रविवार, 12 जुलाई 2015

बारिश के मौसम में भवानी प्रसाद मिश्र की घर की याद

आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,

अब सवेरा हो गया है,
कब सवेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ माना-

क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,

गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,

बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,

घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!

आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,

घर कि घर में सब जुड़े है,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,

और माँ‍ बिन-पढ़ी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,

माँ कि जिसकी स्नेह-धारा,
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।

और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिल-खिलाएँ,

मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,

आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,

जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,

चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नजर उनको पड़े होंगे।

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवे का नाम लेकर,

पाँचवाँ हूँ मैं अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिता जी कहते रहें है,
प्यार में बहते रहे हैं,

आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,

और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा,
आँख में किस लिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,

वह तुम्हारा मन समझ कर,
और अपनापन समझ कर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,

पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,

पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,

गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात-दिन की झड़ी झारी,

खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता-फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,

तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,

मैं न रोऊँगा,कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बद का रे,
पाँचवें की याद का रे,

भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी, सहज तरला,

शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा,
आज सबका मन चुआ होगा।

अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,

ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरणें झुकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों,

गगन-आँगन की लुनाई,
दिशा के मन में समाई,
दश-दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की छाप है रे,

झाड़ आँखें बंद करके,
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं,

एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किस लिए इतनी तृषा रे,

तू जरा-सा दुःख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,

हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,

तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुःख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!

पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन की बाड़ का झाड़ जैसे,

एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नद्दी उमग ले,

एक टहनी कम न होले,
कम कहाँ कि खम न होले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!

इस तरह क हाल उनका,
इस तरह का खयाल उनका,
हवा उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,

हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवे को वे न तरसें,

मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,

किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,

काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते है लोग, कहना,
मत करो कुछ शोक कहना,

और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्‍त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,

कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डट कर झेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,

हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,

कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,

हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसे,
पाँचवें को वे न तरसें।

गुरुवार, 18 जून 2015

मोदी जी (ललित) और मोदी जी (प्रधानमंत्री)


ये फ़ितना आदमी की ख़ानावीरानी को क्या कम है
हुये तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमां क्यों हो

ये लाइनें अब मोदी जी (ललित) के लिए उनके दोस्तों की जुबान पर होगा आजकल। पहले सुषमा स्वराज फिर वसुंधरा राजे । वहाँ मोदी जी वैकेशन पे वैकेशन  मारे जा रहे हैं । उनकी जिंदगी एक लंबी छुट्टी की तरह है। सैर कर दुनिया की गाफिल ज़िंदगानी फिर कहाँ ।
छुट्टियों के अपने अलग अंदाज हैं। पत्नी का इलाज हो तो एक देश में, इंटरव्यू देना हो तो दूसरे देश में । किसी पुराने दोस्त से मिलना हो तो किसी और देश में , बदनाम होना हो तो किसी और देश में । सोते किसी और देश में होंगे उठते किसी और देश में । बाथरूम किसी देश में जाते होंगे तो चाय किसी देश में ।
सच्चे अर्थों में अंतर्राष्ट्रीय नागरिक !
लगता है हमारे मोदी  जी (प्रधानमंत्री)ने मोदी जी(ललित) से काफी कुछ सीखा होगा । वैसे भी मोदी मोदी से नहीं सीखेगा तो क्या वाजपेयी से सीखेगा?
मोदी जी (प्रधानमंत्री) भी तो सच्चे अंतराष्ट्रीय नागरिक लगते हैं । उनके पाँव ही नहीं आँख, नाक, कान, उंगलिया (ट्वीट करने के लिए ) और मोबाइल सीमा के बाहर ही रहते हैं।
दूरदृष्टि वाले नेता हैं सीमा के अंदर  दिखाई ही नहीं देता
देश को एक और प्रधानमंत्री चुन लेना चाहिए था । मोदी जी (प्रधानमंत्री) देश के बाहर के प्रधानमंत्री होते और दूसरा वाला देश के अंदर का प्रधानमंत्री होता।
दोनों मोदियों (प्रधानमंत्री और ललित ) की विवादों में काफी रुचि है। कभी कभी ऐसा लगता है कि विवाद न हों तो इन बेचारों के जीवन में होगा क्या। बेचारे मोदी जी (ललित) को लोगबाग भूल चुके थे ये विवाद ही तो थे जो उन्हे वापस ले आए लाईमलाइट में। अपने मोदी जी (प्रधानमंत्री) जी भी गुजरात के मुख्यमंत्री कैसे बनते अगर गुजरात भूकंप में केशुभाई की छीछालेदार न होती।
लोग तो यह भी कहते हैं कि उनके मुख्यमंत्री बने रहने में गोधरा कांड, फर्जी(अब असली) एंकाउंटरों ,राज्यबदर सहयोगियों का भी हाथ रहा है ।
अब देखिये न समय समय पर होने वाले विवाद लोगों को याद दिलाते रहते हैं कि कैसे देश के कुछ नासमझ (कोई 69%) कैसे मोदी जी (प्रधानमंत्री) को अभी भी पसंद नहीं करते ।
खैर हमे पता है कि मोदी जी (ललित) इस मुद्दे पर चाहे जितना बोल लें पर मोदी जी (प्रधानमंत्री) बिलकुल नहीं बोलेंगे ।
खैर छोड़िए आपलोग राहुल गांधी पर चुट्कुले बनाइये ।

