रविवार, 11 सितंबर 2011

ग्यारह सितम्बर : सभ्यताओं के संवाद का दिन

२००१ से पहले आप ग्यारह  सितम्बर  को  कैसे  याद करते थे ? निःसंदेह २००१ के ग्यारह सितम्बर के बाद कुछ भी पहले सा नहीं रह पाया पर उससे पहले ग्यारह सितम्बर सभ्यताओं के संघर्ष की जगह सभ्यताओं  के संवाद का दिन था . 

अट्ठारह साल पहले जब हम स्कूल में थे , हमारे स्कूल में स्वामी विवेकानंद के ग्यारह सितम्बर अट्ठारह सौ तिरानबे में शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में दिए गए भाषण की सौवीं वर्षगाँठ मनाई जा  रही थी और इस उपलक्ष्य में होने वाले समारोह में हमें  स्वामी विवेकानद का किरदार निभाना था. उम्र कम थी पर पता था की यह कुछ ख़ास है और हम उस समय जो कुछ भी मिला पढ़ते चले गए . स्वामी विवेकानंद को पढने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि हमें हिन्दू धर्म की एक बेहतर समझ आ गयी . जिसे बाद में तमाम धर्म ग्रंथों ने भी अपने योगदान से बेहतर बनाया .

स्वामी विवेकानंद का मंत्रमुग्ध कर देने वाला शिकागो भाषण कुछ इस प्रकार था ;

अमेरिका की बहनों और भाइयो!
आपने हमारा जैसा हार्दिक और स्नेहपूर्ण स्वागत किया है, उसके लिए आभार व्यक्त करने के लिए जब मैं यहां खड़ा हुआ हूं तो मेरा मन एक अकथनीय आनंद से भरा हुआ है.मैं विश्व की सबसे प्राचीन संन्यासियों की पंरपरा की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं; मैं आपको धर्मो की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूं और मैं सभी वर्गो एवं पंथों के करोड़ों हिंदुओं की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं.
इस मंच पर आए उन कुछ वक्ताओं को भी मेरा धन्यवाद, जिन्होंने पूर्व से आए प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए आपको बताया कि दूर देशों से आए हुए ये सज्जन विभिन्न देशों में सहिष्णुता का संदेश पहुंचाने के सम्मान के अधिकारी हो सकते हैं.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने विश्व को सहिष्णुता औ सार्वभौमिक स्वीकार्यता का पाठ पढ़ाया. हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मो की सत्यता को स्वीकार करते हैं.मुझे उसे देश से संबंधित होने में भी गर्व है, जिसने इस प्थ्वी के सभी धर्मो व सभी देशों के सताए हुए लोगों और शरणार्थियों को शरण दी है.
मुझे आपको यह बताने में गर्व है कि हमने उन पवित्र इजराइलियों को अपने कलेजे से लगाया है, जिन्होंने ठीक उसी वर्ष दक्षिण भारत में आकर शरण ली, जब रोमन अत्याचारियों ने उनके पवित्र मंदिर को ध्वस्त कर दिया था.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने महान जोरोस्ट्रियन राष्ट्र के विस्थापितों को शरण दी है और अब भी उनके विकास में सहयोग दे रहे हैं.
भाइयों, मैं आपके सामने उस भजन की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत करूंगा, जिसको मैं अपने बचपन से दोहराता आया हूं और जिसे करोड़ों लोग प्रतिदिन दोहराते हैं -
'जैसे विभिन्न स्रोतों से उद्भूत विभिन्न धाराएं
अपना जल सागर में विलीन कर देती हैं,
वैसे ही हे ईश्वर! विभिन्न प्रवृत्तियों के चलते
जो भिन्न मार्ग मनुष्य अपनाते हैं, वे
भिन्न प्रतीत होने पर भी
सीधे या अन्यथा, तुझ तक ही जाते हैं.'
वर्तमान सम्मेलन, जो अब तक हुई सबसे महान सभाओं में से एक है, स्वयं 'गीत' में बताए उस अद्भुत सिद्धांत का पुष्टीकरण और विश्व के लिए एक घोषणा है -
'जो कोई, किसी भी स्वरूप में
मेरे पास आता है, मुझे पाता है;
सभी मनुष्य उन मार्गो पर
संघर्षरत हैं, जो अंत में उन्हें मुझे तक ही ले आते हैं.'
सांप्रदायिकता कट्टरता और उन्हीं की भयानक उपज धर्माधता ने बहुत समय से इस सुंदर पृथ्वी को ग्रस रखा है. उन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी ही बार उसे मानव रक्त से सराबोर कर दिया है, सभ्यता को नष्ट किया है और समूचे राष्ट्रों को निराशा के गर्त में धकेल दिया है.यदि ये राक्षसी कृत्य नहीं किए जाते तो मानव समाज उससे बहुत अधिकविकसित होता, जितना वह आज है. परंतु उनका अंतकाल आ गया है; और मुझे पूरी आशा है कि इस सम्मेलन के सम्मान में सुबह जो घंटानाद हुआ था, वह सभी प्रकार के कट्टरपन, सभी प्रकार के अत्याचारों, चाहे वे तलवार के जरिए हों या कल के- और व्यक्तियों, जो एक ही उद्देश्य के लिए अग्रसर हैं, के बीच सभी प्रकार की दुर्भावनाओं के लिए मृत्यु का घंटानाद बन जाएगा.
अफ़सोस की  बात है ऐसा नहीं  हो सका
ग्यारह सितम्बर उन्नीस सौ छः  को गांधी जी  ने सत्याग्रह के अनुपम प्रयोग की शुरुआत की 
जोहानसबर्ग , साउथ अफ्रीका में भारतीयों के समूह को उन्होंने एक नए तरह के संघर्ष का पाठ पढ़ाया. नए तरह का आग्रह ; अहिंसात्मक तरीके से सरकार   सत्य का आग्रह , न्याय का आग्रह . 
वह एक रास्ता था असभ्य युद्धों के स्थान पर एक सभी संघर्ष का रास्ता . भारत ने बाद में  देखा, दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य ने भी देखा कि लोगों के जाग कर खड़े होने और चुपचाप apnaa हक़ मांगने में भी बड़ी शक्ति होती है जो बमों और गोलियों  से ज्यादा प्रभावी हो सकती है 

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