मंगलवार, 28 अक्तूबर 2008

हिंसा, बदले और मानसिकताएं

फर्ज कीजिये राहुल राज का नाम रिजवान उर रहमान होता और उसने मुंबई की जगह अहमदाबाद में बस का अपहरण करने की कोशिश की होती। वहाँ पर वह कहता कि मै नरेंद्र मोदी को सबक सिखाना चाहता हूँ तो क्या होता ?
क्या उसके प्रदेश के नेता बिना पूरे देश की निंदा सहे प्रधान मंत्री से उसके मारे जाने के ख़िलाफ़ अपील कर पाते ?
क्या प्रधान मंत्री द्वारा गुजरात सरकार से स्पष्टीकरण मांगना इतने सहज तरीके से देखा जा पाता?
याद कीजिये बाटला हॉउस मामले को? क्या हर उस इंसान जिसने मुठभेड़ पर सवाल उठाये, को इतनी सहजता से लिया गया? दोनों मामलों में लोग जख्मी हुए। इंस्पेक्टर शर्मा की मौत अस्पताल में हुयी लेकिन क्या कोई कह सकता था कि उनकी मौत अवश्यम्भावी है जब उनको गोली लगी थी? क्या कोई कह सकता था कि जिस व्यक्ति को राहुल की गोली लगी थी वह बच ही जाएगा?
हम पुलिस की कार्यवाही का समर्थन नही कर रहे हैं पर बाटला हॉउस की दलीलें मुंबई में क्यों नही प्रभावी हैं? सभी न्यूज़ चैनल एक ओर से पूछ रहे हैं कि क्या राहुल को बिना मारे हल नही निकल सकता था पर जिन्होंने बाटला हॉउस में पुलिस पर प्रश्न उठाये उन्हें इतनी सहजता से क्यों नही लिया गया और जिन्हें दिल्ली पुलिस पर पूरा उन्हें मुंबई पुलिस पर यकीन क्यों नही है?
जब लालू ने कहा कि अगर नरेंद्र मोदी को सजा मिली होती तो आतंकवादी पैदा नही होते और भर्त्सना पायी पर इस मामले पर उसी तरह की बातें करने वाले सहजता से लिए जा रहे हैं।
याद करिए गुजरात के उस एन्काउन्टर को , बंजारा अभी भी जेल में है और उसे भुना कर मोदी गद्दी पर। अब बाटला हॉउस और मुंबई की बसों को कौन भुनायेगा ये सामने जल्दी आएगा।
आप कहेंगे कि इस दीवाली के पावन दिन ये शख्स ये क्या राग ले कर बैठ गया। पर क्या करें दीवाली पर बधाई देने जैसा कुछ नजर नही आ रहा है? हमारी क्या गलती है अगर हमें अपना घर बँटा हुआ हुआ दिख रहा है । क्या करें पर दिल भी तो खुश होना चाहिए न?
कल महाराष्ट्र के गृह मंत्री को टी वी पर देखा बड़े तैश में थे। गोली का जवाब गोली से बता रहे थे। उन्हें एक बिहारी कि इस हरकत पर इतना गुस्सा आ गया पर महीनों से राज और उसके गुंडों कि हरकतों पर तैश नही आया आखिर क्यों? ये मराठी और बिहारी का मामला है या फ़िर अकेले राहुल को तो गोली से वो निपटा सकते हैं और राज के गुंडों से डर लगता है? कल टी वी पर गृह मंत्री के चेहरे पर नजर आ रहा तैश क्या साबित करता है? क्या वो भी उसी मानसिकता के गुलाम नही हैं जो राज और उसके गुंडों की है। सच है कि अगर कानून व्यवस्था के नाम पर उन्हें तैश पहले आ जाता तो शायद नौबत यहाँ तक नही आती।
लोग बिहार की राजनीति की बुराई करते हैं पर कम से कम उन नेताओं में इतनी नैतिकता तो थी कि सभी दलों के नेताओं ने एकजुट हो कर बिहार में चल रही हिंसाओं की निंदा की। न जाने और लोग इतने समझ दार कब होंगे?