रविवार, 23 नवंबर 2014

मंदिर , बाघ और स्टेशन @दुधवा नेशनल पार्क

एक बड़ा शहर और उसमें एक जानवर का जीवन 
एक बड़ा जंगल और उसमे इंसानी रिहाइश !
क्या फर्क हो सकता है ? 
शहर में जानवर पूरी तरह से असुरक्षित है लेकिन जंगल में इंसान अपनी रिहाइश बना लेता है। इसका कारण इंसान की ताकत नहीं है बल्कि यह सत्य है कि जीवधारियों की तमाम प्रजातियों में से इंसान ही ऐसा है जो अपने साथ किसी को जीते नहीं देख सकता । 
एक बाघ , एक शेर, एक हाथी या और किसी भी जानवर को एक कारण चाहिए होता है अगले जानवर या इंसान पर हमला करने के लिए भले ही वह कारण भूख क्यों न हो। 
पर इंसान के लिए हमले का सबसे बड़ा कारण अगले की उपस्थिति मात्र है। 
इंसान के मन में बैठी असुरक्षा की भावना अन्य सभी जानवरों की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाती है। 
दुधवा नेशनल पार्क के बीच में स्थित सोनारीपुर रेलवे स्टेशन नानपारा (बहराइच) और पलिया कलाँ (खीरी लखीमपुर ) के बीच एक छोटा सा स्टेशन हैं। स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार पर यह फूस की टटिया लगा दी गयी है। दूसरे जानवरों को रोकने के लिए ।

ठेला देख के लगता है कि लोगबाग इकट्ठा होते होंगे स्टेशन पर । आसपास कुछ एक गाँव हैं। जहां थारू रहते हैं। फोटो में दिख रहा बच्चा फोटो खिंचवाने के लिए तो सहमत था पर और कोई बात नहीं करना चाहता था। सोनारी पुर रेलवे स्टेशन पर कोई 6-7 ट्रेने रुकती हैं। शायद सभी पैसेंजर ट्रेने हैं। रुकने वाली आखिरी ट्रेन साढ़े छह बजे के आस पास से गुजरती है। 
यह शाम के कोई साढ़े पाँच का समय है । हम वापस जा रहे थे तो एक ट्रेन जा रही थी ट्रेन रुकने वाली थी या नहीं यह तो नहीं पता पर अगर रुकती तो स्टेशन से ट्रेन पर बैठने के लिए अगर कोई रहा होगा तो यह बच्चा । अब शाम के साढ़े पाँच बजे कहीं जाने का मतलब नहीं दिखता  तो यह अंदाजा लगता है कि बच्चा स्टेशन पर ही रह रहा होगा । 

