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बुधवार, 18 मार्च 2009

वरुण की बात में नया क्या है ?

वरुण के बयानों को लेकर हंगामा सा मचा हुआ है । आश्चर्य हमें भाजपा के विरोधियों की प्रतिक्रिया से नही है हमेंआश्चर्य भाजपा के नेताओं की प्रतिक्रिया पर हो रहा है । वरुण गांधी ने ऐसा कुछ नही कहा है जो भाजपा कीविचारधारा में शामिल नही रहा है । विश्वास न हो तो बस इसी हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ छद्म राष्ट्रवादियों की जगहजगह पर प्रतिक्रियाओं को देख लें ।

थोड़ा समय पीछे चलते हैं और लखनऊ में विधानसभा चुनाओं के पहले भाजपा नेताओं द्वारा जारी की गई सी डीको याद करते हैं। वरुण की बातें और उस सी डी में बातें एक ही जैसी कही गई हैं। उस सी डी को बाकायदा भाजपा केमंच से भाजपा के जमे जमाये नेताओं ने जारी किया था। उस सी डी के मामले में बाकायदा चुनाव आयोग नेमामला भी दर्ज किया था । अब चुनाव आयोग (जिसके एक स्वघोषित निष्पक्ष सदस्य दूसरे को कांग्रेसी घोषितकर चुके हैं ) उस मामले को दबा कर बैठा है । हो सकता है वरुण का मुद्दा भी वैसे ही दबा लिया जाय।

हम उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। फैजाबाद समेत अलग अलग जगहों पर रह चुके हैं और ९ साल की उम्र से चुनावसभाओं को देख समझ रहे हैं । संत, साध्वी कहे जाने वाले लोगों को सुना है , संघ परिवार की कार्यप्रणाली को बहुतनजदीक से देखा और समझा है , शिशु मंदिरों में पढ़ाई की है और वो समय अयोध्या के बहुत नजदीक गुजारा हैजब राम मन्दिर आन्दोलन चरम विन्दु पर था। हम देश के कोने कोने से आए कार सेवकों को नजदीक से देख सुनऔर समझ चुके हैं।

इतना देखने सुनने के बाद आज आश्चर्य नही होता कि कोई भाजपा का तथाकथित उभरता नेता कैसे बोल सकताहै। आश्चर्य इस बात पर होता है कि शाहनवाज और मुख्तार जैसे लोग सिर्फ़ दिखाने के लिए उस पर विरोध जतातेहैं।
इन्हे
अटल बिहारी का गोवा भाषण सही लगा था, २००२ का गुजरात सही लगा था , २००७ की सी डी सही लगीथी तो आज वरुण के भाषण पर ही ड्रामा करने की जरुरत क्या थी?

वस्तुतः भाजपा के चहेते बन चुके नरेंद्र मोदी का उदहारण भाजपा के अन्य नेताओं के सामने है। अपनी विचारधाराको डंके की चोट पर लागू करो (भाजपा की विचारधारा यही है जो नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के भाषणों में नजरआती है ) और फ़िर भाजपा के अन्दर भी कोई विरोध करने की हालत में नही रह पायेगा। २००२ के चुनावों के समयआडवाणी तक नरेंद्र मोदी से हरेन पंड्या के मुद्दे पर हार चुके हैं तो औरों की क्या बिसात। अब भाजपा केमहत्वाकांक्षी लोग जानते हैं कि उन्हें आगे बढ़ना है तो नरेंद्र मोदी से आगे निकलना होगा ।
वरुण
गांधी जो कर रहेहैं वह यही है ।
भाजपा
में आगे निकलने का यही रास्ता है।