न्यूज़ चैनलों पर बाढ़ सी आई हुयी है । लोग हिंदू आतंकवाद शब्द लिख लिख कर उसका आनंद उठा रहे हैं। जैसे मालेगांव धमाकों के आरोपियों के हिंदू होने से इन्हे बड़ी तृप्ति हुई हो। जैसे इससे पहले कोई हिंदू आतंकवादी ही न रहा हो। जैसे स्टेन्स के हत्यारे, गुजरात दंगों के अपराधी, उड़ीसा के दंगाई, सभी संत रहे हों। ये बदले की वही पुरानी मानसिकता है जिसके तहत अयोध्या में ढांचा तोडा गया था, जिसके तहत सिख मारे गए थे, जिसके तहत देश भर में आतंवादी घटनाएँ हो रही हैं, जिसके तहत उड़ीसा में ईसाई जलाये जा रहे हैं और जिसके तहत गुजरात में नरसंहार हुआ था।
विश्वास न हो तो बशीर बद्र से पूछ लीजिये वो बताएँगे कि अगर मुसलमानों ने बम विस्फोटों में लोगो को मारा और अब हिंदू उसका बदला ले रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है। (अभी अयोध्या मामलें में उन्होंने ऐसे ही तर्क दिए थे।)। जिस देश में समाज को दिशा देने वाले साहित्यकार ऐसी सोच रखने वाले हो जाएँ उस समाज में त्योहारों का मतलब ही क्या है। क्यों और कैसे स्वीकार करें हम इस दीवाली पर शुभकामनायें?

हम विघ्नसंतोषी नही हैं हम भी खुशी चाहते हैं पर सब गृहमंत्रियों को चयनात्मक तैश आने की बीमारी हो जाए। लोग घटनाओं को नियत चश्मों से देखने लग जायें तो क्या करें आख़िर?
मालेगांव धमाको के संदिग्ध आतंकवादी दोषी हैं या नही इसका फैसला अभी कोर्ट को करना है (जैसे बाकी धमाकों के संदिग्ध आतंकवादियों का ) पर इससे पहले समाज को यह तय करना है कि उसे आतिफ और प्रज्ञा चाहिए या कलाम और अमर्त्य सेन। बाटला हॉउस हो या मुंबई की एक अभागी बस सिर्फ़ पुलिस और मीडिया की कहानी पर यकीन करना है या तथ्यों को आने देने का इंतज़ार?

सोमवार, 27 अक्तूबर 2008

शिकायत

किया व्यापर दर्द का
दिया दर्द और हर बार दर्द ही तौला
फ़िर समेत कर सारी अधूरी हसरतें
पुराना सा एक म्यूज़ियम बना डाला।

बंद करली खिड़कियाँ सारी
डाल दिया दरवाजों पर ताला
कैद कर ढेर सारी पहचानी रोशनियाँ
एक गुमनाम अँधेरा बना डाला।

बनकर याद तुम्हारे दिल मे ही रही
तुमने ख़ुद अपने ही दिल को छला,
रोया मन जब भी तुम्हारा साथ देने को
मुस्कुराकर तुमने हर बार बेगाना बना डाला।

(ये कविता मैंने अपने ब्लॉग पर लिखी थी आज इसे यहाँ रख रही हूँ। जिन्होंने इसे वहां एक बार पढ़ लिया है उनसे दुबारा कष्ट देने के लिए क्षमा चाहूंगी।)

शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

हम सब सुशील कुमार सिंह के साथ हैं

एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें मेंफंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठककी।
इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्टमौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोटडाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित कियागया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील कोइरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया। इस समितिका संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादकअवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेशशर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाटकाम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं।यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंहको परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है। दूसरेप्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति काप्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा।शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिलऔर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने कीसाजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेपकरने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधीकार्यवाही की जाएगी। बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडियासंस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने कीजरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसीब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंनेकहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है औरसमाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंनेसंबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपीलकी।भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय गया है जब वेब माध्यमों से जुड़ेलोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यहकिसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा हमला करने कामामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे। एकजुटता और संघर्ष की इसका कारगर इलाज है। विस्फोट डाट कामके संपादक संजय तिवारी ने कहा- ”पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों परआलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना कोस्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता कोउजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।लखनऊ सेफोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर चुके हैं।लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्किवन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग नेउत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भीसाजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइटके गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बातअलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है। बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज नेभोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गएफैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की औरइस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की। बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडियाके संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेबमाध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ाजाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकिउन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है।हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़ेलोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता केनाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। परउन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़तीजाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना कोसकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। बैठक में हिंदी ब्लागों के कईसंचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।पाठकों से अपीलः अगर आप भी कोई ब्लाग यावेबसाइट या वेब पोर्टल चलाते हैं और वेब पत्रकार संघर्ष समिति में शामिल होना चाहते हैं तोपर मेल करें। वेब माध्यमों से जुड़े लोगों का एक संगठन बनाने की प्रक्रिया शुरू कीजा चुकी है। आप सबकी भागीदारी का आह्वान है। लखनऊ की पुलिस दिल्ली पहुंची.लखनऊ, 24 अक्टूबर। दिल्लीके वरिष्ठ पत्रकार एक मीडिया वेबसाइट के प्रमोटर सुशील कुमार सिंह से पूछताछ के लिए लखनऊ की पुलिसदिल्ली भेजी गई है। हिन्दी और अंग्रेजी की एक वेबसाइट में प्रसारित कुछ अंशों को लेकर यहां के गोमतीनगर थानेमें शिकायत दर्ज कराई गई थी। जिसके बाद पुलिस की टीम सब इंस्पेक्टर राजीव सिंह के नेतृत्व में दिल्ली भेजीगई।मीडिया के कंटेन्ट को लेकर इस तरह की कार्रवाई यदाकदा ही होती है। किसी वेबसाइट को लेकर इस तरह कीकार्रवाई पहली बार होती नजर रही है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया को लेकर समय-समय पर नियम-कानूनकी बात होती रही है पर वेबसाइट को लेकर पुलिस की तत्परता पहली बार नजर रही है। खासबात यह है किभारत में अभी वेबसाइट को लेकर कोई नियम-कायदे बने ही नहीं है। इसके अलावा इस मामले में जिन अंशों कीचर्चा की रही है, उसमें किसी का नाम तक नहीं है। पत्रकार सुशील कुमार सिंह जनसत्ता, एनडीटीवी और सहारान्यूज चैनल से जुड़े रहे हैं। दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने इस सिलसिले में सुशील कुमार सिंह को पूछताछ के लिएअलग जगह पर बुलाया। इस पूरे मामले की जनकारी पुलिस के आला अफसरों को भी नहीं थी। इंडियन फेडरेशनऑफ वर्किग जर्नलिस्ट के अध्यक्ष के विक्रम राव ने इस प्रकरण को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा-कंटेन्ट कामामला जब मीडिया से जुड़ा हो तो ऐसे मामलों में पुलिस का हस्तक्षेप उचित नहीं है। ऐसे मामलों को बातचीत केजरिए ही सुलङाया सकता है। गोमतीनगर थाने के एसओ रूद्र कुमार सिंह ने इस मामले की पुष्टि करते हुए कहाकि सुशील कुमार सिंह के खिलाफ यहां शिकायत दर्ज कराई गई थी जिसकी विवेचना के लिए पुलिस दिल्ली भेजीगई है। इस मामले की जनकारी मिलने के बाद लखनऊ के कुछ पत्रकारों ने पुलिस और प्रशासन के आला अफसरोंको पूरी जनकारी दी और हस्तक्षेप करने को कहा ताकि बेवजह किसी का उत्पीड़न किया सके। गौरतलब हैकि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफतत्कालीन एसपी ने सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसेगिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था।इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यहमामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली।जानकारी के मुताबिक संबंधित वेबसाइट के गपशपजसे कालम को लेकर यह शिकायत दर्ज कराई गई। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्रनहीं किया गया है। पत्रकार सुशील कुमार सिंह ने कहा-यह अद्भुत मामला है। जहां किसी का नाम भी हो, वहशिकायत दर्ज करा दे और पुलिस पूरी तत्परता से वेबसाइट की जंच-पड़ताल करने निकल पड़े।http://aloktomar.com/ तथा http://khabriadda.blogspot.com/ से साभार
aloktomar@hotmail.com

