सोमवार, 21 सितंबर 2015
कस्मै देवाय हविषा विधेम
रविवार, 2 अगस्त 2015
आया सावन बरसा पानी
फिर मोह में शायद थोडा पड़ कर
बेचैन हुए काले बादल
अम्बर तजकर भागे पागल
उनसे फिर छलका पानी।
आया सावन बरसा पानी।।
प्यासी थी उसकी साँस-साँस
नभ उसके दुःख से दुखित हुआ
बादल सा काजल द्रवित हुआ
आँसू बनकर बहका पानी।
आया सावन बरसा पानी।।
निस्तेज हुआ निष्प्राण हुआ
पूरी कर निष्ठुर कठिन सजा
सूरज की कैद से छूट भगा
बरसा प्रेम का तरसा पानी।
आया सावन बरसा पानी।।
नवजीवन ये बोने आया
आशाओं-उम्मीदों का प्रतीक
पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतीक
सर्जन करने निकला पानी।
आया सावन बरसा पानी।।
रविवार, 12 जुलाई 2015
बारिश के मौसम में भवानी प्रसाद मिश्र की घर की याद
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
अब सवेरा हो गया है,
कब सवेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ माना-
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,
घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े है,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा,
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिल-खिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नजर उनको पड़े होंगे।
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवे का नाम लेकर,
पाँचवाँ हूँ मैं अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिता जी कहते रहें है,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,
और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा,
आँख में किस लिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझ कर,
और अपनापन समझ कर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,
पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात-दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता-फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,
मैं न रोऊँगा,कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बद का रे,
पाँचवें की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी, सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा,
आज सबका मन चुआ होगा।
अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरणें झुकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों,
गगन-आँगन की लुनाई,
दिशा के मन में समाई,
दश-दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की छाप है रे,
झाड़ आँखें बंद करके,
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं,
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किस लिए इतनी तृषा रे,
तू जरा-सा दुःख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,
हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुःख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन की बाड़ का झाड़ जैसे,
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नद्दी उमग ले,
एक टहनी कम न होले,
कम कहाँ कि खम न होले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह क हाल उनका,
इस तरह का खयाल उनका,
हवा उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवे को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,
किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते है लोग, कहना,
मत करो कुछ शोक कहना,
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डट कर झेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसे,
पाँचवें को वे न तरसें।
गुरुवार, 18 जून 2015
मोदी जी (ललित) और मोदी जी (प्रधानमंत्री)
ये फ़ितना आदमी की ख़ानावीरानी को क्या कम है
हुये तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमां क्यों हो
ये लाइनें अब मोदी जी (ललित) के लिए उनके दोस्तों की जुबान पर होगा आजकल। पहले सुषमा स्वराज फिर वसुंधरा राजे । वहाँ मोदी जी वैकेशन पे वैकेशन मारे जा रहे हैं । उनकी जिंदगी एक लंबी छुट्टी की तरह है। सैर कर दुनिया की गाफिल ज़िंदगानी फिर कहाँ ।
छुट्टियों के अपने अलग अंदाज हैं। पत्नी का इलाज हो तो एक देश में, इंटरव्यू देना हो तो दूसरे देश में । किसी पुराने दोस्त से मिलना हो तो किसी और देश में , बदनाम होना हो तो किसी और देश में । सोते किसी और देश में होंगे उठते किसी और देश में । बाथरूम किसी देश में जाते होंगे तो चाय किसी देश में ।
सच्चे अर्थों में अंतर्राष्ट्रीय नागरिक !
लगता है हमारे मोदी जी (प्रधानमंत्री)ने मोदी जी(ललित) से काफी कुछ सीखा होगा । वैसे भी मोदी मोदी से नहीं सीखेगा तो क्या वाजपेयी से सीखेगा?
मोदी जी (प्रधानमंत्री) भी तो सच्चे अंतराष्ट्रीय नागरिक लगते हैं । उनके पाँव ही नहीं आँख, नाक, कान, उंगलिया (ट्वीट करने के लिए ) और मोबाइल सीमा के बाहर ही रहते हैं।
दूरदृष्टि वाले नेता हैं सीमा के अंदर दिखाई ही नहीं देता
देश को एक और प्रधानमंत्री चुन लेना चाहिए था । मोदी जी (प्रधानमंत्री) देश के बाहर के प्रधानमंत्री होते और दूसरा वाला देश के अंदर का प्रधानमंत्री होता।
दोनों मोदियों (प्रधानमंत्री और ललित ) की विवादों में काफी रुचि है। कभी कभी ऐसा लगता है कि विवाद न हों तो इन बेचारों के जीवन में होगा क्या। बेचारे मोदी जी (ललित) को लोगबाग भूल चुके थे ये विवाद ही तो थे जो उन्हे वापस ले आए लाईमलाइट में। अपने मोदी जी (प्रधानमंत्री) जी भी गुजरात के मुख्यमंत्री कैसे बनते अगर गुजरात भूकंप में केशुभाई की छीछालेदार न होती।
लोग तो यह भी कहते हैं कि उनके मुख्यमंत्री बने रहने में गोधरा कांड, फर्जी(अब असली) एंकाउंटरों ,राज्यबदर सहयोगियों का भी हाथ रहा है ।
अब देखिये न समय समय पर होने वाले विवाद लोगों को याद दिलाते रहते हैं कि कैसे देश के कुछ नासमझ (कोई 69%) कैसे मोदी जी (प्रधानमंत्री) को अभी भी पसंद नहीं करते ।
खैर हमे पता है कि मोदी जी (ललित) इस मुद्दे पर चाहे जितना बोल लें पर मोदी जी (प्रधानमंत्री) बिलकुल नहीं बोलेंगे ।
खैर छोड़िए आपलोग राहुल गांधी पर चुट्कुले बनाइये ।


