शनिवार, 29 नवंबर 2008

मुबई के शहीद

आज काफ़ी देर से हम कुछ फोटो खोजने की कोशिश में लगे रहे। हम चाहते थे कि मुंबई के शहीदों के फोटो श्रद्धांजलि के रूप में यहाँ रखें । कुछ फोटो जो मिल सकीं हैं यहाँ हैं
शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का ऑरकुट का प्रोफाइल मिला है आप चाहे तो उन्हें यहाँ श्रद्दांजलि दे सकते हैं ।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

शहीद नरकगामी नही होते !

आज सुबह से मुंबई पर हमले की ख़बर देख देख कर वैसे ही बुरा महसूस हो रहा था हमने सोचा कि थोड़ाइन्टरनेट पर भी चीजें देख ली जाएँ। हिन्दी ब्लोग्स पर लोगों का इस घटना पर क्षोभ नजर रहा था। पर एकचीज देख कर दिल और दुखी हो आया


जहाँ एक ओर देश के राजनीतिज्ञों ने इस मामले पर एकजुटता कि वकालत कीहै वहीँ इस मामले पर कुछब्लोगर्स की प्रतिक्रिया कष्ट देने वाली रही। ऐसी प्रतिक्रियाओं को देख कर मन यही पूछता है कि ऐसेबंटवारे वाले समाज के लिए कहाँ सम्भव है आतंकवाद से लड़
पाना।


एक साहब सुबह से घूम घूम कर हर ब्लॉग पर जहाँ मुंबई पर हमलों की चर्चा की गई है वहां एक टिप्पणी डाले जा रहें हैं उस टिप्पणी के कुछ अंश तो देखिये


"बस गलती से किरेकिरे साहब वहा भी दो चार हिंदू आतंकवादी पकडने के जोश मे चले गये , और सच मे नरक गामी हो गये"


क्या कहें इस सोच के मालिकों को ?


इन साहब को हेमंत करकरे की अगुवाई वाली टी एस द्वारा प्रज्ञाओं और दयानंदों पर की जा रही कार्यवाही पर क्षोभ था शायद. ऐसा गुस्सा होना कोई ग़लत नही है . हमारी पुलिस दूध की धुली नही है कई बार उसके कार्य अनुचित पाये जाते हैं । वो मसला कोर्ट के जिम्मे है और कोर्ट देखेगी कि कौन दोषी है कौन नही





पर इस गुस्से में एक शहीद का अपमान कहाँ तक सही है?




मुंबई पुलिस ने अभी तक इस घटना में बहादुरी पूर्वक कार्यवाही की है। पुलिस के शीर्ष अधिकारियों ने आगे आकर कारवाही का नेतृत्व करते हुए अपने प्राणों की बलि दी है। इस जज्बे की सराहना होनी चाहिए .



करकरे साहब की बात करें तो सी एस टी पर जमा आतंकियों पर हमले का उन्होंने ख़ुद आगे बढ़ कर मुकाबला किया वो वरिष्ठ अधिकारी थे और पीछे से आदेश देते रह सकते थे लेकिन उन्होंने अपने जवानों के सामने एक उच्च आदर्श पेश किया। इस जज्बे का सम्मान किया जाना चाहिए. कुछ भाई लोगों ने लिख दिया है कि करकरे साहब हीरो बनने के चक्कर में मारे गए. तो उनसे हम पूछना चाहेंगे कि दिल मागे मोर की शैली में दुश्मन से लड़ जाने वाले विक्रम बत्रा के बारे में भी वो यही ख्याल रखते हैं? सीमाओं पर मारे जाने वाले हर बड़े अधिकारी के बारे में वो यही ख्याल रखते हैं?




क्यों सिर्फ़ करकरे की ही शहादत का मजाक बनाया जा रहा है क्यों अशोक कामते, सदानंद दांते और विजय सालस्कर की चर्चा नही हुई ?



हिंदू-मुस्लिम सोच में यह भूल जाना अफसोसनाक है कि जो शहीद हुआ है वो ड्यूटी पर आतंकियों का मुकाबला करते हुए शहीद हुआ है बेहद शर्मनाक है अपने शहीदों के बारे में बात करने का ये रवैय्या.


इन लोगों और मोहन चन्द्र शर्मा की शहादत पर सवाल उठाने वालों में फर्क क्या रह गया ?
एक भाई की सोच है कि करकरे को सिर्फ़ हिंदू आतंकवाद में ही महारत हासिल थी. अब उन्हें क्या पता किकरकरे एक वरिष्ठ आई पी एस अधिकारी थे और रा जैसी संस्था में काम कर चुके थे. उनके पिछले रिकॉर्ड काफ़ीअच्छे रहे थे. खैर जब इन भाई की सोच मालेगांव से आगे जा पाती तब !

