सोमवार, 19 नवंबर 2012

ऊँचे पहाड़ों पर पेड़ नहीं लगते !

सफ़ेद धरती नीला आसमान


पिछले साल लद्दाख जाने की पुरानी इच्छा पूरी हुई . लद्दाख घूमते हुए  अटल बिहारी वाजपेयी की कविता ऊँचे पहाड़ों पर पेड़ नहीं लगते की याद आती रही

कविता तो आपने पढ़ी ही होगी
पहाड़ों की एक झलक लद्दाख से
गगन चुम्बी पर्वत श्रृंखलाएं



ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ, 
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, 
मौत की तरह ठंडी होती है। 
खेलती, खिलखिलाती नदी, 
जिसका रूप धारण कर, 
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। 
छांग ला

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किन्तु कोई गौरैया, 
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती, 
ना कोई थका-मांदा बटोही, 
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है। 

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
सीमा के पास का दृश्य नीचे भारतीय सेना के भारत चीन युद्ध में प्रयुक्त  बंकर नजर आ रहे हैं

जो जितना ऊँचा, 
उतना एकाकी होता है, 
हर भार को स्वयं ढोता है, 
चेहरे पर मुस्कानें चिपका, 
मन ही मन रोता है। 

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
बर्फ से ढकी धरती छांग ला के पास

भीड़ में खो जाना, 
यादों में डूब जाना, 
स्वयं को भूल जाना, 
अस्तित्व को अर्थ, 
जीवन को सुगंध देता है। 

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,
धाराओं में बंटी हुई एक नदी का विहंगम दृश्य

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं, 
कि पाँव तले दूब ही न जमे, 
कोई काँटा न चुभे, 
कोई कली न खिले। 
पहाड़ों के बीच बने खेत , खार्दुम ला से दिस्किट के रास्ते में नीचे उतरते  हुए

न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।
मेरे प्रभु! 
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, 
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ, 
इतनी रुखाई कभी मत देना।
                                                  अटल विहारी वाजपेयी 





