शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

गुनहगार

तमाचे से जैसे उसके कान सुन्न से हो गए थे । हाथ लगा कर देखा तो कुछ खून का आभास हुआ होठों पर । अब उसने चारों तरफ़ देखने की कोशिश की तो पाया मारने वाला जा चुका था और आस पास इकट्ठा लोग उसी की तरफ़ देखे जा रहे थे।
ये दिन का कोई एक समय और भरे हुए बाजार में कोई एक जगह थी । समय और जगह महत्वपूर्ण नही थी न ही वो ख़ुद। बस ख़ुद में ही गुम वो कहीं चला जा रहा था कि सामने से आ रहे किसी ने उसे रोका और बिना कुछ पूछे , बिना कुछ कहे एक झन्नाटेदार तमाचा उसे जड़ दिया।
महत्वपूर्ण था वो झन्नाटेदार तमाचा !
दिन के किसी एक समय और भरे बाजार की किसी एक जगह पर बिल्कुल मामूली और महत्वहीन से उस इंसान को लगा कि कम से कम उसे उसकी गलती तो पता होनी चाहिए थी। लेकिन मारने वाला बिल्कुल से तमाचा लगा कर चला गया।
अब जब वो थोड़ा संभला तो पाया कि भरे बाजार में इकठ्ठा भीड़ उसी कि तरफ़ देख रही थी। उनकी आंखों में संवेदना की जगह ख़ुद को लोगों को हुए नही थी। उसने पाया कि सभी लोग उसे ही गुनाहगार मान रहे थे था बहुत दिन क्या सहाय! उस बेहद महत्वहीन इंसान को एक थप्पड़ ने लोगों की नजरों में महत्वपूर्ण बना दिया .
बहुत दिन हुए उसने ख़ुद को लोगों के द्बारा देखते हुए नही पाया था, नही शायद कभी नही पाया था। आज उसने देखा तो पाया कि लोगों की निगाहें बहुत अजीब होती हैं। उसने पाया कि लोग सोचते नही बस देखते हैं और जब लोग देखते हैं तो न जाने क्यों एक गुनाहगार खोजते हैं । उसे लगा कि लोगों को ये उम्मीद ही नही हो सकती कि कोई गुनहगार से हट कर और भी कुछ हो सकता है ।
उसने याद किया कि वो ख़ुद भी लोगों की ही तरह तो है।
जिंदगी के इन तमाम सालों में उसने गुनहगार ही तो खोजें हैं। जिंदगी के इन तमाम सालों में उसे कभी यह नही लगा कि लोग और भी कुछ हो सकते हैं । और कुछ भी ... मसलन बेचारे !
जैसा वह अभी ख़ुद था।
यह चक्रव्यूह है ।
लोगों को बेचारा बना कर उन्हें गुनाहगार बताने का ।
यह चक्रव्यूह है लोगों अलग थलग कर देने का ।
उसने फैसला किया कि उसे अलग थलग नही होना है।
उसने फैसला किया कि उसे वापस उसी गुमनामी में जाना है जहाँ वह लोगों को गुनाहगार समझ सके , लोगों की आरोप लगाती नज़रों से बच सके।
अगले ही पल उसने सबसे नज़दीक एक अपने जैसे लग रहे एक इंसान को खोज निकाला और पूरी मजबूती से एक थप्पड़ उसे जड़ दिया।
आस-पास की भीड़ में एक हलचल सी हुई। वह कांपते हुए किनारे खोजने लगा कि किसी तरह से लोगों कि भीड़ से बच कर भागा जाए
पर यह क्या
वह पहले से ही किनारे था।
लोगों की नजरें किसी और पर टिकी हुईं थी । लोग फुसफुसा कर बातें कर रहे थे । शायद लोग उसी को देख रहे थे जिसे उसने अभी अभी थप्पड़ जड़ा था।
उसने लोगों की निगाहों का अनुसरण किया । भीड़ के बीच एक आदमी खडा था, लोग उसे देखे जा रहे थे।
उसने भी एक उड़ती सी नजर उस पर डाली और उसका मन चिढ से भर गया ।
तो यही है वह गुनाहगार!
वह भूल चुका था कि कुछ देर पहले वह ख़ुद गुनाहगार था ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. मन को झनझना दिया आपने।
    शायद यही जीवन का सच है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

    उत्तर देंहटाएं
  2. khud ko janane tak me
    ye sab log kyon zaroori hain...
    kitna achha hota ki khud hi faisla karte apane bare me bina kisi parvah ke.
    kisi ko gunahgar koi kah sakta hai
    ....aur khatrnak baat hai hamari sabki chahi ek khoobsoorat duniya ke liye ek insan ka is hukm ko man lena. ye atma hatya hai.
    gunahgar pehla nahi teesra sach hai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. ذھن کو جھکجھوڑ دینے والی چیج لکھی ہے اپنے

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपको जानकर खुशी होगी कि आज उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, डीएम आवास के बगल, हजरतगंज में हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक "हिन्दी में पटकथा लेखन" का 3.30 बजे विमोचन है। आपको यदि समय मिलें, तो अवश्य आएं। लखनउ के कई ब्लॉगर वहां पर इकटठे हो रहे हैं, इसी बहाने एक छोटी सी ब्लॉगर्स मीट भी करने की प्लानिंग हैं।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    Mo- 9935923334
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

    उत्तर देंहटाएं

Follow by Email