दंभ निमित में मृगतृष्णा के,
गहन-सघन स्वांस अभ्यास|
पुनः व्यंजित वृत्त-पथ पर,
आत्मा का पुनरुक्ति प्रवास|
कल्प-कामना के अनंत में,
लिपिबद्ध अपूर्ण उच्छास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|
अवतरण का,
सत्य, मिथक क्या?
यह भ्रम, मन का,
पूर्वाग्रह है|
ज्ञात यही,
अवसर-प्रतिउत्तर|
जिस काया में,
बसता मन है|
पूर्वजन्म की स्मृति शेष,
ज्यौं पुनः न करती देह-अवशेष|
किंचित यह भी ज्ञात नहीं,
तब क्या था?
क्यूँ जीवन पाने का धर्म है?
पूर्व जन्म का दंड मिला,
या
यह अगले जन्म का दंड-कर्म है|
सत्य का संधान न पाकर,
निर्वात उकेरता एकांतवास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|
लिप्त कर्म में,
दीप्त कर्म में,
संचित धर्म,
निर्लिप्त आयाम|
कैसा दर्पण श्लेष दृष्टि का?
भूत-भविष्य का कैसा विन्यास?
क्यूँ भ्रम को स्थापित करते?
खंडित कर दो सारे न्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|
जो निश्चय था,
तुम्हारे मन का|
पूर्ण से पहले,
वह अविचल है|
जो लिया यहीं से,
देकर जाओ|
यही कर्म है,
यहीं पर फल है|
त्याग-प्राप्ति संकल्प तुम्हारा,
है, तर्कविहीन तुष्टि का सन्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009
रविवार, 20 सितंबर 2009
ब्लोगिंग में सात साल
सात साल पहले
सितम्बर 2002 की बात है हम इंडिया टुडे पढ़ रहे थे। उसमे एक स्टोरी ब्लोगिंग को लेकर थी । हमें बात जम गई बस तुंरत फैसला किया कि जैसा भी होता हो हमें ब्लॉग चाहिए ही चाहिए । दो-तीन ब्लॉग्गिंग साइट्स के नाम रटे, इंडिया टुडे को एक कोने में उछाला और निकल पड़े नजदीकी साइबर कैफे की खोज में ।
उन दिनों हमें इन्टरनेट के इस्तेमाल के अलावा कंप्यूटर के बारे में कोई जानकारी नही थी। २-३ ब्राउजर पहचानते थे की बोर्ड पहचानते थे, माउस पहचानते थे और जानते थे कि माउस क्लिक करना होता है। ब्लोगर वाकई सरल था हमने बाकियों को किनारे किया और ब्लोगिंग शुरू कर दी । सही तारीख तो नही याद है पर ब्लॉग बनने के हफ्ते भर के अन्दर पहली पोस्ट डाली थी । जो 20 सितम्बर 2002 की तारीख बतलाती है । तो इस लिहाज़ से हमें ब्लोगिंग करते आज 7 साल पूरे हो गए हैं।
शुरूआती ब्लॉगर बड़ा अजीबोगरीब टाइप का होता था। हम आपनी शुरूआती पोस्ट्स में टाइटल का लिंक नही देखते हैं । पता नही टाइटल देने की सुविधा नही थी या फ़िर हम अज्ञानी समझ नही पाते थे ।
परिवर्तनों की शुरुआत
1999 में शुरू हुए ब्लॉगर में जब हमने प्रवेश किया तो उसी समय ब्लॉगर को खरीदने के बारे में गूगल और ब्लॉगर के स्वामित्व वाली पायरा लैब्स में बातचीत चल रही थी।
2003 की शुरुआत में किसी समय पता चला कि पायरा लैब्स अब गूगल की है और ब्लॉगर भी।
ब्लोगर में गूगल ने परिवर्तन लाना शुरू कर दिया और इसी परिवर्तनों की यात्रा में साथ -साथ बहते हुए हम भी सीखते रहे जाने क्या क्या।
और भी कुछ
2003 में हमने एक और ब्लॉगर अकाउंट खोला और एक दूसरा ब्लॉग बनाया । ये ब्लॉग छद्म नाम से थोड़ा आक्रामक होकर लिखने को बनाया था . अब तक हम टिप्पणियाँ देने के महत्त्व से परिचित हो चले थे इसलिए ये ब्लॉग चल निकला . हमारा पहला ब्लॉग जहाँ विजिटर्स का मोहताज था वहीँ दूसरा ब्लॉग अच्छा चल रहा था. २००३-२००५ तक के सालों में हमने जम के झगडा किया और सिरदर्द मोल लिया अंत में दिन ब्लॉग डिलीट करके ओरवेल के १९८४ उपन्यास के पात्रों की तरह गायब हो गए . मजा तो ये है कि हम मौजूद रहते हुए भी गायब हैं । कभी कभी अपने उन पुराने दोस्तों के ब्लोग्स पर घूम आते हैं ।
इन दो सालों में हमने जितना झगडा किया उतना जिंदगी भर नही किया होगा ।
प्राइवेट डायरी
ब्लॉग नामक टूल का एक अच्छा इस्तेमाल निजी डायरी बनाने में भी अच्छे से हो सकता है ॥ ऐसा कुछ जो आप अपने कुछ ख़ास दोस्तों को ही पढाना चाहते हों।
हमने नोटिस किया है कि अपने हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ एक लोग पासवर्ड प्रोटेक्टेड ब्लॉग भी रखते हैं। ये पासवर्ड प्रोटेक्शन हर किसी को उस ब्लॉग तक पहुँचने से रोक देता है । हमने भी इसका इस्तेमाल किया है इसका इस्तेमाल करते हुए हमें लगता है कि हम फ़िर से क्लास में बैठे हैं और दोस्तों से कागज़ की छोटी छोटी पर्चियों पर लिख कर बात कर रहे हों। छोटी पर्चियों संभालने में दिक्कत होती थी तो हमने एक बार बड़े से पेज पर लिखना शुरू कर दिया। वह पेज उन्ही लोगों के हाथो से गुजरता था जो उस बातचीत में शामिल रहते थे। और जिसे जो कुछ कहना होता था वह लिख कर साइन कर देता था।
