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मंगलवार, 20 मई 2014

मैत्रेय बुद्ध

फोटो : रौशन 
दिस्कित, नुब्रा घाटी 
लद्दाख 
मैत्रेय बुद्ध, की 32 मीटर  ऊंची प्रतिमा , लद्दाख के रेगिस्तानी इलाके नुब्रा घाटी के दिस्कित नामक स्थान पर 
माना जाता है की मैत्रेय भगवान बुद्ध के आने वाले अवतार हैं 
यहाँ हमें एक लामा मिला जो मैत्रेय बुद्ध के बारे मेँ जानकारी देने लगा । उसने अपनी शिक्षा वाराणसी से प्राप्त की थी । लखनऊ, आजमगढ़ , फैजाबाद, सुल्तानपुर, जौनपुर और थोड़े समय बनारस मेँ रहा शख्स इतने सुदूर उत्तर मेँ खुद को बनारस का तो बता ही सकता है सो हमने खुद को बनारस का रहने वाला बताया तो उसकी आँखों की चमक देखने लायक थी । 

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

रौशन के जन्म दिन पर !


कहावत है कि एक सेब रोजाना लेते रहने से आप बीमारियों से दूर रहते हैं ।

ऐसा ही शायद कुछ लोगों के साथ भी होता है । कुछ लोगों से रोज मिलते रहने या बात करते रहने भर से चिंतामुक्त रहा जा सकता है। ऐसा ही रौशन के साथ है ।

एक ऐसा दोस्त साथ बात करने के बाद महसूस होता है किजो कोई भी परेशानी मन में कहीं भी थी वो ख़त्म हो चुकी है। जिसके साथ बात करने के बाद महसूस होता है कि हर किसी परेशानी का हल खोजा जा सकता है और वो हल ख़ुद ही खोजा जा पाना सम्भव है ।


आज रौशन का जन्म दिन है । अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से (हिन्दी कैलेंडर के हिसाब से कल था , और वो दोनों जन्मदिन मनाता है )

जन्म दिन पर ढेर सारी शुभकामनाएं

सोमवार, 9 मार्च 2009

लोकसभा चुनावों में मेरा वोट

पिछले दिनों अपने गाँव गई तो मुझे पता चला कि मेरा नाम वहाँ की वोटर लिस्ट में शामिल है । मैंने तय किया कि लोकसभा चुनावों में मैं वोट करुँगी। इसके चलते मैंने पता करना शुरू किया फैजाबाद लोकसभा सीट से राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों के नाम।
निवर्तमान लोकसभा में फैजाबाद लोकसभा सीट बसपा के पास थी और यहाँ से सांसद रहे मित्रसेन यादव। मित्रसेन यादव बाहुबली नेताओं में गिने जाते हैं और वो कम्युनिस्ट पार्टी, सपा, बसपा होते हुए अब फ़िर से सपा में आ गए हैं और उन्हें सपा ने यहाँ से टिकट दिया है। उन्हें वोट दे पाना मेरे लिए सम्भव नही ही है।
भाजपा ने अयोध्या के विधायक लल्लू सिंह को टिकट दिया है । लल्लू सिंह कि छवि ठीक ठाक रही है पर अयोध्या जाने वाला कोई भी इंसान ये बता सकता है कि इतने समय से विधायक रहने के बाद भी लल्लू सिंह ने अयोध्या के लिए कुछ ऐसा नही किया है जिसे देख कर उन्हें लोकसभा में भी भेजा जाय, वो भी तब जब वो जिस पार्टी से हैं उसकी राजनीति अयोध्या के बूते पर ही खड़ी हुई है। इतना तो है की भाजपा ने अयोध्या के साथ जितना हो सकता है उससे ज्यादा खिलवाड़ किया है। हो सकता है बाकी लोग सोच भी लें भाजपा और लल्लू सिंह को वोट देने को पर मैं तो नही ही सोच सकती हूँ।
बसपा ने अयोध्या के राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र को फैजाबाद से टिकट दिया है । सुनने में आया है कि ये अच्छे प्रत्याशी हो सकते हैं ।
कांग्रेस ने फैजाबाद से अस्सी के दशक में सांसद रहे निर्मल खत्री को टिकट दिया है। निर्मल खत्री अच्छे नेताओं में गिने जाते हैं । फैजाबाद में उनके समय में विकास के काम भी हुए थे । राजनीति में रूचि रखने वाले लोगों के लिए वो राष्ट्रीय स्तर पर फैजाबाद के एक निर्विवादित चेहरे हैं।
अन्य प्रत्याशियों के बारे में अभी कोई ख़ास जानकारी नही है।
तो बसपा के विमलेन्द्र मिश्र और कांग्रेस के निर्मल खत्री में से चुनाव आसान दिखता है मेरे लिए। उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार देखने के बाद ये समझ में आता है की राष्ट्रीय स्तर पर बसपा की सरकार बने ये देश के लिए बुरा ही होगा।
पिछले पाँच सालों के कांग्रेस सरकार के काम-काज से बहुत संतुष्टि न भी मिले तो भी यह उपलब्ध विकल्पों में श्रेष्ठतम है।
दल और प्रत्याशी दोनों को देखने और समझने के बाद निर्मल खत्री मुझे फैजाबाद से सबसे अच्छे उम्मीदवार नजर आ रहे हैं।
मैंने तय किया है की आने वाले चुनावों में मैं निर्मल खत्री को वोट दे रही हूँ और उम्मीद करुँगी की देश में अगली सरकार कांग्रेस की ही बने ।

रविवार, 23 नवंबर 2008

पलाश के फूल!



