गुरुवार, 25 अगस्त 2016

लाहौर 22 कि मी

लाहौर से 22 कि मी की दूरी पर
एक साधारण सी जगह
जहाँ अलग करती है
संप्रभुता की विभाजक रेखा
एक सी संस्कृति
एक सी हवा
और एक से पानी को
दो विद्वेष भरे "देशों" में।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

सुषमा स्वराज महा श्वेता देवी की किसी किताब का नाम न भी जाने तो क्या हुआ



माननीय मंत्री महोदया ,
महाश्वेता देवी निश्चित रूप से हमारे समय की महान हस्तियों में से थीं। उनको श्रद्धांजलि देने के लिए सिर्फ भावना की जरूरत थी अगर आपके कानों तक वे आवाजें पहुँचती हैं जिनका दर्द वे उठाती रहती थीं , अगर आपके हृदय उसे महसूस कर सकता है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने उनका लिखा कुछ पढ़ा था या नहीं । कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपको सच में उनकी लिखी किसी किताब , किसी कहानी का नाम पता भी है या नहीं।
वैसे हमें पता है आप मानवता के चलते काफी कुछ करती रहती हैं ।
जब आपके ट्वीटकार ने (अगर आपने ये ट्वीट नहीं किया हो तो ) यह दिखाने की कोशिश की कि आप ऐसे नाम वाली किसी लेखिका की कुछ किताबों के नाम जानती थीं और आपने उसे पढ़ा और उससे प्रभावित हुई थीं और उसमें ट्वीटकार (या आप) असफल हुआ तो चोरी छिपे ट्वीट हटाने की जगह अगर खेद प्रकाशित कर दिया जाता तो कैसा होता ?
शायद आपको यकीन नहीं होगा पर हम मानते हैं कि आपके संगठन से जुड़े कुछ लोग पढ़ने लिखने में भी सक्षम हैं। आपको यकीन नहीं होगा पर हम मानते हैं कि आपके संगठन से जुड़े कुछ लोग अपनी कमियों को समझ भी सकते हैं और उसके लिए क्षमा मांगने लायक साहस भी रखते हैं ।
मंत्री महोदया आपके संगठन से जुड़े लोग दूसरे नेताओं की बोलने के लिए नोट्स रखने पर खिल्ली उड़ाते हैं। ऐसी खिल्ली बुरी होती है चाहे वो प्रधानमंत्री जी के भाषण में होने वाली त्रुटियों के लिए हो या किसी ट्वीट के लिए लेकिन जरा सोच के देखिये कि ऐसी किसी कमी पे अगर खेद व्यक्त कर दिया जाय तो कैसा होगा ?
है न हिम्मत का काम ?

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

वे जो होते हैं

वे जो होते हैं
खेतों में, सड़कों पर,
खदानों में, 
कभी घर से दूर दो रोटी के बंदोबस्त में
रिक्शा चलाते या मशीनों काम करते हुए,
कभी किसी अनजानी सी धरती को
अपना देश कहकर शहीद होते हुए
किसी इलाके की दिनरात निगहबानी करते
कहीं दुनियाभर की योजनाओं को अमल में लाते।

वे जो होते हैं 
प्रतिक्रिया नहीं देते 
नाराज नहीं होते 
नाराज हों भी तो 
नाराजगी व्यक्त नहीं करते। 
सड़क पर नहीं उतरते 
हथियार नहीं उठाते 
और न ही लेख लिखते हैं 
चाय की दूकानों, चौराहों 

या जनरल डिब्बों में भी नहीं बोलते 


वे जो होते हैं 
दिनभर काम करते हुए
उनके पास भी सोच होती है
खाके होते हैं
एक दृष्टि होती है
जो कभी कभी अभिव्यक्त हो जाती है
चुनाव परिणामों की शक्ल में
अस्तित्व की इस लड़ाई में
यही उनका हथियार है
बाकी तो बस
जीवन कामचलाऊ ढालों की अनवरत तलाश है। 





सोमवार, 18 जनवरी 2016

रोहित वेमुला का आखिरी पत्र

सुसाइड नोट किसी समाज के लिए सबसे त्रासद लिखावटों में से होते हैं

गुड मॉर्निंग,
जब आप यह पत्र पढ़ रहे होंगे तब मैं यहाँ नहीं होऊंगा. मुझसे नाराज़ नहीं होना. मुझे मालूम है कि आप में से कुछ लोग सच में मेरी परवाह करते थे, मुझे प्यार करते थे और बहुत अच्छा व्यवहार करते थे. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. मुझे तो हमेशा ख़ुद से ही दिक्कत होती थी. मुझे अपनी आत्मा और शरीर के बीच बढ़ती दूरी महसूस हो रही है. और मैं एक क्रूर-इन्सान (मॉन्स्टर) बन गया हूँ. मैं हमेशा से ही एक लेखक बनना चाहता था. कार्ल सगन की तरह विज्ञान का एक लेखक. और अंत में यही एक पत्र है-जो मुझे लिखने को मिला.