ऐसे कई पेज तो समय के साथ गुम होते गए पर कुछ आज भी बचे हुए हैं । उन्हें पढ़ना हमेशा आनंद देता है।
ऐसे ही पासवर्ड प्रोटेक्टेड ब्लोग्स हैं।
छोटे से समूह का अपनी सुविधानुसार लोगों की नजरों से ओझल रहते हुए लगातार चलने वाला वार्तालाप ।
जिन्होंने ट्राई किया है वो जानते होंगे कि ये वाकई मजेदार है ।
सितम्बर 2002 की बात है हम इंडिया टुडे पढ़ रहे थे। उसमे एक स्टोरी ब्लोगिंग को लेकर थी । हमें बात जम गई बस तुंरत फैसला किया कि जैसा भी होता हो हमें ब्लॉग चाहिए ही चाहिए । दो-तीन ब्लॉग्गिंग साइट्स के नाम रटे, इंडिया टुडे को एक कोने में उछाला और निकल पड़े नजदीकी साइबर कैफे की खोज में ।
उन दिनों हमें इन्टरनेट के इस्तेमाल के अलावा कंप्यूटर के बारे में कोई जानकारी नही थी। २-३ ब्राउजर पहचानते थे की बोर्ड पहचानते थे, माउस पहचानते थे और जानते थे कि माउस क्लिक करना होता है। ब्लोगर वाकई सरल था हमने बाकियों को किनारे किया और ब्लोगिंग शुरू कर दी । सही तारीख तो नही याद है पर ब्लॉग बनने के हफ्ते भर के अन्दर पहली पोस्ट डाली थी । जो 20 सितम्बर 2002 की तारीख बतलाती है । तो इस लिहाज़ से हमें ब्लोगिंग करते आज 7 साल पूरे हो गए हैं।
शुरूआती ब्लॉगर बड़ा अजीबोगरीब टाइप का होता था। हम आपनी शुरूआती पोस्ट्स में टाइटल का लिंक नही देखते हैं । पता नही टाइटल देने की सुविधा नही थी या फ़िर हम अज्ञानी समझ नही पाते थे ।
परिवर्तनों की शुरुआत
1999 में शुरू हुए ब्लॉगर में जब हमने प्रवेश किया तो उसी समय ब्लॉगर को खरीदने के बारे में गूगल और ब्लॉगर के स्वामित्व वाली पायरा लैब्स में बातचीत चल रही थी।
2003 की शुरुआत में किसी समय पता चला कि पायरा लैब्स अब गूगल की है और ब्लॉगर भी।
ब्लोगर में गूगल ने परिवर्तन लाना शुरू कर दिया और इसी परिवर्तनों की यात्रा में साथ -साथ बहते हुए हम भी सीखते रहे जाने क्या क्या।
और भी कुछ
2003 में हमने एक और ब्लॉगर अकाउंट खोला और एक दूसरा ब्लॉग बनाया । ये ब्लॉग छद्म नाम से थोड़ा आक्रामक होकर लिखने को बनाया था . अब तक हम टिप्पणियाँ देने के महत्त्व से परिचित हो चले थे इसलिए ये ब्लॉग चल निकला . हमारा पहला ब्लॉग जहाँ विजिटर्स का मोहताज था वहीँ दूसरा ब्लॉग अच्छा चल रहा था. २००३-२००५ तक के सालों में हमने जम के झगडा किया और सिरदर्द मोल लिया अंत में दिन ब्लॉग डिलीट करके ओरवेल के १९८४ उपन्यास के पात्रों की तरह गायब हो गए . मजा तो ये है कि हम मौजूद रहते हुए भी गायब हैं । कभी कभी अपने उन पुराने दोस्तों के ब्लोग्स पर घूम आते हैं ।
इन दो सालों में हमने जितना झगडा किया उतना जिंदगी भर नही किया होगा ।
प्राइवेट डायरी
ब्लॉग नामक टूल का एक अच्छा इस्तेमाल निजी डायरी बनाने में भी अच्छे से हो सकता है ॥ ऐसा कुछ जो आप अपने कुछ ख़ास दोस्तों को ही पढाना चाहते हों।
हमने नोटिस किया है कि अपने हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ एक लोग पासवर्ड प्रोटेक्टेड ब्लॉग भी रखते हैं। ये पासवर्ड प्रोटेक्शन हर किसी को उस ब्लॉग तक पहुँचने से रोक देता है । हमने भी इसका इस्तेमाल किया है इसका इस्तेमाल करते हुए हमें लगता है कि हम फ़िर से क्लास में बैठे हैं और दोस्तों से कागज़ की छोटी छोटी पर्चियों पर लिख कर बात कर रहे हों। छोटी पर्चियों संभालने में दिक्कत होती थी तो हमने एक बार बड़े से पेज पर लिखना शुरू कर दिया। वह पेज उन्ही लोगों के हाथो से गुजरता था जो उस बातचीत में शामिल रहते थे। और जिसे जो कुछ कहना होता था वह लिख कर साइन कर देता था।
ऐसे कई पेज तो समय के साथ गुम होते गए पर कुछ आज भी बचे हुए हैं । उन्हें पढ़ना हमेशा आनंद देता है।
ऐसे ही पासवर्ड प्रोटेक्टेड ब्लोग्स हैं।
छोटे से समूह का अपनी सुविधानुसार लोगों की नजरों से ओझल रहते हुए लगातार चलने वाला वार्तालाप ।
जिन्होंने ट्राई किया है वो जानते होंगे कि ये वाकई मजेदार है ।
टिप्पणी प्रसंग !
