सोमवार, 27 अप्रैल 2009

पहाडों की गोद में गंगा



ऋषिकेश से ऊपर बढ़ते हुए सड़क गंगा के किनारे ऊंचाई पर गंगा के किनारे चलती जाती है इस सड़क से गंगा कोदेखते रहना बहुत ही मनोरम होता है रास्ते में अनेक ऐसी ज़गाहें आती हैं जहाँ ये लगता है कि बस यहीं रुक जाएँऔर यूँ ही निहारते जाएँ
ये जगह , जहाँ की ये फोटो है , ऋषिकेश से थोड़ा ही ऊपर है पीछे दायीं तरफ़ आप एक बनती हुई ऊंची सी इमारतदेख सकते हैं। ये अपार्टमेंट्स बन रहें हैं और हमें पता चला कि सारे के सारे बिक चुके हैं। कल को जब ऐसे ही ढेरसारे ईंट के पहाड़ खड़े हो जायेंगे तो असली पहाड़ कहाँ जायेंगे जा सकते हैं पहाडों में तो हो आइये कल को ऐसेदृश्य बच पायें बच पायें।
एक दूसरा उपाय प्रकृति कि रक्षा के लिए कुछ सार्थक कदम उठाने का है पर क्या हम इतने खाली हैं कि प्रकृति केबारे में सोच सकें?


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रविवार, 26 अप्रैल 2009

विकलांगता और फिटनेस के अजीब नियम

हमारे एक मित्र की एक आँख चोट की वज़ह से जा चुकी है पर नियमों के अनुसार उसकी विकलांगता का प्रतिशत40 से कम आता है और वह सामान्य श्रेणी से ही नौकरियों में आवेदन कर सकता हैइसीलिए वह हमेशा सामान्यश्रेणी से ही परीक्षाएं देता रहता है
हाल ही में उसका चयन स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से हुआमेडिकल जांच में उसे सेवाके लिए अनफिट पाया गया
अजीब बात है की अगर उसकी विकलांगता का प्रतिशत थोड़ा सा और होता तो उसे उसी सेवा में सिर्फ़ आरक्षणमिलता बल्कि वह फिट भी होताअब थोड़ा कम विकलांगता प्रतिशत होने के चलते वह सामान्य श्रेणी से परीक्षाउत्तीर्ण करके भी सेवा में नही जा सकता

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

एक मूरत अचानक नजर आ गई

पिछले दिन

पिछले कुछ समय यूँ ही इधर-उधर भटकना लगा रहा इन्टरनेट पर पहुंचना मुश्किल सा रहा
ब्लॉग जगत से दूर रहना खला तो कई ऐसी जगहों पर भी जाना हुआ जहाँ जाना अच्छा लगा दिल्ली के भारतीयइस्लामिक सांस्कृतिक केन्द्र के छोटे से मगर प्रेरणादायक सम्मेलन से लेकर ऋषिकेश की गंगा की उछालभरीधाराओं तक बहुत कुछ ऐसा है, जिसे शेयर करने का मन है। कोशिश करेंगे जल्दी ही

चुनाव

जाने क्यों इस बार चुनावों में मन नही लग पा रहा है। हम बड़ी छोटी सी उम्र से ही चुनावों में हमेशा रूचि रखते रहेहैं और एक-एक सीट का हिसाब जबानी रटा रहता था। इस बार बड़ा बोरिंग सा दिख रहा है सब कुछ।
न्यूज़ पेपर्स में निकल रहा है कि पहले कैसे कैसे जन-प्रतिनिधि होते थे और कैसे -कैसे चुनाव होते थे।
राजनीति में कमियाँ नई नही है १९३७ के चुनावों के बाद भी कुछ लोग बदल गए थे , उनपर सत्ता का रंग चढ़ गयाथा। लेकिन पहले ये कमियाँ कम होती थीं।
राजनीति में अच्छी बातें भी कोई बहुत पुरानी नही हैं। अच्छे लोग अभी भी हैं लेकिन अब कम हैं

