सोमवार, 27 अप्रैल 2009

पहाडों की गोद में गंगा



ऋषिकेश से ऊपर बढ़ते हुए सड़क गंगा के किनारे ऊंचाई पर गंगा के किनारे चलती जाती है इस सड़क से गंगा कोदेखते रहना बहुत ही मनोरम होता है रास्ते में अनेक ऐसी ज़गाहें आती हैं जहाँ ये लगता है कि बस यहीं रुक जाएँऔर यूँ ही निहारते जाएँ
ये जगह , जहाँ की ये फोटो है , ऋषिकेश से थोड़ा ही ऊपर है पीछे दायीं तरफ़ आप एक बनती हुई ऊंची सी इमारतदेख सकते हैं। ये अपार्टमेंट्स बन रहें हैं और हमें पता चला कि सारे के सारे बिक चुके हैं। कल को जब ऐसे ही ढेरसारे ईंट के पहाड़ खड़े हो जायेंगे तो असली पहाड़ कहाँ जायेंगे जा सकते हैं पहाडों में तो हो आइये कल को ऐसेदृश्य बच पायें बच पायें।
एक दूसरा उपाय प्रकृति कि रक्षा के लिए कुछ सार्थक कदम उठाने का है पर क्या हम इतने खाली हैं कि प्रकृति केबारे में सोच सकें?


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10 टिप्‍पणियां:

  1. आपका प्रकृति पर चिंतन स्वाभाविक है......!!

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  2. आदमी को जहां जगह मिली वही बसता जा रहा है। जिस से ऐसे प्राकृतिक दृश्य नष्ट होते जा रहे हैं।बहुत सामयिक बात कही है आपने।

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  3. आदमी अपनी फितरत नहीं छोड़ता। वह प्रकृति को भी म्‍यूजियम बनाने पर तुला है।

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  4. pretty !
    where is this place in uttarakhand na?

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  5. इमारतें बनेंगी ही। पर जापानी कला मानकों को आत्मसात करते नेचर से ब्लेण्ड करती नहीं हो सकतीं क्या? मेरे ख्याल से आर्कीटेक्ट्स को सोचना चाहिये।
    एक अच्छे ला-कार्बूजिये की दरकार है।

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  6. प्रक्रति मुझे हमेशा से ही आकर्षित करती है इसलिए शायद मैं डिस्कवरी पर मैन vs वाईल्ड देखना कभी नहीं भूलता

    वैसे ज्ञान जी ने जो कहा उस से सहमत हूँ..

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  7. प्रकृति रक्षा के लिए हम सबको सचेत होना पडेगा।

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    S.B.A.
    TSALIIM.

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  8. I have visited this place more than three times and ye aisa place hai jahan baar baar jane ko dil karta hai!

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