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रविवार, 11 सितंबर 2011

ग्यारह सितम्बर : सभ्यताओं के संवाद का दिन

२००१ से पहले आप ग्यारह  सितम्बर  को  कैसे  याद करते थे ? निःसंदेह २००१ के ग्यारह सितम्बर के बाद कुछ भी पहले सा नहीं रह पाया पर उससे पहले ग्यारह सितम्बर सभ्यताओं के संघर्ष की जगह सभ्यताओं  के संवाद का दिन था . 

अट्ठारह साल पहले जब हम स्कूल में थे , हमारे स्कूल में स्वामी विवेकानंद के ग्यारह सितम्बर अट्ठारह सौ तिरानबे में शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में दिए गए भाषण की सौवीं वर्षगाँठ मनाई जा  रही थी और इस उपलक्ष्य में होने वाले समारोह में हमें  स्वामी विवेकानद का किरदार निभाना था. उम्र कम थी पर पता था की यह कुछ ख़ास है और हम उस समय जो कुछ भी मिला पढ़ते चले गए . स्वामी विवेकानंद को पढने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि हमें हिन्दू धर्म की एक बेहतर समझ आ गयी . जिसे बाद में तमाम धर्म ग्रंथों ने भी अपने योगदान से बेहतर बनाया .

स्वामी विवेकानंद का मंत्रमुग्ध कर देने वाला शिकागो भाषण कुछ इस प्रकार था ;

अमेरिका की बहनों और भाइयो!
आपने हमारा जैसा हार्दिक और स्नेहपूर्ण स्वागत किया है, उसके लिए आभार व्यक्त करने के लिए जब मैं यहां खड़ा हुआ हूं तो मेरा मन एक अकथनीय आनंद से भरा हुआ है.मैं विश्व की सबसे प्राचीन संन्यासियों की पंरपरा की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं; मैं आपको धर्मो की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूं और मैं सभी वर्गो एवं पंथों के करोड़ों हिंदुओं की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं.
इस मंच पर आए उन कुछ वक्ताओं को भी मेरा धन्यवाद, जिन्होंने पूर्व से आए प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए आपको बताया कि दूर देशों से आए हुए ये सज्जन विभिन्न देशों में सहिष्णुता का संदेश पहुंचाने के सम्मान के अधिकारी हो सकते हैं.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने विश्व को सहिष्णुता औ सार्वभौमिक स्वीकार्यता का पाठ पढ़ाया. हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मो की सत्यता को स्वीकार करते हैं.मुझे उसे देश से संबंधित होने में भी गर्व है, जिसने इस प्थ्वी के सभी धर्मो व सभी देशों के सताए हुए लोगों और शरणार्थियों को शरण दी है.
मुझे आपको यह बताने में गर्व है कि हमने उन पवित्र इजराइलियों को अपने कलेजे से लगाया है, जिन्होंने ठीक उसी वर्ष दक्षिण भारत में आकर शरण ली, जब रोमन अत्याचारियों ने उनके पवित्र मंदिर को ध्वस्त कर दिया था.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने महान जोरोस्ट्रियन राष्ट्र के विस्थापितों को शरण दी है और अब भी उनके विकास में सहयोग दे रहे हैं.
भाइयों, मैं आपके सामने उस भजन की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत करूंगा, जिसको मैं अपने बचपन से दोहराता आया हूं और जिसे करोड़ों लोग प्रतिदिन दोहराते हैं -
'जैसे विभिन्न स्रोतों से उद्भूत विभिन्न धाराएं
अपना जल सागर में विलीन कर देती हैं,
वैसे ही हे ईश्वर! विभिन्न प्रवृत्तियों के चलते
जो भिन्न मार्ग मनुष्य अपनाते हैं, वे
भिन्न प्रतीत होने पर भी
सीधे या अन्यथा, तुझ तक ही जाते हैं.'
वर्तमान सम्मेलन, जो अब तक हुई सबसे महान सभाओं में से एक है, स्वयं 'गीत' में बताए उस अद्भुत सिद्धांत का पुष्टीकरण और विश्व के लिए एक घोषणा है -
'जो कोई, किसी भी स्वरूप में
मेरे पास आता है, मुझे पाता है;
सभी मनुष्य उन मार्गो पर
संघर्षरत हैं, जो अंत में उन्हें मुझे तक ही ले आते हैं.'
सांप्रदायिकता कट्टरता और उन्हीं की भयानक उपज धर्माधता ने बहुत समय से इस सुंदर पृथ्वी को ग्रस रखा है. उन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी ही बार उसे मानव रक्त से सराबोर कर दिया है, सभ्यता को नष्ट किया है और समूचे राष्ट्रों को निराशा के गर्त में धकेल दिया है.यदि ये राक्षसी कृत्य नहीं किए जाते तो मानव समाज उससे बहुत अधिकविकसित होता, जितना वह आज है. परंतु उनका अंतकाल आ गया है; और मुझे पूरी आशा है कि इस सम्मेलन के सम्मान में सुबह जो घंटानाद हुआ था, वह सभी प्रकार के कट्टरपन, सभी प्रकार के अत्याचारों, चाहे वे तलवार के जरिए हों या कल के- और व्यक्तियों, जो एक ही उद्देश्य के लिए अग्रसर हैं, के बीच सभी प्रकार की दुर्भावनाओं के लिए मृत्यु का घंटानाद बन जाएगा.
अफ़सोस की  बात है ऐसा नहीं  हो सका
ग्यारह सितम्बर उन्नीस सौ छः  को गांधी जी  ने सत्याग्रह के अनुपम प्रयोग की शुरुआत की 
जोहानसबर्ग , साउथ अफ्रीका में भारतीयों के समूह को उन्होंने एक नए तरह के संघर्ष का पाठ पढ़ाया. नए तरह का आग्रह ; अहिंसात्मक तरीके से सरकार   सत्य का आग्रह , न्याय का आग्रह . 
वह एक रास्ता था असभ्य युद्धों के स्थान पर एक सभी संघर्ष का रास्ता . भारत ने बाद में  देखा, दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य ने भी देखा कि लोगों के जाग कर खड़े होने और चुपचाप apnaa हक़ मांगने में भी बड़ी शक्ति होती है जो बमों और गोलियों  से ज्यादा प्रभावी हो सकती है 

