सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

वे जो होते हैं

वे जो होते हैं
खेतों में, सड़कों पर,
खदानों में, 
कभी घर से दूर दो रोटी के बंदोबस्त में
रिक्शा चलाते या मशीनों काम करते हुए,
कभी किसी अनजानी सी धरती को
अपना देश कहकर शहीद होते हुए
किसी इलाके की दिनरात निगहबानी करते
कहीं दुनियाभर की योजनाओं को अमल में लाते।

वे जो होते हैं 
प्रतिक्रिया नहीं देते 
नाराज नहीं होते 
नाराज हों भी तो 
नाराजगी व्यक्त नहीं करते। 
सड़क पर नहीं उतरते 
हथियार नहीं उठाते 
और न ही लेख लिखते हैं 
चाय की दूकानों, चौराहों 

या जनरल डिब्बों में भी नहीं बोलते 


वे जो होते हैं 
दिनभर काम करते हुए
उनके पास भी सोच होती है
खाके होते हैं
एक दृष्टि होती है
जो कभी कभी अभिव्यक्त हो जाती है
चुनाव परिणामों की शक्ल में
अस्तित्व की इस लड़ाई में
यही उनका हथियार है
बाकी तो बस
जीवन कामचलाऊ ढालों की अनवरत तलाश है। 





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