रविवार, 20 सितंबर 2009

ब्लोगिंग में सात साल

सात साल पहले
सितम्बर 2002 की बात है हम इंडिया टुडे पढ़ रहे थे। उसमे एक स्टोरी ब्लोगिंग को लेकर थी । हमें बात जम गई बस तुंरत फैसला किया कि जैसा भी होता हो हमें ब्लॉग चाहिए ही चाहिए । दो-तीन ब्लॉग्गिंग साइट्स के नाम रटे, इंडिया टुडे को एक कोने में उछाला और निकल पड़े नजदीकी साइबर कैफे की खोज में ।
उन दिनों हमें इन्टरनेट के इस्तेमाल के अलावा कंप्यूटर के बारे में कोई जानकारी नही थी। २-३ ब्राउजर पहचानते थे की बोर्ड पहचानते थे, माउस पहचानते थे और जानते थे कि माउस क्लिक करना होता है। ब्लोगर वाकई सरल था हमने बाकियों को किनारे किया और ब्लोगिंग शुरू कर दी । सही तारीख तो नही याद है पर ब्लॉग बनने के हफ्ते भर के अन्दर पहली पोस्ट डाली थी । जो 20 सितम्बर 2002 की तारीख बतलाती है । तो इस लिहाज़ से हमें ब्लोगिंग करते आज 7 साल पूरे हो गए हैं।
शुरूआती ब्लॉगर बड़ा अजीबोगरीब टाइप का होता था। हम आपनी शुरूआती पोस्ट्स में टाइटल का लिंक नही देखते हैं । पता नही टाइटल देने की सुविधा नही थी या फ़िर हम अज्ञानी समझ नही पाते थे ।

परिवर्तनों की शुरुआत

1999 में शुरू हुए ब्लॉगर में जब हमने प्रवेश किया तो उसी समय ब्लॉगर को खरीदने के बारे में गूगल और ब्लॉगर के स्वामित्व वाली पायरा लैब्स में बातचीत चल रही थी।

2003 की शुरुआत में किसी समय पता चला कि पायरा लैब्स अब गूगल की है और ब्लॉगर भी।

ब्लोगर में गूगल ने परिवर्तन लाना शुरू कर दिया और इसी परिवर्तनों की यात्रा में साथ -साथ बहते हुए हम भी सीखते रहे जाने क्या क्या।

और भी कुछ


2003 में हमने एक और ब्लॉगर अकाउंट खोला और एक दूसरा ब्लॉग बनाया । ये ब्लॉग छद्म नाम से थोड़ा आक्रामक होकर लिखने को बनाया था . अब तक हम टिप्पणियाँ देने के महत्त्व से परिचित हो चले थे इसलिए ये ब्लॉग चल निकला . हमारा पहला ब्लॉग जहाँ विजिटर्स का मोहताज था वहीँ दूसरा ब्लॉग अच्छा चल रहा था. २००३-२००५ तक के सालों में हमने जम के झगडा किया और सिरदर्द मोल लिया अंत में दिन ब्लॉग डिलीट करके ओरवेल के १९८४ उपन्यास के पात्रों की तरह गायब हो गए . मजा तो ये है कि हम मौजूद रहते हुए भी गायब हैं । कभी कभी अपने उन पुराने दोस्तों के ब्लोग्स पर घूम आते हैं ।
इन दो सालों में हमने जितना झगडा किया उतना जिंदगी भर नही किया होगा ।


प्राइवेट डायरी


ब्लॉग नामक टूल का एक अच्छा इस्तेमाल निजी डायरी बनाने में भी अच्छे से हो सकता है ॥ ऐसा कुछ जो आप अपने कुछ ख़ास दोस्तों को ही पढाना चाहते हों।
हमने नोटिस किया है कि अपने हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ एक लोग पासवर्ड प्रोटेक्टेड ब्लॉग भी रखते हैं। ये पासवर्ड प्रोटेक्शन हर किसी को उस ब्लॉग तक पहुँचने से रोक देता है । हमने भी इसका इस्तेमाल किया है इसका इस्तेमाल करते हुए हमें लगता है कि हम फ़िर से क्लास में बैठे हैं और दोस्तों से कागज़ की छोटी छोटी पर्चियों पर लिख कर बात कर रहे हों। छोटी पर्चियों संभालने में दिक्कत होती थी तो हमने एक बार बड़े से पेज पर लिखना शुरू कर दिया। वह पेज उन्ही लोगों के हाथो से गुजरता था जो उस बातचीत में शामिल रहते थे। और जिसे जो कुछ कहना होता था वह लिख कर साइन कर देता था।
ऐसे कई पेज तो समय के साथ गुम होते गए पर कुछ आज भी बचे हुए हैं । उन्हें पढ़ना हमेशा आनंद देता है।
ऐसे ही पासवर्ड प्रोटेक्टेड ब्लोग्स हैं।