जब समाज के चंद स्वयंभू ठेकेदार शहीद होने वाले पर इस तरह मजाक उडाने सा रवैय्या अपनायेंगे तो फ़िर कब तक जान पर खेल कर यूँ लड़ते रहेंगे। हमें बेहद अफ़सोस है अपने समाज के इस बँटवारे पर



इस तरह तो हो चुका आतंक का मुकाबला.



हमें बेहद अफ़सोस है !
हाँ इतना स्पष्ट कर दें कि शहीद नरकगामी नही होते !

हिन्दुस्तान पर हमला



मुंबई में जारी आतंकी हमले ने हम सभी देशवासियों को सकते में डाल दिया है। यह हमला संसद पर आतंकी हमले से एक कदम आगे जाता हुआ लगता है। ये हमला बताता है कि हम अंदरूनी झगडों में अपने देश की सुरक्षा भूल जा रहे हैं।
ऐसा बताया जा रहा है कि कोई छः मोटर बोटों में छब्बीस के करीब आतंकी करांची से मुंबई समुद्र के रस्ते दाखिल हुए। अगर ऐसा है तो न जाने कितने विदेशी समुद्र के रास्ते दाखिल होते होंगे और आगे भी होते रहेंगे। शायद समुद्री चौकसी को और अधिक सघन बनाना जरूरी होगा।
अभी तक मिली जानकारी के अनुसार छः विदेशियों सहित कोई 101 लोग मारे गएँ हैं जिसमे दो अमरीकी खुफिया अधिकारी भी शामिल हैं। नौ आतंकी पकड़े गए हैं जबकि चार मारे गए हैं ऐसा माना जाता है कि अभी तेरह आतंकी कुल तीन जगहों, होटल ताज और ओबेराय और छाबडा हॉउस में हैं और वहां सेना, एन एस जी और मुंबई पुलिस की कार्यवाही जारी है। ऐसा सुनने में आया है कि आतंकी होटलों में ब्रिटिश और अमरीकी पासपोर्ट धारकों को विशेष रूप से निशाना बना रहे थे इससे जाहिर होता है कि न सिर्फ़ इस घटना के तार अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से जुड़े हैं बल्कि भारत की छवि पर भी आतंकी निशाना साध रहे थे।
अभी तक नौ पुलिस कर्मी शहीद हुए हैं जिसमे एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त अशोक काम्टे, मुंबई पुलिस के एनकाउंटर विशेषज्ञ विजय सालस्कर और आईपीएस सदानंद दांते शामिल हैं। पुलिस के शीर्ष अधिकारियों ने जिस प्रकार मोर्चे पर आगे रहकर कुर्बानी दी है उसे देश याद रखेगा।
विपक्ष ने राजनैतिक विरोधों को दरकिनार करते हुए प्रधानमन्त्री को सहयोग का आश्वासन दिया है प्रधान मंत्री और विपक्ष के नेता साथ साथ मुंबई दौरे पर जाने की तैयारी में हैं।
पकिस्तान के विदेशमंत्री जो भारत के दौरे पर हैं, ने कहा है कि भारत और पकिस्तान की खुफिया एजेंसियों को हॉट लाइन के जरिये संपर्क में रहना चाहिए। उनका मानना है कि दोनों साझा दुश्मन के निशाने पर हैं। वैसे 19 सितम्बर के मैरिएट होटल और मुंबई के ताजा हमलों में पैटर्न की समानता देखी जा सकती है। आतंकी हमलों की जिम्मेदारी लेने वाले दक्कन मुजाहिदीन के पाकिस्तानी बेस के होने की बात पहले से ही जाहिर है। ऐसे में अगर पकिस्तान वास्तव में गंभीर है तो उसे भारतीय जांच एजेंसियों को पकिस्तान में जांच में सहयोग देना होगा। इस मुद्दे पर पकिस्तान की प्रतिक्रिया उसकी सही मंशा बता सकेगी।
इस बीच इस हमले के लिए केन्द्र और राज्य सरकार को जवाब देना चाहिए कि तमाम हाई एलर्ट और एन एस ए के साफ़ बयान के बावजूद इतनी बड़ी घटना कैसे घट जाती है.
मुंबई में मारे गए लोगों और शहीद पुलिस कर्मियों को हमारी श्रद्धांजली !

