रविवार, 1 जनवरी 2012
सोमवार, 10 अक्टूबर 2011
जिम्मेदारी लेना सीखो अन्ना !
अन्ना हजारे और उनके साथियों की कांग्रेस को हराने की अपील को लेकर कांग्रेस में काफी कुछ कहा जा रहा है . मजेदार बात यह है कि अन्य राजनैतिक दल इस बात पर खामोश हैं. शायद उनकी खामोशी इस बात को लेकर है कि कल को अगर इसी तरह की अपील उनके खिलाफ आ जाती है तो वो क्या करेंगे.?
ख़ैर जैसा कि अन्ना हजारे के एक साथी ने कहा कि सत्ताधारी दल होने के चलते लोकपाल बिल पास करवाने की जिम्मेदारी कांग्रेस की बनती है , अभी तूफ़ान का सामना कांग्रेस को करना लाजिमी है. कांग्रेस के लिए यह बड़ी ही अप्रिय स्थिति बन आई है और वह निश्चित ही इसे लेकर परेशानी में है.
हमारा मानना है कि जनतांत्रिक देश के जिम्मेदार नागरिक होने के चलते अन्ना और उनके साथियों को चुनावों के लिए मुद्दे तय करने और जन साधारण से उन मुद्दों पर किसी को वोट देने या न देने की अपील करने का पूरा हक़ है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है चाहे यह किसी एक राजनैतिक दल या पूरी की पूरी राजनैतिक व्यवस्था को कितना भी नागवार क्यों न गुजरे. इससे पहले भी सिर्फ एक मुद्दे को लेकर चुनाव हुए हैं अगर किसी को यह महसूस होता है कि चुनाव में मत देने के लिए कई मुद्दों को एक साथ देखा जाना जरूरी है उसे शायद "वो मेरी ही माँ नहीं पूरे देश की माँ थीं " या "राम लला हम आयेंगे मंदिर वही बनायेंगे " नारों या ऐसे ही तमाम नारों के साथ लडे चुनाव नहीं याद हैं . जब ऐसे मुद्दों पर चुनाव लडे जा सकते हैं तो लोकपाल मुद्दे पर क्यों नहीं.
यह तमाम बाते अना और उनके साथियों की सही हैं और हमेशा सही रहेंगी बस हमारा प्रश्न है कि क्या अन्ना जिम्मेदार नागरिक नहीं हो सकते थे?
हमारा स्पष्ट मत है कि सही मांग और सही बात के बावजूद अन्ना और उनके साथी शुरू से गैर जिम्मेदार हैं.
१ . जब लोकपाल बिल के लिए संयुक्त कमेटी बनायी गयी थी और उसमे सरकार से इतर कुछ लोग और शामिल किये गए थे जिन्हें अन्ना हजारे ने चुना था तो क्या अन्ना हजारे उस कमेटी में अन्य दलों के सदस्यों की सदस्यता की मांग नहीं कर सकते थे? उन्होंने ऐसा नहीं किया (उनका बाद में यह कहना कि वह चाह रहे थे पर सरकार नहीं मानी स्वीकार्य नहीं है क्योंकि उन्होंने उस समय इस मुद्दे की चर्चा तक नहीं की थी ) क्योंकि उन्हें लगता रहा है कि वह जो सोच रहें हैं वही अंतिम सत्य है बाकी पूरे देश में कोई कुछ सोच ही नहीं सकता .
२. जब ऐसी किसी संयुक्त कमेटी को हजारे और उनके साथी स्वीकार कर रहे थे तो क्या उनकी यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह इस कमेटी को एक सही अंजाम तक पहुंचाने का प्रयास करते. दलील फिर दी जाती है कि सरकार नहीं तैयार थी. लेकिन आये दिन अखबारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में वह और उनके साथी सिर्फ और सिर्फ धमकाने की मुद्रा में ही नजर आते रहे. एक भी बयान किसी ने ऐसा दिया था कि हम प्रयास कर रहे हैं या और कुछ ऐसा जो जिम्मेदारी का बोध कराता हो? कड़ा लगेगा पर तथाकथित टीम अन्ना के लोगों (अन्ना हजारे समेत ) के आचरण और भाषा हमेशा उन राजनेताओं से भी गयी गुजरी रही जिनकी वह आलोचना करते हैं.
