सोमवार, 1 अप्रैल 2019

आम चुनावों में वोट दें वोटर लिस्ट में अपना नाम डलवाएं

2019 के आम चुनावों की उद्घोषणा हो चुकी है और अलग अलग दल अपनी उम्मीदवारी जता रहे हैं. इन चुनावों में वोट दे कर अपना भविष्य तय करने की जिम्मेवारी आपकी है. कई बार लोग मतदाता सूची में अपना नाम समय की कमी से या किन्ही अन्य कारणों से नहीं डलवा पाते और मतदान से वंचित रहते हैं. चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नाम डलवाने की प्रक्रिया ऑनलाइन कर राखी है जो बहुत ही सुगम है और आप मिनटों में स्वयं को मतदाता के रूप में रजिस्टर करवा सकते हैं.
इसके लिए आपको राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल या NVSP की वेबसाइट पर जाना होगा जिसके लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं  आप किसी भी सर्च इंजन पर NVSP सर्च करके भी इस वेबसाइट पर जा सकते हैं.
इस वेबसाइट पर आपको निम्न सेवाएं उपलब्ध हैं

  1. मतदाता के रूप में रजिस्ट्रेशन या एक चुनाव क्षेत्र से दूसरे चुनाव क्षेत्र में स्थानांतरण 
  2. अनिवासी मतदाता के रूप में पंजीकरण 
  3. निर्वाचक नामावली में नाम सम्मिलित किए जाने या निर्वाचक नामावली से नाम हटाए जाने पर आपत्ति के लिए आवेदन
  4. निर्वाचक नामावली में प्रविष्टि विशिष्टियों की शुद्धि के लिए आवेदन
  5. निर्वाचक नामावली में प्रविष्‍टि को अन्‍यत्र रखने के लिए आवेदन (एक निर्वाचन क्षेत्र में निवास स्‍थान को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर स्‍थानांतरित करने के मामले में)
  6. नया वोटर आई कार्ड (EPIC ) इशू करवाने हेतु आवेदन एवं 
  7. अपने आवेदन की स्थिति 

मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आपको ऊपर दिए लिंक पर जाना होगा पंजीकरण शुरू करने से पूर्व अपने पास निम्न डाक्यूमेंट तैयार रखें 
  1. अपनी फोटो सॉफ्ट कॉपी में 
  2. यदि पहली बार पंजीकरण करवा रहे हैं तो आयु सम्बन्धी घोषणा हस्ताक्षर करके सॉफ्ट कॉपी में।  यह उद्घोषणा आपको पंजीकरण के पेज पर ही डाउनलोड के लिए उपलब्ध रहेगी. इस उद्घोषणा की आवश्यकता तब होती है जब आपकी आयु 21 वर्ष से अधिक हो. 
  3. आयु प्रमाण पत्र  जैसे कि PAN Card , आधार कार्ड , जन्म प्रमाणपत्र, अंकपत्र , पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस 
  4. पते का प्रमाणपत्र जैसे कि पासपोर्ट , ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड , टेलीफोन बिल, बिजली का बिल किसान बही, बैंक या पोस्टऑफिस की पासबुक, पानी का बिल , गैस का बिल , राशन कार्ड , आपके पते पर डाक विभाग के द्वारा प्राप्त कोई पत्र , टैक्स असेस्मेंट आर्डर, किरायानामा इत्यादि की सॉफ्ट कॉपी
ध्यान रखें मतदाता रजिस्ट्रेशन आपके क्षेत्र में चुनाव हेतु नामांकन के दस दिन पूर्व तक किया जा सकता है. 

सोमवार, 28 अगस्त 2017

जादुई बारिश

नज़र नही आती बूंदें
कभी कभी बारिश की फोटो में
कभी कभी गुम हो जाता है
बरसता पानी
पेड़ों की पत्तियों
घास के मैदानों
बरसाती नालों
हरियाली ओढ़े खेतों
या फिर पशु-पक्षियों में
और फिर छा जाता है जादू
हर जगह
हर ओर
हमेशा जरूरी नही होता
नज़र आना
प्रभाव छोड़ने के लिए

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मन भयमुक्त हो जहां

मन भयमुक्त हो जहां
और मस्तक ऊंचा

ज्ञान जहां मुक्त हो;

और जहां दुनिया को

संकीर्ण घरेलू दीवारों से

छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है;

जहां शब्द सच की गहराइयों से निकलते हैं;

जहां थकी हुई प्रयासरत बांहें

त्रुटि हीनता की तलाश में हैं;

जहां कारण की स्पष्ट धारा है

जो सुनसान रेतीले मृत आदत के

वीराने में अपना रास्ता खो नहीं चुकी है;

जहां मन हमेशा  व्यापक होते विचार और सक्रियता में

तुम्हारे जरिए आगे चलता है

और आजादी के स्वर्ग में पहुंच जाता है

ओ पिता

मेरे देश को ऐसा जागृत बनाओ”

