सोमवार, 9 जनवरी 2012

खामोशियाँ


खामोशियाँ!
कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।


वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर


और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है
हमे छील गयीं भीतर तक
कई पुराने छुपे हुए से
ज़ख़्म फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी

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