एक दोस्त के ब्लॉग पर पलाश के फूल पर कविता पढ़ने को मिली तो मन किया कुछ लिखना चाहिए।

पलाश के फूल से पहला परिचय!, आज सोचती हूँ तो हंसी आती है।

बहुत पहले की बात है। एक दिन हम कुछ दोस्त एक गेम खेल रहे, थे जिसमे हमे कुछ गेस करने होते थे। मुझे जिसके बारे मे गेस मारने थे, उसका पसंदीदा फूल पलाश का फूल था और तब तक मुझे पता ही नही था की ये चीज़ क्या होती है। मेरा गेस ग़लत निकला। मैने ये मानने से मना कर दिया कि ऐसा कोई फूल होता भी है तो उसने एक कविता की लाइने बतायीं-

आए महंत बसंत

बैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला
मैं थोड़ा फ्र्स्टू टाइप की थी मुझे लगा कि उसने मुझे ग़लत गेस करने के लिए ही पलाश का फूल चुना था।

मै उससे जम कर गुस्सा हुई और कई दिन तक बात नही की।

काफ़ी दिन बाद मुझे खुद ही अपना गुस्सा भूलना पड़ा, क्योंकि उसने मेरे गुस्से को नोटिस ही नही किया।

बहुत दिन बाद जब उसे बताया कि मै उससे इस बात को ले कर गुस्सा थी तो उसने बड़ी मासूमियत से कहा कि अब कभी गुस्सा होना तो प्लीज़ बता देना कि तुम गुस्सा हो नही तो हमे पता ही नही चल पाएगा।

उसके बाद आजतक जब किसी को ये फूल पसंद करते हुए सुनती हूँ तो हँसी आती है खुद पर। जब किसी की कोई पसंद अनोखी होती है तो लगता है कि ये ही पसंद क्यों? किसी को पलाश का फूल पसंद है तो ज़रूर इसके पीछे कोई वजह होगी। हमारी कुछ उम्र ही ऐसी थी कि हम गेस करते थे कि कुछ इश्क-विश्क जैसा मामला होगा। हमने बहुत कोशिश की पता लगाने की।

लेकिन एक चुप तो हज़ार चुप!

कभी पता ही नही लगा कि आख़िर क्या कोई ऐसा मामला था। उसकी इस फूल की दीवानगी अभी तक है और उसके जन्म दिन के दिनो मे ही पलाश का फूल खिलता है मज़े की बात है कि वो इकट्ठा करता है ढेर सारे फूल अभी तक.