छोटे से समूह का अपनी सुविधानुसार लोगों की नजरों से ओझल रहते हुए लगातार चलने वाला वार्तालाप ।
जिन्होंने ट्राई किया है वो जानते होंगे कि ये वाकई मजेदार है ।

टिप्पणी प्रसंग !
कुछ नियम
प्रत्येक नए ब्लॉग पर की गई प्रतिक्रिया आपके ब्लॉग के पाठकों में एक और पाठक और टिप्पणी देने वालों में एक और टिप्पणी देने वाला जोड़ सकता है
आप कुछ भी लिखते हैं तो उस लेखन पर आने वाली टिप्पणियाँ आपके द्वारा दूसरे ब्लोगों पर दी गई टिप्पणियों के समानुपाती होती हैं
विवाद लोगों को आकर्षित करने का अचछा माध्यम होता है पर इसके लिए आपको थोड़ा सा नामचीन होना पड़ेगा

हमने अपनी इंग्लिश ब्लोगिंग में ये तीनों नियम इस्तेमाल किए हैं और सफलता पायी हैकहाँ क्या अच्छा है इससे ज्यादा लोगों की रूचि कहाँ क्या बुरा है खोजने में ज्यादा रहती है

खैर!


अभी हाल ही में चिट्ठाचर्चा पर कुश ने एक ब्लॉग और उसपर आई टिप्पणियाँ उजागर कीज्यादा कुछ कहना बेकार है क्योंकि कुश ने सबकुछ कह डाला है पर कभी जब हम अपने ब्लॉग पर आई हुई टिप्पणियाँ पढ़ रहे होते हैं तो अक्सर किसी टिप्पणी को देख कर दिल से आह निकलती है
..... उफ़ बिना पोस्ट पढ़े या बिना समझे टिप्पणी मार दी गई होगी
आप में से कईयों को ऐसा ही लगता होगा

