़ा भी गया है पता चल रहा है कि उसने कुछ चीजें ऐसी बताई भी हैं जिससे लश्कर और ऐसे ही संगठनो की बात सामने आई है।
- ये कांग्रेस सरकार नाकारा है
हमने उनकी इस सूचना को ग्रहण किया और पूछा
-अगर ये मोसाद का काम था तो उसने नरीमन हॉउस पर हमला क्यों बोला ? यहूदियों को क्यों मारा ?
- सहानुभूति बटोरने के लिए रौशन भाई जिससे वो अरबों के ख़िलाफ़ कार्यवाही जारी रख सके
हम उनके कुतर्कों से बोर हो गए थे।
-अगर उन्हें अरबो के ख़िलाफ़ कार्यवाही ही जारी रखनी थी तो वहीँ जारी रख सकते थे। वैसे भी मोसाद सहानुभूति के चक्कर में नही पड़ती वो जो मन आता है करती जाती है नृशंसता से ।
- इसमे मोसाद और सी आई ए की मिलीभगत है
उन्होंने जाते जाते कहा ।
एक भाई से बात हुई वो दक्षिणपंथी थे ।
- ये हिन्दुओं पर अत्याचार का बदला है तभी तो करकरे मारा गया ।
-लेकिन हिन्दुओं का बदला लश्कर क्यों ले रहा है? क्या कोई ताजा समझौता हुआ है ?
- रौशन जी आप कैसी बातें करते हैं उनके साथ हमारा समझौता क्यों होगा?
- तो आप क्यों कह रहे हैं ये हिन्दुओं पर अत्याचार का बदला है? वैसे करकरे पर हमला नही हुआ मुंबई पर हमला हुआ है और करकरे वहां अपनी ड्यूटी करे गए थे उनका सीधे फ्रंट पर जाना जरूरी नही था। और अकेले करकरे की मौत नही हुई है आंकडा दो सौ के पार हो गया है वो सब तो हिन्दुओं के विरोधी नही थे?
वो थोडी देर और बातें करते रहे फ़िर थोडी देर बाद उनके मुह से निकला
- ये हमारे संतो का तेज है
हम भी बोर हो गए।
एक भाई को हमने बताया कि ऐसी रिपोर्ट आ रही है कि आतंकी गुजरात के पोरबंदर से बोट से आए थे वो लगे केन्द्र सरकार और मीडिया को गाली देने बोले ये मोदी को फंसाने की साजिश है वो गुजरात से कैसे आ सकते हैं । ये झूठ है
हमने उन्हें शांत किया कि समुद्री रास्तों कि जिम्मेदारी राज्य सरकार की नहीं केन्द्र सरकार की होती है।
अब वो थोड़ा रिलैक्स हुए और जब पाया कि मोदी और गुजरात सरकार सकुशल है तो लगे हाथ पकिस्तान को गाली देना शुरू किया ।
एक कांग्रेसी से बात हुई । वो भी नाराज थे । हमने उन्हें बताया कि गृह मंत्री ने कहा है कि ऐसी छोटी छोटी घटनाएं होती रहती हैं।
- नही यार माना वो नाकारा हैं लेकिन ऐसा बयान कैसे दे दिया । ये मीडिया की बनाई बात है । वो मीडिया पर बरसते रहे और शिवराज पाटिल को गाली देते रहे कांग्रेस को नीचा दिखने के लिए।
हमने उन्हें बताया कि ये महारास्ट्र के गृह मंत्री का बयान है देश के नही।
वो भी रिलैक्स हो गए। वो शरद पवार का चमचा और कह ही किया सकता है उसे हटा देना चाहिए ।
वो उदास ही रहे
- इस चक्कर में विधान सभा चुनावों में हमें परेशानी आ गई । कितना अच्छा जा रहा था । भाजपा का चरित्र देखिये ऐसे मुद्दे का भी राजनैतिक फायदा उठा रहे हैं।
- अब आप कमी रखोगे तो विपक्ष फायदा क्यों न उठाये । इसमे ग़लत क्या है उन्हें मुद्दा मिला है।
- फ़िर भी यार कुछ तो लिहाज करना चाहिए। मुझे तो शक है .....
हम फ़िर बोर हो गए थे । चल पड़े।
चलते- चलते:- दिनभर लोगों के पास मेल्स आते रहते हैं । हम ९ सालों से इन्टरनेट इस्तेमाल कर रहे हैं तमाम मेल पढने को मिलते हैं । भाई लोग करते क्या हैं कि वो मेल आगे अपने मित्रों के पास भेज देते हैं बिना सत्यता जांचने की कोशिश किए। अब भाई लोग उसे अपने ब्लॉग पर भी डालने लगे हैं। कुछ भाई तो जनहित में हिन्दी में अनुवाद काके देशसेवा करते हैं। पर बिना तथ्य जाने । मजे की बात तो ये है की हमारी हिन्दी के बड़े बड़े नामों वाले और अपने ब्लॉग से बुद्धिमान दिखने वाले ब्लॉगर बंधुओं की भी आँखें ऐसे ब्लॉग पोस्ट पढ़ कर खुल जाती हैं और उस ब्लॉग पर शुक्रिया अदा कर देते हैं कि आपने अच्छी जानकारी दी । पता नही ये इतने बड़े ब्लॉगर उस पोस्ट को पढ़ते भी हैं या नही और पढ़ते हैं तो क्या पढ़ते हैं. हमें जब ऐसे जानकारी से भरे मेल और ब्लॉग पाये हैं हरबार सच जानने की कोशिश की और हर बार पाया कि वो झूठ थे । खैर ...