बुधवार, 26 नवंबर 2008

अब हिन्दी में भी फ्लोक ब्राउजर से ब्लोगिंग

जिन लोगों ने कभी फ्लोक ब्राउजर इस्तेमाल किया होगा उन्हें यह ब्राउजर काफ़ी पसंद आया होगा। कुछ समय पहले कुन्नु भाई ने इसपर अपने ब्लॉग में लिखा भी था। तब इसके साथ एक बड़ी परेशानी इसमें हिन्दी सही से न दिख पाने वाली थी । फ्लोक इस्तेमाल करने के बाद से हम लगातार खोज रहे थे कि किस तरह इसका इस्तेमाल हम जैसे हिन्दी वाले भी कर सकें। इसके लिए हमने फ्लोक को बाकायदा मेल भी किया था।
अभी कल हमने नए संस्करणों के लिए फ्लोक की वेबसाइट चेक की तो पता चला उन्होंने २.० संस्करण उतारा है और ये संस्करण देखने के बाद हमारा खुशी का ठिकाना नही रहा क्योंकि अब इसमे हिन्दी न सिर्फ़ सही दिख रह है बल्कि हिन्दी लिखी भी जा सकती है।


फ्लोक की सुविधाओं में इसमें इन बिल्ट फोटो अपलोडर, ब्लॉग एडिटर , मीडिया बार जैसी सुविधाओं का होना है। फीड रीडर से आप सीधे अपने फ्लोक पेज पर मनपसंद ब्लोग्स और वेबसाइट्स की ताजा चीजें पढ़ सकते हैं।
फ्लोक को वास्तव में सोशल ब्राउजर के रूप में प्रचारित किया जाता है और यह काफ़ी हद तक इसके फीचर्स देखने पर सही भी लगता है। यह सभी प्रमुख ब्लॉग्गिंग साइट्स और सोशल नेट्वर्किंग साइट्स के अपडेट्स सीधे आपके फ्लोक होम पेज पर देखने की सुविधा देता है



वस्तुतः फ्लोक मोजिला पर आधारित ब्राउजर की श्रेणी का एक ब्राउजर है और यह फायर फॉक्स के ३.० संस्करण की श्रेष्ठतम सुविधाओं का उपयोग करता है। मल्टी टास्किंग के लिए यह सबसे अच्छा ब्राउजर है।
आप फ्लोक यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं।

ब्लॉग एडीटर: ब्लॉग एडीटर की अब यही कमी रह गई है कि आपको हिन्दी में कॉपी-पेस्ट मारना पड़ेगा यहाँ पर
खैर तब तक इस सोशल ब्राउजर के फीचर्स का आनंद तो लिया ही जा सकता है .

रविवार, 23 नवंबर 2008

पलाश के फूल!



एक दोस्त के ब्लॉग पर पलाश के फूल पर कविता पढ़ने को मिली तो मन किया कुछ लिखना चाहिए।

पलाश के फूल से पहला परिचय!, आज सोचती हूँ तो हंसी आती है।

बहुत पहले की बात है। एक दिन हम कुछ दोस्त एक गेम खेल रहे, थे जिसमे हमे कुछ गेस करने होते थे। मुझे जिसके बारे मे गेस मारने थे, उसका पसंदीदा फूल पलाश का फूल था और तब तक मुझे पता ही नही था की ये चीज़ क्या होती है। मेरा गेस ग़लत निकला। मैने ये मानने से मना कर दिया कि ऐसा कोई फूल होता भी है तो उसने एक कविता की लाइने बतायीं-

आए महंत बसंत

बैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला
मैं थोड़ा फ्र्स्टू टाइप की थी मुझे लगा कि उसने मुझे ग़लत गेस करने के लिए ही पलाश का फूल चुना था।

मै उससे जम कर गुस्सा हुई और कई दिन तक बात नही की।

काफ़ी दिन बाद मुझे खुद ही अपना गुस्सा भूलना पड़ा, क्योंकि उसने मेरे गुस्से को नोटिस ही नही किया।

बहुत दिन बाद जब उसे बताया कि मै उससे इस बात को ले कर गुस्सा थी तो उसने बड़ी मासूमियत से कहा कि अब कभी गुस्सा होना तो प्लीज़ बता देना कि तुम गुस्सा हो नही तो हमे पता ही नही चल पाएगा।

उसके बाद आजतक जब किसी को ये फूल पसंद करते हुए सुनती हूँ तो हँसी आती है खुद पर। जब किसी की कोई पसंद अनोखी होती है तो लगता है कि ये ही पसंद क्यों? किसी को पलाश का फूल पसंद है तो ज़रूर इसके पीछे कोई वजह होगी। हमारी कुछ उम्र ही ऐसी थी कि हम गेस करते थे कि कुछ इश्क-विश्क जैसा मामला होगा। हमने बहुत कोशिश की पता लगाने की।

लेकिन एक चुप तो हज़ार चुप!

