शुक्रवार, 9 सितम्बर 2011

कुछ नया लाओ न

ऊबली हुई चाय की पत्तियों के जैसे ।
बेअसर से हो चले हैं पुराने दर्द ॥
कुछ नया लाओ न।

3 प्रतिक्रियाएँ:

  1. उन्ही पत्तियों से न जाने कितनी बार चाय बनी है।

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  2. काफी दिनों बाद पुनः आ पाया हूँ इस ब्लॉग पर. अच्छा लगा.

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