शनिवार, 6 दिसंबर 2008

एक धुंधलाती हुई शाम की यादें

दिनांक 30 नवम्बर 1992 , फैजाबाद शहर के पास एक स्कूल के छात्रावास के बच्चों का ध्यान खींचते हैं धड़धडातेहुए उनके पास आ रहे सी आर पी ऍफ़ के ट्रक। बच्चों का खेल बंद हो जाता है और वो अपने कमरों की खिड़कियों सेचिपक जाते हैं। थोडी देर में स्कूल प्रबंधन से आधिकारिक सूचना जारी हो जाती है ।
स्कूल अनिश्चितकाल के लिए बंद और जल्दी से जल्दी छात्रावास खाली किया जाना है।
आख़िर बड़ों की लड़ाई चल रहीहो तो बच्चे पढाई कैसे करसकते हैं। उनकी कक्षाएं और
छात्रावास तो सी आर पी ऍफ़के अस्थायी कैम्प बनेंगे ।राहत की बात इतनी है किकैम्प अस्थाई होंगे।
उन बच्चों में एक बारह साल का बच्चा था । अपने सभी साथियों कीतरह वह भी खेल रहा था , अपने सभी साथियों की तरह वह भी खुशथा कि घर जाने का मौका मिल रहा है । लेकिन साथ ही साथ उसकादिल एक अनजाने डर से भरा जा रहा था।
30 नवम्बर 1992 की उस शाम वह महसूस कर सकता था कि सीआर पी ऍफ़ के ट्रक जो धूल उड़ाते हैं वो एक घुटन सी पैदा करती है। वह महसूस कर सकता था कि जब ठीक ठाकचल रहे समाज में आपात प्रबंधनों की नौबत आए तो यह खतरनाक होता है.
पिछले कुछ दिनों से प्रदेश के मुख्यमंत्री के , देश के प्रधान मंत्री के और ढेर सारे नेताओं के लगातार बयान आ रहे थेकि सबकुछ शांतिपूर्ण निपट जायेगा और सभी के साथ उसे भी भरोसा था पर राजनीति में रूचि रखने वाला वहबारह साल का बच्चा उन सी आर पी ऍफ़ के ट्रकों से असहज हो चला था।
वह एक अजीब सा दौर था ।
दरकती आस्थाओं का दौर
टूटते मिथकों का दौर
निस्तेज जो रहे नायकों का दौर
विभाजनों का दौर
अभी थोड़े ही दिन पहले एकाएक आदर्शवादी युवा सुनील कुमारों के नाम के आगे सिंह, त्रिपाठी , यादव और वर्माजुड़ गए थे ।
अभी कुछ दिन पहले जाति के विभाजनो की आग में युवाओं ने ख़ुद को, अपने सपनो को और उसके साथ समाजको झोंका था।

ये एक टूटन थी


अभी कुछ दिन पहले एक युवा नायक, जो देश को इक्कीसवीं सदी में ले जाने के सपने देख और दिखा रहा था, नेपिछले दिनों की रूढियों के सामने घुटने टेके थे ।
अभी कुछ दिन पहले एक मिस्टर क्लीन अचानक से बदरंग हो उठा था
अभी कुछ दिन पहले एक दिलों पर राज कर रहा सुपर स्टार अचानक नजर से गिर गया था
ये आदर्शों और नायकों का पतन था
ये दूसरी टूटन थी।

अभी कुछ दिन पहले समाज के सामने अर्थव्यवस्था का नया संकट आ पड़ा था । पुरानी आस्थाएं , सोचें, तौर-तरीके छोड़ कर पूरी अर्थव्यवस्था एक परिवर्तन के दौर से गुजर रही थी । एक परिवर्तन का दौर जब हर तरफ़आशंकाएं होती हैं जब हर तरफ़ आने वाली परिस्थियों को लेकर भय होता है ।
ये एक और टूटन थी

इन दरकती हुई आस्थाओं के दौर में जब कुछ भी पहले जैसा नही दिख रहा था ट्रकों से उड़ी धूल पूरे वातावरण कोएक घुटन से भर दे रही थी , उस बच्चे ने महसूस किया कि वो न जाने कहाँ आ गया है। उसने महसूस किया कि वोकुछ नही समझ पा रहा है ।


आज सोलह साल और बीत चुके हैं । उस ३० नवम्बर 1992 की धुंधलाती शाम और उसके बाद आने दिनों ने बहुतकुछ बदल कर रख दिया ।
आज 6 दिसम्बर 2008 को जब मुंबई हमलों के चलते विहिप शौर्य दिवस और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटीकाला दिवस नही माना रही है तो एक 28 साल का युवा ये जानने का बहुत इच्छुक है कि क्या हम उन दिनों कोपीछे छोड़ कर आगे नही बढ़ सकते? आज जब हम एकता का प्रदर्शन कर रहे हैं तो क्या इसी एकता को आगे नहीबढ़ाते रख सकते? क्या रखा है एक विवाद को यूँ ही आगे बढाते जाने में
अतीत का बोझ सबके लिए परेशानी बन रहा है तो क्यों न उसे उतार फेंके और कदम से कदम मिला कर चल पड़ेंएक नए भविष्य की ओर
क्या ऐसा हो पायेगा?

hamarivani

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