कभी पता ही नही लगा कि आख़िर क्या कोई ऐसा मामला था। उसकी इस फूल की दीवानगी अभी तक है और उसके जन्म दिन के दिनो मे ही पलाश का फूल खिलता है मज़े की बात है कि वो इकट्ठा करता है ढेर सारे फूल अभी तक.



गुरुवार, 20 नवंबर 2008

बेकार की फतवेबाजी

मौलाना फिरंगीमहली ने बच्चन की मधुशाला के ख़िलाफ़ फतवा जारी किया है।उन्होंने बताया कि फतवा जारी करने से पहले उन्होंने मधुशाला को पढ़ा औरकुछ पंक्तियों को गैर इस्लामी पाया।

वो
इस्लाम की व्याख्या कैसे करते हैं हमेंनही पता आख़िर वो मौलाना हैं इस्लाम की जैसे चाहे व्याख्या करने को आजादहैं पर वो साहित्य की व्याख्या करने की हैसियत में आते हैं या नही इसपर हमें सख्त ऐतराज है।

बच्चन ने मधुशाला के साथ ही उमर खैय्याम की रुबाइयों का भी अनुवादकिया। इन में भी मय, मधुशाला और साकी जैसी चीजें बड़ी मात्रा में आई हैं औरमधुशाला पढने वाला और समझने वाला शख्स यह बता सकता है कि इन चीजों का दार्शनिकता से गहरा नाता है।बच्चन ने मधुशाला कि जो प्रस्तावना लिखी है वह बेहद खूबसूरत है और मधुशाला की दार्शनिक समझ को पाठकोंके सामने पेश करती है। शायद मौलाना साहब ने उससमझने की कोशिश नही की होगी।

मौलाना साहब यह भी नही समझ पाये कि शराब के मायने क्या हैं और इस्लाम से उसका क्या सम्बन्ध है।

जब बच्चन बताते हैं कि मधुशाला प्रेम सिखाती है तो वह मजहबी जुनूनों को कटघरे में खड़ा करते है और इंसानी रिश्तोंके महत्त्व को बतलाते हैं। मजहबों की तारीख बताई जा सकती है पर इंसानी रिश्ते तारीखों से परे हैं और अगरमजहबी जूनून इन रिश्तों में ज़हर घोल रहे हैं तो ये मजहब को समझना होगा कि वो इन जुनूनों के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आए कि उस पर ऊँगली उठाने वालों के ख़िलाफ़।

हमने मधुशाला और बच्चन की शराब से जुड़ी जितनी चीजें पढ़ी हैं हर जगह प्रेम, दार्शनिकता और जिंदगी के जज्बेको पाया है और इसीलिए हमें पता है कि जो अदब को समझने वाले होंगे वो पढ़ते रहेंगे इसे।

फिरंगीमहली साहब ये फतवा बेकार की कसरत है, इन बातों में पड़ने की जगह अगर बड़े और जरूरी मुद्दों परध्यान दिया जाय तो बेहतर होगा।

रविवार, 16 नवंबर 2008

आपसी सामंजस की ज़रूरत है!

मैं नारी और पुरुष के आपसी सामंजस की बात कर रही हूँ, और दोनों को एक ही धुरी पर चलने की बात कर रही हूँ. मैं भूत के आधार पर वर्तमान की बात ना कर, बल्कि भविष्य के बारे में सोच, उसे आधार मानकर वर्तमान में बात कर रही हूँ. आने वाले पीढ़ी के बारे में सोच आज को सकारात्मक रूप देने का प्रयास दिमाग़ में रख उसके बारे में चर्चा कर रही हूँ. यह कहना अतिशयोक्ति नही होगा कि नारी और पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक दूसरे के बिना समाज़ के बारे में हम नही सोच सकते हैं, क्योंकि नारी और पुरुष एक दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर हैं!

मेरा मानना है, आप भूत के आधार पर भविष्य की कल्पना नही कर सकते. हमारा वर्तमान भविष्य का मार्ग दिखाता है. आज अगर नारियाँ ये आवाज़ उठाती हैं कि उन्हें बराबरी का हिस्सा चाहिए तो उन्हें खुद ही आगे आनी होगी और ये सोचना होगा कि किस तरह पुरुषों से कंधे मिलाकर चल सके. पुरुषों के तरह संघर्ष करने में खुद को पीछे छोड़, और आरक्षण के बल पर वो ना तो आगे बढ़ सकती हैं, और ना बढ़ेंगी. क्योंकि सही मायने में आरक्षण का मुनाफ़ा भी उन्हें ही मिल रहा है जिन्हे वास्तव में इसकी जररूरत नही है!