उदबिलाव 






रविवार, 5 अगस्त 2012

राजनीति में गैंग अन्ना

पहले दिन जब गैंग अन्ना के लोगों ने राजनीतिज्ञों को गालियाँ देना शुरू किया, हमें अनुचित लगा था . किनारे खड़े होकर उपदेश देना गई जिम्मेदारी भरा काम होता है . आपको लगता है कि कुछ गलत है तो आप दूसरों से उसे सुधारने के लिए कहना शुरू करते हैं यह गलत है . कुछ बुरा है उसे सुधारा जाना चाहिए तो दूसरे क्यों आप खुद क्यों नहीं ?
गैंग अन्ना शुरू से राजनैतिक आंदोलन था और इससे राजनीति को अलग ही नहीं किया जा सकता था . राजनीति अलग तब होती जब आप सिर्फ उन सुधारों की बात करते जो आप चाहते हैं , उसके लिए कानूनी , संविधान सम्मत तरीके अपनाते .आपका तरीका सिर्फ और सिर्फ सकारात्मक होना था .  आपकी भाषा सिर्फ आपके उद्देश्य के लिए तय होती. आप एक राजनैतिक दल चुन कर उसका विरोध करने की बात नहीं करते . हम शुरू से ही इस आंदोलन को अपरिपक्व इसी लिए मान रहे थे. वस्तुतः आप किसी चीज के लिए  से हट कर किसी के खिलाफ नजर आने लगते हैं तो इसके मायने कुछ और ही होते हैं.
पिछली अप्रैल और अगस्त में जो जन समर्थन गैंग अन्ना को मिला इन्होने उसका मतलब गलत लगा लिया . भीड़ इनकी खुराक बन गयी और भीड़ ही प्राणवायु
मीडिया की चकाचौंध , रात-दिन कवरेज , मिस्सड काल्स , फेसबुक लाइक्स, कमेंट्स और ट्विटर तो साथ में थे ही . पांच -छह लोगों का समूह खुदा बन गया . खाप पंचायत बन गयी . कौन अच्छा है कौन बुरा , किसे पद में बाँध कर पीता जाना चाहिए किसे "बस एक थप्पड़ लगाना है " जैसी चीजे शुरू हो गयीं. और शुरू हो गया उन्माद परोसा जाना
गैंग के एक सदस्य ने आंदोलन के उफान के दिनों में अपने फेस बुक पर लिखा था
"स्थानीय इंटेलिजेंस के लोग हमारे बारे में पूछ ताछ कर रहे थे 
तो क्या डर जाऊं 
इससे अच्छा है की मर जाऊं "
एक पुरानी ट्वीट को अभी अभी का बता कर पेश किया जाता है कि सरकार खबरे दबा रही है वस्तुतः जितना मीडिया दिखा रहा है जन समर्थन उससे ज्यादा है
पिछली अगस्त में मेरे मोबाइल पर चेन एस एम् एस आते कि अमुक बच्चा जिसकी उम्र सिर्फ अमुक साल है अन्ना के साथ अनशन पर बैठा था आज बेहोश हो गया है डॉ उसकी स्थिति खतरनाक बता रहे हैं और सरकार ने खबर दबा ली है .
इस बार मैसेज आ रहे थे कि इस जगह हजारों की सख्या में लोग गिरफ्तार करके अनशन में पहुँचाने से रोके गए . फेसबुक पर लिखा जाता "तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहें "
सनसनी  फैला कर लोगों को यह अहसास कराया जा रहा था कि जैसे देश एक बड़े से रणक्षेत्र में बदल गया हो और सरकार का दमनचक्र चल रहा हो
अगर सरकार दमन पर उतारू ही थी तो आप कैसे सही सलामत हैं
सरकार का दमन कैसा होता है उनसे पूछिए जिन्हें आपातकाल की याद हो
कैसे आवाज का गला घोंटा जाता है तहलका से पूछिए
खैर !
हम गैंग के राजनीति में आने का स्वागत करते हैं उनकी नीयत पर सौ प्रतिशत अविश्वास होने के बावजूद हम चाहते हैं कि हम गलत साबित हों और गैंग सही साबित हो इस लिए हम चाहते हैं कि यह लोग समझे कि अगर राजनीति करनी है तो एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करें
परम शक्तिशाली लोकपाल ही एक मात्र चीज नहीं है जो हमें चाहिए सिर्फ भ्रष्टाचार का रुकना ही जरुरी नहीं है वैसा कोई दृष्टिकोण हमें आज तक नहीं नजर आया . अगर हम पूरे गैंग के प्रति सकारात्मक होकर भी आंकलन करें तो भी यह एक खाप पंचायत से बढ़कर कुछ नहीं है सुधारवादी परन्तु यथास्थिति वादी
जी नहीं ऐसी सरकार की भारत को जरुरत नहीं है खाप पंचायत की जगह थोड़ी भ्रष्ट सरकार भी चलेगी अगर वो प्रगति वादी विकास वादी और परिवर्तन वादी हो
गैंग को राजनीति जाननी होगी
उसे जानना होगा कि जितना समर्थन उसे उसके उफान के दिनों में मिला था उतना समर्थन भी उसे सिर्फ वोटकटवा पार्टी के रूप में ही खडा कर सकता है और समर्थन बढाने के लिए समग्रता की जरुरत है , अपने दंभ में कमी की जरुरत है . दूसरों को भी कुछ समझने की जरुरत है .
और हाँ
भारत में फिलहाल कोई राजनैतिक दल फेसबुक ट्विटर और मिस्सड काल के भरोसे नहीं खडा किया जा सकता . दिल्ली से बाहर निकलो घरों से बाहर निकलो दिनभर फेसबुक और ट्विटर पर आपके आंदोलन का समर्थन करने वाले कामकाजी लोग वस्तुतः भ्रष्ट ही हैं  क्योंकि वो अपने काम के समय में काम छोड़ कर यह कर रहे हैं 

रविवार, 22 जुलाई 2012

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

क्या जनरल सिंह अपनी व्यक्तिगत अहमन्यता की पुष्टि के लिए सैन्य बलों के सम्मान को मुद्दा बना रहे हैं ?