बुधवार, 18 मार्च 2009

वरुण की बात में नया क्या है ?

वरुण के बयानों को लेकर हंगामा सा मचा हुआ है । आश्चर्य हमें भाजपा के विरोधियों की प्रतिक्रिया से नही है हमेंआश्चर्य भाजपा के नेताओं की प्रतिक्रिया पर हो रहा है । वरुण गांधी ने ऐसा कुछ नही कहा है जो भाजपा कीविचारधारा में शामिल नही रहा है । विश्वास न हो तो बस इसी हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ छद्म राष्ट्रवादियों की जगहजगह पर प्रतिक्रियाओं को देख लें ।

थोड़ा समय पीछे चलते हैं और लखनऊ में विधानसभा चुनाओं के पहले भाजपा नेताओं द्वारा जारी की गई सी डीको याद करते हैं। वरुण की बातें और उस सी डी में बातें एक ही जैसी कही गई हैं। उस सी डी को बाकायदा भाजपा केमंच से भाजपा के जमे जमाये नेताओं ने जारी किया था। उस सी डी के मामले में बाकायदा चुनाव आयोग नेमामला भी दर्ज किया था । अब चुनाव आयोग (जिसके एक स्वघोषित निष्पक्ष सदस्य दूसरे को कांग्रेसी घोषितकर चुके हैं ) उस मामले को दबा कर बैठा है । हो सकता है वरुण का मुद्दा भी वैसे ही दबा लिया जाय।

हम उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। फैजाबाद समेत अलग अलग जगहों पर रह चुके हैं और ९ साल की उम्र से चुनावसभाओं को देख समझ रहे हैं । संत, साध्वी कहे जाने वाले लोगों को सुना है , संघ परिवार की कार्यप्रणाली को बहुतनजदीक से देखा और समझा है , शिशु मंदिरों में पढ़ाई की है और वो समय अयोध्या के बहुत नजदीक गुजारा हैजब राम मन्दिर आन्दोलन चरम विन्दु पर था। हम देश के कोने कोने से आए कार सेवकों को नजदीक से देख सुनऔर समझ चुके हैं।

इतना देखने सुनने के बाद आज आश्चर्य नही होता कि कोई भाजपा का तथाकथित उभरता नेता कैसे बोल सकताहै। आश्चर्य इस बात पर होता है कि शाहनवाज और मुख्तार जैसे लोग सिर्फ़ दिखाने के लिए उस पर विरोध जतातेहैं।
इन्हे
अटल बिहारी का गोवा भाषण सही लगा था, २००२ का गुजरात सही लगा था , २००७ की सी डी सही लगीथी तो आज वरुण के भाषण पर ही ड्रामा करने की जरुरत क्या थी?