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2008

पूर्वोत्तर की उपेक्षा और सांप्रदायिक चश्में

हमारे देश में चीजों को देखने के कई चश्में प्रयोग में आते हैं। कुछ तार्किक होते हैं कुछ घोर अतार्किक। चश्मों का एक प्रकार साम्प्रदायिकता भी होता है। स्वघोषित हिंदुत्ववादी चश्में , हिंदुत्व विरोधी चश्में, तथाकथित राष्ट्रवादी चश्में आदि आदि।
ऐसे चश्मों से एक फ़ायदा होता है कि उन्हें लगाने के बाद आप हर घटना और उसके कारणों को उसी चश्मे से देखते हैं सोचने समझने की जरुरत ही नही पड़ती। दिमाग खर्च करने से छुट्टी बस चश्मा लगाओ और धरना बनाओ।
पिछले दिनों मणिपुर की राजधानी इम्फाल में बम धमाका हुआ। शायद मीडिया ने थोड़ा समय उस समाचार को दिया और फ़िर दूसरी घटनाओं की ओर मुड गए। इसे सांप्रदायिक चश्में से देखने वालों ने आरोप लगाया कि
"इम्फाल में हुए बम-विस्फोट में पन्द्रह लोग मारे गए, मीडिया ने छोटा सा कैप्शन दिखा कर औपचारिकता निभा ली, फिर एक कटु प्रश्न सामने रखता हूँ, कि यदि कहीं यह दुर्घटना तथाकथित अल्पसंख्यकों के इलाके हो गई होती तो मीडिया से लेकर संसद तक कहर बरपा होता।"

अब ये तो हद ही है किसी चीज को बस एक ही चश्मे से देखने और कुछ भी कह देने की। क्या जयपुर, बंगलोर, अहमदाबाद, और दिल्ली अल्पसंख्यक इलाके थे जो उन बम विस्फोटों पर मीडिया और देश के राजनितिक जीवन में हंगामा हुआ? ये सभी ऐसे इलाके थे जहाँ सभी सम्प्रदायों के लोग रहते हैं। बल्कि जयपुर तो जहाँ तक हमें मालूम है अल्पसंख्यकों की कम आबादी रखता है । फ़िर मीडिया और राजनैतिक जीवन में वहां के ब्लास्ट पर हंगामा क्यों हुआ? मजे की बात है कि लोग ऐसी अतार्किक बात लिख देते हैं शान से और दूसरों को ग़लत ठहराने की कोशिश करते हैं।
हम न्यूज़ चैनल बहुत कम देखते हैं इसलिए हमें नही पता कि मीडिया ने इम्फाल की घटना को कम महत्त्व दिया या नही। पर अगर कम महत्व दिया तो उसके अलग कारण हैं।
मणिपुर एक पूर्वोत्तर राज्य है और मीडिया जिन ख़बरों को महत्त्व देता है उसके पीछे कहीं न कहीं बाज़ार की भी बड़ी भूमिका होती है। पूर्वोत्तर राज्यों में बाज़ार की रूचि कम है और देश के प्रमुख मीडिया चैनेलों की उपस्थिति और लोकप्रियता भी वहां कम है। अस्तु मीडिया की रूचि भी वहां की घटनाओं में कम ही होती है।
ध्यान देने की बात है कि देश की आजादी के इतने सालों बाद भी विकास पूर्वोत्तर तक कम ही पहुँचा है। हो सकता है उसका एक कारण ये भी हो कि वहां की घटनाओं को वहां के परिप्रेक्ष्य में न देख कर दुसरे कारको के प्रभाव में देखा जाता है और वहां की चीजों की उपेक्षा की जाती हो।
अपने पिछले पोस्ट में हमने दुहरेपन के एक रूप की चर्चा की थी। चीजों को एक विशेष चश्मे से देखने की परिपाटी उसी रूप का एक विस्तार है।
हमें जरुरत है घटनाओं को उनके परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़ कर तार्किक रूप में देखने की न कि पहले से बनाये गए ढाँचे में बिना सोचे समझे फिट करके वास्तविकता से मुह चुराने की। यकीन मानिये हम साधारणीकरण करने के चक्कर में सच्चाई को किनारे रख देते हैं और नई परेशानियों को जन्म देते हैं।

गुरुवार, 23 अक्तूबर 2008

हिन्दी, अंग्रेजी और चंद्रयान.