आज आरक्षण की माँग ज़्यादातर बड़े शहरों की पढ़ी लिखी महिलाएँ करती हैं, लेकिन उन्हें इसकी जररूरत नही है, ये ख़ुद को बुजदिल और पुरुषों से किसी भी बात में पीछे नही मानती हैं. जररूरत किन्हें है इसकी, ये पहचानना भी बहुत ज़रूरी है. वैसे लड़कियाँ अगर ख़ुद आगे बढ़ना चाहेगी तो उन्हें कोई नही रोक सकता है, लेकिन आज भी हमारी मानसिकता में कोई ख़ास बदलाव नही आया है. मैं बहुत करीब से ज़िंदगी को देखने की कोशिश कर रही हूँ और अभी बहुत कुछ देखना बाँकी है!

अपने घर का पुरुष सभी स्त्रियों को अच्छा एवं नेक लगता है, लेकिन दूसरा नलायक. ऐसा पुरुषों के साथ भी है, उन्हें अपने घर की नारियाँ देवी लगती है, बांकी बेकार! ऐसे नज़रिया को बदलना बहुत ज़रूरी है. सभी इंसान में अच्छाई और बुराई होती है, इसका मतलब यह नही की पूरे समाज़ पर दोषारोपण करना चाहिए. अगर कोई भी नारी सशक्तिकरण की बात करती हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने आस पास के झुग्गी झोपड़ी में जाकर दीप जलाने की बात करनी चाहिए, क्योंकि आज इसकी जररूरत है!

आवाज़ उठाने से पहले एक कदम आगे बढ़कर वहाँ सार्थक काम करने की ज़रूरत है, फिर ख़ुद बख़ुद सभी में बदलाव आएगा. हमे समाज में बदलाव लाने के लिए खुद ही आगे बढ़ना होगा, इसलिए ज़रूरत है ख़ुद के अंदर झाँकने की, अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाने की. ख़ुद बदलो सब बदलेगा!

और हाँ, ये पोस्ट मैं बहसबाज़ी करने के लिए नही लिखी हूँ, आप कृपया यहाँ सजेशन दे सकते हैं कि हम कैसे एक सार्थक समाज के बारे में सोचें एवं हमें इसके लिए क्या करना चाहिए. अगर ये नही हो सकता है तो फिर आराम से इग्नोर करें.

