सोमवार, 19 जनवरी 2009

खामोशियाँ!

खामोशियाँ!
कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।


वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर।


और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है।
भीतर तक छील गयीं
कई पुराने छुपे हुए से ज़ख़्म
फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत ब्लॉग और उतनी ही सुंदर रचना...जैसे सोने पर सुहागा...बहुत ही अच्छा लगा यहाँ आ कर और आपकी खामोशी वाली रचना पढ़ कर...वाह...
    नीरज

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  2. बहुत अच्छी कविता...
    खामोशी नियामत है...
    बेशकीमती है खामोशी...
    क्योंकि तब बुने जाते हैं
    अनमोल शब्द...
    खामोशी जितनी घनी होगी...
    उतने ही गहरे होंगे
    शब्दों के अर्थ भी...

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  3. और तब हमने जाना
    कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है।
    ---------
    निश्चय ही, बोलने से ज्यादा बोलती है।
    --- एक खामोशी है, सुनती है कहा करती है।

    कविता मेरे मन की लिखी आपने।

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  4. और तब हमने जाना
    कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है।
    भीतर तक छील गयीं
    कई पुराने छुपे हुए से ज़ख़्म
    फिर से खोल गयी।


    भावपूर्ण कविता, हार्दिक बधाई।

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  5. बहुत ख़ूब भाई वाह, ग़ज़ब लिखा है

    ---आपका हार्दिक स्वागत है
    चाँद, बादल और शाम

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  6. बहुत सुन्दर!
    घुघूती बासूती

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  7. बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
    उसकी ख़ामोशी
    वो सबकुछ बोल गयी।
    वाह! बहुत खूब
    मोनिका भट्ट (दुबे)

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  8. bahut sundar kavita..


    एक ज़माना था की खामोशियाँ हौले से कुछ कह जाती थी..
    अब तो बस चीख सी सुनाई देती है।

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  9. ...................................................................

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