कुछ नियम
प्रत्येक नए ब्लॉग पर की गई प्रतिक्रिया आपके ब्लॉग के पाठकों में एक और पाठक और टिप्पणी देने वालों में एक और टिप्पणी देने वाला जोड़ सकता है।
आप कुछ भी लिखते हैं तो उस लेखन पर आने वाली टिप्पणियाँ आपके द्वारा दूसरे ब्लोगों पर दी गई टिप्पणियों के समानुपाती होती हैं।
विवाद लोगों को आकर्षित करने का अचछा माध्यम होता है पर इसके लिए आपको थोड़ा सा नामचीन होना पड़ेगा।
हमने अपनी इंग्लिश ब्लोगिंग में ये तीनों नियम इस्तेमाल किए हैं और सफलता पायी है । कहाँ क्या अच्छा है इससे ज्यादा लोगों की रूचि कहाँ क्या बुरा है खोजने में ज्यादा रहती है।
खैर!
अभी हाल ही में चिट्ठाचर्चा पर कुश ने एक ब्लॉग और उसपर आई टिप्पणियाँ उजागर की । ज्यादा कुछ कहना बेकार है क्योंकि कुश ने सबकुछ कह डाला है पर कभी जब हम अपने ब्लॉग पर आई हुई टिप्पणियाँ पढ़ रहे होते हैं तो अक्सर किसी टिप्पणी को देख कर दिल से आह निकलती है
..... उफ़ बिना पोस्ट पढ़े या बिना समझे टिप्पणी मार दी गई होगी।
आप में से कईयों को ऐसा ही लगता होगा
शुक्रवार, 4 सितंबर 2009
गुनहगार
तमाचे से जैसे उसके कान सुन्न से हो गए थे । हाथ लगा कर देखा तो कुछ खून का आभास हुआ होठों पर । अब उसने चारों तरफ़ देखने की कोशिश की तो पाया मारने वाला जा चुका था और आस पास इकट्ठा लोग उसी की तरफ़ देखे जा रहे थे।
ये दिन का कोई एक समय और भरे हुए बाजार में कोई एक जगह थी । समय और जगह महत्वपूर्ण नही थी न ही वो ख़ुद। बस ख़ुद में ही गुम वो कहीं चला जा रहा था कि सामने से आ रहे किसी ने उसे रोका और बिना कुछ पूछे , बिना कुछ कहे एक झन्नाटेदार तमाचा उसे जड़ दिया।
महत्वपूर्ण था वो झन्नाटेदार तमाचा !
दिन के किसी एक समय और भरे बाजार की किसी एक जगह पर बिल्कुल मामूली और महत्वहीन से उस इंसान को लगा कि कम से कम उसे उसकी गलती तो पता होनी चाहिए थी। लेकिन मारने वाला बिल्कुल से तमाचा लगा कर चला गया।
अब जब वो थोड़ा संभला तो पाया कि भरे बाजार में इकठ्ठा भीड़ उसी कि तरफ़ देख रही थी। उनकी आंखों में संवेदना की जगह ख़ुद को लोगों को हुए नही थी। उसने पाया कि सभी लोग उसे ही गुनाहगार मान रहे थे था बहुत दिन क्या सहाय! उस बेहद महत्वहीन इंसान को एक थप्पड़ ने लोगों की नजरों में महत्वपूर्ण बना दिया .
बहुत दिन हुए उसने ख़ुद को लोगों के द्बारा देखते हुए नही पाया था, नही शायद कभी नही पाया था। आज उसने देखा तो पाया कि लोगों की निगाहें बहुत अजीब होती हैं। उसने पाया कि लोग सोचते नही बस देखते हैं और जब लोग देखते हैं तो न जाने क्यों एक गुनाहगार खोजते हैं । उसे लगा कि लोगों को ये उम्मीद ही नही हो सकती कि कोई गुनहगार से हट कर और भी कुछ हो सकता है ।
उसने याद किया कि वो ख़ुद भी लोगों की ही तरह तो है।
जिंदगी के इन तमाम सालों में उसने गुनहगार ही तो खोजें हैं। जिंदगी के इन तमाम सालों में उसे कभी यह नही लगा कि लोग और भी कुछ हो सकते हैं । और कुछ भी ... मसलन बेचारे !
जैसा वह अभी ख़ुद था।
यह चक्रव्यूह है ।
लोगों को बेचारा बना कर उन्हें गुनाहगार बताने का ।
यह चक्रव्यूह है लोगों अलग थलग कर देने का ।
उसने फैसला किया कि उसे अलग थलग नही होना है।
उसने फैसला किया कि उसे वापस उसी गुमनामी में जाना है जहाँ वह लोगों को गुनाहगार समझ सके , लोगों की आरोप लगाती नज़रों से बच सके।
अगले ही पल उसने सबसे नज़दीक एक अपने जैसे लग रहे एक इंसान को खोज निकाला और पूरी मजबूती से एक थप्पड़ उसे जड़ दिया।
आस-पास की भीड़ में एक हलचल सी हुई। वह कांपते हुए किनारे खोजने लगा कि किसी तरह से लोगों कि भीड़ से बच कर भागा जाए
पर यह क्या
वह पहले से ही किनारे था।
लोगों की नजरें किसी और पर टिकी हुईं थी । लोग फुसफुसा कर बातें कर रहे थे । शायद लोग उसी को देख रहे थे जिसे उसने अभी अभी थप्पड़ जड़ा था।
उसने लोगों की निगाहों का अनुसरण किया । भीड़ के बीच एक आदमी खडा था, लोग उसे देखे जा रहे थे।
उसने भी एक उड़ती सी नजर उस पर डाली और उसका मन चिढ से भर गया ।
तो यही है वह गुनाहगार!
वह भूल चुका था कि कुछ देर पहले वह ख़ुद गुनाहगार था ।
ये दिन का कोई एक समय और भरे हुए बाजार में कोई एक जगह थी । समय और जगह महत्वपूर्ण नही थी न ही वो ख़ुद। बस ख़ुद में ही गुम वो कहीं चला जा रहा था कि सामने से आ रहे किसी ने उसे रोका और बिना कुछ पूछे , बिना कुछ कहे एक झन्नाटेदार तमाचा उसे जड़ दिया।
महत्वपूर्ण था वो झन्नाटेदार तमाचा !