एक पुरानी सी याद

पापा की पोस्टिंग उन दिनों अविभाजित फैजाबाद में थी।
हमारी उम्र कोई सात-आठ साल की रही होगी , होली का समय था और हमारे लिए पिचकारी गई थी। हमपिचकारी में फीका सा रंग भर कर शिकार पर निकले हुए थे घर वापस पहुँचने पर हमने पाया कि पापा के साथकोई झक सफ़ेद कुरते में बैठा हुआ था हमारा मन मचल गया उस सफेदी पर पिचकारी चलाने को पर कुरते केमालिक ने हमारी पिचकारी पकड़ ली। पिचकारी टूट गई और हमने बुक्का फाड़ कर रोना शुरू कर दिया अब उनकुरता-धारी ने हमें मनाने की कोशिश शुरू की
उन्होंने वादा किया कि वो हमें पिचकारी टूटने का हर्जाना देंगे कुछ दिनों बाद जब वो फ़िर से हमारे घर आए तो उन्होंने हमें एक पेज दिया बतौर हर्जाना पेज पर एक ग़ज़ललिखी थी। (तब हमें ग़ज़ल नही पता होती थी क्या होती है। हमें बड़ी गुस्सा आई थी। बाद में समझ आया कि वोसबसे कीमती चीज किसी को दे सकते थे वो वही था जो उन्होंने हमें दिया था।)
लाइने थीं-
एक सूरत अचानक नजर गई,
मन विकल हो गया है नमन के लिए।
वो सज्जन थे स्थानीय कांग्रेसी विधायक और ग़ज़ल सम्राट नाम से विख्यात जिया राम शुक्ल "विकल साकेती "
विकल साकेती उन नेताओं में शामिल रहे हैं जिनके लिए राजनीति ताकत अर्जन का माध्यम कभी नही रही। कोईदस साल विधायक रहते हुए भी वो वैसे ही रहे जैसे हो सकते थे। उनका घर औसत ग्रामीण घरों जैसा ही बना रहा , घर पर आने वाले को विकल साकेती गुड खिला कर पानी पिलाते और प्रेम से मिलते , और तो और सरकारी हैण्डपम्प तक उनके घर से दूर लगा था
१९८९ में वो चुनाव हार गए। पापा का स्थानांतरण चुनाव के पहले ही हो चुका था पर हमारी रूचि कटेहरी विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में बनी हुई थी। विकल साकेती ने चुनाव हारने को भी मनोविनोद का माध्यम बनाया उन्हेंहराने वाले जनता दल के उम्मीदवार का मुह थोड़ा सा टेढा था विकल साकेती ने चुनाव के नतीजे आने परप्रतिक्रिया दी
वोट डालने गई थी जनता पीकर भांग,
हार गए श्री विकल जी, जीत गया विकलांग।

विजयी उम्मीदवार ने इसका बुरा नही माना था

मेरी वाली ग़ज़ल

विकल साकेती ने जो ग़ज़ल हमें लिख के दी थी वो कहीं गुम हो गई उसकी दो-एक लाइने पापा के गुनगुनाते रहनेसे याद रह पायी हैं
जो किनारे रहे वारुणी पा गए,
हमको विष मिल गया आचमन के लिए
प्यार की बूँद बनके बरस जाइए,
एक शोला विकल है शमन के लिए।
एक मूरत अचानक नज़र गई,
मन विकल हो गया है नमन के लिए