इस विषय पर और चर्चा के लिए यहाँ जाएँ

शनिवार, 15 नवंबर 2008

कष्ट में हम हिंदू भी हैं

आज भगवान् कि बड़ी याद आई कुछ नही समझ में आया तो सोचा कि कुछ लिख ही डाला जाय।
मेरा घर थोड़ा धार्मिक प्रवृत्ति वाला रहा है और धार्मिक कामों में सब को हमेशा खुशी का अनुभव होता रहा है।हमारा हिंदू धर्म भी कितना रोचक है इत्ती संख्या में देवी देवता और चुनने की आजादी कि क्या कहिये. कितनीमजा आती है कि आप किसी की भी पूजा कर सकते हैं. गाय को पूजिए या गंगा को, हनुमान जी के आगे मत्थाटेकिये या फ़िर दुर्गा जी की आरती कीजिये. चाहे एक साथ सब की पूजा कीजिये. मेरे घर के छोटे से मन्दिर मेंकुछ नही तो -१० भगवानो को जगह मिली हुई है और सब बड़े प्रेम से एक दुसरे के साथ रहते हैं.
इत्ते देवी देवताओं में मेरे पसंदीदा हनुमान जी रहे हैं। वैसे तो सबसे सुंदर गणेश जी लगते हैं पर जो भोलापन औरसुन्दरता हनुमान जी में है वो किसी और में नही दिखती . भला हर कोई भक्ति के लिए ख़ुद को सिन्दूर से कहाँढक सकता है.
मेरे गाँव में एक छोटा सा मन्दिर जैसा है जिसमे हनुमान जी विराजमान हैं। एक पेड़ भी है पीपल का जिसपे भैरोबाबा की पूजा होती है और वहीँ पर एक छोटा सा शिवलिंग भी है. वहीँ पास में एक पोखरा है वहां तीज त्योहारों परपूजा होती है पोखरे में मछलियाँ है लेकिन उन्हें मारा नही जाता मछली पकड़ने वाले दुसरे तालाबों का सहारा लेतेहैं.
ये मन्दिर, पेड़ के भैरो बाबा और शिवलिंग और पोखरा गाँव के लोगों के जीवन में शामिल हैं। शादी व्याह , जन्म-मृत्यु होली-दिवाली सब में भागी दार होते हैं. गाँव से जब शादी हो के लड़की विदा होती है तो विदा लेने इनतक भी जाती है.
कभी कभी कोई साधू बाबा आते थे ( अब शायद ऐसे साधू बाबा नही आते ) पोखरे के पास किसी का बगीचा है उसमेवो ठहरते और कीर्तन आदि करते रहते। गाँव वालों के लिए अच्छा मौका होता था हर किसी के घर से थोड़ा बहुतआटा दाल जाता . साधू बाबा लोग ख़ुद अपना खाना वहीँ बगीचे में बनाते और खाते. कभी एक दिन पता चलता किवो चले गए किसी और जगह.
इन साधू बाबा लोगों से कोई उनका घर जाती वगैरह नही पूछता था और इनके पास कुछ रहता भी नही था एकपोटली के सिवा। बगीचे में रहने के दौरान गाँव वालों ने जो दे दिया वो खा लिया और आशीष दिया और चलते बने.
हमारे देश में सब कुछ ऐसे ही सहज बना रहता था.
जो बाहर जाते वो कुछ और जगह पूजा करने का सुख पाते। मुझे खूब घूमने का मौका मिला बचपन से ही।फैजाबाद में अयोध्या की हनुमान गढ़ी, बड़ी बुआ बनारस में संकट मोचन, दिल्ली में हज़रात निजामुद्दीन, अजमेर शरीफ, मुंबई में हाजी अली सिद्धि-विनायक, विन्घ्याचल में अष्टभुजी , वैष्णो देवी एक लम्बी लिस्ट हैऔर हर जगह श्रद्धा अपने आप जग जाती रही है. हाँ देश के बाहर चाहे जितना अच्छा मन्दिर, दरगाह, चर्च होवहां श्रद्धा की जगह कौतुहल होता है एक नई चीज देखने का . पर इन सब जगहों के बावजूद जब मुसीबत मेंभगवान् की याद आती है तो फ़िर गाँव का वही छोटा सा हनुमान मन्दिर याद आता है. जब साधू संतों की बातआती है तो वही अनजाने से साधू बाबा याद आते हैं जिनको शायद याद सँभालने के बाद कभी देखा भी नही है.
सच अपने देश में धर्म इतना ही सहज रहा है
पर आज लगता है कि चीजें बदल रही हैं। बड़े बड़े नाम वाले और बड़ी बड़ी गाड़ियों वाले महंत नए साधू हैं.
गाँव का मन्दिर ठीक हों हो पर आजकल रामसेतु जिसकी कभी पूजा भी की हो जरूर बचा रहना चाहिए।
चलो ये भी ठीक है जो माने उनके संत, जो माने उनके मन्दिर पर बुरा तो तब लगता है जब ये लोग मेरे अपने देशको मेरे अपने धर्म के नाम पर बाटना चाहते हैं. बुरा तब लगता है जब कोई जाने कैसे बना पीठाधीश धर्म केनाम पर अपने ही देश के उन लोगों को मरना चाहता है जिनकी गलती सिर्फ़ इतनी है कि वो उसी धर्म के हैं जिसधर्म के कुछ लोगो ने इन बाबाओं जैसे ही ग़लत काम किए.
हमारे सहज और सुंदर समाज में जहर घोला जा रहा है. ये दोनों धर्मों के धमाके करने वाले लोगों की मिलीभगतहो तो कोई आश्चर्य नही.
आज जब मै भगवान् को याद कर रही थी तो अपने गाँव की याद आई अपने भगवानो की याद आई।
मैंने अपने उस छोटे से मन्दिर के छोटे से हनुमान जी से पूछा कि क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है?
वो वैसे ही मुह पर ढेर सारा सिन्दूर पोते मुह फुलाए बैठे रहे।