ख़ैर बीच में रामलीला मैदान हुआ . उसमे क्या रहा कैसा रहा यह सभी ने देखा. अब सीधे आते हैं चुनाव के मुद्दे पर
अन्ना के एक साथी ने यह पूछने पर कि सपा और बसपा तो खुले रूप में जन लोकपाल की विरोधी है तो आप उनके खिलाफ प्रचार करने कि बात क्यों नहीं करते, उन्होंने बताया कि इन दलों का लोकपाल बिल पास करवाने में कोई योगदान नहीं होगा इसलिए वह सिर्फ कांग्रेस को हराने की बात कर रहे हैं. अब क्या यह लोग बताएँगे कि अगर यही बात है तो राज्यों के विधानसभा चुनावों में आप प्रचार की बात क्यों कर रहे हैं . राज्य की विधानसभा तो लोकपाल बिल पास कर नहीं सकती. अगर कांग्रेस भ्रष्ट है इसलिए आप कांग्रेस के खिलाफ हैं तो बाकी भ्रष्टों पर इनायत क्यों कर रहे हैं और अगर सिर्फ लोकपाल ही मुद्दा है भ्रष्टाचार नहीं तो राज्यों की विधान सभाओं से तो कोई लेना देना ही नहीं है
आते हैं हिसार की बात पर ! वहाँ कांग्रेस पहले ही कमजोर स्थिति में थी. लड़ाई तो ओम प्रकाश चौटाला के बेटे अजय चौटाला और भजनलाल के बेटे कुलदीप विश्नोई में थी . हजारे ने कहा था कि अगर लोकपाल बिल शीतकालीन सत्र में पास नहीं हुआ तो वह कांगेस के खिलाफ प्रचार करेंगे . मजे की बात तो यह है कि इतना बोलने के बाद याद आया कि शीत कालीन सत्र तो अभी शुरू नहीं हुआ है , हजारे और उनके साथियों ने तय कर लिया कि शीत कालीन सत्र का इन्तजार क्यों करें अभी से कांगेस के खिलाफ प्रचार शुरू कर देते हैं और पहुँच गए हिसार . प्रश्न यह उठता है कि अगर कांग्रेस भ्रष्टाचार का दूसरा नाम है इसलिए उसे हराना है तो फिर जिताना किसे है ? अगर हजारे में जिम्मेदारी का भाव होता तो वह एक प्रत्याशी खडा करते और कहते कि यह हमारा प्रत्याशी है स्वच्छ है और लोकपाल का समर्थक है . आप इसे वोट दें . उस प्रत्याशी को (केजरीवाल तो अभी सरकारी सेवा में हैं चुनाव लड़ नहीं सकते , किरण बेदी या फिर शान्ति भूषण लड़ सकते थे ) आसानी से जिताया जा सकता था और वह सांसद बन कर शीतकालीन सत्र में लोकपाल के सपने को यथार्थ में लाने के लिए खडा हो सकता था.
तो हिसार में अन्ना ने नहीं कहा कि किसे जिताना है. कुलदीप विश्नोई या अजय चौटाला ? उम्मीद है हजारे को इनका इतिहास पता होगा.
अन्ना प्रत्याशी नहीं उतार सकते वो वोटबैंक की नहीं लोगों की राजनीति करते हैं एक सहज प्रश्न उठता है कि जब देश के सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा के अध्यक्ष ने पत्र अन्ना को भरोसा दिलाया है कि वह जन लोकपाल के प्रावधानों से सहमत हैं तो अन्ना भाजपा को समर्थन की अपील क्यों नहीं कर देते? कांग्रेस को हराने के लिए इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है . लोगों के पास एक विकल्प होगा . भाजपा को समर्थन मिल जाय तो वह सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है. लेकिन अन्ना के साथी वह भी नहीं कर सकते इन सब के लिए जिम्मेदारी लेनी पड़ती. आकांक्षाओं के समुद्र में गोते लगाना पड़ता . अगर शौक दूसरों को गैर जिम्मेदार बोलना ही हो गया हो तो जिम्मेदारी क्यों रास आने लगी .
