मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कागज की हवेली है


आज जैसे ही हम घर से निकले बारिश की बूँदें शुरू हो गयीं । पहले हौले-हौले और फ़िर तेज। आपना तरीका वही कुश भाई वाला रहा है भाग जाओ या फ़िर भीग जाओ। भीग जाने को ललचाये अपने मन को हमने कपडों और ऑफिस का हवाला दिया , लैपटॉप की और इशारा किया और मुट्ठी बंद है या खुली इसकी परवाह किए बिना भाग खड़े हुए।
पनाह ली एक दूकान के सामने थोडी सी छाया में।
बारिशे आकर्षित करती हैं पर सच तो यह है की हर आकर्षित करने वाली चीज के मानिंद ये भी परेशानी खड़ी करने वाली होती हैं। यह ज्ञान हमें आज ही प्राप्त हुआ।
कुछ लोग भीगते हुए निकल रहे थे उनसे हमें रश्क हुआ ।
कुछ लोग छाते ताने निकल रहे थे उनसे भी हमें रश्क हुआ।
कुल मिला कर टोटल सेंस ऑफ़ डेप्राईवेशन !
भीग न सकने की लाचारी
बरसते पानी में निकल न पाने की लाचारी
हम छाते नही पसंद हैं। आख़िर ये भी कोई बात हुई कि बूंदे अपना दिल खोल के बरस रहीं हों और आप छाता ताने उनको जलाते हुए चले जा रहे हों। पिछ्ले साल की घनघोर में भी हमने छातों और रेनकोट से परहेज बनाये रखा। बारिश होती रही और बाइक के बैग में रखे रेनकोट को ऐसे इग्नोर करते रहे जैसे वो टीवी पर आने वाला जनहित में जारी विज्ञापन हो।
खैर!
इंतज़ार ख़त्म हुआ बारिश बंद हुई । हम थोडी ही दूर आए थे, बूंदे फ़िर जी ललचाने आ गयीं इसबार हमने हाथ में लिए अखबार को अपने सर पर रख लिया ।
ऑफिस पहुँचते पहुँचते अखबार बुरी तरह से भीग चुका था । हमने अखबार को एक किनारे रखा और एक शेर मन ही मन गुनगुनाने लगे
मासूम मोहब्बत का इतना सा फ़साना है
कागज़ की हवेली है, बारिश का ज़माना है।
शायद बारिशों से की जाने वाली मासूम मोहब्बतें ऐसे ही न भीग पाने की लाचारियों की भेंट चढ़ती चली जातीं हैं
शायद छाते भी कसमसाते होंगे अपने नीचे बिना भीगे चले जाते लोगों की लाचारी पर , शायद रेनकोट .........
पता नही ...........................
कुश ने अभी अपने ब्लॉग पर लिखा था हर बारिश की अपनी अलग कहानी होती है।
हर साल की बारिश भी ऐसे ही अलग अलग कहानी लेकर आती है

