शनिवार, 25 अप्रैल 2009

एक मूरत अचानक नजर आ गई

पिछले दिन

पिछले कुछ समय यूँ ही इधर-उधर भटकना लगा रहा इन्टरनेट पर पहुंचना मुश्किल सा रहा
ब्लॉग जगत से दूर रहना खला तो कई ऐसी जगहों पर भी जाना हुआ जहाँ जाना अच्छा लगा दिल्ली के भारतीयइस्लामिक सांस्कृतिक केन्द्र के छोटे से मगर प्रेरणादायक सम्मेलन से लेकर ऋषिकेश की गंगा की उछालभरीधाराओं तक बहुत कुछ ऐसा है, जिसे शेयर करने का मन है। कोशिश करेंगे जल्दी ही

चुनाव

जाने क्यों इस बार चुनावों में मन नही लग पा रहा है। हम बड़ी छोटी सी उम्र से ही चुनावों में हमेशा रूचि रखते रहेहैं और एक-एक सीट का हिसाब जबानी रटा रहता था। इस बार बड़ा बोरिंग सा दिख रहा है सब कुछ।
न्यूज़ पेपर्स में निकल रहा है कि पहले कैसे कैसे जन-प्रतिनिधि होते थे और कैसे -कैसे चुनाव होते थे।
राजनीति में कमियाँ नई नही है १९३७ के चुनावों के बाद भी कुछ लोग बदल गए थे , उनपर सत्ता का रंग चढ़ गयाथा। लेकिन पहले ये कमियाँ कम होती थीं।
राजनीति में अच्छी बातें भी कोई बहुत पुरानी नही हैं। अच्छे लोग अभी भी हैं लेकिन अब कम हैं

एक पुरानी सी याद

पापा की पोस्टिंग उन दिनों अविभाजित फैजाबाद में थी।
हमारी उम्र कोई सात-आठ साल की रही होगी , होली का समय था और हमारे लिए पिचकारी गई थी। हमपिचकारी में फीका सा रंग भर कर शिकार पर निकले हुए थे घर वापस पहुँचने पर हमने पाया कि पापा के साथकोई झक सफ़ेद कुरते में बैठा हुआ था हमारा मन मचल गया उस सफेदी पर पिचकारी चलाने को पर कुरते केमालिक ने हमारी पिचकारी पकड़ ली। पिचकारी टूट गई और हमने बुक्का फाड़ कर रोना शुरू कर दिया अब उनकुरता-धारी ने हमें मनाने की कोशिश शुरू की
उन्होंने वादा किया कि वो हमें पिचकारी टूटने का हर्जाना देंगे कुछ दिनों बाद जब वो फ़िर से हमारे घर आए तो उन्होंने हमें एक पेज दिया बतौर हर्जाना पेज पर एक ग़ज़ललिखी थी। (तब हमें ग़ज़ल नही पता होती थी क्या होती है। हमें बड़ी गुस्सा आई थी। बाद में समझ आया कि वोसबसे कीमती चीज किसी को दे सकते थे वो वही था जो उन्होंने हमें दिया था।)
लाइने थीं-
एक सूरत अचानक नजर गई,
मन विकल हो गया है नमन के लिए।
वो सज्जन थे स्थानीय कांग्रेसी विधायक और ग़ज़ल सम्राट नाम से विख्यात जिया राम शुक्ल "विकल साकेती "
विकल साकेती उन नेताओं में शामिल रहे हैं जिनके लिए राजनीति ताकत अर्जन का माध्यम कभी नही रही। कोईदस साल विधायक रहते हुए भी वो वैसे ही रहे जैसे हो सकते थे। उनका घर औसत ग्रामीण घरों जैसा ही बना रहा , घर पर आने वाले को विकल साकेती गुड खिला कर पानी पिलाते और प्रेम से मिलते , और तो और सरकारी हैण्डपम्प तक उनके घर से दूर लगा था
१९८९ में वो चुनाव हार गए। पापा का स्थानांतरण चुनाव के पहले ही हो चुका था पर हमारी रूचि कटेहरी विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में बनी हुई थी। विकल साकेती ने चुनाव हारने को भी मनोविनोद का माध्यम बनाया उन्हेंहराने वाले जनता दल के उम्मीदवार का मुह थोड़ा सा टेढा था विकल साकेती ने चुनाव के नतीजे आने परप्रतिक्रिया दी
वोट डालने गई थी जनता पीकर भांग,
हार गए श्री विकल जी, जीत गया विकलांग।

विजयी उम्मीदवार ने इसका बुरा नही माना था

मेरी वाली ग़ज़ल

विकल साकेती ने जो ग़ज़ल हमें लिख के दी थी वो कहीं गुम हो गई उसकी दो-एक लाइने पापा के गुनगुनाते रहनेसे याद रह पायी हैं
जो किनारे रहे वारुणी पा गए,
हमको विष मिल गया आचमन के लिए
प्यार की बूँद बनके बरस जाइए,
एक शोला विकल है शमन के लिए।
एक मूरत अचानक नज़र गई,
मन विकल हो गया है नमन के लिए

अफ़सोस कि पूरी याद नही रह सकी

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