शनिवार, 15 नवंबर 2008

कष्ट में हम हिंदू भी हैं

आज भगवान् कि बड़ी याद आई कुछ नही समझ में आया तो सोचा कि कुछ लिख ही डाला जाय।
मेरा घर थोड़ा धार्मिक प्रवृत्ति वाला रहा है और धार्मिक कामों में सब को हमेशा खुशी का अनुभव होता रहा है।हमारा हिंदू धर्म भी कितना रोचक है इत्ती संख्या में देवी देवता और चुनने की आजादी कि क्या कहिये. कितनीमजा आती है कि आप किसी की भी पूजा कर सकते हैं. गाय को पूजिए या गंगा को, हनुमान जी के आगे मत्थाटेकिये या फ़िर दुर्गा जी की आरती कीजिये. चाहे एक साथ सब की पूजा कीजिये. मेरे घर के छोटे से मन्दिर मेंकुछ नही तो ८-१० भगवानो को जगह मिली हुई है और सब बड़े प्रेम से एक दुसरे के साथ रहते हैं.
इत्ते देवी देवताओं में मेरे पसंदीदा हनुमान जी रहे हैं। वैसे तो सबसे सुंदर गणेश जी लगते हैं पर जो भोलापन औरसुन्दरता हनुमान जी में है वो किसी और में नही दिखती . भला हर कोई भक्ति के लिए ख़ुद को सिन्दूर से कहाँढक सकता है.
मेरे गाँव में एक छोटा सा मन्दिर जैसा है जिसमे हनुमान जी विराजमान हैं। एक पेड़ भी है पीपल का जिसपे भैरोबाबा की पूजा होती है और वहीँ पर एक छोटा सा शिवलिंग भी है. वहीँ पास में एक पोखरा है वहां तीज त्योहारों परपूजा होती है पोखरे में मछलियाँ है लेकिन उन्हें मारा नही जाता मछली पकड़ने वाले दुसरे तालाबों का सहारा लेतेहैं.
ये मन्दिर, पेड़ के भैरो बाबा और शिवलिंग और पोखरा गाँव के लोगों के जीवन में शामिल हैं। शादी व्याह , जन्म-मृत्यु होली-दिवाली सब में भागी दार होते हैं. गाँव से जब शादी हो के लड़की विदा होती है तो विदा लेने इनतक भी जाती है.
कभी कभी कोई साधू बाबा आते थे ( अब शायद ऐसे साधू बाबा नही आते ) पोखरे के पास किसी का बगीचा है उसमेवो ठहरते और कीर्तन आदि करते रहते। गाँव वालों के लिए अच्छा मौका होता था हर किसी के घर से थोड़ा बहुतआटा दाल जाता . साधू बाबा लोग ख़ुद अपना खाना वहीँ बगीचे में बनाते और खाते. कभी एक दिन पता चलता किवो चले गए किसी और जगह.
इन साधू बाबा लोगों से कोई उनका घर जाती वगैरह नही पूछता था और इनके पास कुछ रहता भी नही था एकपोटली के सिवा। बगीचे में रहने के दौरान गाँव वालों ने जो दे दिया वो खा लिया और आशीष दिया और चलते बने.
हमारे देश में सब कुछ ऐसे ही सहज बना रहता था.
जो बाहर जाते वो कुछ और जगह पूजा करने का सुख पाते। मुझे खूब घूमने का मौका मिला बचपन से ही।फैजाबाद में अयोध्या की हनुमान गढ़ी, बड़ी बुआ बनारस में संकट मोचन, दिल्ली में हज़रात निजामुद्दीन, अजमेर शरीफ, मुंबई में हाजी अली सिद्धि-विनायक, विन्घ्याचल में अष्टभुजी , वैष्णो देवी एक लम्बी लिस्ट हैऔर हर जगह श्रद्धा अपने आप जग जाती रही है. हाँ देश के बाहर चाहे जितना अच्छा मन्दिर, दरगाह, चर्च होवहां श्रद्धा की जगह कौतुहल होता है एक नई चीज देखने का . पर इन सब जगहों के बावजूद जब मुसीबत मेंभगवान् की याद आती है तो फ़िर गाँव का वही छोटा सा हनुमान मन्दिर याद आता है. जब साधू संतों की बातआती है तो वही अनजाने से साधू बाबा याद आते हैं जिनको शायद याद सँभालने के बाद कभी देखा भी नही है.
सच अपने देश में धर्म इतना ही सहज रहा है
पर आज लगता है कि चीजें बदल रही हैं। बड़े बड़े नाम वाले और बड़ी बड़ी गाड़ियों वाले महंत नए साधू हैं.
गाँव का मन्दिर ठीक हों न हो पर आजकल रामसेतु जिसकी कभी पूजा भी न की हो जरूर बचा रहना चाहिए।
चलो ये भी ठीक है जो माने उनके संत, जो माने उनके मन्दिर पर बुरा तो तब लगता है जब ये लोग मेरे अपने देशको मेरे अपने धर्म के नाम पर बाटना चाहते हैं. बुरा तब लगता है जब कोई न जाने कैसे बना पीठाधीश धर्म केनाम पर अपने ही देश के उन लोगों को मरना चाहता है जिनकी गलती सिर्फ़ इतनी है कि वो उसी धर्म के हैं जिसधर्म के कुछ लोगो ने इन बाबाओं जैसे ही ग़लत काम किए.
हमारे सहज और सुंदर समाज में जहर घोला जा रहा है. ये दोनों धर्मों के धमाके करने वाले लोगों की मिलीभगतहो तो कोई आश्चर्य नही.
आज जब मै भगवान् को याद कर रही थी तो अपने गाँव की याद आई अपने भगवानो की याद आई।
मैंने अपने उस छोटे से मन्दिर के छोटे से हनुमान जी से पूछा कि क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है?
वो वैसे ही मुह पर ढेर सारा सिन्दूर पोते मुह फुलाए बैठे रहे।

सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

शिकायत

किया व्यापर दर्द का
दिया दर्द और हर बार दर्द ही तौला
फ़िर समेत कर सारी अधूरी हसरतें
पुराना सा एक म्यूज़ियम बना डाला।

बंद करली खिड़कियाँ सारी
डाल दिया दरवाजों पर ताला
कैद कर ढेर सारी पहचानी रोशनियाँ
एक गुमनाम अँधेरा बना डाला।

बनकर याद तुम्हारे दिल मे ही रही
तुमने ख़ुद अपने ही दिल को छला,
रोया मन जब भी तुम्हारा साथ देने को
मुस्कुराकर तुमने हर बार बेगाना बना डाला।

