शुक्रवार, 5 मई 2017

लोकपाल षड़यंत्र और गैंग अन्ना

2009 के लोकसभा चुनावों के परिणामों ने बहुत स्पष्ट तरीके से बताया कि भारत के लोग किस दिशा में सोच रहे हैं।
2008 के मुम्बई आतंकी हमले से निपटने के सरकार के तौर तरीकों,
सामाजिक आर्थिक मजबूती करण की योजनाओं
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव और आर्थिक मंदी के सामने मजबूती से खड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था को देख और समझ रहे मतदाताओं ने सकारात्मक मतदान करते हुए कांग्रेस के तौर तरीकों के प्रति सहमति व्यक्त की थी। इन चुनावों के परिणामों में कुछ चीजें बड़े स्पष्ट तरीके से देखी जा सकती थीं।
जैसे शहरी मतदाताओं विशेषकर मध्यवर्ग का कांग्रेस के प्रति सकारात्मक रुझान और ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस की वापसी
उत्तर प्रदेश में जहाँ कांग्रेस लुप्तप्राय हो चली थी कांग्रेस की दमदार वापसी हुई थी ।
लोगों ने लाउड लौह पुरुषों को नकार कर मितभाषी सिख को चुना था।
इसके बावजूद कांग्रेस का एक कमजोर पक्ष था
भ्रष्टाचार!
भ्रष्टाचार का दाग कांग्रेस के लिए हमेशा से भारी पड़ता रहा है और यही वह हथियार था जिससे कांग्रेस के प्रति बढ़ती सकारात्मकता को नकारात्मकता में बदला जा सकता था।
सत्तापरिवर्तन के लिए बेकरार लॉबी ने सैनिक चुने
राजनैतिक उद्देश्य के लिए अराजनैतिक चेहरे

 अराजनैतिक चेहरों के मुख्य समूह ने विश्वसनीय माने जाने वाले भ्रष्टाचार के विरोधी सामजिक कार्यकर्ताओं को साथ मिलाया। इस समूह को हमने गैंग अन्ना का नाम दिया था।
और 2010 के अंत में जब निर्भया प्रकरण के बाद इस जनांदोलन मिसाइल का टेस्टफायर चल रहा था तब एक दिन किरण बेदी के नाम से भेजा एक sms मोबाइल में पहुंचा लोकपाल के लिए प्रस्तावित संघर्ष का आह्वाहन।
धीरे-धीरे कई नाम सामने आये योगेंद्र यादव, अरुणा राय ,जस्टिस हेगड़े जैसे कुछ नामों को छोड़ कर बाकी नामों पर हमें कभी भरोसा नहीं रहा था। इन नामों पर भरोसे के बावजूद इस संघर्ष में हमें छिपी साजिश नज़र आ रही थी।
हमें एक संगठन विशेष की छाप हर जगह नजर आ रही थी। वो संगठन जिसका प्रचार तंत्र काफी मजबूत रहा है और अभी 2009 में मुंह की खा चुका था। जिसकी भारत के बाहर बसे भारतीयों में और शहरी मध्यवर्ग में अच्छी पकड़ थी।
संघर्ष तेज हुआ
जैसे अभी नहीं तो कभी नहीं अब तो लोकपाल ले कर ही मानेंगे
सरकार का राजनैतिक नेतृत्व संघर्ष के रिस्पॉन्स में प्रभावी नहीं था। सत्तापक्ष की सबसे मजबूत नेता, जिसने बाजपेयी, महाजन, आडवाणी जैसे धुरंधरों को रणनीतिक रूप से धूल चटाई थी और करात जैसे हठधर्मियों को आइना दिखाया था , अस्वस्थता के चलते राजनैतिक रूप से निष्क्रिय थी। सत्तापक्ष समझ नहीं पा रहा था कि इसे राजनैतिक माने या अराजनैतिक और इसका प्रतिकार कैसे करें। याद करें भूख हड़ताल शुरू करने  दिल्ली आये एक योग शिक्षक से मिलने सरकार ने अपने वरिष्ठ मंत्री भेजे
याद करें गैंग के सदस्यों को देश की आमजनता का प्रतिनिधि मानते हुए लोकपाल पर अंतिम निर्णय के लिए एक समिति बनाई गयी जिसमें गैंग अन्ना के और सरकार के सदस्यों की बराबर की भागेदारी थी परंतु सरकार से इतर जनप्रतिनिधियों की कोई गणना नहीं थी। प्रमुख विपक्षी दल ने इसका विरोध तक नही किया( शायद गैंग अन्ना के सदस्य अंततः उसी के प्रतिनिधि थे और वह छद्म लड़ाई लड़ रहा था)
सरकार के प्रतिकार के तौर तरीकों में अपरिपक्वता और अनिर्णय स्पष्ट नज़र आ रहा था। यह संसदीय लोकतंत्र की अवहेलना थी। गैर भाजपा दलों ने सरकार के इन तौर तरीकों विरोध भी किया। परंतु दक्ष प्रशासकों के समूह ने गंभीर राजनैतिक गलतियां कीं
मुफ़ीद समय
मुफ़ीद तरीका
मुफ़ीद हथियार
जब धीरे धीरे वे लोग जिनपर हमें भरोसा था आंदोलन से अलग होने लगे तो हमें यकीन हो गया कि हमारा जजमेंट इस आंदोलन को लेकर सही था।
2013 आते-आते दिल्ली की सबसे प्रभावी और सफल मुख्यमंत्री की बलि लेकर इस आंदोलन ने 2014 की दशा और दिशा स्पष्ट कर दी। 
 आज उस गैंग के लोग अलग अलग जगहों पर सत्ता में बैठे हैं
जिन घोटालों पर जन मानस रोष में था आज वे कहाँ हैं
-निर्भया सी घटनाओं पर अब कोई समूह प्रतिक्रिया नहीं होती
- कलमाड़ी , राजा आदि लोग जो मनमोहन सरकार में जेल गए थे आज मोदी सरकार में कहाँ हैं।
- शरद पवार पद्म सम्मान पा रहे हैं
- रविशंकर (गैंग और उसके प्रायोजक दोनों इनके भक्त हैं) यमुना प्रदूषित करते हुए लोगों को जीने के तरीके सीखा रहे हैं।
- जो तुरंत काला धन वापस मंगवाने के लिए आमरण अनशन कर रहा था वो सरकारी सहयोग से अकूत सम्पदा जुटाने में लगा है
- दूसरे गांधी प्रहसन में अपना किरदार अदा करके वापस जा चुके हैं
मामला भ्रष्टाचार से हट के हिन्दू-मुस्लिम  पे जा चुका है
लोकपाल का तो शुरू से ही कोई इरादा नहीं था
इसे हिंदुस्तान के इतिहास में लोकपाल षडयंत्र के नाम से जाना जाएगा


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