दिन के किसी एक समय और भरे बाजार की किसी एक जगह पर बिल्कुल मामूली और महत्वहीन से उस इंसान को लगा कि कम से कम उसे उसकी गलती तो पता होनी चाहिए थी। लेकिन मारने वाला बिल्कुल से तमाचा लगा कर चला गया।
अब जब वो थोड़ा संभला तो पाया कि भरे बाजार में इकठ्ठा भीड़ उसी कि तरफ़ देख रही थी। उनकी आंखों में संवेदना की जगह ख़ुद को लोगों को हुए नही थी। उसने पाया कि सभी लोग उसे ही गुनाहगार मान रहे थे था बहुत दिन क्या सहाय! उस बेहद महत्वहीन इंसान को एक थप्पड़ ने लोगों की नजरों में महत्वपूर्ण बना दिया .
बहुत दिन हुए उसने ख़ुद को लोगों के द्बारा देखते हुए नही पाया था, नही शायद कभी नही पाया था। आज उसने देखा तो पाया कि लोगों की निगाहें बहुत अजीब होती हैं। उसने पाया कि लोग सोचते नही बस देखते हैं और जब लोग देखते हैं तो न जाने क्यों एक गुनाहगार खोजते हैं । उसे लगा कि लोगों को ये उम्मीद ही नही हो सकती कि कोई गुनहगार से हट कर और भी कुछ हो सकता है ।
उसने याद किया कि वो ख़ुद भी लोगों की ही तरह तो है।
जिंदगी के इन तमाम सालों में उसने गुनहगार ही तो खोजें हैं। जिंदगी के इन तमाम सालों में उसे कभी यह नही लगा कि लोग और भी कुछ हो सकते हैं । और कुछ भी ... मसलन बेचारे !
जैसा वह अभी ख़ुद था।
यह चक्रव्यूह है ।
लोगों को बेचारा बना कर उन्हें गुनाहगार बताने का ।
यह चक्रव्यूह है लोगों अलग थलग कर देने का ।
उसने फैसला किया कि उसे अलग थलग नही होना है।
उसने फैसला किया कि उसे वापस उसी गुमनामी में जाना है जहाँ वह लोगों को गुनाहगार समझ सके , लोगों की आरोप लगाती नज़रों से बच सके।
अगले ही पल उसने सबसे नज़दीक एक अपने जैसे लग रहे एक इंसान को खोज निकाला और पूरी मजबूती से एक थप्पड़ उसे जड़ दिया।
आस-पास की भीड़ में एक हलचल सी हुई। वह कांपते हुए किनारे खोजने लगा कि किसी तरह से लोगों कि भीड़ से बच कर भागा जाए
पर यह क्या
वह पहले से ही किनारे था।
लोगों की नजरें किसी और पर टिकी हुईं थी । लोग फुसफुसा कर बातें कर रहे थे । शायद लोग उसी को देख रहे थे जिसे उसने अभी अभी थप्पड़ जड़ा था।
उसने लोगों की निगाहों का अनुसरण किया । भीड़ के बीच एक आदमी खडा था, लोग उसे देखे जा रहे थे।
उसने भी एक उड़ती सी नजर उस पर डाली और उसका मन चिढ से भर गया ।
तो यही है वह गुनाहगार!
वह भूल चुका था कि कुछ देर पहले वह ख़ुद गुनाहगार था ।
राष्ट्रभाषा का तमगा मिले, तुम्हारी पैरवी करूँगा|
सुनो! तुम्हें आती है,
खिचड़ी पकानी,
अंग्रेजी और हिंदी की|
नहीं आती न?
अच्छा! अंग्रेजी में हिंदी,
या हिंदी में अंग्रेजी का,
चटपटा पकवान बनाकार,
गर्व से सीना चौड़ा करके,
उसे परोसना|
कुछ तो सीखा होगा तुमने....
नहीं सीखा?
तब तो तुम,
बिलकुल नहीं चल पाओगे,
और बचा भी नहीं पाओगे,
अपने बचे-खुचे अवशेष को|
महसूस किया है तुमने,
अंग्रेजी के उन्माद को|
जब कोई बेटा हिंदी में,
अंग्रेजी मिलाकर,
अपनी माँ से कहता है-
"माँ आज तुम बहुत सेक्सी लग रही हो"
हा..हा..हा..! उस वक़्त..! उस वक़्त..!
माँ भी वातशल्य को,
क्षण-भर भूल,
निहारने लगती है,
अपने सोलहवें सावन को|
अपने पुराने ढर्रे पर,
चिपों-चिपों करते हो|
क्या हुआ तुम्हारी जननी,
संस्कृत का?
जिसके गर्भ में,
अविर्भाव हुआ था तुम्हारा!
वह भी गायब हो गयी न,
गदहे की सिंघ की तरह|
बात करते हो साहित्य की?
चलो मनाता हूँ,
साहित्य दर्शन है,
लेकिन ये बताओ कि,
दर्शन का भी,
संगठन होता है क्या?
और होती हैं क्या?
इसकी भी प्रतियोगिताएँ,
अपने व्यक्तित्व को,
श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये|
हिंदुस्तान में,
तुम्हें शुद्ध बोलने वाले कम,
और तुम्हारे नाम की,
रोटी खानेवाले ज्यादा हैं,
गौर किया है कभी तुमने?
वर्ण, जाति, धर्म और
परंपरा का संगठन,
या फिर कोई भी,
मनचाह संगठन,
जानते हो कब बनता है?
इसके भी व्यतिगत रूप से,
बहुत पहलू हैं,
अपने-अपने हिसाब से|
लेकिन मुझे,
जो पहलू मुख्य लगता है,
वह है उसके लोप होने का भय|
अच्छा ये बताओ...
सुना है तुमने कभी,
कि शेरों ने मिलकर,
गीदडों के खिलाफ,
बनाया हो संगठन|
हा! इतना ज़रूर है कि,
गीदड़ एक साथ मिलकर,
हुआं-हुआं करते हैं,
वो भी दिन में नहीं,
अमावस की रात में|
जानते हो,
तुम्हारी सबसे बड़ी,
विवशता क्या है?
तुम "एलीट" नहीं बन पाये|
तुम में कोई योगता नहीं,
कि तुम्हें राष्ट्रभाषा का,
तमगा मिले,
ये कैसे हो सकता है?