(ये कविता मैंने अपने ब्लॉग पर लिखी थी आज इसे यहाँ रख रही हूँ। जिन्होंने इसे वहां एक बार पढ़ लिया है उनसे दुबारा कष्ट देने के लिए क्षमा चाहूंगी।)

सोमवार, 13 अक्टूबर 2008

एक और कारखाना राजनीति की भेंट

एक घटना का पता चला है।उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती जी की सरकार ने रेल डिब्बे के कारखाने के लिए दी गई जमीन का आवंटन रद्द कर दिया है।

पता चला है कि भूमि पूजन के महज दो दिन पहले जिला अधिकारी महोदय को स्वप्न आया कि वहां के कृषकों में इस आवंटन को लेकर रोष है जो हिंसक हो सकता है।

पता नही जिलाधिकारी महोदय को यह स्वप्न इतना देर में देखने को क्यों कहा गया ।

पता नही अगर वहां मुख्यमंत्री जी को अगर को पार्क वार्क टाइप की चीज बनवानी होती तो क्या होता

सुनने में आया है कि आजकल वहां की सरकार सिर्फ़ पार्क और स्मृति उद्यान ही बनवाती है। क्षमा करें मूर्तियाँ भी लगवाती है और तहलका की माने तो जमीन पर बलात् कब्जे भी करती है

पता तो यह भी चला है कि रायबरेली के किसानो को भी अभी उस रोष कि जानकारी नही हो पायी है जो जिलाधिकारी महोदय के जरिये मुख्यमंत्री जी को हो गई।

सुनने में यह आया है कि इस तरह के रोषो का पूर्वाभास करने में सक्षम अधिकारी अब बादल पुर और गंगा तीव्र गामी राजमार्ग के लिए वास्तविक रोष में आ चुके किसानों के रोषों को कुचलते रहने के काम पर वापस चले जायेंगे।

चलिए कोई नही ये कारखाने कुछ ठीक होते भी नही आख़िर बुद्धदेब बाबु को परेशानी हुयी न

शनिवार, 6 सितंबर 2008

नाभिकीय कुहासा और भ्रम के साए

नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह में इस समय जम के जोड़ तोड़ चल रही है और वहीँ एक पत्र के खुलासे ने भारत में राजनीतिज्ञों को उत्तेजित कर रखा है। चलिए देखते हैं क्या है पत्र और क्या है उसके मतलब
गोपनीय पत्र
राष्ट्रपति बुश ने एक सांसद की एक प्रश्नावली के जवाब में ये पत्र जनवरी के आस-पास लिखा था उसमे उन्होंने भारत के परमाणु परिक्षण करने की दशा में अमेरिकी सरकार के संभावित क़दमों की चर्चा की है। पत्र में कई बातें हैं भारत को संवेदनशील तकनीकि न देने की भारत को आपूर्ति तुंरत रोकने की आदि आदि।
बवाल
बवाल यह है की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को गुमराह किया। अब सवाल ये उठता है की जो लोग आज ऐसी बातें कह रहे हैं क्या वो प्रधानमंत्री के बयानों का मतलब नही समझ रहे थे? धन्य हैं ये लोग जो सीधी बातें नही समझते हैं और इल्जाम दूसरों को देते हैं। प्रधानमंत्री जी ने स्पष्ट कहा था कि भारत को परमाणु परीक्षण का हक़ है और अमेरिका को प्रतिक्रिया का । और आप लोग क्या समझते हैं भारत को इस डील से परमाणु परीक्षण का हक़ मिलने जा रहा था? यह नागरिक समझौता है सैन्य नही । ये हमें समझना होगा।
1998 के परमाणु परीक्षण हमारी पीढी के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। उस समय हमें कई बातों का पता चला। सी टी बी टी क्या है , एन पी टी क्या है , भारत इन पर हस्ताक्षर क्यों नही करता आदि। उसी समय तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री ने भारत के तरफ़ से एकतरफा घोषणा की थी आगे परीक्षण न करने की। उस समय हमारे वैज्ञानिक समुदाय का सोचना था की अगर कोई बड़ा परिवर्तन नही आया तो हमें निकट भविष्य में परीक्षण करने की जरुरत नही होगी। जो आज शोरगुल कर रहे हैं उन्हें ये बताना होगा कि कौन सा ऐसा परिवर्तन आ गया है जिससे हमें परीक्षण करने कि जरुरत आ पड़ी है। उन्हें ये भी बताना होगा कि अगर ये डील नही होती है तब भी हमें परीक्षण करने पर प्रतिबन्ध झेलने पड़ेंगे तो फ़िर डील करके ही क्यों न झेलें । ऐसी वैज्ञानिक प्रगति किस काम की जिसका हम उपयोग ही न कर सकें ।
लोग शोर मचा रहे हैं कि सरकार अमेरिका को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। अगर ऐसा होता तो अब तक मामला नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह के पास लटका न होता सरकार ने बातें मान ली होती ।
हर बात में मीन मेख निकालने कि जगह अगर भाजपा जैसे समूहों ने सरकार को मदद कि पेशकश कि होती तो शायद वो अपनी छवि रचनात्मक बना पाते।
खैर अभी तो बात विएना में अटकी पड़ी है
देखिये क्या होता है
पर मेरी सलाह इन देशभक्तों को यही है कि देश हित सोचें पार्टी का हित अपने आप साध जाएगा ।

