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रविवार, 14 मार्च 2021

क्यूबिकल के नए मरीज

 

हमारे क्युबिकल में उनकी एंट्री शाम के लगभग 7 बजे हुयी। एसजीपीजीआई लखनऊ के राजधानी कोरोना हॉस्पिटल में हमारे क्युबिकल के छह बेड्स पर अब सिर्फ तीन मरीज थे। क्युबिकल थोड़ा खाली खाली लगता है तो अच्छा लगता है कि मरीज कम हो रहे हैं और हमारे भी जल्दी ही ठीक होकर जाने की संभावना बेहतर है। दोपहर के तीन-चार बजे जब पता चला कि वार्ड में  कुछ नए मरीज आने वाले हैं तो हम मना रहे थे कि नए मरीज किसी और क्युबिकल में जाएँ। वार्ड में  आने वाले कुछ मरीज किसी और क्युबिकल में गए भी पर आखिरकार शाम के सात  बजे आने वाले दो नए मरीज हमारे क्युबिकल में ही आए।

वे माँ-बेटे थे । पता चला कि वे वाराणसी से एंबुलेंस से आए हैं और इसी वजह से उन्हे आने में लेट हुई। वाराणसी में बीएचयू जैसा उत्कृष्ट संस्थान होने के बाद भी उनका एंबुलेंस से इतनी दूर लखनऊ आना हमे समझ में नही आ रहा  था। उन्हे सैटेल होने में समय लग रहा था । इसी समय पता चला कि दरअसल वे कुल तीन लोग थे -माँ-बाप और बेटा । पिता की स्थिति क्रिटिकल थी इसलिए उन्हे आईसीयू में रखा गया था। माँ – बेटे की स्थिति थोड़ा बेहतर थी इसलिए वे हमारे वार्ड में आए। पीजीआई में उनका परिचय था इसलिए उन्हे उम्मीद थी कि तीनों जन साथ में रहेंगे और इस तरह पिता का बेहतर ख्याल रखा जा सकेगा परंतु कोरोना की गंभीरता को देखते हुये डॉक्टर्स इस तरह की कोई सुविधा देने में असमर्थ थे।

क्युबिकल में हम सीनियर थे तो उन्हे हॉस्पिटल के तौर तरीकों की जानकारी देना हमारी भी जिम्मेदारी थी। एक दूसरे का सहयोग ही कोरोना वार्ड में सहारा होता है क्योंकि आपके परिजन तो आपसे मिलने आ नही सकते। नए मरीजों के जानने के लिए कई चीजें होती हैं; मसलन पीने के लिए गुनगुना पानी कहाँ से और कैसे मिलेगा, ओढ़ने के लिए एक और कंबल मांग लेना बेहतर रहेगा, भाप लेने के लिए कप में बोतल का पानी नही नल का पानी डालना होता है और रात का खाना आ चुका है इसलिए उन्हे हॉस्पिटल में पता करना पड़ेगा कि एक्स्ट्रा खाना है या फिर बाहर अपने परिजनों को फोन करके उनसे खाना भिजवाने के लिए कहना है।

उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि आईसीयू में अकेले पड़ गए उनके पिता के पास आवश्यक चीजें पहुँच पा रहीं हैं या नही। वे घर से अपने समान के बैग इस उम्मीद में लाये थे कि सभी साथ रहेंगे पर अब पिता के अलग रहने की स्थिति में उनका सामान एक बैग में करके भिजवाया तो वह मिसप्लेस हो गया। लगातार फोन करते रहने से संतुष्ट न होने पर बेटा वार्ड से निकल कर आईसीयू चला गया। कोरोना हॉस्पिटल  में इस तरह का मूवमेंट प्रतिबंधित है। बाहर से आया कोई सामान  वार्ड के गेट पर ट्रांसपोर्ट (सामान या मरीजों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए नियत हॉस्पिटल स्टाफ ) छोड़ जाता था जिसे वार्ड का स्टाफ अलग अलग क्युबिकल में मरीजों के पास पहुंचाता था। इसी तरह मरीजों को विभिन्न जांच इत्यादि के लिए ट्रांसपोर्ट वार्ड के गेट से ले जाता था और वापस वार्ड के गेट तक छोड़ जाता था। वार्ड से कोई भी सामान बाहर नही भेजा जा सकता था। बेटे के आईसीयू वार्ड चले जाने से एक असामान्य स्थिति उत्पन्न हो गई ।

उधर आईसीयू वार्ड में अकेले पड़े उनके पिता भी अत्यंत परेशानी महसूस कर रहे थे । वृद्धावस्था में व्यक्ति समान्यतः अपने परिजनों पर निर्भर हो जाता है । यद्यपि बातचीत से पता चला कि उनके पिता इतने अशक्त नही थे कि आईसीयू स्टाफ से सहयोग न मांग सकें परंतु कई वर्षों से चली आ रही परिजनों पर उनकी निर्भरता उन्हे हॉस्पिटल स्टाफ पर भरोसा करने या उनसे सहयोग मांगने से रोक रही थी। इधर माँ-बेटा और उधर पिता परेशान और हॉस्पिटल के बाहर उनके परिजन परेशान।