रविवार, 23 जुलाई 2017

झूठ का स्वर्णकाल

1949  में लिखी गयी  जॉर्ज ऑरवेल की किताब नाइन्टीन  एटी  फोर  सुव्यवस्थित तरीके से झूठ के प्रचार के तौर तरीकों के बारे में विस्तार से पूर्वाभास करती है।  
ऑरवेल ने एक दुनिया की कल्पना  की थी   जहां दुनिया तीन बड़े राष्ट्रों में बँट  चुकी है , तीनों महा-राष्ट्र बंद समाज हैं।  इन महा-राष्ट्रों  का नेतृत्व जनता को अतिराष्ट्रवाद की खुराक के सहारे अपने नियंत्रण में रखे हुए है.  व्यक्ति , उसके  रिश्ते , उसका जीवन यहां तक कि  उसका अस्तित्व और अतीत भी राष्ट्रवाद की भेंट चढ़ चुका है और राज्य के सख्त पहरे में है. 
यहां अतीत की बात इसलिए महत्वपूर्ण  हो जाती है क्योकि व्यक्ति ख़त्म होने के बाद लोगों की स्मृतियों में रहते हैं विचार दबा भी दिए जाएँ तो कोने में पड़े रहते हैं और मौक़ा मिलने पर उभर आते हैं।  एक समझदार तानाशाह के लिए ये जरुरी होता है कि  वो लोगों की सोच ,समझ और विश्वासों पर शासन करे. अपनी पुस्तक द राज सिंड्रोम में सुहास चक्रवर्ती ब्रिटिश राज के तौर -तरीकों के बारे में जो कुछ बताते हैं वो दुनिया के हर राज का सच है. . 
नाइन्टीन एटी फोर पढ़ते समय हमें महसूस होता था कि यह सब कुछ सिर्फ बंद समाजों में ही चल सकता है. प्रचारकों के सहारे कैसे झूठ फैलाया और सच बनाया जाता है ये हमने देख रखा हुआ था. विद्यार्थी के रूप में हम देख चुके थे कि कैसे शुरुआत से ही मस्तिष्कों को अपने वश में करने की कोशिशें की जाती हैं. समर्पित कार्यकर्ता जो  कि समाज के संपन्न  तबके के लोग होते थे कैसे  रात के अंधेरों में धार्मिक उन्माद फैलाने वाले वीडियोज  के गुप्-चुप प्रदर्शन का बंदोबस्त करते थे ये किसी से छुपा हुआ नहीं है।  लेकिन ये सब बंद समाजों में ही संभव था ,
सूचना क्रान्ति और शिक्षा के विकास के बाद झूठ के प्रचारकों के लिए सबसे बड़ी समस्या आयी कि जानकारी के सर्वसुलभ हो जाने के बाद , ज्ञान के सर्वसुलभ हो जाने के बाद लगातार बेड़ियाँ तोड़ रहे समाज को वापस कैसे कैद किया जाय।  इंडिया शाइनिंग के आश्वस्त कर देने वाले प्रचार के झांसे में न पड़ने वाले समाज को कैसे बंद किया जाय. इंटरनेट ने तो हर मुँह को जुबान दे दी थी और हर मस्तिष्क को सोच का दायरा बढ़ाने का मौक़ा दे दिया था. 
यहां पर इन्होने अपनी रणनीति बदली. वास्तविक न सही आभासी बंधन बनाने की।  राष्टवाद और सूचना तकनीकि को साथ मिला कर एक मजबूत दीवार तैयार की गयी. इंटरनेट पर न्यूज़ वेबसाइटों का जाल , दृश्य श्रव्य माध्यमों पर कब्जा, फेसबुक /टविटर पर उपयोगकर्ताओं का जाल और मोबाईल फ़ोन पर व्हाट्सएप  ग्रुपों का जाल. . . अब लोगों को देखने , सुनने और पढ़ने के लिए चारों तरफ सिर्फ यही लोग मौजूद हैं।  मेरे पास दिन कम से कम दस वाट्सएप ऐसे ही लक्षित मैसेज आते हैं कभी कभी तो एक ही मैसेज दस दस बार. किसी व्यक्ति के पास जो सूचनाएं पहुँचती हैं उसकी सोच वैसे ही होती  जाती है. हर आदमी तो हर एक चीज क्रॉसचेक नहीं कर सकता है. 
इस घेराबंदी के बाद अब नाइन्टीन एटी  फोर  कल्पना नहीं रह गयी है. हमारा समाज हमें हर दिन उसी कृत्रिम उन्माद और गुलामी की और बढ़ता नजर आता है जिसकी कल्पना जॉर्ज ऑरवेल ने की थी. 

अभी कुछ दिन पहले रवीश कुमार ने फेक न्यूज़ पर एक स्टोरी करते हुए एक सवाल उठाया था कि आखिर जवाहर लाल नेहरू जिनके 2019 प्रधानमंत्री बनने की ज़रा भी संभावना नहीं है उनके ऊपर कीचड क्यों उछाला जा रहा है वो भी प्रधानमंत्री कार्यालय तक के आई पी से।  

जवाहर लाल नेहरू पर कीचड संघ  के अस्तित्व में आने के बाद से ही उछाला जा रहा है।  अभी इसमें तेजी की वजह वही पुरानी सोच है. किसी को ख़त्म करना है तो अतीत में जा के ख़त्म करो और आज उनके पास अधिक कारगर हथियार हैं।  

नन्हा किसान


सोमवार, 26 जून 2017

आपातकाल

हिंसक भीड़ द्वारा संचालित
शासनतंत्र में जीते हम,
आपातकाल के बाद की  पीढ़ी के लोग  

हैरान होते हैं आज
कि लोकतंत्र,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और
विचारों की आज़ादी
को बेड़ियां पहनाने की
कोशिशें तब अनुचित मानी जाती थीं 

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