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

गुनहगार

तमाचे से जैसे उसके कान सुन्न से हो गए थे । हाथ लगा कर देखा तो कुछ खून का आभास हुआ होठों पर । अब उसने चारों तरफ़ देखने की कोशिश की तो पाया मारने वाला जा चुका था और आस पास इकट्ठा लोग उसी की तरफ़ देखे जा रहे थे।
ये दिन का कोई एक समय और भरे हुए बाजार में कोई एक जगह थी । समय और जगह महत्वपूर्ण नही थी न ही वो ख़ुद। बस ख़ुद में ही गुम वो कहीं चला जा रहा था कि सामने से आ रहे किसी ने उसे रोका और बिना कुछ पूछे , बिना कुछ कहे एक झन्नाटेदार तमाचा उसे जड़ दिया।
महत्वपूर्ण था वो झन्नाटेदार तमाचा !
दिन के किसी एक समय और भरे बाजार की किसी एक जगह पर बिल्कुल मामूली और महत्वहीन से उस इंसान को लगा कि कम से कम उसे उसकी गलती तो पता होनी चाहिए थी। लेकिन मारने वाला बिल्कुल से तमाचा लगा कर चला गया।
अब जब वो थोड़ा संभला तो पाया कि भरे बाजार में इकठ्ठा भीड़ उसी कि तरफ़ देख रही थी। उनकी आंखों में संवेदना की जगह ख़ुद को लोगों को हुए नही थी। उसने पाया कि सभी लोग उसे ही गुनाहगार मान रहे थे था बहुत दिन क्या सहाय! उस बेहद महत्वहीन इंसान को एक थप्पड़ ने लोगों की नजरों में महत्वपूर्ण बना दिया .
बहुत दिन हुए उसने ख़ुद को लोगों के द्बारा देखते हुए नही पाया था, नही शायद कभी नही पाया था। आज उसने देखा तो पाया कि लोगों की निगाहें बहुत अजीब होती हैं। उसने पाया कि लोग सोचते नही बस देखते हैं और जब लोग देखते हैं तो न जाने क्यों एक गुनाहगार खोजते हैं । उसे लगा कि लोगों को ये उम्मीद ही नही हो सकती कि कोई गुनहगार से हट कर और भी कुछ हो सकता है ।
उसने याद किया कि वो ख़ुद भी लोगों की ही तरह तो है।
जिंदगी के इन तमाम सालों में उसने गुनहगार ही तो खोजें हैं। जिंदगी के इन तमाम सालों में उसे कभी यह नही लगा कि लोग और भी कुछ हो सकते हैं । और कुछ भी ... मसलन बेचारे !
जैसा वह अभी ख़ुद था।
यह चक्रव्यूह है ।
लोगों को बेचारा बना कर उन्हें गुनाहगार बताने का ।
यह चक्रव्यूह है लोगों अलग थलग कर देने का ।
उसने फैसला किया कि उसे अलग थलग नही होना है।
उसने फैसला किया कि उसे वापस उसी गुमनामी में जाना है जहाँ वह लोगों को गुनाहगार समझ सके , लोगों की आरोप लगाती नज़रों से बच सके।
अगले ही पल उसने सबसे नज़दीक एक अपने जैसे लग रहे एक इंसान को खोज निकाला और पूरी मजबूती से एक थप्पड़ उसे जड़ दिया।
आस-पास की भीड़ में एक हलचल सी हुई। वह कांपते हुए किनारे खोजने लगा कि किसी तरह से लोगों कि भीड़ से बच कर भागा जाए
पर यह क्या
वह पहले से ही किनारे था।
लोगों की नजरें किसी और पर टिकी हुईं थी । लोग फुसफुसा कर बातें कर रहे थे । शायद लोग उसी को देख रहे थे जिसे उसने अभी अभी थप्पड़ जड़ा था।
उसने लोगों की निगाहों का अनुसरण किया । भीड़ के बीच एक आदमी खडा था, लोग उसे देखे जा रहे थे।
उसने भी एक उड़ती सी नजर उस पर डाली और उसका मन चिढ से भर गया ।
तो यही है वह गुनाहगार!
वह भूल चुका था कि कुछ देर पहले वह ख़ुद गुनाहगार था ।

राष्ट्रभाषा का तमगा मिले, तुम्हारी पैरवी करूँगा|

सुनो! तुम्हें आती है,
खिचड़ी पकानी,
अंग्रेजी और हिंदी की|
नहीं आती न?
अच्छा! अंग्रेजी में हिंदी,
या हिंदी में अंग्रेजी का,
चटपटा पकवान बनाकार,
गर्व से सीना चौड़ा करके,
उसे परोसना|
कुछ तो सीखा होगा तुमने....
नहीं सीखा?

तब तो तुम,
बिलकुल नहीं चल पाओगे,
और बचा भी नहीं पाओगे,
अपने बचे-खुचे अवशेष को|
महसूस किया है तुमने,
अंग्रेजी के उन्माद को|
जब कोई बेटा हिंदी में,
अंग्रेजी मिलाकर,
अपनी माँ से कहता है-
"माँ आज तुम बहुत सेक्सी लग रही हो"
हा..हा..हा..! उस वक़्त..! उस वक़्त..!
माँ भी वातशल्य को,
क्षण-भर भूल,
निहारने लगती है,
अपने सोलहवें सावन को|
अपने पुराने ढर्रे पर,
चिपों-चिपों करते हो|
क्या हुआ तुम्हारी जननी,
संस्कृत का?
जिसके गर्भ में,
अविर्भाव हुआ था तुम्हारा!
वह भी गायब हो गयी न,
गदहे की सिंघ की तरह|
बात करते हो साहित्य की?
चलो मनाता हूँ,
साहित्य दर्शन है,
लेकिन ये बताओ कि,
दर्शन का भी,
संगठन होता है क्या?
और होती हैं क्या?
इसकी भी प्रतियोगिताएँ,
अपने व्यक्तित्व को,
श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये|
हिंदुस्तान में,
तुम्हें शुद्ध बोलने वाले कम,
और तुम्हारे नाम की,
रोटी खानेवाले ज्यादा हैं,
गौर किया है कभी तुमने?
वर्ण, जाति, धर्म और
परंपरा का संगठन,
या फिर कोई भी,
मनचाह संगठन,
जानते हो कब बनता है?
इसके भी व्यतिगत रूप से,
बहुत पहलू हैं,
अपने-अपने हिसाब से|
लेकिन मुझे,
जो पहलू मुख्य लगता है,
वह है उसके लोप होने का भय|
अच्छा ये बताओ...
सुना है तुमने कभी,
कि शेरों ने मिलकर,
गीदडों के खिलाफ,
बनाया हो संगठन|
हा! इतना ज़रूर है कि,
गीदड़ एक साथ मिलकर,
हुआं-हुआं करते हैं,
वो भी दिन में नहीं,
अमावस की रात में|
जानते हो,
तुम्हारी सबसे बड़ी,
विवशता क्या है?
तुम "एलीट" नहीं बन पाये|
तुम में कोई योगता नहीं,
कि तुम्हें राष्ट्रभाषा का,
तमगा मिले,
ये कैसे हो सकता है?
फिर भी मैं,
तुम्हारी पैरवी करूँगा|
कानूनी किताब में तुम,
हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा,
के नाम पर,
दर्ज कर दिए जाओगे|
लेकिन...
मेरे एक अंतिम प्रश्न,
का उत्तर दे दो|
यही तुम्हारी योग्यता,
मान बैठूँगा|
कहाँ से लाओगे,
अपने प्रेमियों को,
जो तुम में,
आस्था बनाये रखेंगे तबतक,
जबतक रहेगी ये सम्पूर्ण सृष्टी|
तुम चीटिंगबाज़ी करके,
दे सको अगर इसका उत्तर,
तो इस बात की भी,
तुम्हें छुट है....