राजधानी कोरोना हॉस्पिटल पिछले कई महीनों से कोरोना प्रोटोकाल्स के तहत कार्य कर रहा था और इस तरह की स्थितियों से निपटने में वे समझ का परिचय दे रहे थे। पिता की कई राउंड की काउंसलिंग के बाद अंततः हॉस्पिटल के इंचार्ज ने उन्हे और हमारे क्युबिकल में आकर माँ-बेटे को समझाया। इंचार्ज के सहानुभूति भरे स्वर ने पिछली रात से चली आ रही उनकी शिकायत पर मरहम का कार्य किया। अब तक मिस्प्लेस्ड सामान भी मिल चुका था। इस तरह से वे माँ-बेटे अब सामान्य हो चुके थे। पिता से फोन पर हो रही उनकी बात से समझ आ रहा था कि अब वे भी नई परिस्थियों के अनुरूप स्वयं को ढाल रहे हैं।

उनके परिवार में कुल छह लोग थे। माँ-बाप, बेटा और उसकी पत्नी और उनके दो आठ और दस वर्षीय बच्चे। पिछले माह उनके किसी परिजन के घर में विवाह था और कुछ मेहमान उनके घर भी रुके थे। सारी सावधानी के बाद भी कोरोना ने उनके घर दस्तक दे ही दी। माँ-बाप की अधिक उम्र और मोहल्ले में कोरोना संक्रमित होने की बात फैलने  के डर ने उन्हे वाराणसी से दूर लखनऊ आने के लिए मजबूर किया। बेटे की पत्नी का कोरोना टेस्ट नही करवाया गया। पति टेस्ट करवा कर पॉज़िटिव होकर माँ-बाप के साथ था, पत्नी की भी रिपोर्ट पॉज़िटिव होती तो बच्चों को कौन संभालता ! अब स्थिति यह थी कि पत्नी और बच्चे घर पर बंद हैं। जिस परिजन के घर विवाह था उनका पूरा परिवार पॉज़िटिव हो गया था । कोरोना संक्रमित होने के बाद एक बड़ी ज़िम्मेदारी मोहल्ले में बात छुपाने की भी होती है अन्यथा घर में बंद होकर रहने में भी जीना मुश्किल हो जाता है।

अगले दिन राउंड पर आए डॉक्टर्स ने माँ-बेटे को बताया कि पिता की स्थिति पहले से बेहतर है और आश्वासन दिया कि एंटी वायरल का कोर्स पूरा होने तक कोई कांप्लीकेशन नही होती है तो उन्हे भी इस वार्ड में शिफ्ट किया जा सकता है। माँ-बेटे अपने परिजनों से बात करते हुये हॉस्पिटल स्टाफ और सुविधाओं की प्रशंसा कर रहे थे , यद्यपि पहली रात वे अत्यंत असंतुष्ट एवं नाराज थे

कोरोना बीमारी एक अभूतपूर्व स्थिति है । अभूतपूर्व इसलिए कि हॉस्पिटल के बाहर बैठे मरीज के परिजन उससे नही मिल सकते हैं। ऐसे में हॉस्पिटल स्टाफ का रोल अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। संभव है कि शुरुआत में कोरोना के बारे में जानकारी के अभाव ने सरकारी मेडिकल और पैरा-मेडिकल स्टाफ में डर फैलाया रहा हो पर मेरे अपने अनुभव यह कहते हैं कि इस बीमारी के खिलाफ लड़ाई में सरकारी मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ ने अभूतपूर्व कार्य किया। हमें याद है कि जुलाई  माह में एक आवश्यकता (कोरोना से इतर मामले में) पड़ने पर एक बेहद लोकप्रिय  निजी चिकित्सक ने फोन पर भी बात करने से यह कह कर मना कर दिया कि “मान लीजिये अभी मै डॉ हूँ ही नही।” वहीं जिला अस्पताल में कार्यरत एक चिकित्सक ने स्वयं रुचि लेकर सहयोग दिया जबकि उस समय वे स्वयं कोरोना संक्रमित होकर घर पड़े हुये थे। राजधानी कोरोना हॉस्पिटल लखनऊ के मेरे अनुभवों ने मेरी इस सोच को और मजबूत किया कि हमें सार्वजनिक  स्वास्थ्य व्यवस्था को और सुदृढ़ और समृद्ध करने की आवश्यकता है और स्वास्थ्य व्यवस्था हर हालत में सरकार के हाथ में रहनी चाहिए। जन स्वास्थ्य को लाभप्रदता के भंवरजाल से दूर रखा ही जाना चाहिए।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

वह अनाम व्यक्ति!