फिर भी मैं,
तुम्हारी पैरवी करूँगा|
कानूनी किताब में तुम,
हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा,
के नाम पर,
दर्ज कर दिए जाओगे|
लेकिन...
मेरे एक अंतिम प्रश्न,
का उत्तर दे दो|
यही तुम्हारी योग्यता,
मान बैठूँगा|
कहाँ से लाओगे,
अपने प्रेमियों को,
जो तुम में,
आस्था बनाये रखेंगे तबतक,
जबतक रहेगी ये सम्पूर्ण सृष्टी|
तुम चीटिंगबाज़ी करके,
दे सको अगर इसका उत्तर,
तो इस बात की भी,
तुम्हें छुट है....
खिचड़ी पकानी,
अंग्रेजी और हिंदी की|
नहीं आती न?
अच्छा! अंग्रेजी में हिंदी,
या हिंदी में अंग्रेजी का,
चटपटा पकवान बनाकार,
गर्व से सीना चौड़ा करके,
उसे परोसना|
कुछ तो सीखा होगा तुमने....
नहीं सीखा?
तब तो तुम,
बिलकुल नहीं चल पाओगे,
और बचा भी नहीं पाओगे,
अपने बचे-खुचे अवशेष को|
महसूस किया है तुमने,
अंग्रेजी के उन्माद को|
जब कोई बेटा हिंदी में,
अंग्रेजी मिलाकर,
अपनी माँ से कहता है-
"माँ आज तुम बहुत सेक्सी लग रही हो"
हा..हा..हा..! उस वक़्त..! उस वक़्त..!
माँ भी वातशल्य को,
क्षण-भर भूल,
निहारने लगती है,
अपने सोलहवें सावन को|
अपने पुराने ढर्रे पर,
चिपों-चिपों करते हो|
क्या हुआ तुम्हारी जननी,
संस्कृत का?
जिसके गर्भ में,
अविर्भाव हुआ था तुम्हारा!
वह भी गायब हो गयी न,
गदहे की सिंघ की तरह|
बात करते हो साहित्य की?
चलो मनाता हूँ,
साहित्य दर्शन है,
लेकिन ये बताओ कि,
दर्शन का भी,
संगठन होता है क्या?
और होती हैं क्या?
इसकी भी प्रतियोगिताएँ,
अपने व्यक्तित्व को,
श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये|
हिंदुस्तान में,
तुम्हें शुद्ध बोलने वाले कम,
और तुम्हारे नाम की,
रोटी खानेवाले ज्यादा हैं,
गौर किया है कभी तुमने?
वर्ण, जाति, धर्म और
परंपरा का संगठन,
या फिर कोई भी,
मनचाह संगठन,
जानते हो कब बनता है?
इसके भी व्यतिगत रूप से,
बहुत पहलू हैं,
अपने-अपने हिसाब से|
लेकिन मुझे,
जो पहलू मुख्य लगता है,
वह है उसके लोप होने का भय|
अच्छा ये बताओ...
सुना है तुमने कभी,
कि शेरों ने मिलकर,
गीदडों के खिलाफ,
बनाया हो संगठन|
हा! इतना ज़रूर है कि,
गीदड़ एक साथ मिलकर,
हुआं-हुआं करते हैं,
वो भी दिन में नहीं,
अमावस की रात में|
जानते हो,
तुम्हारी सबसे बड़ी,
विवशता क्या है?
तुम "एलीट" नहीं बन पाये|
तुम में कोई योगता नहीं,
कि तुम्हें राष्ट्रभाषा का,
तमगा मिले,
ये कैसे हो सकता है?
फिर भी मैं,
तुम्हारी पैरवी करूँगा|
कानूनी किताब में तुम,
हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा,
के नाम पर,
दर्ज कर दिए जाओगे|
लेकिन...
मेरे एक अंतिम प्रश्न,
का उत्तर दे दो|
यही तुम्हारी योग्यता,
मान बैठूँगा|
कहाँ से लाओगे,
अपने प्रेमियों को,
जो तुम में,
आस्था बनाये रखेंगे तबतक,
जबतक रहेगी ये सम्पूर्ण सृष्टी|
तुम चीटिंगबाज़ी करके,
दे सको अगर इसका उत्तर,
तो इस बात की भी,
तुम्हें छुट है....
गुरुवार, 3 सितंबर 2009
इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों के साथ रेलवे का सौतेला व्यवहार
अगर आप ई - टिकटिंग सुविधा का इस्तेमाल करते हैं तो आप जानते होंगे कि ई टिकट के साथ पहचान पत्र का होने जरूरी है। वस्तुतः इसके बिना आपका टिकट मान्य नही होता है । हमने कई बार कोशिश की कि रेलवे के इस नियम के पीछे के लोजिक को समझा जाय पर हमें समझ में नही आ पाया।
वस्तुतः पहचान पत्र के पीछे सुरक्षा का पहलू बताया जाता है और यह सोचा जाता है कि इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि टिकट सही के हाथों में है। पर रेलवे के विंडो से लिए गए टिकट में यह अनिवार्यता नही होती है। इन्टरनेट के माध्यम से लिए गए टिकट में टिकट लेने वाला टिकट के लिए भुगतान किसी खाते से ही करता है जिससे कम से कम यह तो सुनिश्चित हो जाता है कि बाद में जब कभी भी टिकट के खरीदार को ट्रैक किया जाना जरूरी हुआ तो भुगतान के खाते के माध्यम से खरीदार को ट्रैक किया जा सकेगा परन्तु रेलवे के विंडो पर टिकट नगद पैसा दे कर खरीदने वाले को ट्रैक किया जा पाना सम्भव नही है।
फ़िर पहचान पत्र की अनिवार्यता क्यों?