वस्तुतः भाजपा के चहेते बन चुके नरेंद्र मोदी का उदहारण भाजपा के अन्य नेताओं के सामने है। अपनी विचारधाराको डंके की चोट पर लागू करो (भाजपा की विचारधारा यही है जो नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के भाषणों में नजरआती है ) और फ़िर भाजपा के अन्दर भी कोई विरोध करने की हालत में नही रह पायेगा। २००२ के चुनावों के समयआडवाणी तक नरेंद्र मोदी से हरेन पंड्या के मुद्दे पर हार चुके हैं तो औरों की क्या बिसात। अब भाजपा केमहत्वाकांक्षी लोग जानते हैं कि उन्हें आगे बढ़ना है तो नरेंद्र मोदी से आगे निकलना होगा ।
वरुण
गांधी जो कर रहेहैं वह यही है ।
भाजपा
में आगे निकलने का यही रास्ता है।


सोमवार, 16 मार्च 2009

पाकिस्तान: बुनियाद का दंश

अभी-अभी समाचार मिल रहा है कि पकिस्तान के प्रधान मंत्री की जस्टिस चौधरी सहित अन्य जजों को बहालकरने की घोषणा के बाद नवाज़ शरीफ ने अपना लोंग-मार्च वापस ले लिया है । अब सभी निगाहें २१ मार्च कीप्रस्तावित बहाली पर लग गयीं हैं।
जस्टिस चौधरी की बहाली के आगे क्या क्या परिणाम हो सकते हैं यह तो समय ही बताएगा पर आज कीपाकिस्तान की बुरी स्थिति की जिम्मेदारी अगर उसकी बुनियाद पर डाली जाय तो ग़लत नही होगा।
पाकिस्तान के निर्माण के लिए दिए गए तर्कों को अलग रख दें तो भी पाकिस्तान निर्माण के बाद शुरू से हीपकिस्तान के नेताओं ने जो परम्पराएं डालनी शुरू कर दीं वो आगे चल कर परेशानी का सबब बनने वाली ही थीं ।
मज़हब के आधार पर बने हुए देश में मज़हबी जूनून रखने वालों को सत्ता से अलग कर पाना बहुत ही कठिन था।इसके लिए जरूरी था कि देश के रहनुमा कड़े फैसले लेने वाले होते और अपना उदाहरण सकारात्मक रूप में लोगोंके सामने रख पाते।
जिन्ना इस कसौटी पर खरे नही उतर सके।
जिन्ना डावांडोल प्रकृति वाले नेता थे। विभाजन की घोषणा तक उन्हें पता नही था कि वो जो पाकिस्तान चाहते हैंवो कैसा होना चाहिए। उसे भारत से अलग होना है या एक ढीले ढाले संघ में रहना है उन्हें नही पता था उन्हें ये भीनही पता था कि पाकिस्तान में कौन कौन से इलाके रहने हैं। उन्हें बस पकिस्तान चाहिए था । पकिस्तान मिलजाने के बाद भी उसके भविष्य को लेकर उनके पास कोई कार्ययोजना नही थी। कभी मज़हब के आधार पर बने देशको वो सेकुलर बनाना चाहते थे तो कभी तरह तरह के अंदरूनी दबावों के आगे झुक झुक कर इधर उधर के फैसलेलेते रहे।
जिन्ना ने जिस एक चीज की नींव डाली-जो पाकिस्तान को अभी भी परेशान कर रही है- वह थी एकाधिकार कीप्रवृत्ति । जिन्ना को माउन्टबेटन ने सलाह दी कि उन्हें गवर्नर जनरल की जगह प्रधान मंत्री बनना चाहिए क्योंकिसंसदीय शासन की प्रणाली में प्रधान मंत्री अधिक महत्त्व पूर्ण होता है। परन्तु जिन्ना ने गवर्नर जनरल बनने केसाथ सत्ता अपने पास रखना चुना। जब शासन का ध्येय किसी तरह से सत्ता बचाए रखना और पूरी सत्ता अपने पासरखना हो जाता है तो चीजें ग़लत होनी शुरू हो जाती हैं । इस तरह की जवाबदेही विहीन सत्ता अन्य लोगों कोआकर्षित करती है।
जल्दी ही सत्ता खिसकनी शुरू हो गई। जिन्ना से लियाकत अली और फ़िर धीरे धीरे श्रंखला चल निकली। सेना काराजनीति के लिए प्रयोग हुआ और फ़िर सेना ने राजनीति शुरू कर दी।
२००७ के चुनावों के बाद ज़रदारी ने कहा कि वो पाकिस्तान के सोनिया गांधी बनना चाहते हैं । लेकिन सोनियागांधी बनना यूँ आसान नही था ज़ल्दी ही ज़रदारी एक और जिन्ना बन कर राष्ट्रपति बन बैठे। ज़रदारी के राष्ट्रपतिबनने के साथ ही उनके पराभव की कहानी शुरू हो चुकी थी। ये आश्चर्यजनक है कि वो अभी तक सत्ता में बने हुए हैं।