सोमवार, 1 सितंबर 2008

सोफ्टवेयर बाजार

सबसे पहले सभी लोगो को धन्वाद जिन्होंने हमारा पिछला पोस्ट पढ़ा और प्रतिक्रिया दी। लवली जी आपने ये पिछला पोस्ट निश्चित रूप से पढ़ा है हमारे ब्लॉग पर जिस पर अब हमने लिखना बंद कर दिया है। आपने वह भी प्रतिक्रिया दी थी इसलिए आपका ये लगना सही है की आपने इसे कहीं पढ़ा है। आपको एक ही चीज दो बार पढ़वाने के लिए माफ़ी चाहती हूँ।
पिछले दिनो मै दिल्ली में थी। उस समय एक दोस्त से मिलने गयी थी। नयी टेक्नालजी को पसंद करने वालो मे से एक रही है वो हमेशा से और जब मै उसे मिलने गयी तो वो अपने डेस्कटॉप से उलझी हुई थी. उसके साथ गुज़रे दो घंटे पूरे-पूरे कंप्यूटर के पास ही गुज़रे.वो माइक्रोसॉफ्ट का ऑपरेटिंग सिस्टम प्रयोग करती है और उस समय वो कुछ अपडेट तलाश रही थी.
मैने उसे ढेर सारी इधर उधर की वेबसाइट्स पर घूमते पाया मैने कहा कि तू सीधे माइक्रोसॉफ्ट की वेबसाइट पर अपडेट क्यों नही देखती तो उसने बताया की ढेर सारे अपडेट्स के लिए माइक्रोसॉफ्ट प्रामाणिक ऑपरेटिंग सिस्टम चाहता है जो मेरे पास है नही, तो फिर इधर उधर से ही खोजना पड़ेगा।
उसके पास से तो मै चली आई पर सोचती रही। मुझे पता है कि पयरेटेड सॉफ्टवेर प्रयोग करने वालों कि संख्या अपार है और इससे सॉफ्टवेर बनाने वाली कंपनियों को बड़ा घटा होता है और इसीलिए ये कंपनियाँ अपडेट्स और सपोर्ट उन्ही को उपलब्ध करती हैं जो प्रामाणिक वर्ज़न प्रयोग करते हैं। पर आश्चर्य कि बात है कि इस समस्या से निपटने के लिए अभी तक कुछ ठोस किया नही गया है।
फर्ज़ कीजिए कि आपको एक कंप्यूटर खरीदना है। आप के पास दो विकल्प होंगे आप अस्म्बॅल्ड कंप्यूटर ले या फिर ब्रांडेड। अस्म्बॅल्ड में आसानी यह रहती है कि आप वो चीज़ें तय कर सकते है जो आपको चाहिए वो भी कम कीमतों में. फिलहाल दोनो तरीकों मे आपको सॉफ्टवेर प्रामाणिक लेने के लिए अच्छा ख़ासा पैसा ज़्यादा खर्च करना पड़ेगा. जैसे माइक्रोसॉफ्ट का एक्स पी लेने के लिए आपको कोई 6000 रुपये ज़्यादा चाहिए जब कि पयरटेड एक्स पी आपको अक्सर मुफ़्त मिल जाता है. अगर आपको खरीदना भी पड़े तो कीमत कोई 200-300 के आस पास बैठेगी. काम दोनो वैसे ही करते हैं. अपडेट्स भी कहीं ना कहीं से मिल ही जाते हैं. अब कौन भला ओरिजिनल के चक्कर में पड़े
जी हाँ मै जानती हूँ कि यह उचित नही है, यह चोरी है लेकिन 300 और 6000 में फ़र्क काफ़ी बड़ा होता है.मै भी नैतिकता के सवाल मे उलझी रही.
मैने सोचा किसी व्यावहारिक और नैतिक इंसान से बात कि जाए. अब कवि से बड़ा नैतिकता का पैरोकार कौन होता है. मैने रौशन से बात की.कवि लोग सीधी बाते करने में भरोसा नही रखते मैने आपसे पहले भी अर्ज़ किया था.
रौशन ने शुरुआत ऐसे ही की। उसने मुझसे दो बातों पर विचार करने को कहा.
पहली बात टी-सिरीज़ कंपनी का भारतीय संगीत व्यापार में योगदान और दूसरी बात भारतीय वित्त मंत्रालय की स्वेच्छिक आय घोषणा योजना.
मेरा नाराज़ होना स्वाभाविक था मैने उसे बताया की मै अभी कुछ नैतिक और टेक्नोलॉजिकल मुद्दो पर चर्चा चाहती हूँ.
वो बताता रहा इन दोनो के बारे में
शायद मेरा नाराज़ होना ग़लत था
उसका कहना था कि सॉफ्टवेर कि ऊँची क़ीमतें लोगो को पयरेसी कि ओर धकेल रही हैं। अगर माइक्रोसॉफ्ट अपने सॉफ्टवेर कि कीमतों में कमी करके उन्हे प्रासंगिक बनाता है तो शायद वो ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को ओरिजिनल सॉफ्टवेर खरीदने के लिए राज़ी कर पाएगा और इस तरह शायद उसका फयडा भी ज़्यादा हो.टी सिरीज़ और उसके बाद और संगीत कंपनियों का अनुभव बताता है कि फ़ायदा हो सकता है. कंपनियों को थोड़ा व्यावहारिक कदम उठाने होंगे.उसकी सोच है कि अगर कंपनियाँ पयरटेड सॉफ्टवेर प्रयोग करने वालों को थोड़ी कीमत में प्रामाणिक मान लें और उन्हे अपडेट्स ऑनलाइन उपलब्ध करने का फ़ायदा दिखाएँ तो बहुत से लोग अपने सॉफ्टवेर को प्रामाणिक बनाने के लिए कुछ पैसे खर्च करने को तैयार हो सकते हैं
वस्तुतः इस तरह कंपनियाँ उस उपभोक्ता से भी कुछ पा लेंगी जिससे उसे कुछ भी नही मिलना था, और उपभोक्ता भी कंपनियों से जुड़ सकेंगे।विचार अच्छा हो सकता हैआज जब कंप्यूटर लोगो कि ज़रूरत बनता जा रहा है तो सॉफ्टवेर कि ऊँची कीमते ना उपभोक्ताओं के हित में हैं ना ही उत्पादकों के हित में।
मुझे याद है कि मेरे अपने लॅपटॉप का ऑपरेटिंग सिस्टम लॅपटॉप के साथ मिला था अगर मुझे खरीदना होता तो शायद मै भी नैतिक ना रह पाती