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों के साथ रेलवे का सौतेला व्यवहार

अगर आप ई - टिकटिंग सुविधा का इस्तेमाल करते हैं तो आप जानते होंगे कि ई टिकट के साथ पहचान पत्र का होने जरूरी है। वस्तुतः इसके बिना आपका टिकट मान्य नही होता है । हमने कई बार कोशिश की कि रेलवे के इस नियम के पीछे के लोजिक को समझा जाय पर हमें समझ में नही आ पाया।
वस्तुतः पहचान पत्र के पीछे सुरक्षा का पहलू बताया जाता है और यह सोचा जाता है कि इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि टिकट सही के हाथों में है। पर रेलवे के विंडो से लिए गए टिकट में यह अनिवार्यता नही होती है। इन्टरनेट के माध्यम से लिए गए टिकट में टिकट लेने वाला टिकट के लिए भुगतान किसी खाते से ही करता है जिससे कम से कम यह तो सुनिश्चित हो जाता है कि बाद में जब कभी भी टिकट के खरीदार को ट्रैक किया जाना जरूरी हुआ तो भुगतान के खाते के माध्यम से खरीदार को ट्रैक किया जा सकेगा परन्तु रेलवे के विंडो पर टिकट नगद पैसा दे कर खरीदने वाले को ट्रैक किया जा पाना सम्भव नही है।
फ़िर पहचान पत्र की अनिवार्यता क्यों?
ई टिकटिंग में पहचान पत्र की अनिवार्यता टी टी के हाथों में ब्रह्मास्त्र की तरह है और यह व्यवस्था उसके लिए कमाई के अवसर सुलभ कराती है।
मान लीजिये आपके पास ई टिकट है पर पहचान पत्र आप गलती से घर भूल गए हैं । अब आप की शांतिपूर्ण यात्रा टी टी की इच्छा पर निर्भर करती है। नियमानुसार आप टिकट होते हुए भी बिना टिकट यात्रा कर रहे हैं और टी टी आप की सीट या बर्थ किसी और को दे देने के लिए स्वतंत्र है । अगर आपको आपनी सीट या बर्थ चाहिए तो अनिवार्य रूप से टी टी की सहमति की जरुरत होगी और सभी जानते हैं कि ऐसी सहमति टी टी से सिर्फ़ एक ही तरीके से प्राप्त की जा सकती है।

ई टिकटिंग एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे टिकट विक्री में रेलवे का स्टेशनरी का खर्च और स्टाफ का खर्च बचता है इसके साथ ही उसकी ऊर्जा की भी बचत होती है। कायदे से इन बचतों के बदले टिकट खरीदने वालों को कुछ छूट भी दी जा सकती है पर ना जाने क्यों ई टिकटिंग से जुड़े हुए कई नियम- क़ानून इसे लगभग हतोत्साहित ही करते दीखते हैं।

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