ई टिकटिंग में पहचान पत्र की अनिवार्यता टी टी के हाथों में ब्रह्मास्त्र की तरह है और यह व्यवस्था उसके लिए कमाई के अवसर सुलभ कराती है।
मान लीजिये आपके पास ई टिकट है पर पहचान पत्र आप गलती से घर भूल गए हैं । अब आप की शांतिपूर्ण यात्रा टी टी की इच्छा पर निर्भर करती है। नियमानुसार आप टिकट होते हुए भी बिना टिकट यात्रा कर रहे हैं और टी टी आप की सीट या बर्थ किसी और को दे देने के लिए स्वतंत्र है । अगर आपको आपनी सीट या बर्थ चाहिए तो अनिवार्य रूप से टी टी की सहमति की जरुरत होगी और सभी जानते हैं कि ऐसी सहमति टी टी से सिर्फ़ एक ही तरीके से प्राप्त की जा सकती है।
ई टिकटिंग एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे टिकट विक्री में रेलवे का स्टेशनरी का खर्च और स्टाफ का खर्च बचता है इसके साथ ही उसकी ऊर्जा की भी बचत होती है। कायदे से इन बचतों के बदले ई टिकट खरीदने वालों को कुछ छूट भी दी जा सकती है पर ना जाने क्यों ई टिकटिंग से जुड़े हुए कई नियम- क़ानून इसे लगभग हतोत्साहित ही करते दीखते हैं।
वस्तुतः पहचान पत्र के पीछे सुरक्षा का पहलू बताया जाता है और यह सोचा जाता है कि इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि टिकट सही के हाथों में है। पर रेलवे के विंडो से लिए गए टिकट में यह अनिवार्यता नही होती है। इन्टरनेट के माध्यम से लिए गए टिकट में टिकट लेने वाला टिकट के लिए भुगतान किसी खाते से ही करता है जिससे कम से कम यह तो सुनिश्चित हो जाता है कि बाद में जब कभी भी टिकट के खरीदार को ट्रैक किया जाना जरूरी हुआ तो भुगतान के खाते के माध्यम से खरीदार को ट्रैक किया जा सकेगा परन्तु रेलवे के विंडो पर टिकट नगद पैसा दे कर खरीदने वाले को ट्रैक किया जा पाना सम्भव नही है।
फ़िर पहचान पत्र की अनिवार्यता क्यों?
ई टिकटिंग में पहचान पत्र की अनिवार्यता टी टी के हाथों में ब्रह्मास्त्र की तरह है और यह व्यवस्था उसके लिए कमाई के अवसर सुलभ कराती है।
मान लीजिये आपके पास ई टिकट है पर पहचान पत्र आप गलती से घर भूल गए हैं । अब आप की शांतिपूर्ण यात्रा टी टी की इच्छा पर निर्भर करती है। नियमानुसार आप टिकट होते हुए भी बिना टिकट यात्रा कर रहे हैं और टी टी आप की सीट या बर्थ किसी और को दे देने के लिए स्वतंत्र है । अगर आपको आपनी सीट या बर्थ चाहिए तो अनिवार्य रूप से टी टी की सहमति की जरुरत होगी और सभी जानते हैं कि ऐसी सहमति टी टी से सिर्फ़ एक ही तरीके से प्राप्त की जा सकती है।
ई टिकटिंग एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे टिकट विक्री में रेलवे का स्टेशनरी का खर्च और स्टाफ का खर्च बचता है इसके साथ ही उसकी ऊर्जा की भी बचत होती है। कायदे से इन बचतों के बदले ई टिकट खरीदने वालों को कुछ छूट भी दी जा सकती है पर ना जाने क्यों ई टिकटिंग से जुड़े हुए कई नियम- क़ानून इसे लगभग हतोत्साहित ही करते दीखते हैं।
बुधवार, 26 अगस्त 2009
ताजमहल मेरे मोबाइल के कैमरे की नज़र से
पिछले दिनों आगरा जाना हुआ । वहाँ से वापसी के वाले दिन थोड़ा समय बच गया था । फतेहपुर सीकरी जाने काबहुत मन था पर समय नही था लखनऊ वापसी की जल्दी थी, तो सोचा कि ताजमहल ही घूम आया जाए।
ताजमहल उन इमारतों में है जिनकी तस्वीरें सबसे ज्यादा खींची गई हैं ऐसे में ताजमहल की कोई अनोखी फोटोखींच पाना कठिन है ऊपर से मोबाइल के कैमरे से तो और भी कठिन ।
खैर हम तस्वीरें ले आए
कुछ आप भी देखिये





मंगलवार, 25 अगस्त 2009
अभी नहीं करता तुम्हें, अंतिम प्रणाम!
श्वे़त पर ज्यों,
श्याम बिखरें हैं,
यथावत!
श्लेष भावों के वरण में,
अन्तः का प्रकल्प लेकर|
नित्य प्रतिदिन,
मृत्यु करती है आलिंगन,
पुनर्जीवन के दंभ का संकल्प लेकर|
अट्टहास-सा क्रंदन समेटे,
बाहु-पाश में|
अलिप्त-सा,
अब लिप्त क्यूँ?
किसी अप्रयास में|
है विधि का चक्र ज्यों,
होना निष्प्राण|
श्रेष्ठ यही,
विष्मृत न हो,
जीवन-प्रमाण|
माध्य हूँ मैं कर्म का,
कर्त्तव्य-पथ पर|
गंतव्य से पहले मेरा,
वर्जित विश्राम|
हे मृत्यु! तू ही ले,
अपनी गति को थाम|
अभी नहीं करता तुम्हें,
अंतिम प्रणाम!
मोक्ष नहीं कि,
तू मिले,
अनायास मुझको|
सोच यह कि काल ने,
निगला मुझे है|
ग्रास हूँ मैं वक्र-सा,
सहज नहीं हूँ,
सृजन-बीज हूँ,
काल से डरता नहीं मैं|
तेरी अपनी पीड़ा,
तेरी अपनी हार का|
मैं तो रहा सदा वंचित,
तेरे अनगिन प्रहार का|
याचक नहीं कि स्वार्थवश,
बनूँ प्रार्थी!
क्यूंकि है अन्तरिक्ष स्वयं,
मेरा सारथी!
हे मृत्यु! तू ही ले,
अपनी गति को थाम|
अभी नहीं करता तुम्हें,
अंतिम प्रणाम!
श्याम बिखरें हैं,
यथावत!