मैं विज्ञान, सितारों और प्रकृति से प्यार करता था और साथ ही मैं इंसानों से भी प्यार करता था- यह जानने के बावजूद कि इंसान अब प्रकृति से अलग हो गया है. हमारी भावनाएं अब हमारी नहीं रहीं. हमारा प्यार कृत्रिम हो गया. हमारे विश्वास, दिखावा. कृत्रिम-कला, हमारी असलियत की पहचान. बगैर आहत हुए प्यार करना बहुत मुश्किल हो गया है.

इंसान की कीमत बस उसकी फौरी-पहचान और निकटतम संभावना बन के रह गयी है. एक वोट. एक गिनती. एक चीज़. इंसान को एक दिमाग की तरह देखा ही नहीं गया. सितारों के कणों का एक शानदार सृजन. पढाई में, गलियों में, राजनीति में, मरने में, जिंदा रहने में, हर जगह.
मैं ऐसा ख़त पहली दफ़ा लिख रहा हूँ. पहली बार एक अंतिम चिट्ठी. अगर यह बेतुका हो तो मुझे माफ कर देना.

हो सकता है दुनिया को समझने में मैं शुरू से ही गलत रहा होऊं. प्यार, पीढ़ा, ज़िन्दगी, मौत को समझने में गलत रहा होऊं. कोई जल्दी भी तो नहीं थी. लेकिन मैं हमेशा जल्दी में रहा. जीवन शुरू करने को बेताब. इस सब के बीच कुछ लोगों के लिए जीवन ही अभिशाप है. मेरा जन्म एक बड़ी दुर्घटना है. मैं बचपन के अकेलेपन से कभी बाहर नहीं आ सका. अतीत का वह उपेक्षित बच्चा.

मुझे इस वक़्त कोई आघात नहीं है. मैं दुःखी नहीं हूँ. मैं एक शून्य हो गया हूँ. अपने से बेपरवाह. यह दयनीय है. और इसीलिए मैं यह कर रहा हूँ.

मेरे जाने के बाद लोग मुझे कायर कह सकते हैं. या स्वार्थी या बेवकूफ. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कोई मुझे क्या कहता है. मृत्यु के बाद की कहानियों, भूत, या आत्माओं इन सबमे मैं विश्वास नहीं करता. अगर मैं किसी चीज में भरोसा करता हूँ तो – मैं सितारों का सफ़र कर सकता हूँ अपने इस विश्वास में. और दूसरी दुनियाओं को जानूँ.

अगर आप, जो यह पत्र पढ़ रहे है, मेरे लिए कुछ कर सकते हैं, मुझे अपनी सात महीने की फ़ेलोशिप मिलनी है, एक लाख पचहत्तर हज़ार रुपये. कृपया देखिएगा कि यह मेरे परिवार को मिल जाये. मुझे चालीस हज़ार रुपये रामजी को देने हैं. उन्होंने ये पैसे कभी वापस मांगे ही नहीं. लेकिन कृपया उन्हें इन पैसों में से ये वापस दे दीजियेगा.

मेरे अंतिम संस्कार को शांत रहने दीजियेगा. ऐसा सोचियेगा कि मैं बस दिखा और चला गया. मेरे लिए आंसू नहीं बहैयेगा. यह बात समझिएगा कि मैं जिंदा रहने से ज्यादा मर कर खुश हूँ.

‘परछाइयों से सितारों तक’
उमा अन्ना, माफ़ कीजियेगा – इस काम के लिए आपका कमरा यूज़ किया.
एएसए [अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन] परिवार, आप सब को निराश करने के लिए माफ़ी. आपने मुझे बहुत प्यार किया. अच्छे भविष्य के लिए मेरी शुभकामनाएं.

एक आखिरी बार के लिए,
जय भीम
मैं औपचारिकताओं को लिखना भूल गया.
अपने आप को मारने के मेरे इस कृत्य के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है.
यह करने के लिए किसी ने मुझे उकसाया नहीं है, न अपने कृत्य से, न अपने शब्दों से.
यह मेरा निर्णय है और अकेला मैं ही इसके लिए ज़िम्मेदार हूँ.
मेरे दोस्तों और मेरे दुश्मनों को मेरे जाने के बाद इसके लिए परेशान न कीजियेगा.

- रोहित वेमुला
अनुवाद भरत तिवारी छत्तीसगढ़ खबर से

सोमवार, 21 सितंबर 2015

कस्मै देवाय हविषा विधेम

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् 
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः 
यस्य छायामृतम् यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
 

यः प्राणतो निमिषतो महित्वै क इद्राजा जगतो बभूव             
यः ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम । 
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसय सहाहुः             
यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम । 
येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृळहा येन स्वः स्तभितं येन नाकः         
यो अंतरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
 


यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने           
यन्नाधि सूर उदतो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
आपेा ह यद् वृहतीर्विश्वमायन् गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम           
ततो देवानाम् समवर्ततासुरेकः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद् दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम्         
यो देवेष्वधि देवः एक आसीत कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
मा नो हिंसीज्जनिताः यः पृथिव्या यो वा दिव सत्यधर्मा जजान             
यश्चापश्चन्द्रा बृहतीर्जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
 



प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव           
यत् कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु कस्मै देवाय हविषा विधेम ।




 हिरण्यगर्भ-ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 121

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