अफ़सोस कि पूरी याद नही रह सकी

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

माल के सामने वो तीन बच्चे

मार्च के अन्तिम सप्ताह की बात है हम दिल्ली में थेएक दोपहरी एक दोस्त से मिलने की बात तय हुई हम एकऔर दोस्त के साथ साकेत जा पहुंचेजिससे मिलना था वो अभी तक आया नही थाथोड़ा बहुत इधर-उधरचक्कर काटने के बाद हम पी वी आर के सामने लगी बेंचों में से एक पर जा बैठे
वहाँ बैठने के थोडी देर बाद ही हमारा ध्यान खींचा तीन बच्चों नेवस्तुतः माल के चकाचौंध वाले माहौल में वो तीनबच्चे पूरी तरह से बाहरी नज़र रहे थे और इस बात पर ध्यान दिए बिना वो एक छोटी सी अत्यधिक उछलनेवाली गेंद से खेलने में मग्न थे
बच्चों की उम्र कोई नौ-दस साल की रही होगीउसमे एक लड़का थोड़ा लंबा था और वो ज़रा शर्मीला सा दिख रहाथाबाकी दोनों लगभग एक ही कद के थे और उम्र के अनुरूप बेइंतिहा ऊर्जा से भरे हुए गेंद के पीछे इधर-उधरभाग रहे थेअचानक उनकी गेंद तेजी से उछली और सड़क से गुजर रहे ट्रैफिक में जाने कहाँ गुम हो गईवो तीनोंसड़क की ओर भाग निकले
दोस्त को सिगरेट की तलब लग गई थी और वो उठ के सिगरेट लेने गयाइतनी देर में हमने हवा के रुख कोसमझा और उठ के अपने बैठने की जगह में परिवर्तन किया जिससे जब वो बगल बैठ के सिगरेट पिए तो उसकाधुंआ हमारी तरफ़ आए जाने सार्वजानिक स्थल पर धूम्रपान पर लगी रोक का मतलब क्या होता है
थोडी देर बाद हमने पाया कि वो तीनों बच्चे बेंचों पर बैठे लोगों को निगाहों से टटोलते हुए हमारी तरफ़ बढ़ रहे हैंआख़िर थोड़ा झिझकने के बाद वो तीनो हमारे सामने खड़े थे और उनके हाथ में पी वी आर का एक टिकट थाहमेंलगा कि ये कहीं टिकट तो ब्लैक नही कर रहे हैं पर मामला दूसरा थाउसमे से एक बच्चे ने टिकट को मजबूती सेपकड़े हुए हमें दिखाया और पूछा ये टिकट चालू है?
टिकट वस्तुतः ब्लैन्क थाउसपर सिर्फ़ नंबर पड़ा था ज़ाहिर है वो किसी काम का नही था
दोस्त ने अरुचि दिखाते हुए दूसरी तरफ़ देखना शुरू कर दिया था
"ये बेकार टिकट है तुम्हे कहाँ मिला "
--"बेकार नही है देखो इसपे लिखा है " एक बच्चे ने इनसिस्ट किया तो हम मुस्कुराए बिना नही रह पाये
"ये देखो ये सारी जगह खाली हैचालू टिकट में यहाँ सब फ़िल्म का नाम सीट नंबर और टाइम लिखा होता हैइसटिकट पर सिर्फ़ नंबर पड़ा है और वो किसी काम का नही है। "
--"बुद्धू बना रहे हो !" एक बच्चे ने मुस्कुरा कर पूछाहमारे दोस्त महोदय को ये नागवार गुज़रा उन्होंने कुछकहना शुरू किया तो हमने उन्हें रोक दिया
"अगर तुम ये टिकट लेकर जाओगे तो वो गार्ड खड़ा है वो तुम्हे भगा देगा "
बच्चों को यकीन नही हुआ अगली बेंच पर एक जोड़ा बैठा हुआ थालड़की के हाथ में कोल्ड ड्रिंक था और लड़के केहाथ में चिप्स का पैकेट
"दीदी कोल्ड ड्रिंक दो " बड़े आराम से एक बच्चे ने जिद की जैसे वो सचमुच अपनी बड़ी दीदी से मांग रहा हो