गुरुवार, 13 नवंबर 2008

मीडिया की धुन पर नाचती भाजपा और संत मंडली

प्रमोद महाजन के ज़माने से ही भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट कमाल का रहता रहा है पर आजकल लगता है मीडिया की समझ भाजपा और उसके संत साथी कर पाने में असफल हो रहे हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है वर्तमान मालेगांव जांच पर इस समूह के बयान।
अभी कुछ दिन पहले मीडिया में जोर शोर से हंगामा मचना शुरू हुआ कि मुंबई पुलिस ने यु पीके एक विधायक से पूछतांछ करने कीअनुमति मांगी है फ़िर क्या था अटकलों का बाजार गर्म हो चला। और शुरू हो गई बयान बाजी। नाम गोरखपुर का आया और आदित्यनाथ कूद पड़े मैदान में । उन्हें लगा कि पुलिस उन तक या उनके किसी समर्थक तक पहुँचने वाली है और उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया। देश के दुसरे हिस्सों से स्व घोषित संतों के बयान भी आने लगे कोई पल्ला झाड़ता कोई मुंबई पुलिस और कांग्रेस पर आरोप लगाता । राजनाथ सिंह तो तैश भरे स्वरों में बताते रहे कि कैसे आदित्यनाथ शराफत के पुतले हैं और उनको पूरी भाजपा जानती है।
इधर मुंबई पुलिस चुपचाप कानपुर पहुंचती है और जिसे पकड़ती है उसे शायद भाजपा और उसके साथी जानते तक नही थे। सवाल उठता है कि क्या ये शोरगुल चोर की दाढ़ी में तिनके का मामला था या फ़िर भाजपा सच में यही समझ रही है कि ये कांग्रेस की चाल है और जो लोग पकड़े गए हैं वो निर्दोष हैं। क्या अगर पुलिस और सरकार हिन्दुओं को बदनाम करने कीसाजिश पर ही काम कर रही थी तो सुधाकर उर्फ़ दयानंद उर्फ़......... जाने क्या क्या को पकड़ने से अधिक बेहतर आदित्यनाथ या किसी और ऐसी मछली को पकड़ना नही रहता? पकड़े गए स्वघोषित शंकराचार्य से तो उसे वो फायदा नही मिलने वाला है अपनी साजिश में। (सुनने में आया है कि इस व्यक्ति ने महापीठाधिश्वर की उपाधि के लिए काशी विद्वत परिषद् को लाखों रूपये दिए थे सच क्या है पता नही. )

वास्तव में भाजपा को शायद उनके दोषी या निर्दोष होने की जानकारी ही नही है। उसे तो महसूस हो रहा है कि प्रज्ञा का मामला उसे चुनावी फायदा दिला सकता है आखिर कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने का अच्छा मौका है। सभी जानते हैं कि ऐसी जांचों में दोषी या निर्दोष का सवाल कोर्ट की कार्यवाही के बाद ही समझ में आ पायेगा और उसमे समय है हो सकता है चुनाओं के नाव इसी से पार हो जाय।
ऐसा ही शोर प्रज्ञा के नारको टेस्ट को लेकर मचा हुआ है। लोग कह रहे हैं कि उसके टेस्ट में कुछ नही मिल रहा है इसलिए पुलिस बार बार उसके टेस्ट करवा रही है। जिन्हें इस टेस्ट के बारे में जानकारी होगी वो जानते होंगे कि इस टेस्ट में सवालों की एक लिस्ट होती है और उस लिस्ट के पूरे होने को टेस्ट का पूरा होना माना जाता है । अब ये लिस्ट एक सेशन में पूरी हो या कई में अब इसे आप एक टेस्ट के कई सेशन मान लें या कई टेस्ट। प्रक्रिया तभी पूरी होती है जब प्रश्न पूरे हो जाते हैं॥
अब इसे मीडिया प्रश्नों की संख्या और टेस्ट की संख्या का शोर मचाती हुई घूम रही है और भाजपा और उसके साथी उसी पर आपत्ति करते हुए।
अभी राजनाथ सिंह ने सवाल उठाया कि पुलिस के पास अगर सबूत हैं तो वह उसे जनता के सामने क्यों नही लाती । और मामलों में तो मीडिया पर विश्वास करके बयानबाजी जारी रह रही है मगर यहाँ नही । यहाँ अगर मीडिया में खबरें आ रहीं हैं कि प्रज्ञा से पूछा गया कि मृतकों की संख्या कम क्यों है या वह अपनी मोटर साइकिल के बारे में पूछती है तो इसका मतलब क्यों नही लगाया जा रहा है . क्या जो अपने मुफीद लगे उसी में मीडिया की बात मानी जानी है?
एक सवाल और भी उठता है दिल्ली में पकड़े गए युवकों के बारे में किसी ने सबूतों की मांग की होती तो उसे कैसे लिया जाता।
लगता है इस जांच के सिलसिले में लोग उन लोगों को भूल से गए हैं। लेकिन विश्वास कीजिये पुलिस नही भूली है और अभी उन्हें गुजरात पुलिस ने दिल्ली पुलिस से रिमाण्ड पर ले रखा हुआ है और गुजरात ने चार्जशीट भी दाखिल कर दी है उधर दिल्ली पुलिस नाराज है कि गुजरात पुलिस अधिक समय ले रही है और उनका काम रुका पड़ा है।
खैर चलते चलते आदित्यनाथ के बयान में शामिल एक बात। आदित्यनाथ ने अपने बयान में कहा कि अगर हिंदू समाज ऐसी (मालेगांव जैसी ) कार्यवाहियां करने ही लगे तो फ़िर तो देश सुधर ही जायेगा
सवाल यह है कि क्या इसे आग भड़काने वाली और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली बात नही माना जाय? और क्या उनकी बातों से उनके दल और उससे सम्बन्ध रखने वाले लोग सहमत हैं?