स्टेशन के बगल में यह मंदिर था । ये श्री मचाली दास बाबा कहीं पूर्वाञ्चल के रहने वाले थे और सपत्नीक यहाँ रह रहे थे। कई थारू मंदिर दर्शन के लिए बैलगाड़ियों से आए थे। हो सकता है कि लोगों की भीड़ होने पर बाघ या अन्य जानवर हमला नहीं करते। लोग कोई तीन गाड़ियों से आए थे और चन्दन चौकी के थे। चन्दन चौकी उस जगह से कुछ दूरी पर है।


शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

देशभक्ति में परिपक्वता की जरूरत

जो कुछ है , उससे बेहतर चाहिए ,
इस देश और समाज को सबसे पहले एक मेहतर चाहिए
                                                                                                                                     मुक्तिबोध
ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री जी के स्वातंत्र्य दिवस उद्बोधन से एकदम से ये विचार आ गया लेकिन जब भी देशभक्ति की बातें होती हैं , शहीदों की चर्चा की जाती है , सीमा पर मोर्चा संभाल रहे जवानों की चर्चा होती है , तिरंगे के सम्मान , देश के गौरव की चर्चा  होती है और न जाने किन किन  उदाहरणो  के माध्यम तमाम बाते की जाती हैं हमारे दिमाग में अजीब सा आश्चर्य होता है। कुछ समय पहले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर साहब ( जाहिर है प्रोफेसर तो पढे लिखे होते हैं, डिग्री धारी टाइप के ) ने अपनी फेसबुक वाल पर अपने चाचा के सैनिक होने की चर्चा करते हुये इस बात पर गर्व किया था कि उनकी रगों में एक सैनिक का खून है। हम अधिकतर चुपचाप पढ़ते रहते हैं क्योंकि  कई बार टीका टिप्पणी के चक्कर में काफी कुछ बिन पढ़ा रह जाता है सो हमने याद करने की कोशिश की कि कभी उन्होने अपने परिवार के किसी और सदस्य के पेशे को लेकर कोई बात लिखी हो। मसलन पिता जी किसान थे मुझे गर्व है कि मेरी रगों में उनका रक्त प्रवाहित होता है या एक चाचा जी अध्यापक थे , भाई फलां हैं आदि आदि और सबसे बढ़कर मेरी माँ गृहणी थीं और मुझे गर्व है कि मेरी रगों में उनका रक्त है ।
हमारा मकसद किसी का उपहास करना नहीं लेकिन याद करें कि राष्ट्रीय पर्वों और अनेक और मौकों पर देशभक्ति के प्रवाह में बह रहे सोशल मीडिया संदेशों, मोबाइल संदेशों में कब एक मेहतर को जगह मिली है , कब लोगों ने ये सोचा है कि ये वो व्यक्ति है जो गंदगी और दुर्गंध की परवाह किए बिना दूसरों की गंदगी साफ करता रहता है जिससे हमे साफ सूत्र जीवन मिल सके । कब हम याद करते हैं इमरजेंसी वार्ड में बिना शिफ्ट की गणना किए काम करते हुये चिकित्सकों , एवं उनके अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को, मूँगफली बेचने वाले को , कुलियों को , अध्यापकों को अनेक विभागों में काम कर रहे कर्मचारियों को , व्यापारियों को, श्रमिकों, मछुहारों को । कब हम सलाम करते हैं महीनों घर से दूर सड़कों पर जीवन बिता रहे ट्रक ड्राइबरों को, । कब हम सलाम करते हैं चौबीस घंटे की शिफ्ट में बिना छुट्टी के काम कर रही गृहणियों को । यहाँ गिनती कर पाना नामुमकिन है पर याद करें कि कौन सा पेशा ऐसा है जो महत्वहीन है और दुश्वारियाँ नहीं हैं तो ऐसा क्यों है कि देशभक्ति का पेटेंट सिर्फ सैनिकों के  (या कभी कभी किसानों और वैज्ञानिकों के भी ) पास है।
इतने लोगों को याद करना मुश्किल है ना ! तो फिर ऐसा क्यों नहीं करते हैं कि एक आईना उठाएँ और देखें कि हम खुद कैसे हैं । खुद पर गर्व कर सकते हैं या नहीं । क्या होनी चाहिए देशभक्ति की परिभाषा ?
क्या महज तिरंगे का सम्मान करना देशभक्ति है ?
क्या देशभक्ति के गीत गाना देशभक्ति है ?
क्या अपनी सभ्यता संस्कृति पर गर्व करना देशभक्ति है ?
क्या सेना में भर्ती होना देशभक्ति है ?
क्या बंदे मातरम गाना , जन गण मन की धुन सुन कर खड़े हो जाना देशभक्ति है ?
क्या पाकिस्तान को गाली देना देशभक्ति है ?
क्या देश के दुश्मनों , अपराधियों से घृणा करना देशभक्ति है?
क्या देश की सरकार के हर कदम पर प्रशंसा करना देशभक्ति है?