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

लिंकन का पत्र अपने बेटे के शिक्षक के नाम

यह पत्र अब्राहम लिंकन ने अपने बेटे के शिक्षक को लिखा था . मुझे लगता है इसकी प्रासंगिकता आज भी है
मै जानता हूँ की उसे सीखना है कि
सभी लोग न्याय प्रिय नहीं होते
सभी लोग सच्चे नहीं होते
लेकिन उसे यह भी सिखाएं कि
जहाँ एक बदमाश होता है
वहीं एक नायक भी होता है
यह कि हर स्वार्थी राजनेता के जवाब में
एक समर्पित राजनेता होता है
उसे बताइए कि जहां एक दुश्मन होता है
वहीँ एक दोस्त भी होता है
अगर आप कर सकें तो
उसे ईर्ष्या से बाहर निकालें
उसे खामोश हसीं का रहस्य बताएं
उसे जल्दी यह सीखने दें कि
गुंडई करने वाले बहुत जल्दी चरणस्पर्श करते हैं
अगर पढ़ा सकें तो उसे
किताबों के आर्श्चय के बारे में पढाएं
लेकिन उसे इतना समय भी दें कि
वह आसमान में उड़ती चिडिया के,
धुप में उड़ती मधुमक्खियों के ,
और हरे पर्वतों पर खिले फूलों के
शाश्वत रहस्य के बारे में सोच सके
उसे स्कूल में यह भी सिखाओ के
नकाल करने से कहीं ज्यादा
स्म्मान्जानक है फेल हो जाना
उसे अपने विचारों में विश्वास
करना सिखाएं,
ताब भी जब सब उसे गलत बताएं
उसे विनम्र लोगों से विनम्र रहना
और कठोर लोगों से कठोर व्यावार करना सिखाएं
मेरे बेटे को ऐसी ताकत दो कि वह उस भीड़ का हिस्सा न बने
जहां हर कोई खेमे में शामिल होने में लगा हो
उसे सिखाओ कि वह सबकी सुने
लेकिन उसे यह भी बताओ कि
वह जो कुछ सुने उसे सच्चाई की छन्नी पर छाने
और उसके बाद जो अच्छी चीज बचे उसे ही ग्रहण करे
अगर आप सिखा सकते हैं तो उसे सिखाएं कि
जब वह दुखी हो तो कैसे हसे
और उसे सिखाएं कि आंसू आना कोई शर्म कि बात नहीं है
उसे सिखाएं कि निंदकों का
कैसे मजाक उडाया जाए
और ज्यादा मिठास से
कैसे सावधान रहा जाए
उसे सिखाएं कि अपने बल और बुद्धि को
कैसे ऊंचे दाम पर बेचे
लेकिन अपने ह्रदय और
आत्मा को किसी कीमत पर न बेचे
उसे सिखाएं कि एक चीखती भीड़ के आगे
अपने कान बंद करले
और अगर वह अपने को सही समझता है तो
जम कर लादे
उससे विनम्रता से पेश आयें
पर छाती से न लगायें रहें
क्योंकि आग में ही तप
कर लोहा मजबूत होता है
उसमें साहस आने दें
उसे अधीर न बनने दें
उसमे बहादुर बनने का धैर्य आने दें
उसे सिखाएं कि वह अपने में गहरा विश्वास रखे
क्योंकि तभी वह मानव जाती में गहरा विश्वास रखेगा
यह एक बड़ी फरमाइश है पर देखिये आप क्या कर सकते हैं
क्योंकि यह छोटा बच्चा मेरा बेटा है .

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

सुप्रीम कोर्ट और वो चुनौती देता धुआं

कभी कभी ऐसा होता है की छोटी सी बात बहुत कुरेद जाती है । खैर इस छोटी सी बात ने मुझे कुरेदने के साथ साथ गुदगुदाया भी और......... मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया जो की मेरी स्वाभाविकता के खिलाफ है। आज मुझे अपने काम से सुप्रीम कोर्ट जाना हुआ। निहायत ही खुली और खूबसूरत जगह है। टीवी में देखने पर उसका बहुत ही छोटा सा अक्स आता है , पर सामने से देखने पर सफ़ेद पत्थरों की विशालता कुछ अलग ही बात कहती है। मैं बहुत दिन बाद किसी ऐसी जगह गया जहाँ मेरा मन छोड़ कर जाने को नही हो रहा था । मैं एक घंटे तक करीने से लगी गाड़ियों , कई सारे पीले बोर्डों पर लिखे हुए निर्देश पढ़ते , पत्थरों के इस व्यापक विस्तार को देखते हुए बाहर निकल रहा था, कि धूम्रपान के विरूद्व निर्देश लगा था। गेट से पहले लगा था इसलिए निगाह पड़ गई। आगे बढ़ते ही दो होनहार आराम से कुर्सी पर बैठ कर बीडी पी रहे थे भारतीय गणराज्य के सर्वोच कोर्ट के" स्वागत" गेट पर।धूम्रपान के विरूद्व निर्देशों के बगल में । मेरे लिए कानून के सबसे सम्मानजनक स्थान पर ।

कई बातें मन में आयीं ।हँसी आई ,गुस्सा भी । सबसे शक्तिशाली संस्थान की सीमाएं(परिवर्तन लाने की ) इससे स्पष्ट क्या होंगी ? कानून शायद सिर्फ़ कागज़ ही नही हमारे मन में भी होता है । अगर आम जनता न मने तो कानून कैसा और कैसी वैधानिकता ।कानून का राज कानून बना देने से नही आ सकता। जन के मन में सही समझ कानून का राज है ।आप इसे अपने समाज परिवर्तन के अपने पहलूवों से जोड़ कर देखिये कुछ ऐसा ही मिलेगा । मेरे मन में सुप्रीम कोर्ट के लिए आदर है , हो सकता है की मैं इस निरादर पर थोड़ा सा प्रतिक्रियात्मक हो गया हूँ । पर आप सोचिये ......जो संस्थान हमारे जीवन की तमाम आजादियों की रक्षा कर रहा हो ,उसका सम्मान , होना ही चाहिए । पर ये अमूल्य योगदान धुओँ प्रेमी दोनों भाई को (शर्त लगा लीजिये) .....नही पता। शायद ये नही पता होने कि वजहें ही निरादर हैं न कि वो धुआं ?

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