रविवार, 10 मई 2009

उत्तर प्रदेश का चुनावी परिदृश्य-1

आज फ़िर बहुत दिनों के बाद लिखना हो पा रहा है इस बीच जहाँ कुछ लिखना सम्भव नही हो पा रहा है वहीँ अपनेमनपसंद ब्लॉग पढने का समय नही मिल पा रहा है

आम चुनाव

आम चुनाव अपने आखिरी चरण में पहुँच गया हैपहले जहाँ नेता जीत के दावे करते फ़िर रहे थे वहीँ अबएक-दूसरे को रिझाना शुरू कर दिया हैवोटर को रिझाना ख़त्म हुआ अब पार्टियों और नेताओं की बारी है
चुनाव शुरू होने से पहले उत्तर प्रदेश के बारे में कुछ ख़ास तरीके से सोचा जा रहा थाइस सोच में शामिल कुछ बातेंथीं:
- मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तरप्रदेश से ही कम से कम ४० सीटें तो पा ही सकती है
- कांग्रेस और भाजपा दोनों की स्थिति प्रदेश में बहुत ही बुरी है
- एक कांग्रेस - समाजवादी पार्टी गठबंधन स्वाभाविक गठबंधन है और अगर ये गठबंधन हो जाता है तोबसपा को घाटा पहुंचेगा


कांग्रेस-सपा गठबंधन

कांग्रेस-सपा गठबंधन को स्वाभाविक गठबंधन मानने वाले संभवतः इस एक बात को महत्त्व नही दे रहे थे कि दोनोंके अपने अलग पहलु हैंजहाँ सपा उत्तर प्रदेश में सिमटी हुई पार्टी है वहीँ कांग्रेस उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रदेश सेजनाधार गवां चुकी पार्टी हैउत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अधिक स्पेस देने का मतलब सपा के लिए अपने पाँव परकुल्हाडी मारने जैसा था और कांग्रेस के लिए सपा का प्रभुत्व मान लेने का मतलब था कि वो उत्तर प्रदेश को हमेशाके लिए गवां बैठेबिहार में राजद के साथ हुए गठबंधन के चलते वहाँ के कांग्रेसियों में चल रही कशमकश कोदेखने वाले जान सकते थे कि कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में १५ सीटों पर समझौता कर पाना फिलहाल कितनाकठिन होगा और सपा के लिए १५ से ज्यादा सीटें दे पाना कितना कठिन होगा
वैसे ये तो सच है कि एकसपा-कांग्रेस गठबंधन की आहट ने बसपा के नेताओं के चेहरे पर परेशानी ला ही दी थी

बसपा और लोकसभा चुनाव

बसपा की २००७ के विधानसभा चुनावों में सफलता ने तमाम समीक्षकों को अचंभित कर दिया थाउस सफलताको कुछ ने बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का नतीजा बताया कुछ ने और सारे कयास लगायेहमारा मानना हैकि बसपा की इस सफलता के एक नही अनेक पहलु थे
जारी है

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