सोमवार, 8 अगस्त 2011

तुम्हारे बग़ैर

रास्तों पर मोड़ हों

तो अच्छे लगते हैं रास्ते

तुम कहते थे 





गुजरकर सैकड़ों मोड़ों से

आज भी याद है हमें

 वो सारी बातें

 जो तुम कहते थे।



सुंदर सी तुम्हारी आँखें

हो जाती थीं और भी सुंदर

संजों कर ख़ुद मेँ

ढेर सारे प्यारे-प्यारे सपने

भिगो देतीं थीं

भीतर तक तुम्हारी बातें

और मंत्रमुग्ध से हम

समेटते रहते

तुम्हारी बातें

अपनी बातों मेँ,

तुम्हारे सपने

अपने सपनों मेँ,

और तुम्हारी आँखें

अपनी आँखों मेँ.



आज जब तुम नही हो

आईना दिखाता सा लगता है

हर अकेलापन

देखते रहतें हैं

जिसमे घंटों हम

अपनी ही आँखों मेँ

अब भी खिलते,

तुम्हारे ही सपने,

उनमें डूबी हुई सी

तुम्हारी गहरी आँखें.



घेर लेती हैं हर मोड़ पर

हमें तुम्हारी यादें.

तुम्हारे बाद, अब

कुछ भी नही बदलता

किसी भी मोड़ पर

और अच्छा नही लगता

हमें ये रास्ता

तुम्हारे बग़ैर


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