श्लेष भावों के वरण में,
अन्तः का प्रकल्प लेकर|
नित्य प्रतिदिन,
मृत्यु करती है आलिंगन,
पुनर्जीवन के दंभ का संकल्प लेकर|
अट्टहास-सा क्रंदन समेटे,
बाहु-पाश में|
अलिप्त-सा,
अब लिप्त क्यूँ?
किसी अप्रयास में|
है विधि का चक्र ज्यों,
होना निष्प्राण|
श्रेष्ठ यही,
विष्मृत न हो,
जीवन-प्रमाण|
माध्य हूँ मैं कर्म का,
कर्त्तव्य-पथ पर|
गंतव्य से पहले मेरा,
वर्जित विश्राम|
हे मृत्यु! तू ही ले,
अपनी गति को थाम|
अभी नहीं करता तुम्हें,
अंतिम प्रणाम!
मोक्ष नहीं कि,
तू मिले,
अनायास मुझको|
सोच यह कि काल ने,
निगला मुझे है|
ग्रास हूँ मैं वक्र-सा,
सहज नहीं हूँ,
सृजन-बीज हूँ,
काल से डरता नहीं मैं|
तेरी अपनी पीड़ा,
तेरी अपनी हार का|
मैं तो रहा सदा वंचित,
तेरे अनगिन प्रहार का|
याचक नहीं कि स्वार्थवश,
बनूँ प्रार्थी!
क्यूंकि है अन्तरिक्ष स्वयं,
मेरा सारथी!
हे मृत्यु! तू ही ले,
अपनी गति को थाम|
अभी नहीं करता तुम्हें,
अंतिम प्रणाम!
मंगलवार, 28 जुलाई 2009
कागज की हवेली है

आज जैसे ही हम घर से निकले बारिश की बूँदें शुरू हो गयीं । पहले हौले-हौले और फ़िर तेज। आपना तरीका वही कुश भाई वाला रहा है भाग जाओ या फ़िर भीग जाओ। भीग जाने को ललचाये अपने मन को हमने कपडों और ऑफिस का हवाला दिया , लैपटॉप की और इशारा किया और मुट्ठी बंद है या खुली इसकी परवाह किए बिना भाग खड़े हुए।
पनाह ली एक दूकान के सामने थोडी सी छाया में।
बारिशे आकर्षित करती हैं पर सच तो यह है की हर आकर्षित करने वाली चीज के मानिंद ये भी परेशानी खड़ी करने वाली होती हैं। यह ज्ञान हमें आज ही प्राप्त हुआ।
कुछ लोग भीगते हुए निकल रहे थे उनसे हमें रश्क हुआ ।
कुछ लोग छाते ताने निकल रहे थे उनसे भी हमें रश्क हुआ।
कुल मिला कर टोटल सेंस ऑफ़ डेप्राईवेशन !
भीग न सकने की लाचारी
बरसते पानी में निकल न पाने की लाचारी
हम छाते नही पसंद हैं। आख़िर ये भी कोई बात हुई कि बूंदे अपना दिल खोल के बरस रहीं हों और आप छाता ताने उनको जलाते हुए चले जा रहे हों। पिछ्ले साल की घनघोर में भी हमने छातों और रेनकोट से परहेज बनाये रखा। बारिश होती रही और बाइक के बैग में रखे रेनकोट को ऐसे इग्नोर करते रहे जैसे वो टीवी पर आने वाला जनहित में जारी विज्ञापन हो।
खैर!
इंतज़ार ख़त्म हुआ बारिश बंद हुई । हम थोडी ही दूर आए थे, बूंदे फ़िर जी ललचाने आ गयीं इसबार हमने हाथ में लिए अखबार को अपने सर पर रख लिया ।
ऑफिस पहुँचते पहुँचते अखबार बुरी तरह से भीग चुका था । हमने अखबार को एक किनारे रखा और एक शेर मन ही मन गुनगुनाने लगे
मासूम मोहब्बत का इतना सा फ़साना है
कागज़ की हवेली है, बारिश का ज़माना है।
शायद बारिशों से की जाने वाली मासूम मोहब्बतें ऐसे ही न भीग पाने की लाचारियों की भेंट चढ़ती चली जातीं हैं
शायद छाते भी कसमसाते होंगे अपने नीचे बिना भीगे चले जाते लोगों की लाचारी पर , शायद रेनकोट .........
पता नही ...........................