पाकिस्तान का उदहारण यह बताता है कि ग़लत बुनियाद का फल सही हो यह सम्भव नही है । अब देखना यहहोगा कि आगे आने वाले नेता इस चीज को समझ पाते हैं या नही।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

यहाँ कोई रोक-टोक नही है अभी

लखनऊ में कपूरथला चौराहा उन जगहों में शामिल है जहाँ हम कुछ दोस्त अक्सर मिला करते हैं । कपूरथलाचौराहे पर ख़ास बात युनिवर्सल बुक डिपो में है जहाँ का हिन्दी और और अंग्रेजी दोनों ही सेक्शन अच्छा है । एकऔर ख़ास बात नेस्कैफे के स्टाल में है जहाँ फुटपाथ और काफ़ी दोनों का आनंद एक साथ लिया जा सकता है ।
दो-तीन दिन पहले हम दो दोस्त युनिवर्सल बुक डिपो के दोनों सेक्शन छान कर नेस्कैफे के बगल काफ़ी ले कर बैठेतो अचानक सूखे मेवे लेकर फेरी लगाने वाला एक कश्मीरी दिख गया। हमें अंजीर और कश्मीर दोनों बहुत पसंद है। अंजीर तो उसके पास ख़त्म हो चुका था पर कश्मीर बाकी था । हम दोनों उसके साथ कश्मीर के बारे में बात करनेलगे।
कश्मीर के चुनाव के बाद अक्सर अलगाव वादी आरोप लगते रहे कि इन चुनावों में लोगो को जबरदस्ती वोट डालनेपर मजबूर किया गया था । हमने फैज़ल (उस कश्मीरी युवक का नाम फैज़ल था ) से पहली बात यही पूछी। फैज़लसे पता चला कि कश्मीर में पिछले कुछ टाइम में काफ़ी कुछ बदला है और लोग खुशहाल हुए हैं । नेताओं कोअंदाजा नही था कि लोग वोट डालना चाहते हैं उन्हें अंदाजा होता तो वो भी चुनाव लड़ते। हमें अच्छा नही लगा जबउसने कहा कि फौजी परेशान करते हैं पर याद किया तो समझ में आया कि फौज का व्यवहार नागरिकों के बीच मेंहमेशा कोई बहुत शानदार नही रहता है। ट्रेनों में उनका व्यवहार देख कर अगर हमें बुरा लगता है तो कश्मीरियों कोक्यों नही लग सकता ?
फैज़ल ने बताया कि अगर नए मुख्यमंत्री उमर अपने पिता फारुख की तरह रहते हैं तो लोगों में उपजा भरोसा ख़त्महो जायेगा । अगर थोड़ा भी अच्छा रहे तो इनको कोई हटा नही पायेगा ।
हमारे दोस्त ने पूछा कि लखनऊ में जो लोग मिलते हैं उनका व्यवहार कैसा लगता है तो उसने बिना लाग-लपेट केबता दिया कि अधिकतर लोग खुश होते हैं पर कुछ लोग कभी कभी उल्टा सीधा भी कहते हैं। हमने सोचा किआख़िर फेरी लगाने आए कश्मीरी उल्टा सीधा बोल कर किसी को क्या संतुष्टि मिलती होगी।