आपका क्या कहना है

बुधवार, 13 अगस्त 2008

स्वार्थ!

(इस प्रसंग के पात्र काल्पनिक नही हैं और वास्तविक जिन्दगी से उनका गहरा रिश्ता है। ये प्रसंग दिमाग में ऑरकुट पर एक स्क्रैप देख कर उपजा है।)
नीलू ने झटके से स्कूटी रोक दी अब वो कहीं दूर देख रही थी।
-दी! वो रही आपकी पंखुडी ब्लू सूट में। उन लोगो का क्लास ख़त्म हो गया है मै आपको उससे मिलवा दूँ?
नही मैं मिल लूँगी तुझे लेट हो रही होगी।-
हाँ वो तो है। अच्छा अब मै चलती हूँ। ये स्कूटी यही खड़ी कर देना और मुझे टाइम पर लेने आ जाना।
नीलू उछलते कूदते चल पड़ी अपने क्लास की ओर और मै रुक कर देखने लगी।तो ये है पंखुड़ी। मैने सोचा। मै स्कूटी पर ही बैठी रही. अचानक मुझे डर लगने लगा. अनिमेष कि बातें याद आने लगी. उसके अपने अंदाज में उसने सोचते हुए कहा था. शायद अच्छी लगती है पता नही पर मै बात बढ़ाना नही चाहता इसीलिए मैने आजतक उससे बात तक नही की है. वो अनिमेष जिसे मै चाहती थी और सोचती थी की कभी ना कभी उसके भी दिल में मेरे लिए ऐसा ही कुछ जागेगा, किसी और के प्रति आकर्षित था और उसकी आँखें कहती थी की ये आकर्षण कुछ ज़्यादा ही है.
मै क्यों मिलना चाहती थी पंखुड़ी से ये तो मुझे नही पता था पर उसे देख कर ऐसा लग रहा था की मै अनिमेष को खो ही चुकी हूँ। कितनी स्वीट दिख रही थी वो. मैने स्कूटी के शीशे में खुद को देखा. आँख मे जलन के भाव थे और मुझे अपना चेहरा अच्छा नही लगा।
वो एक और लड़की के साथ थी और अब एक पेड़ के गोल चबूतरे पर आ के दोनो बैठ गयीं। मैने साहस बटोरा और उसकी तरफ बढ़ गयी।
-एक्सक्यूस मी ये थर्ड ईयर बॉटेनी की क्लास कहाँ होती है?
मैने सीधे उसी से पूछा वो जैसे किसी सोच में थी उसके साथ की लड़की ने एक तरफ इशारा किया मैने उस दिशा में देखा तक नही।
-आप किस क्लास की हैं?
-थर्ड ईयर बॉटेनी
फिर साथ वाली लड़की ही बोली मैं थोड़ा झिझकी
- ये अनिमेष आपके ही क्लास में है ना? वो चला गया क्या?
अनिमेष नाम सुनते ही जैसे उसके कान खड़े हो गये दोनो मुझे एकदम से देखने लगीं।
-आपको अनिमेष से मिलना है?
साथ वाली लड़की ही बोली
-हाँ वो मेरा पुराना क्लासमेट है मै यहाँ आई थी तो सोचा की उससे मिल लूँ।
दोनों अभी भी मुझे घूर सी रही थी लगभग पंखुड़ी की आँखे कह रही थी कि इसे अनिमेष से कुछ मतलब तो ज़रूर है मेरा डर एकदम से पुख़्ता हो गया।
तू तो गयी बेटा। ये लड़की ले जाएगी अनिमेष को तुझसे छीन कर।
दोनो ने एक दूसरे को देखा। पंखुड़ी अब कुछ असहज सी थी। साथ वाली लड़की ही बोली फिर से
-वो आज नही आया है। शायद कही गया है
-मतलब शहर मे नही है?
- शहर में होता है तो कॉलेज ज़रूर आता है पर वो कल भी नही आया था।
ये पंखुड़ी गूंगी है क्या
मैने मन में सोचा। अब और पूछने को कुछ नही था मै भी अधिक असहज हुई जा रही थी।
- अच्छा थॅंक्स मै चलती हूँ।
मैंने बेमन से कहा मै मुड़ने को ही हुई तो अचानक एक दूसरी आवाज़ सुनाई दी।
- आपके पास उसका नंबर होगा पूछ लीजिए शायद हो ही शहर में
-ओह तो आप बोलती भी हैं
मैने मन मे सोचा