कल चंद्रयान-१ का प्रक्षेपण किया गया। कई ब्लोगर्स ने उसे अपने अपने तरीके से पेश किया। हम भी खोज खोज कर पढ़ते रहे लोगों का उत्साह और उनका तरीका चीजें पेश करने का। एक साहब की बातें थोड़ा खटकी तो हमने सोचा कि उस पर कुछ लिखा जाय।
उन साहब ने ख़बरों को परोसा था अपने ब्लॉग में पहली ही ख़बर थी चंद्रयान के बारे में। बड़े उत्साह से उन्होंने मिशन की सफलता की कामना की थी और मांग की थी कि यह बताया जाय कि यान में कितने पुर्जे विदेशी और कितने स्वदेशी हैं। अगर वो जरा मेहनत करते तो इसरो ने काफ़ी जानकारियां अपनी वेबसाइट पर डाल रखी हैं.

खैर ये बात वो नही थी जो हमें खटकी। वो साहब जिन्होंने अपना स्क्रीन नेम अंग्रेजी में पसंद किया है जबकि उस शब्द का हिन्दी उतना ही प्रभावकारी और सरल है, आपत्ति करते हैं कि इसरो के वैज्ञानिकों ने प्रक्षेपण के बाद राजभाषा हिन्दी में बोलना उचित नही समझा।
जो लोग वैज्ञानिक शब्दावलियों और क्रियाकलापों से वाकिफ होंगे वो जानते होंगे कि प्रक्षेपण के पूरे क्रियाकलाप में सबकुछ अंग्रेजी में ही चलता रहता है। और प्रक्षेपण के तुंरत बाद वो वैज्ञानिक, जो राजनेता नही हैं कि दिखावा करते फिरें, उसी भाषा में बोल सकते हैं जिसके वो उस समय अभ्यस्त हों। वो वैज्ञानिक कोई जानकारी बढ़ने का कार्यक्रम नही कर रहे थे अपना उत्साह प्रदर्शित कर रहे थे।
हम सब अपनी भाषा से प्रेम करते हैं। इसका यह मतलब कतई नही है कि दूसरी भाषाएँ महत्वपूर्ण नही हैं। ज्ञान-विज्ञानं की सार्वभौमिक भाषा के रूप में अंग्रेजी के महत्त्व को नकारने से हमारी हिन्दी का भला या बुरा नही होगा।
जो चीज सहजता में आगे बढती है वो सफल होती है। भाषा को भी सहज रहने दें तो बेहतर होगा। किसी से तुलना या हीनभाव की कोई जरुरत नही हैं हमारी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ को। हिन्दी ब्लोग्स का विकास यही दर्शाता है की स्वस्फूर्त चीजें ज्यादा मजबूती से बढ़ सकती हैं।
छोटी छोटी बातों पर दुखी होने की अपेक्षा यह अधिक अच्छा है कि हम बड़ी उपलब्धियों की खुशी मनाएं।
(ऊपर जिन ब्लोगर भाई का जिक्र किया है उनसे क्षमा याचना के साथ )

बुधवार, 22 अक्तूबर 2008

चुपके से


अंधेरी रात के
गहरे सन्नाटे में
चुपके से
धीरे धीरे
मेरे क़रीब आकर
किसी ने
मुझसे कुछ कहा!

मैं सहमी
अलसायी
नींद में उलझी,
पूछ बैठी
कौन है?

कोई जवाब नहीं
ना कोई पद चिन्ह
ना कोई परछाई
फिर भी
छोड़ गया
एक निःशब्द सवाल!

मैं कौन हूँ?
मेरा वज़ूद क्या है!


Reference - Turning the wheel

शनिवार, 18 अक्तूबर 2008

अब! जब कि

अब! जब कि
कुछ ही दिनों में हमारे रिश्ते
बीते दिनों की मीठी सी
याद बनकर रह जाने को हैं।

अब! जब कि
हमारी पहचान पुरानी किताबों के सूखे फूल
या अनायास ही लिखे कुछ शब्द देख
होठों पर आ जाने वाली
दर्द भरी मुस्कान बनकर रह जाने को है।

अब! जब कि
सारी शरारतें, सारे सपने
इन गुजरे सालों की
सारी दिलचस्प बकवासें
कुछ खोयी सी कहानियाँ बनकर रह जाने को हैं।

अब! जब कि
हम जानते हैं कि चेहरों पर चिपकी
ये मुस्कुराहटें झूठी हैं
और आंखों में बरस पड़ने को
तैयार हजारों मोती हैं।

अब! जब कि
रात भर नींद नहीं आती
डराता है आने वाला कल
जागी हुई आंखों को
और बचे हुए लम्हों को
कमजोर मुट्ठियों में रोकने की
बेकार कोशिशें जारी हैं।