इस तरह कि एक बहुत लंबी लिस्ट बनाई जा सकती है कई सकारात्मक बातें कई नकारात्मक बाते हो सकती हैं पर हमे लगता है कि इन सूचियों में मूलभूत बात छूट जा रही है।
मूलभूत बात !
हम समाज की सबसे छोटी इकाई , एक परिवार के सदस्य हैं । वो जिसमें हमने जन्म लिया है । जहां हम एक पुत्र -पुत्री हैं, भाई-बहन हैं , पति-पत्नी हैं और माँ-बाप हैं।
मूलभूत बात !
हमने किन्ही कारणों से जीवन यापन के लिए एक विधिमान्य पेशा चुना , खुशी से या मजबूरी से जहां हम किसी एक रोल में हैं
ये दो चीजें हैं जो सबसे जरूरी हैं और हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी हैं। हम इन दो मूलभूत मोर्चों पर सही तरीके से काम कर रहे हैं तो हम देशभक्त हैं और हमे खुद पर गर्व करना चाहिए ।
यकीन मानिए अगर आप अपना काम सही तरीके से कर रहे हैं तो आप सबसे बड़े देशभक्त हैं भले ही आपको तिरंगे के तीन रंग न पता हों , आपको बंदे मातरम का एक शब्द नहीं आता हो और आपका सबसे अच्छा मित्र एक पाकिस्तानी हो।
हमे लगता है कि राष्ट्र को अतार्किक देशभक्ति से एक परिपक्व  देशभक्ति की समझ की ओर बढ़ना चाहिए । अब समय है कि समाज के हर अंग को समान रूप से सम्मान मिले ।

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

भगवान् से एक प्रश्न

हमें पता है लोग पूजते हों तुम्हे
उनकी तो आदत है किसी न किसी को पूजने की
पर भगवान् तुम्हारा भी तो कोई ईमान होगा?

मंगलवार, 20 मई 2014

मैत्रेय बुद्ध

फोटो : रौशन 
दिस्कित, नुब्रा घाटी 
लद्दाख 
मैत्रेय बुद्ध, की 32 मीटर  ऊंची प्रतिमा , लद्दाख के रेगिस्तानी इलाके नुब्रा घाटी के दिस्कित नामक स्थान पर 
माना जाता है की मैत्रेय भगवान बुद्ध के आने वाले अवतार हैं 
यहाँ हमें एक लामा मिला जो मैत्रेय बुद्ध के बारे मेँ जानकारी देने लगा । उसने अपनी शिक्षा वाराणसी से प्राप्त की थी । लखनऊ, आजमगढ़ , फैजाबाद, सुल्तानपुर, जौनपुर और थोड़े समय बनारस मेँ रहा शख्स इतने सुदूर उत्तर मेँ खुद को बनारस का तो बता ही सकता है सो हमने खुद को बनारस का रहने वाला बताया तो उसकी आँखों की चमक देखने लायक थी । 

