गुरुवार, 2 जुलाई 2009

सुप्रीम कोर्ट और वो चुनौती देता धुआं

कभी कभी ऐसा होता है की छोटी सी बात बहुत कुरेद जाती है । खैर इस छोटी सी बात ने मुझे कुरेदने के साथ साथ गुदगुदाया भी और......... मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया जो की मेरी स्वाभाविकता के खिलाफ है। आज मुझे अपने काम से सुप्रीम कोर्ट जाना हुआ। निहायत ही खुली और खूबसूरत जगह है। टीवी में देखने पर उसका बहुत ही छोटा सा अक्स आता है , पर सामने से देखने पर सफ़ेद पत्थरों की विशालता कुछ अलग ही बात कहती है। मैं बहुत दिन बाद किसी ऐसी जगह गया जहाँ मेरा मन छोड़ कर जाने को नही हो रहा था । मैं एक घंटे तक करीने से लगी गाड़ियों , कई सारे पीले बोर्डों पर लिखे हुए निर्देश पढ़ते , पत्थरों के इस व्यापक विस्तार को देखते हुए बाहर निकल रहा था, कि धूम्रपान के विरूद्व निर्देश लगा था। गेट से पहले लगा था इसलिए निगाह पड़ गई। आगे बढ़ते ही दो होनहार आराम से कुर्सी पर बैठ कर बीडी पी रहे थे भारतीय गणराज्य के सर्वोच कोर्ट के" स्वागत" गेट पर।धूम्रपान के विरूद्व निर्देशों के बगल में । मेरे लिए कानून के सबसे सम्मानजनक स्थान पर ।

कई बातें मन में आयीं ।हँसी आई ,गुस्सा भी । सबसे शक्तिशाली संस्थान की सीमाएं(परिवर्तन लाने की ) इससे स्पष्ट क्या होंगी ? कानून शायद सिर्फ़ कागज़ ही नही हमारे मन में भी होता है । अगर आम जनता न मने तो कानून कैसा और कैसी वैधानिकता ।कानून का राज कानून बना देने से नही आ सकता। जन के मन में सही समझ कानून का राज है ।आप इसे अपने समाज परिवर्तन के अपने पहलूवों से जोड़ कर देखिये कुछ ऐसा ही मिलेगा । मेरे मन में सुप्रीम कोर्ट के लिए आदर है , हो सकता है की मैं इस निरादर पर थोड़ा सा प्रतिक्रियात्मक हो गया हूँ । पर आप सोचिये ......जो संस्थान हमारे जीवन की तमाम आजादियों की रक्षा कर रहा हो ,उसका सम्मान , होना ही चाहिए । पर ये अमूल्य योगदान धुओँ प्रेमी दोनों भाई को (शर्त लगा लीजिये) .....नही पता। शायद ये नही पता होने कि वजहें ही निरादर हैं न कि वो धुआं ?

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