अब! जब कि
झूठी उम्मीदों पर जीने लगें हैं हम
भीतर ही भीतर बेजार-बेबस हो
छुप-छुप रोने लगे हैं हम।

अब! जब कि
उठाती हैं सवाल
अपनी ही उँगलियाँ ख़ुद पर
और अन्दर बैठा कोई
संभालने, संवारने की
कुछ आखिरी कोशिशों में है निरंतर।

अब! जब कि
कुछ ही दिनों में
दूर, बहुत दूर हमें हो जाना है
और फ़िर याद करके अनकही बातों को
पछताना बस पछताना है।

पर अब भी
ह्रदय में मचलता सागर
होठों से नही निकलेगा
बुन लीं हैं हमने मुश्किलें ऐसीं
कि कोई रास्ता नही निकलेगा।

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

सचिन ने तोड़ा लारा का रिकॉर्ड



सचिन तेंदुलकर ने मोहाली में चल रहे भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सिरीज के दूसरे मैच में चाय काल के तुंरत बाद पहली ही गेंद पर तीन रन बनते हुए वेस्ट इंडीज के बल्लेबाज ब्रायन लारा के 11953 रनों के रिकॉर्ड तो पीछे छोड़ दिया।
सचिन ने इस मैच में 88 रनों की पारी खेली और टेस्ट क्रिकेट में 12000 रन बनाने वाले पहले खिलाड़ी बने।


यह एक प्रकार से इस रिकॉर्ड की घर वापसी है क्योंकि पहले या रिकॉर्ड सुनील गावस्कर के नाम था जिस पहले एलन बॉर्डर ने अपने नाम किया और फ़िर ब्रायन लारा ने उन्हें पीछे छोड़ दिया था। गौरतलब है कि लारा ने भी अपना रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया के ही खिलाफ बनाया था।


सचिन की इस उपलब्धि पर उन्हें और देश के तमाम क्रिकेट प्रेमियों को बधाई।


मंगलवार, 14 अक्तूबर 2008

सोमवार, 13 अक्तूबर 2008

एक और कारखाना राजनीति की भेंट

एक घटना का पता चला है।उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती जी की सरकार ने रेल डिब्बे के कारखाने के लिए दी गई जमीन का आवंटन रद्द कर दिया है।

पता चला है कि भूमि पूजन के महज दो दिन पहले जिला अधिकारी महोदय को स्वप्न आया कि वहां के कृषकों में इस आवंटन को लेकर रोष है जो हिंसक हो सकता है।

पता नही जिलाधिकारी महोदय को यह स्वप्न इतना देर में देखने को क्यों कहा गया ।

पता नही अगर वहां मुख्यमंत्री जी को अगर को पार्क वार्क टाइप की चीज बनवानी होती तो क्या होता

सुनने में आया है कि आजकल वहां की सरकार सिर्फ़ पार्क और स्मृति उद्यान ही बनवाती है। क्षमा करें मूर्तियाँ भी लगवाती है और तहलका की माने तो जमीन पर बलात् कब्जे भी करती है

पता तो यह भी चला है कि रायबरेली के किसानो को भी अभी उस रोष कि जानकारी नही हो पायी है जो जिलाधिकारी महोदय के जरिये मुख्यमंत्री जी को हो गई।

सुनने में यह आया है कि इस तरह के रोषो का पूर्वाभास करने में सक्षम अधिकारी अब बादल पुर और गंगा तीव्र गामी राजमार्ग के लिए वास्तविक रोष में आ चुके किसानों के रोषों को कुचलते रहने के काम पर वापस चले जायेंगे।

चलिए कोई नही ये कारखाने कुछ ठीक होते भी नही आख़िर बुद्धदेब बाबु को परेशानी हुयी न

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

मौसमों का डाकिया

बादलों की उमंगें

तितलियों के रंग

नदियों की खिलखिलाहट

बारिशों की नज्में

बसंत की खुशबुएँ

और भी जाने कैसे कैसे

दिखाता रहा करिश्में

निकाल निकाल

अपनी जादुई पोटली से

जाते जाते मुस्कुराया शरारत से

वो मौसमों का डाकिया

और लिख गया मेरा नाम-पता

उदासियों के पार्सल पर

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