- असल में बहुत दिनो से हम मिले नही हैं तो नंबर भी नही है कोई। अगर आप के पास हो तो। वो बुरा नही मानेगा असल मे खुश ही होगा हम बहुत पुराने दोस्त हैं।
दोनो फिर एकदुसरे को देखती रहीं
-प्लीज़ उसे मत बताइएगा कि हमने दिया है नंबर
पंखुड़ी झिझकते हुए बोली।
- आपने अपना नाम ही कहाँ बताया है जो मै उसे बता दूँगी कि आपने दिया है
मै मुस्कुराइ
- ओह मै पंखुड़ी और ये सोनाली
वो अपना बैग खोलते हुए बोली
- मतलब उसे बताना है कि नंबर पंखुड़ी और सोनाली ने दिया है
- ओह नही प्लीज़ मै तो आपको नाम बता रही थी उसे मत कहियेगा
उसका हाथ रुक गया और वो घबडा सी गयी
- ट्रस्ट मी वो बुरा नही मानेगा। लेकिन आप कह रहीं हैं तो मै उसे नही कहूँगी हाँ अगर आप लोग ही ना बता दें।
जिन लोगो ने कभी किसी को चाहा होगा वो जानते होंगे कि कब किसी का नाम सुनकर किसी के हाथ कापने लग जाते हैं कब और क्यों किसी के बारे में बात करने का मन भी करते है और बात हो भी नही पाती और कब किसी और के मूह से उसका नाम सुनकर और ये जान कर कि कोई और उसके बारे मे हमसे ज़्यादा जानता है दिल बेतहाशा धड़कने लगता है। मैने पंखुड़ी के सामने ही अनिमेष के घर फ़ोन किया मुझे पता था कि वो घर पर नही है पर पूछा और अपना संदेश छोड़ा। मुझे पता था कि अगर उसके मन मे अनिमेष के लिए कुछ होगा तो मुझे पता चल जाएगा। और पता चल गया। मै जान चुकी थी कि सिर्फ़ अनिमेष ही नही चाहता उसे बल्कि वो भी चाहती है अनिमेष को। मै उदास हो चली थी. मै जानती थी कि दोनो एक क्लास मे पढ़ते हैं और कभी ना कभी दोनो एक दूसरे कि फीलिंग्स जान ही जाएँगे और तब मै खो दूँगी अनिमेष को हमेशा के लिए. मै मनाती रही कि दोनो एक दूसरे से कुछ ना कह पाएँ. ये थर्ड ईयर है साल ख़त्म होते ही दोनो के लिंक्स टूट जाएँगे. काश!. मैने तय किया कि मै अनिमेष को अपनी रीडिंग नही बताने वाली. कहीं कोई अपना बुरा खुद करता है. क्या हुआ कि वो नही चाहता मुझे पर कल किसने देखा है.
कहते हैं कि कभी कभी आपकी ज़ुबान पर सरस्वती का वास होता है और आप जो भी कहते हैं सच हो जाता है. साल ख़त्म हो गया. दोनो एक दूसरे से कुछ नही कह पाए. और अलग हो गये. मै अक्सर अनिमेष से पंखुड़ी के बारे में पूछती रही और वो हंस के टालता रहा. पर जब आप किसी को सच्चे मन से चाहते हैं तो उसकी उदासी पढ़ सकते हैं. आज इतने दिनो बाद भी जब अनिमेष उसके बारे मे सुनकर हंस के टाल देता है तो मुझे अंदर से कुछ चुभता है कि मै दोनो कि फीलिंग्स जानती थी मै दोनो के लिए कुछ कर सकती थी पर मैने नही किया.मुझे सबसे बुरा तो तब लगा जब मैने ये पूरी बात अनिमेष को बताई. मै पढ़ सकती थी उसके मन में क्या है. पर उसने मुस्कुरा कर मुझे डांटा कि जबर्दस्ती मै आपने को दोषी क्यों मानती हूँ. वो मुझे समझना लगा कि वो खुद इस बात को वही पर रोकना चाहता था. कहते हैं कि सच्चा प्यार खुशी देता है स्वार्थी नही होता. जब स्वार्थ आ जाता है तो प्यार नही मिल पाता. सच मे नही मिला ना पंखुड़ी को ना अनिमेष को, खैर मुझे तो मिलना ही नही था