जनरल सिंह के उम्र विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय जाने के बाद सियासी हलकों में तूफ़ान उठना स्वाभाविक था पर देखा यह जाना चाहिए कि यह मामला कहाँ तक जाता है.
जनरल सिंह ने याचिका दायर करते समय दलील दी कि यह उनके व्यक्तिगत सम्मान और निष्ठा से जुड़ा मामला है और इसका सैन्यबलों के मनोबल पर कोई असर नहीं पडेगा . प्रश्न उठता है कि जब यह उनके व्यक्तिगत सम्मान और निष्ठा का मामला है तो फिर तेरह लाख सैनिकों के सम्मान को क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है.

जिन्हें भी सरकारी सेवाओं और उसमे पदोन्नति से जुड़े मामलों की जानकारी होगी वह जानते होंगे कि आधिकारिक रिकार्ड में जो जन्मतिथि होती है उसका सेवा के दौरान पदोन्नति आदि पर सीधा असर पड़ता है . यदि आधिकारिक रिकार्ड में जनरल सिंह की जन्मतिथि उन्नीस सौ इक्यावन रही है तो उन्हें उस हिसाब से पदोन्नति मिलती रही होगी और अगर यह उन्नीस सौ पचास है तो पदोन्नति के मामलों में यह निर्णायक रही होगी. अब अगर रक्षा मंत्रालय यह मान रहा है कि रिकार्ड्स में यह उन्नीस सौ पचास है तो जाहिर है सेनाप्रमुख समेत तमाम पदोन्नतियों में उन्हें इसका लाभ मिलता रहा होगा क्यों कि पदोन्नति के समय अधिक उम्र वालों को इसका लाभ मिलता है.
क्या जनरल सिंह पदोन्नति लेते समय यह नहीं जानते रहे हैं? क्या यह उचित है कि पदोन्नति के लिए वह अलग जन्मतिथि माने और सेवानिवृत्ति के लिए अलग?
दूसरा मुद्दा है यु पी एस सी का राष्ट्रीय रक्षा अकादमी का फार्म भरते समय दी जाने वाली जन्मतिथि?
क्या जनरल सिंह ने फार्म भरते समय गलत जन्मतिथि दी? जनरल सिंह की दलील है कि  यह लिपिकीय गलती से हुआ होगा . क्या फार्म यु पी एस सी के लिपिक भरते हैं ?
यह मानना कि जनरल सिंह सिर्फ एक वर्ष और सेवा में रहने के लिए जन्मतिथि विवाद को लेकर इतने गंभीर हो गए हैं सही नहीं लगता . जनरल सिंह जिस पद पर हैं और अपने जीवन के जिस मुकाम पर हैं वहाँ एक वर्ष और सेवा में रहने की बात बहुत छोटी है . तो फिर मुद्दा क्या है?
क्या यह सिर्फ खुद को सही करने की जिद है? अगर यह बस सम्मान और निष्ठा का मामला है तो जनरल सिंह इसे इतना इतना तूल देकर स्वयं उसे खोते जा रहे हैं .
परन्तु क्या मामला सिर्फ इतना छोटा है? आशा की जानी चाहिए  कि जनरल के इस कदम के पीछे और कोई मामला या संगठन न हो  क्योंकि ऐसी स्थिति जितनी घातक हो सकती है इसका अंदाजा लगा पाना कठिन है .