अंत में उसने एक बात कही जो हम जैसों को जो लखनऊ जैसी अपेक्षाकृत शांत जगह रहते हैं उन्हें कभी समझ मेंनही आ सकती है। उसने कहा कि लखनऊ में उसे बहुत अच्छा लगता है क्योंकि यहाँ कोई रोक टोक नही है चाहेजहाँ घूमो फिरो चाहे जितने देर तक घूमो फिरो।
हम सोचने लगे कि कैसा लगता होगा किसी भी जगह के रहने वालों को जब उन्हें आते जाते पूछा जाता होगा किकहा जा रहे हो कहाँ से आ रहे हो, कैसा लगता होगा जब शाम के एक निश्चित समय के बाद घर से बाहर निकलनावर्जित होता होगा, कैसा लगता होगा जब उनके अपने शहर में उनके अपने इलाके में औचित्य की जरुरत पड़तीहोगी कहीं रहने के लिए।
कैसा लगता होगा उन्हें जिन्हें अपने घर छोड़ कर कैम्पों में जिंदगी काटनी पड़ती होगी एक दो महीने , एक दो सालकश्मीरी पंडितों के लिए तो शायद एक दो पीढियां या और भी ज़ियादा।
फैज़ल ने बताया कि अभी भी टाइम लगेगा कश्मीरी पंडितों की वापसी में । उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि समस्या कासमाधान कश्मीरी पंडितों को जम्मू कैम्प से उठा कर श्री नगर के कैम्प में डालने में नही है। समस्या का समाधानहै उस स्थिति का निर्माण जिसमे कश्मीरी पंडित ख़ुद अपने आप अपने घरों में जा सकें। हम सहमत हैं उमर साहबपर बीस साल एक लंबा अरसा होता है । लोग निराश हैं।
क्या कश्मीरियों का भी फ़र्ज़ नही बनता था कि अपने ही भाइयों के हक़ में आगे बढ़ के बोलें। क्या लोग जमीन सेज्यादा कीमती हैं?
लेकिन लोग अपने वंचित भाइयों के बारे में नही सोचते।
कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए आन्दोलन नही छेड़ेंगे।
गुजरात के लोग सरदार सरोवर बाँध से तृप्त तो होंगे लेकिन नर्मदा के विस्थापितों के अधिकार की नही सोचेंगे। जोउनके अधिकारों को समर्थन देगा उसके ख़िलाफ़ गुंडागर्दी पर उतर आयेंगे (यहाँ हम कश्मीर और गुजरात के आमलोगों की बात कर रहे हैं नेताओं के समर्थक भावुक न हों )।
ओह कहाँ से शुरू किया था कहाँ आ गए । मुआफ कीजियेगा इधर उधर भटकने के लिए ये यहाँ सिर्फ़ इसलिए होपाया क्योकि अभी तक यहाँ भी
कोई रोक टोक नही है कुछ भी करो कहीं भी भटको , कोई नही पूछता । कल इसतरह से मौका मिले न मिले ।

चलते-चलते : गुलज़ार साब ने फ़िल्म यहाँ के लिए एक गाना लिखा था पूछे जो कोई मेरी निशानी ।
उसमे एक लाइन है
आओ
न आओ न जेहलम में बह लेंगे ।
कोई वादी के मौसम भी एक दिन तो बदलेंगे ॥
आमीन

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

सुभाष बाबू !

आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्मदिन है सुभाष चन्द्र बोस उन दो बंगाली विभूतियों में से रहे हैं जिनके व्यक्तित्व और विचारों ने हमेशा से हमें प्रभावित किया है।
1897 में कटक जन्मे सुभाष बाबू अपने 14 भाई बहनों में नौवें थे। पिता के दबाव के चलते आई सी एस की कठिन और प्रतिष्टापूर्ण परीक्षा महज आठ महीनों के श्रम से उत्तीर्ण करने वाले सुभाष बाबू को देश की आजादी के लिए संघर्ष का रास्ता पसंद था और उन्होंने बिना किसी हिचक के आई सी एस से त्यागपत्र दे दिया। 1922 में स्वराज पार्टी के बैनर तले कलकत्ता के महापौर बने देशबंधु चितरंजन दास ने उन्हें नगर पालिका का मुख्यकार्यकारी नियुक्त किया। सुभाष बाबू की प्रशासनिक क्षमता और राष्ट्रीय सरोकार उनके कार्यकाल में नगर पालिका की कार्यप्रणाली में स्पष्ट देखा जा सकता है । बाद में सुभाष बाबू ख़ुद भी महापौर बने। बाद में अपने कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में राष्टीय योजना समिति की स्थापना की । इसी विचार का प्रतिनिधित्व आजादी के बाद बने योजना आयोग ने किया । इसी के साथ उन्होंने एक विज्ञान परिषद् की भी स्थापना की थी।
सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अन्दर पूर्ण स्वराज के संकल्प को लेकर जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर युवाओं का नेतृत्व किया। युवा नेताओं का यह समूह समाजवादी विचारों से प्रेरित था और भारत को एक प्रगतिशील रूढियों से मुक्त देश के रूप में देखना चाहता था। उनके व उनके साथियों के समाजवादी विचारों का कांग्रेस के अन्दर का दक्षिणपंथी समूह पसंद नही करता था । अपनी बीमारी के समय यूरोप प्रवास में उन्होंने विट्ठल भाई पटेल के साथ काम किया. कांग्रेस के उस समय के नेतृत्व से असंतुष्ट इन नेताओं ने बोस -पटेल विश्लेषण में अपने विचारों को स्पष्ट रूप से रखा. अपनी अस्वस्थता के दौरान नेताजी द्वारा की गई सेवा और उनके विचारों के चलते विट्ठल भाई ने अपनी संपत्ति वसीयत वसीयत द्वारा सुभाषबाबू के नाम करदी। विट्ठल भाई के छोटे भाई इस वसीयत से अप्रसन्न थे और उन्होंने मुक़दमे में सुभाषबाबू को पराजित करके विट्ठल भाई की संपत्ति प्राप्त कर ली परन्तु इससे दोनों महत्वपूर्ण और बड़े नेताओं में कटुता आ गई। वस्तुतः पटेल कांग्रेस के दक्षिणपंथी माने जाने वाले नेताओं में से थे और कांग्रेस संगठन पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखते थे (आजादी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने जवाहरलाल के उम्मीदवार के विरुद्ध अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी किया था )। गांधी जी की खुली असहमति के बावजूद सुभाष बाबू कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीतने में सफल रहे। इसपर कांग्रेस कार्यसमिति के 14 में से 12 सदस्यों ने कार्यसमिति से इस्तीफा दे दिया (सिर्फ़ जवाहरलाल और शरत चन्द्र बोस कार्यसमिति में बने रहे थे। ) कार्यसमिति के विरोध के चलते उन्हें त्यागपत्र देना पडा।
नेता जी इस समय अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का लाभ उठा कर भारत को आजादी दिलाने के लिए एक बड़े संघर्ष का आगाज करने के पक्षधर थे परन्तु अधिकतर नेता इस मौके पर सावधानी पूर्ण कदम उठाने के इच्छुक थे।
इसी समय नेताजी और उनके लंबे समय तक साथी रहे जवाहरलाल में भी मतभेद हो गए। जवाहरलाल मतभेदों के वैयक्तिकरण के ख़िलाफ़ थे। उन्होंने सुभाष को लिखा कि चाल इतनी तेज नही हो कि साथी पीछे छूट जाएँ। उन दोनों में मित्र और धुरी राष्ट्रों को लेकर भी मतभेद रहे।