कुश ने अभी अपने ब्लॉग पर लिखा था हर बारिश की अपनी अलग कहानी होती है।
हर साल की बारिश भी ऐसे ही अलग अलग कहानी लेकर आती है
गुरुवार, 23 जुलाई 2009
लिंकन का पत्र अपने बेटे के शिक्षक के नाम
यह पत्र अब्राहम लिंकन ने अपने बेटे के शिक्षक को लिखा था . मुझे लगता है इसकी प्रासंगिकता आज भी है
मै जानता हूँ की उसे सीखना है कि
सभी लोग न्याय प्रिय नहीं होते
सभी लोग सच्चे नहीं होते
लेकिन उसे यह भी सिखाएं कि
जहाँ एक बदमाश होता है
वहीं एक नायक भी होता है
यह कि हर स्वार्थी राजनेता के जवाब में
एक समर्पित राजनेता होता है
उसे बताइए कि जहां एक दुश्मन होता है
वहीँ एक दोस्त भी होता है
अगर आप कर सकें तो
उसे ईर्ष्या से बाहर निकालें
उसे खामोश हसीं का रहस्य बताएं
उसे जल्दी यह सीखने दें कि
गुंडई करने वाले बहुत जल्दी चरणस्पर्श करते हैं
अगर पढ़ा सकें तो उसे
किताबों के आर्श्चय के बारे में पढाएं
लेकिन उसे इतना समय भी दें कि
वह आसमान में उड़ती चिडिया के,
धुप में उड़ती मधुमक्खियों के ,
और हरे पर्वतों पर खिले फूलों के
शाश्वत रहस्य के बारे में सोच सके
उसे स्कूल में यह भी सिखाओ के
नकाल करने से कहीं ज्यादा
स्म्मान्जानक है फेल हो जाना
उसे अपने विचारों में विश्वास
करना सिखाएं,
ताब भी जब सब उसे गलत बताएं
उसे विनम्र लोगों से विनम्र रहना
और कठोर लोगों से कठोर व्यावार करना सिखाएं
मेरे बेटे को ऐसी ताकत दो कि वह उस भीड़ का हिस्सा न बने
जहां हर कोई खेमे में शामिल होने में लगा हो
उसे सिखाओ कि वह सबकी सुने
लेकिन उसे यह भी बताओ कि
वह जो कुछ सुने उसे सच्चाई की छन्नी पर छाने
और उसके बाद जो अच्छी चीज बचे उसे ही ग्रहण करे
अगर आप सिखा सकते हैं तो उसे सिखाएं कि
जब वह दुखी हो तो कैसे हसे
और उसे सिखाएं कि आंसू आना कोई शर्म कि बात नहीं है
उसे सिखाएं कि निंदकों का
कैसे मजाक उडाया जाए
और ज्यादा मिठास से
कैसे सावधान रहा जाए
उसे सिखाएं कि अपने बल और बुद्धि को
कैसे ऊंचे दाम पर बेचे
लेकिन अपने ह्रदय और
आत्मा को किसी कीमत पर न बेचे
उसे सिखाएं कि एक चीखती भीड़ के आगे
अपने कान बंद करले
और अगर वह अपने को सही समझता है तो
जम कर लादे
उससे विनम्रता से पेश आयें
पर छाती से न लगायें रहें
क्योंकि आग में ही तप
कर लोहा मजबूत होता है
उसमें साहस आने दें
उसे अधीर न बनने दें
उसमे बहादुर बनने का धैर्य आने दें
उसे सिखाएं कि वह अपने में गहरा विश्वास रखे
क्योंकि तभी वह मानव जाती में गहरा विश्वास रखेगा
यह एक बड़ी फरमाइश है पर देखिये आप क्या कर सकते हैं
क्योंकि यह छोटा बच्चा मेरा बेटा है .
गुरुवार, 2 जुलाई 2009
सुप्रीम कोर्ट और वो चुनौती देता धुआं
कभी कभी ऐसा होता है की छोटी सी बात बहुत कुरेद जाती है । खैर इस छोटी सी बात ने मुझे कुरेदने के साथ साथ गुदगुदाया भी और......... मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया जो की मेरी स्वाभाविकता के खिलाफ है। आज मुझे अपने काम से सुप्रीम कोर्ट जाना हुआ। निहायत ही खुली और खूबसूरत जगह है। टीवी में देखने पर उसका बहुत ही छोटा सा अक्स आता है , पर सामने से देखने पर सफ़ेद पत्थरों की विशालता कुछ अलग ही बात कहती है। मैं बहुत दिन बाद किसी ऐसी जगह गया जहाँ मेरा मन छोड़ कर जाने को नही हो रहा था । मैं एक घंटे तक करीने से लगी गाड़ियों , कई सारे पीले बोर्डों पर लिखे हुए निर्देश पढ़ते , पत्थरों के इस व्यापक विस्तार को देखते हुए बाहर निकल रहा था, कि धूम्रपान के विरूद्व निर्देश लगा था। गेट से पहले लगा था इसलिए निगाह पड़ गई। आगे बढ़ते ही दो होनहार आराम से कुर्सी पर बैठ कर बीडी पी रहे थे भारतीय गणराज्य के सर्वोच कोर्ट के" स्वागत" गेट पर।धूम्रपान के विरूद्व निर्देशों के बगल में । मेरे लिए कानून के सबसे सम्मानजनक स्थान पर ।
कई बातें मन में आयीं ।हँसी आई ,गुस्सा भी । सबसे शक्तिशाली संस्थान की सीमाएं(परिवर्तन लाने की ) इससे स्पष्ट क्या होंगी ? कानून शायद सिर्फ़ कागज़ ही नही हमारे मन में भी होता है । अगर आम जनता न मने तो कानून कैसा और कैसी वैधानिकता ।कानून का राज कानून बना देने से नही आ सकता। जन के मन में सही समझ कानून का राज है ।आप इसे अपने समाज परिवर्तन के अपने पहलूवों से जोड़ कर देखिये कुछ ऐसा ही मिलेगा । मेरे मन में सुप्रीम कोर्ट के लिए आदर है , हो सकता है की मैं इस निरादर पर थोड़ा सा प्रतिक्रियात्मक हो गया हूँ । पर आप सोचिये ......जो संस्थान हमारे जीवन की तमाम आजादियों की रक्षा कर रहा हो ,उसका सम्मान , होना ही चाहिए । पर ये अमूल्य योगदान धुओँ प्रेमी दोनों भाई को (शर्त लगा लीजिये) .....नही पता। शायद ये नही पता होने कि वजहें ही निरादर हैं न कि वो धुआं ?
कई बातें मन में आयीं ।हँसी आई ,गुस्सा भी । सबसे शक्तिशाली संस्थान की सीमाएं(परिवर्तन लाने की ) इससे स्पष्ट क्या होंगी ? कानून शायद सिर्फ़ कागज़ ही नही हमारे मन में भी होता है । अगर आम जनता न मने तो कानून कैसा और कैसी वैधानिकता ।कानून का राज कानून बना देने से नही आ सकता। जन के मन में सही समझ कानून का राज है ।आप इसे अपने समाज परिवर्तन के अपने पहलूवों से जोड़ कर देखिये कुछ ऐसा ही मिलेगा । मेरे मन में सुप्रीम कोर्ट के लिए आदर है , हो सकता है की मैं इस निरादर पर थोड़ा सा प्रतिक्रियात्मक हो गया हूँ । पर आप सोचिये ......जो संस्थान हमारे जीवन की तमाम आजादियों की रक्षा कर रहा हो ,उसका सम्मान , होना ही चाहिए । पर ये अमूल्य योगदान धुओँ प्रेमी दोनों भाई को (शर्त लगा लीजिये) .....नही पता। शायद ये नही पता होने कि वजहें ही निरादर हैं न कि वो धुआं ?
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