बुधवार, 11 जनवरी 2012

हताशा के भाजपा के अनुभव



लगता है भाजपा पर चुनावी बुखार इस कदर चढ़ गया है की वह यह समझ पाने में सक्षम नहीं रह गयी है की किस मुद्दे पर कैसे हमला बोलना है .
आज खबर आई है कि भाजपा के मुखपत्र कमल - सन्देश में राहुल गांधी पर हमला बोला गया है. और मुद्दे तो ठीक हैं पर उसमे राहुल गांधी को शादी न होने की वजह से हताश बताने पर समझ में नहीं आया कि यह भाजपा राहुल पर हमला बोल रही थी कि अपना दर्द बयान कर रही थी. गौरतलब है कि भाजपा में कुंवारे नेताओं की संख्या सर्वाधिक है . अटल विहारी वाजपेयी लम्बे समय तक भाजपा के शीर्ष पर रहे और उनके नाम पर भाजपा आज भी गौरवान्वित होने का दावा करती है. उत्तर प्रदेश चुनावों में भाजपा की प्रचार की कमान संभाल रही उमा भारती से लेकर देश के हर हिस्से में कुंवारे नेताओं की संख्या और दलों की अपेक्षा ज्यादा है . ऐसे में यह समझ में आने में कठिनाई हो रही है कि भाजपा अटल और उमा जैसे नेताओं की हताशा जानने के अपने अनुभव के चलते ऐसा कह रही है या फिर संघ के अविवाहित प्रचारकों की अपनी पार्टी में अनावश्यक दखलंदाजी से उपजी चिढ के चलते यह सोचने पर मजबूर हुई है कि अविवाहित लोगों में हताशा अधिक होती है . कुछ भी हो पर भाजपा को अपने अविवाहित सदस्यों के चलते इस हताशा से उबरने और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के तौर तरीके पता होंगे . अच्छा होता कि राहुल के दुःख के कारण की खोज के साथ उसके निवारण के लिए अटल विहारी वाजपेयी के निजी अनुभव भी बांट दिए जाते .
वैसे गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में चारों प्रमुख दलों में से तीन दलों के शीर्ष प्रचारक अविवाहित ही हैं . भाजपा के ये अनुभव सबके काम आ जाते तो बेहतर होता .
खैर!
वैसे भाजपा की खुद पर हमला करने की आदत इन दिनों काफी बढ़ गयी है. बाबू सिंह कुशवाहा नामक खोज जो आडवानी जी ने अपनी भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा की परिणाम स्वरुप प्राप्त की तो सभी को पता है . भाजपा प्रवक्ता ने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा  भ्रष्टाचार में निरुद्ध सभी नेताओं के लिए गंगा बनने  की ओर अग्रसर है . हमें लगता है कि नकवी के इस बयान के बाद राजा और कलमाड़ी काफी हल्का महसूस कर रहे होंगे . आखिर कोई तो है जो उनके बारे में सोच रहा है .
वैसे ऐसा भी कहा जा रहा है कि इन चुनावों में भाजपा और बसपा में कुछ समझौता हो गया है . भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे जिस भी नेता को बसपा निकालेगी उसे भाजपा अपने साथ ले लेगी जिससे लोग बसपा पर हमला छोड़ कर भाजपा पर हमला करने लगेंगे . जिससे बसपा विरोधों  से बच जायेगी 
भाजपा का सेन्स ऑफ़ ह्यूमर गजब का है वह लोकायुक्त की आठ सालों से नियुक्ति पर रोक और सशक्त लोकपाल के लिए जबानी संघर्ष दोनों एक साथ कर सकती है .
 उम्मीद है कि यह सेन्स ऑफ़ ह्यूमर चुनावों के बाद भी जारी रहेगा


पांगोंग झील



पांगोंग झील का प्रथम दृश्य 
लद्दाख 
फोटो : रौशन

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

सोमवार, 9 जनवरी 2012

खामोशियाँ


खामोशियाँ!
कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।


वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर


और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है
हमे छील गयीं भीतर तक
कई पुराने छुपे हुए से
ज़ख़्म फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी

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