बुधवार, 12 नवंबर 2008

भाजपा को गाँधी नाम का सहारा

अभी कुछ दिन पहले एक वरिष्ठ ब्लॉगर ने हमें भाजपा पर चिंतन करने का काम सौपा था । कुछ ज्यादा सोचते तभी भाजपा ने लोक सभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की दूसरी सुचीजारी कर दी । हमें लगा शुरुआत यहीं से करना ठीक रहेगा।
भाजपा की लोकसभा उम्मीदवारों की दूसरी सूची में भी लखनऊ सीट का मामला तय नही हो पाया। कई बार से भाजपा की पहली सूची में स्थान पाने वाला लखनऊ अभी कशमकश में है। लखनऊ सीट से भाजपा में कई नाम चल रहे हैं जिसमें प्रमुख हैं लालजी टंडन, कलराज मिश्रा , मेयर दिनेश शर्मा और पूर्व मेयर एस सी राय । वैसे अटल बिहारी लड़ते तो ज्यादा अच्छा रहता हमें एक बार और उनके ख़िलाफ़ वोट देने का मौका मिलता।
खैर भाजपा की दूसरी सूची
लगता है अब भाजपा भी उत्तर प्रदेश में ख़ुद को गाँधी परिवार से फ़ायदा लेने की स्थिति में देखना चाहती है तभी तो पहली सूची में दो नाम उसी परिवार से हैं। मेनका गाँधी जहाँ अब तक जे डी यु की सीट रही आंवला से लड़ रही हैं वहीँ उन्होंने अपनी पीलीभीत सीट अपने पुत्र वरुण के लिए छोड़ दी है । वरुण का भी नाम इस दूसरी सूची में है। देखने वाली बात यह होगी किअभी तक मेनका और उनके पति संजय के ख़िलाफ़ तमाम प्रचार करती रहने वाली संघ परिवार की चरित्र हत्या ब्रिगेड क्या करती है इस ब्रिगेड के कम से कम एक स्वयंभू सदस्य हिन्दी ब्लॉग जगत में भी काफ़ी सक्रिय हैं.
अभी कुछ दिन पहले हमने उनके ब्लॉग पर तमाम अनजाने सूत्रों से प्राप्त जानकारियों का भण्डार पाया था।
एक ही हार ने जोशी जी जैसे भारत माता की धरोहर का दिल ऐसा तोड़ दिया कि संगम का त्याग करके वाराणसी का रास्ता पकड़ लिया। खैर करियर के अन्तिम समय में बनारस जाना यूँ भी धार्मिक लिहाज से उचित था .
राजनाथ सिंह जी ने लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत करके अच्छा ही किया आख़िर उच्च पद की उम्मीदवारी के किसी मौके में हो सकता है यह भी काम आ जाय ।
कल्याण सिंह , पकंज चौधरी , योगी, अशोक प्रधान और संतोष गंगवार के नामों में कोई विवाद नही था ये सब सिटिंग सांसद हैं और पिछले लोकसभा में पहुँच पाने में कामयाब लोगों को छोड़ना उचित नही था। रामपुर से मुख्तार अब्बास नकवी के अलावा कोई और प्रत्याशी नही था .
इस समूह में वाराणसी कांग्रेस के पास है और एटा और रामपुर सपा के पास है और आंवला जे डी यु के पास जब कि अन्य सीटें भाजपा के ही पास हैं। गाजियावाद नयी सीट है.
उम्मीद है इन दिग्गजों के सहारे भाजपा अपनी खोयी जमीन वापस पाने की कोशिश करेगी में भाजपा को उत्तर प्रदेश से देतें मिली थीं तब से लगातार भाजपा तेजी से घटती रही है पिछले चिनावों में वह बमुश्किल दहाई का आंकडा छू पाई थी।
मजे की बात यह है कि अभी तक जिन नामों की सूची भाजपा ने जारी की है उसमे पार्टी के वरिष्ठ नेता ही रहे हैं. राजनाथ सिंह भले ही पहला चुनाव लड़ रहे हों पर वह भाजपा के अध्यक्ष हैं. इस प्रकार इस सूची में पहला चुनाव लड़ रहे वरुण का नाम कुछ तो संदेश देता ही है.

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