शनिवार, 29 नवंबर 2008

मुबई के शहीद

आज काफ़ी देर से हम कुछ फोटो खोजने की कोशिश में लगे रहे। हम चाहते थे कि मुंबई के शहीदों के फोटो श्रद्धांजलि के रूप में यहाँ रखें । कुछ फोटो जो मिल सकीं हैं यहाँ हैं
शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का ऑरकुट का प्रोफाइल मिला है आप चाहे तो उन्हें यहाँ श्रद्दांजलि दे सकते हैं ।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

शहीद नरकगामी नही होते !

आज सुबह से मुंबई पर हमले की ख़बर देख देख कर वैसे ही बुरा महसूस हो रहा था । हमने सोचा कि थोड़ाइन्टरनेट पर भी चीजें देख ली जाएँ। हिन्दी ब्लोग्स पर लोगों का इस घटना पर क्षोभ नजर आ रहा था। पर एकचीज देख कर दिल और दुखी हो आया ।


जहाँ एक ओर देश के राजनीतिज्ञों ने इस मामले पर एकजुटता कि वकालत कीहै वहीँ इस मामले पर कुछब्लोगर्स की प्रतिक्रिया कष्ट देने वाली रही। ऐसी प्रतिक्रियाओं को देख कर मन यही पूछता है कि ऐसेबंटवारे वाले समाज के लिए कहाँ सम्भव है आतंकवाद से लड़
पाना।


एक साहब सुबह से घूम घूम कर हर ब्लॉग पर जहाँ मुंबई पर हमलों की चर्चा की गई है वहां एक टिप्पणी डाले जा रहें हैं उस टिप्पणी के कुछ अंश तो देखिये


"बस गलती से किरेकिरे साहब वहा भी दो चार हिंदू आतंकवादी पकडने के जोश मे चले गये , और सच मे नरक गामी हो गये"


क्या कहें इस सोच के मालिकों को ?


इन साहब को हेमंत करकरे की अगुवाई वाली ए टी एस द्वारा प्रज्ञाओं और दयानंदों पर की जा रही कार्यवाही पर क्षोभ था शायद. ऐसा गुस्सा होना कोई ग़लत नही है . हमारी पुलिस दूध की धुली नही है कई बार उसके कार्य अनुचित पाये जाते हैं । वो मसला कोर्ट के जिम्मे है और कोर्ट देखेगी कि कौन दोषी है कौन नही





पर इस गुस्से में एक शहीद का अपमान कहाँ तक सही है?




मुंबई पुलिस ने अभी तक इस घटना में बहादुरी पूर्वक कार्यवाही की है। पुलिस के शीर्ष अधिकारियों ने आगे आकर कारवाही का नेतृत्व करते हुए अपने प्राणों की बलि दी है। इस जज्बे की सराहना होनी चाहिए .



करकरे साहब की बात करें तो सी एस टी पर जमा आतंकियों पर हमले का उन्होंने ख़ुद आगे बढ़ कर मुकाबला किया वो वरिष्ठ अधिकारी थे और पीछे से आदेश देते रह सकते थे लेकिन उन्होंने अपने जवानों के सामने एक उच्च आदर्श पेश किया। इस जज्बे का सम्मान किया जाना चाहिए. कुछ भाई लोगों ने लिख दिया है कि करकरे साहब हीरो बनने के चक्कर में मारे गए. तो उनसे हम पूछना चाहेंगे कि दिल मागे मोर की शैली में दुश्मन से लड़ जाने वाले विक्रम बत्रा के बारे में भी वो यही ख्याल रखते हैं? सीमाओं पर मारे जाने वाले हर बड़े अधिकारी के बारे में वो यही ख्याल रखते हैं?




क्यों सिर्फ़ करकरे की ही शहादत का मजाक बनाया जा रहा है क्यों अशोक कामते, सदानंद दांते और विजय सालस्कर की चर्चा नही हुई ?



हिंदू-मुस्लिम सोच में यह भूल जाना अफसोसनाक है कि जो शहीद हुआ है वो ड्यूटी पर आतंकियों का मुकाबला करते हुए शहीद हुआ है बेहद शर्मनाक है अपने शहीदों के बारे में बात करने का ये रवैय्या.


इन लोगों और मोहन चन्द्र शर्मा की शहादत पर सवाल उठाने वालों में फर्क क्या रह गया ?
एक भाई की सोच है कि करकरे को सिर्फ़ हिंदू आतंकवाद में ही महारत हासिल थी. अब उन्हें क्या पता किकरकरे एक वरिष्ठ आई पी एस अधिकारी थे और रा जैसी संस्था में काम कर चुके थे. उनके पिछले रिकॉर्ड काफ़ीअच्छे रहे थे. खैर जब इन भाई की सोच मालेगांव से आगे जा पाती तब न !

जब समाज के चंद स्वयंभू ठेकेदार शहीद होने वाले पर इस तरह मजाक उडाने सा रवैय्या अपनायेंगे तो फ़िर कब तक जान पर खेल कर यूँ लड़ते रहेंगे। हमें बेहद अफ़सोस है अपने समाज के इस बँटवारे पर



इस तरह तो हो चुका आतंक का मुकाबला.



हमें बेहद अफ़सोस है !
हाँ इतना स्पष्ट कर दें कि शहीद नरकगामी नही होते !

hamarivani

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