सोमवार, 27 अक्तूबर 2008

शिकायत

किया व्यापर दर्द का
दिया दर्द और हर बार दर्द ही तौला
फ़िर समेत कर सारी अधूरी हसरतें
पुराना सा एक म्यूज़ियम बना डाला।

बंद करली खिड़कियाँ सारी
डाल दिया दरवाजों पर ताला
कैद कर ढेर सारी पहचानी रोशनियाँ
एक गुमनाम अँधेरा बना डाला।

बनकर याद तुम्हारे दिल मे ही रही
तुमने ख़ुद अपने ही दिल को छला,
रोया मन जब भी तुम्हारा साथ देने को
मुस्कुराकर तुमने हर बार बेगाना बना डाला।

(ये कविता मैंने अपने ब्लॉग पर लिखी थी आज इसे यहाँ रख रही हूँ। जिन्होंने इसे वहां एक बार पढ़ लिया है उनसे दुबारा कष्ट देने के लिए क्षमा चाहूंगी।)

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