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

जीवन की उत्पत्ति

                                                                जीवन की उत्पत्ति
                                                                                                                                  फ़ोटो - रौशन
                                                       नवागत का स्वागत                                         फ़ोटो - रौशन 

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

सूरज की लुकाछिपी, डूबते सूरज की कुछ तस्वीरें

 
ऊंचे पेड़ के नीचे , इक झाड़ी के पीछे
शाम का कोई वक्त
जम्मू-कटरा मार्ग पर
फोटो - रौशन

 
डूब जाने की ओर
शाम का कोई वक्त
जम्मू-कटरा मार्ग पर
फोटो रौशन

 
बादलों की गोद मेँ
शाम का कोई वक्त
वैष्णो देवी मंदिर के ऊपर भैरों मंदिर से
फोटो- रौशन


शाम का आखिरी क्षण 
शाम का कोई वक्त
वैष्णो देवी मंदिर के ऊपर भैरों मंदिर से
फोटो- रौशन

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

गोयबल्स के ध्वजावाहक ; भारत के फासीवादी

काफी पहले की बात है , हम तीसरी कक्षा के छात्र थे और शिशु मंदिर मे पढ़ते थे । हमारा परिवार फैजाबाद शिफ्ट हो रहा था तो हमे पता चला कि फैजाबाद मे अयोध्या है हमे आश्चर्य सा हुआ । भला अयोध्या जैसी अद्भुत जगह जहां स्वयं भगवान श्री राम ने जन्म लिया था फैजाबाद जैसी नजदीक जगह कैसे हो सकती थी! (रामकथा हमने इतिहास और भूगोल जानने से पहले पढ़ी थी )"ये मुगलों की करतूत है " आचार्य जी ने हमे बताया। मानो मुगलों ने अयोध्या स्वर्ग से उतार कर धरती पर ला पटका रहा हो। 
ये एक उदाहरण मात्र है । हमे याद है एक परिचर्चा के दौरान अटल बिहारी बाजपेयी जी ने जावेद अख्तर जी के इस कथन पर कि शिशु मंदिरों मे बच्चो के मन मे क्या भरा जाता है पूछा था कि क्या आप शिशु मंदिर गए हैं? हम जवाब देना चाहते थे कि हम गए हैं और सच यही है कि इतिहास के नाम पर कूड़ा ही ठूँसा जाता है (मोदी छाप इतिहासकारों को वही कूड़ा सच लगता है उनसे क्षमा याचना के साथ क्योंकि सच चाहे जितना कड़वा क्यों न हो उससे उनके मन को ठेस जो पहुँचती है )। हाँ बाजपेयी जी बच्चो के मन मे न सिर्फ कूड़ा भरा जाता है बल्कि एक मुस्लिम बच्चे के क्लास मे होते हुए भी ईद की छुट्टी नहीं होती परीक्षा के नाम पर लेकिन दो दिन बाद होने वाली आपकी चुनाव सभा के लिए छुट्टी हो जाती है ।
हम सिर्फ उस कूड़े की बात नहीं कर रहे हैं  जो इतिहास के नाम पर ठेला जाता है हम उस कूड़े की भी बात कर रहे हैं जो नैतिक शिक्षा के नाम पर ठूँसा जाता है (अगर किसी को ये आपत्ति हो कि हम मिशनरी स्कूलों की बात क्यों नहीं कर रहे हैं तो उनके लिए हमारी पढ़ाई मिशनरी स्कूलों मे नहीं हुई है )। वो धर्म, नैतिकता और इतिहास के नाम पर जाने क्या क्या पढ़ाते हैं । धर्म तो हमे पता था कि वो हमसे ज्यादा उस उम्र मे भी नहीं जानते थे , नैतिकताए खुद बनती हैं और हमे पाखंड मे भीगी नैतिकताए नहीं पसंद थीं । इस प्रकार पाँचवी कक्षा तक आते आते , हमे उस पूरे संस्थान से असहमति होने लगी (उस समय तो खैर चिढ़ थी )। इतिहास तो खैर तब तक हमने पढ़ा ही नहीं था ।
