मंगलवार, 17 जनवरी 2012

क्या जनरल सिंह अपनी व्यक्तिगत अहमन्यता की पुष्टि के लिए सैन्य बलों के सम्मान को मुद्दा बना रहे हैं ?

जनरल सिंह के उम्र विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय जाने के बाद सियासी हलकों में तूफ़ान उठना स्वाभाविक था पर देखा यह जाना चाहिए कि यह मामला कहाँ तक जाता है.
जनरल सिंह ने याचिका दायर करते समय दलील दी कि यह उनके व्यक्तिगत सम्मान और निष्ठा से जुड़ा मामला है और इसका सैन्यबलों के मनोबल पर कोई असर नहीं पडेगा . प्रश्न उठता है कि जब यह उनके व्यक्तिगत सम्मान और निष्ठा का मामला है तो फिर तेरह लाख सैनिकों के सम्मान को क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है.

जिन्हें भी सरकारी सेवाओं और उसमे पदोन्नति से जुड़े मामलों की जानकारी होगी वह जानते होंगे कि आधिकारिक रिकार्ड में जो जन्मतिथि होती है उसका सेवा के दौरान पदोन्नति आदि पर सीधा असर पड़ता है . यदि आधिकारिक रिकार्ड में जनरल सिंह की जन्मतिथि उन्नीस सौ इक्यावन रही है तो उन्हें उस हिसाब से पदोन्नति मिलती रही होगी और अगर यह उन्नीस सौ पचास है तो पदोन्नति के मामलों में यह निर्णायक रही होगी. अब अगर रक्षा मंत्रालय यह मान रहा है कि रिकार्ड्स में यह उन्नीस सौ पचास है तो जाहिर है सेनाप्रमुख समेत तमाम पदोन्नतियों में उन्हें इसका लाभ मिलता रहा होगा क्यों कि पदोन्नति के समय अधिक उम्र वालों को इसका लाभ मिलता है.
क्या जनरल सिंह पदोन्नति लेते समय यह नहीं जानते रहे हैं? क्या यह उचित है कि पदोन्नति के लिए वह अलग जन्मतिथि माने और सेवानिवृत्ति के लिए अलग?
दूसरा मुद्दा है यु पी एस सी का राष्ट्रीय रक्षा अकादमी का फार्म भरते समय दी जाने वाली जन्मतिथि?
क्या जनरल सिंह ने फार्म भरते समय गलत जन्मतिथि दी? जनरल सिंह की दलील है कि  यह लिपिकीय गलती से हुआ होगा . क्या फार्म यु पी एस सी के लिपिक भरते हैं ?
यह मानना कि जनरल सिंह सिर्फ एक वर्ष और सेवा में रहने के लिए जन्मतिथि विवाद को लेकर इतने गंभीर हो गए हैं सही नहीं लगता . जनरल सिंह जिस पद पर हैं और अपने जीवन के जिस मुकाम पर हैं वहाँ एक वर्ष और सेवा में रहने की बात बहुत छोटी है . तो फिर मुद्दा क्या है?
क्या यह सिर्फ खुद को सही करने की जिद है? अगर यह बस सम्मान और निष्ठा का मामला है तो जनरल सिंह इसे इतना इतना तूल देकर स्वयं उसे खोते जा रहे हैं .
परन्तु क्या मामला सिर्फ इतना छोटा है? आशा की जानी चाहिए  कि जनरल के इस कदम के पीछे और कोई मामला या संगठन न हो  क्योंकि ऐसी स्थिति जितनी घातक हो सकती है इसका अंदाजा लगा पाना कठिन है .



बुधवार, 11 जनवरी 2012

हताशा के भाजपा के अनुभव



लगता है भाजपा पर चुनावी बुखार इस कदर चढ़ गया है की वह यह समझ पाने में सक्षम नहीं रह गयी है की किस मुद्दे पर कैसे हमला बोलना है .
आज खबर आई है कि भाजपा के मुखपत्र कमल - सन्देश में राहुल गांधी पर हमला बोला गया है. और मुद्दे तो ठीक हैं पर उसमे राहुल गांधी को शादी न होने की वजह से हताश बताने पर समझ में नहीं आया कि यह भाजपा राहुल पर हमला बोल रही थी कि अपना दर्द बयान कर रही थी. गौरतलब है कि भाजपा में कुंवारे नेताओं की संख्या सर्वाधिक है . अटल विहारी वाजपेयी लम्बे समय तक भाजपा के शीर्ष पर रहे और उनके नाम पर भाजपा आज भी गौरवान्वित होने का दावा करती है. उत्तर प्रदेश चुनावों में भाजपा की प्रचार की कमान संभाल रही उमा भारती से लेकर देश के हर हिस्से में कुंवारे नेताओं की संख्या और दलों की अपेक्षा ज्यादा है . ऐसे में यह समझ में आने में कठिनाई हो रही है कि भाजपा अटल और उमा जैसे नेताओं की हताशा जानने के अपने अनुभव के चलते ऐसा कह रही है या फिर संघ के अविवाहित प्रचारकों की अपनी पार्टी में अनावश्यक दखलंदाजी से उपजी चिढ के चलते यह सोचने पर मजबूर हुई है कि अविवाहित लोगों में हताशा अधिक होती है . कुछ भी हो पर भाजपा को अपने अविवाहित सदस्यों के चलते इस हताशा से उबरने और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के तौर तरीके पता होंगे . अच्छा होता कि राहुल के दुःख के कारण की खोज के साथ उसके निवारण के लिए अटल विहारी वाजपेयी के निजी अनुभव भी बांट दिए जाते .
वैसे गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में चारों प्रमुख दलों में से तीन दलों के शीर्ष प्रचारक अविवाहित ही हैं . भाजपा के ये अनुभव सबके काम आ जाते तो बेहतर होता .
खैर!
वैसे भाजपा की खुद पर हमला करने की आदत इन दिनों काफी बढ़ गयी है. बाबू सिंह कुशवाहा नामक खोज जो आडवानी जी ने अपनी भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा की परिणाम स्वरुप प्राप्त की तो सभी को पता है . भाजपा प्रवक्ता ने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा  भ्रष्टाचार में निरुद्ध सभी नेताओं के लिए गंगा बनने  की ओर अग्रसर है . हमें लगता है कि नकवी के इस बयान के बाद राजा और कलमाड़ी काफी हल्का महसूस कर रहे होंगे . आखिर कोई तो है जो उनके बारे में सोच रहा है .
वैसे ऐसा भी कहा जा रहा है कि इन चुनावों में भाजपा और बसपा में कुछ समझौता हो गया है . भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे जिस भी नेता को बसपा निकालेगी उसे भाजपा अपने साथ ले लेगी जिससे लोग बसपा पर हमला छोड़ कर भाजपा पर हमला करने लगेंगे . जिससे बसपा विरोधों  से बच जायेगी 
भाजपा का सेन्स ऑफ़ ह्यूमर गजब का है वह लोकायुक्त की आठ सालों से नियुक्ति पर रोक और सशक्त लोकपाल के लिए जबानी संघर्ष दोनों एक साथ कर सकती है .
 उम्मीद है कि यह सेन्स ऑफ़ ह्यूमर चुनावों के बाद भी जारी रहेगा


पांगोंग झील



पांगोंग झील का प्रथम दृश्य 
लद्दाख 
फोटो : रौशन

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

सोमवार, 9 जनवरी 2012

खामोशियाँ


खामोशियाँ!
कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।


वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर


और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है
हमे छील गयीं भीतर तक
कई पुराने छुपे हुए से
ज़ख़्म फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी

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