वह व्यक्ति अनाम ही रहा। एक मुख़्तसर सी मुलाक़ात में नाम जानने का समय ही नही मिला। कभी -कभी नाम जानना इतना जरूरी भी नही होता है।
SGPGI लखनऊ के राजधानी कोरोना हॉस्पिटल में ऐडमिट होने के बाद सबसे अधिक नज़र आने वाला व्यक्ति वही था। PPE किट में लिपटे हॉस्पिटल के स्टाफ की कोई इंडिविजुअल पहचान तो होती ही नही। किट पर ही लिखा, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ , पेशेंट हेल्पर और अटैंडेंट देखकर बस इतना पता चल पाता है कि ये हॉस्पिटल का स्टाफ है। मरीज़ की पहचान साफ होती है । सामान्य डील-डौल वाला वह व्यक्ति कुर्ता-पायजामा और बिना बांह का स्वेटर पहने लगातार पूरे वार्ड में चहलकदमी करता नज़र आ रहा था। ऐडमिट होते समय डॉ वार्ड में ही टहलते रहने को कहते भी हैं। कोरोना संक्रमित व्यक्ति की दुनिया तो वार्ड के गेट के अंदर तक ही होती है।
ऐडमिट होने के बाद की तमाम प्रक्रियाएं पूरी करते हुए हम उसे टहलते हुए देखते रहे। 
उसका टहलना देर रात तक जारी रहा। हॉस्पिटल पहुंचने के बाद पहला दिन तो हॉस्पिटल पहुंचने के शॉक में ही ख़त्म हो जाता है। जितनी जल्दी आप शॉक से उबर कर हॉस्पिटल की रूटीन से खुद को सिंक्रोनाइज कर लेते हैं उतना ही अच्छा है।
हॉस्पिटल में सुबह जल्दी होती है।और जगहों का नही पता पर यहां सुबह साढ़े पांच बजे ही हॉस्पिटल स्टॉफ विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी पैरामीटर्स की रिकार्डिंग शुरू कर देता है तो मज़बूरन आपको जागना ही पड़ता है। वैसे तो इस वार्ड में कुल छह क्युबिकल्स में 36 बेड हैं, ऐडमिट होते समय वार्ड में 15 मरीज़ थे। जब 15 पेशेंट्स एक वार्ड में हैं तो टॉयलेट्स लगातार स्वच्छ रह पाना बहुत कठिन होता है। टॉयलेट्स में वही टहलते रहने वाले सज्जन वाश बेसिन के शीशे साफ करते नज़र आये।
"साफ-सफ़ाई रखना मेरी आदत है। घर रहने पर भी सफाई मैं खुद ही करता हूँ। टॉयलेट्स की रेगुलर सफाई बहुत जरूरी होती है। यहां हूँ तो यहां की सफाई करता रह रहा हूँ। "
उन्होंने खुद ही बताया। 
उन्होंने शीशा चमकाने के बाद वाश बेसिन साफ करना शुरू कर दिया।
-पानी की केतली खाली कर के उसमें नया पानी भर लो फिर गरम करो।
हम गरम पानी लेने पहुंचे फिर वे वहां टहलते हुए मिले। 
-एक बार में ज्यादा पानी मत लो ज़रूरत पड़ने पर फिर आके ले लेना।
पानी गर्म होने तक उनसे बात करना हुआ। बात इकतरफा ही थी वही बोल रहे थे, हम सुन रहे थे। 
- दस दिन हो गए हमें यहाँ। डायबिटीज है, ब्लड प्रेशर है और पता नही क्या-क्या है। 69 साल उम्र है। मार्च से बचा रहा हूँ कि इस बीमारी से बचा रहूँ क्योंकि लग रहा था कि अगर मुझे हुई तो फिर ज़िंदा नही बचूंगा।
-जब पॉजिटिव हुआ तो अस्पताल आने का मन नही था लेकिन सब ने कहा कि यही बेहतर है। यहां आ कर लगा कि अच्छा किया कि आ गया। बेहतर ट्रीटमेंट मिल गया। अब देखिए कल सैंपल गया था बस थोड़ी देर में रिपोर्ट आने वाली है नेगटिव हो गए तो फिर शाम तक घर चला जाऊंगा। 
ये अंतिम बार था जब वे नज़र आये।
लंच वितरित हो ही रहा था कि लोगों के कदमों की आवाजें बढ़ गयी। PPE किट पहने हॉस्पिटल स्टाफ के चलने की आवाज अलग ही होती है।
बाहर जा कर देखा तो पता चला कि बगल वाले क्यूबिकल में एक पेशेंट सीरियस हो गया था। पूरे वार्ड का स्टाफ क्यूबिकल में उसके बेड के पास इकट्ठा था। कोई लगातार सीपीआर दे रहा था। वार्ड का स्टाफ तेज तेज बातें करते हुए उस मरीज़ को बचाने की कोशिश कर रहा था।
हमारे क्यूबिकल में उस समय कम मरीज़ थे।
- पता नही क्या हो गया बैठे-बैठे। बस खाना खाने की तैयारी कर रहे थे अचानक पीछे की ओर गिर गए
उस पेशेंट के बगल के बेड का पेशेंट हमारे क्यूबिकल में आ गया। उसने बताया
- शायद अटैक पड़ा होगा। 
-कितनी उम्र होगी
मैंने पूछा
-सत्तर के होने वाले थे। बताते थे। वैसे तो फिट थे दिन भर टहलते रहते थे। सुबह से उठ कर टॉयलेट्स की सफाई करते रहते थे।
हम हैरान रह गए।
-वही जो कुर्ता-पायजामा में घूमते रहते थे।
मन अजीब सा हो उठा। ऐसे कैसे हो सकता है। बिल्कुल चलता फिरता आदमी। 
स्वस्थ-प्रसन्न!
कोई एक घण्टे तक पूरा वार्ड स्टाफ उसे बचाने की कोशिश में जुटा रहा। फिर उसे ICU में भेज दिया गया।
हम सोच रहे थे कि कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट क्या आयी होगी। कोलैप्स करने के पहले उसे पता चला होगा कि नही।
अगले दिन पता चला कि वे नही रहे।
रिपोर्ट फिर से पॉजिटिव ही आयी थी।