अभी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ ज्यादा ही मुखर हो चले हैं। पहले लोग उन्हे एक अक्षम शासक (बक़ौल अटल बिहारी बाजपेयी , कुछ लोग जो सक्षम शासक मानते हैं उनसे क्षमा याचना के साथ आखिर सच से दिल तो दुखता ही है आपके दिल मे बनी प्रतिमाओं के खंडित होने का खतरा है  लेकिन क्या करें इतिहास सबसे बड़ा मूर्तिभंजक होता है  ) के तौर पर ही जानते थे। सोचा जाता था कि पढे लिखे व्यक्ति होंगे लोग  परास्नातक बताते हैं । पर अब मुखर हो चलने के बाद कुछ और सच खुलने लगे
काकः कृष्णकः, पिकः कृष्ण:, को भेद पिककाकयो।
बसंत समये प्राप्ते, काकः , काकः  पिकः पिकः । ।
अब मुख्यमंत्री जी के इतिहास, भूगोल और सामान्य जानकारी (गुजरातकी प्रगति से जुड़े उनके दावों के पीछे की हकीकत ), उनकी अशोभनीय भाषा , घमंडी व्यक्तित्व और उतावलेपन को सभी लोग देख चुके हैं । ये चीजें ऐसी होती हैं कि विरोधियों को बुरी लगती हैं और चारणों  को अत्याधिक प्रिय । यहाँ हमने सिर्फ विरोधी और चारण लिखा है क्यों कि इस परंपरा मे दो ही लोग होते हैं विरोधी और चारण  । न समर्थक, न साथी , न निष्पक्ष  कुछ भी नहीं । सवाल उठता है कि यह जानबूझ कर होता है या गलती से ।
यहाँ पर यह चर्चा करना बेकार है कि तक्षशिला कहाँ है , दीन-ए -इलाही क्या है सिकंदर उसका प्रचार कब कर रहा था , चाणक्य कहाँ पैदा हुए आदि आदि । यह साफ है कि मुख्यमंत्री जी ने जो बोला वो उनकी जानकारी के अनुसार सही है । सही न होता तो अब तक उनकी तरफ से खंडन आ गया होता (शोभन सरकार पर ट्विट याद करें ) उनकी जानकारी के अनुसार पटेल की अंत्येष्ठि का उनका ब्योरा सही है । उनकी जानकारी जहां तक है ये बाते सही हैं और गलत वो लोग हैं जिनहे ये बाते गलत लगती हैं । 
नरेंद्र मोदी गोयबल्स की उस बात मे भरोसा रखते हैं जिसके अनुसार 100 बार बोलने पर झूठ भी सच हो जाता है ।
मीडिया और पढे लिखे लोगों  के एक हिस्से को आभास होने लग गया कि
1। गुजरात ने उनके नेतृत्व के चलते बहुत तरक्की की।
2। कुछ लोगों को महसूस सो रहा है कि 2002 के आगे कुछ बहुत अच्छा हुआ है ।
3। भाजपा को महसूस होने लग गया कि मोदी ही उसकी नैया पार लगा सकते हियन
4। भाजपा को लगने गया कि नरेंद्र मोदी ही उनके सबसे बड़े नेता हैं

याद रखिए इस समूह की अगर जरा भी चली तो इनके इतिहास और भूगोल के ब्लंडर्स कल आधिकारिक सच होंगे ।
लेकिन अगर भारत वैसा ही है जैसा अभी तक रहा था तो कल को हो सकता है नेहरू जी की प्रतिमा के लिए भी कुछ मांगते नजर आयें (1998 मे चुनाव के समय संघ के एक बड़े खेमे मे सोनिया गांधी की काफी प्रशंसा हुआ करती थी ) 

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