विश्वयद्ध के दौरान सुभाष बाबू ने निष्क्रिय बने रहने से इनकार कर दिया और नजरबंदी से भाग निकले । अफगानिस्तान, रूस होते हुए जर्मनी पहुँच कर उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संगठन की स्थापना की । इस दौरान उन्होंने जियाउद्दीन खान और ओरलान्दो मात्सूता नामों से यात्रा की। जर्मनी में हिटलर से मतभेदों और उससे मिली निराशा के चलते वो जापान गए और वहाँ पर आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला । उन्होंने आजाद हिंद की अंतरिम सरकार का भी गठन किया जिसे धुरी राष्ट्रों से मान्यता मिली थी।
आजाद हिंद फौज जापान के सहयोग से भारत की आजादी के लिए संघर्ष छेड़ दिया । अपने मतभेदों को किनारे करते हुए नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो के माध्यम से गांधी जी को संबोधित करते हुए जापान के सहयोग से भारत को आजाद कराने की अपनी योजना के बारे में बताया। यह वही संबोधन है जिसमे उन्होंने गांधी जी को राष्ट्र पिता कह कर पुकारा (यह उपाधि नेता जी की ही दी हुई है और गांधी जी ने सुभाष को नेता जी की उपाधि दी थी। )। हालांकि नेता जी की योजनायें भारत में पहले ही पहुँच रही थी और गांधी जी के नेतृत्व में एक तबका महसूस कर रहा था कि जापानियों का आगमन भारत के लिए बेहतर हो सकता है।
शुरूआती सफलताओं (जिसमें अंडमान निकोबार को जीतना शामिल था ) के बाद मित्र राष्ट्र भारी पड़ने लगे और आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पडा। 18 अगस्त 1945 का नेता जी की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। यह दुर्घटना और मृत्यु आज भी रहस्यपूर्ण है ।
आज हमारे लिए बहुत आसान है यह सोचना कि शायद जापानियों की जीत और उनका ताकतवर होना भारत की आजादी के लिए घातक हो सकता था , या फ़िर जापानियों या धुरी राष्ट्रों की मदद लेना ग़लत हो सकता था पर उस समय की परिस्थितियों की देखें तो धुरी राष्ट्रों के उफान के एक समय इक्का-दुक्का नेताओं को छोड़ कर सभी जापान और आजाद हिंद फौज के बढ़ते क़दमों को लेकर आशान्वित थे। उस समय के तमाम नेताओं ने अपने हिसाब से चीजों को समझने की कोशिश की और उन्हें जो बेहतर समझ में आया किया । आज यह कहना आसान हो सकता है कि सुभाष ग़लत रास्ते पर निकल चुके थे या गाँधी अनुचित आग्रह कर रहे थे या भगत सिंह और उनके साथी अपनी हिंसा में ग़लत थे, पर हमें लगता है कि यह सभी एक दूसरे के पूरक थे। युवाओं में आत्म बलिदान के उच्च आदर्श जहाँ भगत सिंह और उनके साथियों से मिल रहे थे वहीँ गांधी ने आजादी की लड़ाई को आम आदमी तक पहुँचाया और उसे उससे जोड़ा । सुभाष ने 1857 के विद्रोह की टूटी कड़ी को जोड़ते हुए एक पूरी पूरी सेना का न सिर्फ़ गठन किया बल्कि अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों में जुडाव की एक भावना भरी। इसका प्रमाण था कि आजाद हिंद फौज के ट्रायल के समय उनके समर्थन में हो रही सभाओं में सैनिक वर्दी में शामिल हो रहे थे।
आख़िर सेना ही तो अंग्रेजों का अन्तिम दुर्ग था! सुभाष की सफलता की कहानी अंडमान और निकोबार जीतने या सेना गठित करने में नही थी। उनकी सफलता यहाँ हिन्दुस्तान में उस भावना की थी जो उन्होंने जगाई थी । उनकी सफलता उन तमाम आजाद हिंद सैनिकों में थी जो अंग्रेजो द्वारा बंदी बना कर लाये गए थे और उनपर मुक़दमे चल रहे थे। वो लाये थे अपने साथ अदम्य इच्छशक्ति की वो कहानियाँ जो नौसेना के विद्रोह के साथ मिलकर अंग्रेजी साम्राज्य के ताबूत में अन्तिम कील साबित हुयी।

सुभाष बचपन से हमारे आदर्शों में रहे हैं। समय के साथ इतिहास के अलग अलग विन्दुओं के अध्ययन में हमने उनकी कमियों और भूलों को भी देखा और समझा इसके बावजूद उनका स्थान अभी भी वही है जहाँ तब था जब उनके साहसिक व्यक्तित्व को पहली बार जाना था।
महान लोगों की गलतियों और कमियों के बारे में जानना जरूरी है यह कहने के लिए नही कि ओह यह ऐसे निकले, उन्हें गाली देने के लिए भी नही, बल्कि यह समझने के लिए कि हम उनसे सीख लें यह समझने के लिए कि आख़िर वो इंसान थे ।

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