शनिवार, 9 अगस्त 2008

हमारी भी बात

इस ब्लॉग पर हमारा ये पहला पोस्ट है। अपना ब्लॉग बंद करने के बाद रौशन का ब्लॉग हमारी पहली पसंद था और वैसे ही इस ब्लॉग के पास वर्ड्स हमारे पास पहले से ही थे. फिर भी उसे पूछना तो ज़रूरी ही था. तो पूछ लिया और उसे तो ना कहना ही नही था. सच तो है की वो ना तो कहता ही नही. वो ऐज यू विश बोल देता है और अगला मतलब निकालता रह जाए. हमने तो उसकी ऐज यू विश को हमेशा हा और चुप्पी को हमेशा ना न कहने की आदत के रूप मे जाना है।

हमारी ब्लॉग्स मे दिलचस्पी इधर थोड़े दिनो मे ज़्यादा बढ़ी है जब से हमने पाया कि देवनागरी में लिखना बड़ा आसान है. इधर कुछ और चीज़े हुईं जिन्होने काफ़ी काम आसान कर दिया. जैसे गूगल पर डॉक्युमेंट्स साझा करने कि सुविधा, क्विलपॅड और ब्लॉगर जैसी साइट्स पर हिन्दी टाइपिंग कि सुविधा और बढ़ता हुआ इंटरनेट का जाल. हमे याद है कि सालों पहले दिल्ली में साइबर केफे में रेट्स काफ़ी ज़्यादा हुआ करते थे अब ये लोगों कि पहुँच मे ज़्यादा आ रहे हैं. इंटरनेट कि वजह से सिटिज़न जर्नलिस्ट जैसे कॉन्सेप्ट भी बड़े लोकप्रिय हो रहे हैं और पढ़ने, बात करने और समझने के ज़्यादा अवसर मिल रहे हैं.

लब्बोलुआब यह है कि दुनिया छोटी हो के मुट्ठी मे आ रही है। लोग-बाग ब्लॉग्स में बहुत कुछ लिख रहे हैं. हमने देखा कि कविताओं, निजी डायरियों और अनुभवों की भरमार है. ये उन लोगों के हैं जो इंटरनेट कि वजह से अपने मन कि बात कह पाने मे ज़्यादा सक्षम हैं. समझ का एक विस्तार सा चल रहा है

ऐसे में हम क्या लिखें? कहने को तो बहुत कुछ या पर क्या सब कुछ कहा जा सकता है? वो ग़ालिब ने कहा है न


किसी को देके दिल कोई नवासंगे फुगा क्यों हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मूह में ज़ुबाँ क्यों हो


हम भी ग़ालिब की इज़्ज़त करते हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नही कि सामने मौका और उंगलियों तले की बोर्ड हो और हम चूक जाएँ। अब हम कोई कवि तो हैं नही.आप बोलेंगे कि कवि तो बोलता है, कहता है और लिखता हैयही तो ग़लत फ़हमी है ये जो कवि और शायर वग़ैरह होते हैं ये बड़े गोल मोल टाइप के इंसान होते हैं. बातों को घुमा कर लोगो को गोल गोल घमाने में इनका कोई सानी नही. ये कोई बात इसलिए लिखते हैं कि कोई और बात छुपानी होती है.तो इस ब्लॉग में हमारे सहभागी रौशन के उलट हम जो कुछ लिखेंगे सच लिखेंगे, सच्ची जिंदगी से लिखेंगे और कविता तो बिल्कुल नही करेंगे. और इसका उदाहरण है अगला पोस्ट जो एक प्रसंग है और हमारे ब्लॉग पर था उसे हम यहाँ ले कर आ रहे हैं।

बाकी जल्दी ही

hamarivani

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