लड़की मुस्कुराने लगी और लड़के ने हलके से धमकाया पर धमकी में कटुता नही थी और बच्चों ने भी उसे गंभीरतासे नही लिया
"अच्छा तुम चिप्स देदो कोल्ड ड्रिंक रहने दो। " दूसरे बच्चे ने समझौता प्रस्ताव पेश किया
अब लड़के ने तीन चिप्स के टुकड़े निकाल कर तीनो को पकडा दिया और भागने को बोलाजिस बच्चे के हाथ मेंटिकट था उसने टिकट दिखाया
"ये चालू है?"
हाँ जल्दी जाओ शो छूट रहा है टाइम हो गया है लड़के ने कहा
तीनों बच्चों ने मुड़कर हमें देखा फ़िर उसे और अंत में उसमे से एक ने बाकी दोनों को बताया कि ये चूतिया बना रहाहै और तीनों फ़िर हमारे पास गए
"ये चालू क्यों नही है " उसने हमसे पूछा
"स्कूल जाते हो?"
"नही नारियल बेच रहा था ख़त्म हो गया है घर गए तो और बेचने को दे दिया जाएगाये चालू क्यों नही है "
"तुम्हे कहाँ से मिला ?"
"तुमको भी चाहिए ? "
हमने नही कहा तब तक तीनों भाग के कोने पर लगी टिकट डिस्पेंसर मशीन तक पहुँच गए थेदो बच्चे दो किनारोंपर खड़े हो गए तीसरे ने मशीन को नीचे से खोला और उसमे लगे रोल में से थोड़ा सा हिस्सा फाड़ लियाफ़िर तीनोंहमारी तरफ़ भाग कर आए
"देखो तुमने जो टिकट निकाला है ये खाली कागज है जब उस मशीन इसपर बाकी चीजें छप जाती हैं तो ये टिकटबन जाता है और चालू टिकट ऊपर से निकलता है नीचे से नही। "
तीनों की समझ में चुका थावो उदास होके फ़िर घूमने लगेहम जिसका इंतज़ार कर रहे थे वो दूर से नज़र रहा था
"ये साले अभी इतने शातिर हैं बड़े होकर क्या करेंगे " दोस्त ने कहा

हम भी सोचते रहे कि ये बड़े होकर क्या करेंगे ! डॉ अनुराग ने हमारी पिछली एक पोस्ट पर टिप्पणी दी थी किमुफ़लिसी का एंटीडॉट नही होताहम सोच रहे हैं क्या सचमुच नही होता!

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

रौशन के जन्म दिन पर !


कहावत है कि एक सेब रोजाना लेते रहने से आप बीमारियों से दूर रहते हैं ।

ऐसा ही शायद कुछ लोगों के साथ भी होता है । कुछ लोगों से रोज मिलते रहने या बात करते रहने भर से चिंतामुक्त रहा जा सकता है। ऐसा ही रौशन के साथ है ।

एक ऐसा दोस्त साथ बात करने के बाद महसूस होता है किजो कोई भी परेशानी मन में कहीं भी थी वो ख़त्म हो चुकी है। जिसके साथ बात करने के बाद महसूस होता है कि हर किसी परेशानी का हल खोजा जा सकता है और वो हल ख़ुद ही खोजा जा पाना सम्भव है ।


आज रौशन का जन्म दिन है । अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से (हिन्दी कैलेंडर के हिसाब से कल था , और वो दोनों जन्मदिन मनाता है )

जन्म दिन पर ढेर सारी शुभकामनाएं

जी मेल अब भारतीय भाषाओँ में भी

आज सुबह मैंने जी मेल में मेल लिखने के लिए कंपोज आप्शन देखा तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ .
जी मेल पर ऑरकुट एवं ब्लोगर की ही तरह अब भारतीय भाषाओँ में लिखने की सुविधा मिल गयी है । इसके लिए आपका ब्राउजर एक्स्प्लोरर में ७ और मोजिला में ३ से ऊपर का होना चाहिए . तो देर किस बात की है शुरू कीजिये न !
और हाँ ये अप्रैल फूल नहीं है

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