रविवार, 20 दिसंबर 2020

कोरोना में मुस्कान!



उस बच्ची का नाम मुस्कान है पर चेहरे पर बस उदासी या आंसू नज़र आते हैं। हॉस्पिटल के रिकार्ड में 15 साल उम्र है पर दिखने में और छोटी लगती है।
पिछले कुछ दिनों से कोरोना से संक्रमित होने के कारण हम SJPGI के राजधानी कोरोना हॉस्पिटल में कोविड वार्ड में ऐडमिट हैं। हमारे क्यूबिकल में वह पांचवीं मरीज है। उसके ऐडमिट होने के बाद डॉक्टरों के राउंड में उनकी आपसी बातचीत में पता चला कि उसका दो वर्षों से SGPGI, लखनऊ से इलाज़ चल रहा है। केस हिस्ट्री में डायबिटीज  शामिल है, नियमित इन्सुलिन लगता है तथा डॉक्टरों की आपसी बातचीत में पता चला कि उन्हें लगता है कि उसे कुछ मानसिक समस्या भी है। 
एक 15 साल से कम उम्र की बच्ची  अगर अपने घर वालों से अलग हॉस्पिटल में अकेली बीमार  पड़ी है तो उसे मानसिक समस्या नही होगी तो क्या होगा।
मुस्कान विपन्न परिवार से है और महोबा की रहने वाली है। घर में दादी का पैर टूटा हुआ है कोई दिखाने वाला वहां नही है। उसके पिता किसी से कर्ज लेकर उसके नियमित इलाज़ के कंसल्टेशन के लिए दिखाने आये थे, यहां वह जांच में कोरोना पॉजिटिव निकल आयी तो हॉस्पिटल में अकेले डाल दी गयी। 
बताती है कि महोबा में 3 बार चेकअप हुआ हर बार निगेटिव आयी यहां टेस्ट हुआ तो पॉजिटिव हो गयी। उसे कोविड के सिम्टम्स तो नही हैं पर लगता है उसकी सीवियर मेडिकल हिस्ट्री के चलते  उसे कोरोना हॉस्पिटल में डाल दिया गया अब  निगेटिव होने के बाद ही अपने परिवार वालों से बात कर पायेगी या मिल पाएगी।
मुस्कान की हालत सोचिये! ऐसी निर्मम बीमारी जो सबसे पहले आपको आपके परिवार से, अपनो से अलग कर देती है। सोचिये कि अपने घर से कोसों दूर   बिल्कुल अज़नबियों के बीच बीमार पड़ी एक बच्ची ! ऐसी स्थिति जिसमें अपनों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, कोई भी व्यक्ति अकेला होगा तो परेशान ही होगा वो तो बस छोटी सी बच्ची है। इसलिए जब वह अचानक फूट फूट कर रोना शुरू करती है तो समझ में नही आता कि क्या कहें।
आज उसके लिए बाहर से कुछ सामान आया। सामान खोल कर देखा तो पिंक कलर की नई चप्पलें थीं। जिन चप्पलों को देखकर सामान्य परिस्थितियों में  वह प्रफुल्लित हो उठती, फूट-फूट कर रोने लगी।
क्या कहें!
(यह पोस्ट कोरोना वार्ड से लिखी गई है)

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