श्रीमान अन्ना हजारे दूसरों को नसीहत देना और पागलखाने जाने की सलाह देना थोड़े दिन के लिए रोक के एक बार जिम्मेदारी लेना भी सीखो . बहुतों ने भरोसा किया है तुम पर
रविवार, 11 सितंबर 2011
ग्यारह सितम्बर : सभ्यताओं के संवाद का दिन
२००१ से पहले आप ग्यारह सितम्बर को कैसे याद करते थे ? निःसंदेह २००१ के ग्यारह सितम्बर के बाद कुछ भी पहले सा नहीं रह पाया पर उससे पहले ग्यारह सितम्बर सभ्यताओं के संघर्ष की जगह सभ्यताओं के संवाद का दिन था .
अट्ठारह साल पहले जब हम स्कूल में थे , हमारे स्कूल में स्वामी विवेकानंद के ग्यारह सितम्बर अट्ठारह सौ तिरानबे में शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में दिए गए भाषण की सौवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी और इस उपलक्ष्य में होने वाले समारोह में हमें स्वामी विवेकानद का किरदार निभाना था. उम्र कम थी पर पता था की यह कुछ ख़ास है और हम उस समय जो कुछ भी मिला पढ़ते चले गए . स्वामी विवेकानंद को पढने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि हमें हिन्दू धर्म की एक बेहतर समझ आ गयी . जिसे बाद में तमाम धर्म ग्रंथों ने भी अपने योगदान से बेहतर बनाया .
स्वामी विवेकानंद का मंत्रमुग्ध कर देने वाला शिकागो भाषण कुछ इस प्रकार था ;
अफ़सोस की बात है ऐसा नहीं हो सका
अमेरिका की बहनों और भाइयो!
आपने हमारा जैसा हार्दिक और स्नेहपूर्ण स्वागत किया है, उसके लिए आभार व्यक्त करने के लिए जब मैं यहां खड़ा हुआ हूं तो मेरा मन एक अकथनीय आनंद से भरा हुआ है.मैं विश्व की सबसे प्राचीन संन्यासियों की पंरपरा की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं; मैं आपको धर्मो की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूं और मैं सभी वर्गो एवं पंथों के करोड़ों हिंदुओं की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं.
इस मंच पर आए उन कुछ वक्ताओं को भी मेरा धन्यवाद, जिन्होंने पूर्व से आए प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए आपको बताया कि दूर देशों से आए हुए ये सज्जन विभिन्न देशों में सहिष्णुता का संदेश पहुंचाने के सम्मान के अधिकारी हो सकते हैं.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने विश्व को सहिष्णुता औ सार्वभौमिक स्वीकार्यता का पाठ पढ़ाया. हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मो की सत्यता को स्वीकार करते हैं.मुझे उसे देश से संबंधित होने में भी गर्व है, जिसने इस प्थ्वी के सभी धर्मो व सभी देशों के सताए हुए लोगों और शरणार्थियों को शरण दी है.
मुझे आपको यह बताने में गर्व है कि हमने उन पवित्र इजराइलियों को अपने कलेजे से लगाया है, जिन्होंने ठीक उसी वर्ष दक्षिण भारत में आकर शरण ली, जब रोमन अत्याचारियों ने उनके पवित्र मंदिर को ध्वस्त कर दिया था.मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने महान जोरोस्ट्रियन राष्ट्र के विस्थापितों को शरण दी है और अब भी उनके विकास में सहयोग दे रहे हैं.
भाइयों, मैं आपके सामने उस भजन की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत करूंगा, जिसको मैं अपने बचपन से दोहराता आया हूं और जिसे करोड़ों लोग प्रतिदिन दोहराते हैं -
'जैसे विभिन्न स्रोतों से उद्भूत विभिन्न धाराएं
अपना जल सागर में विलीन कर देती हैं,
वैसे ही हे ईश्वर! विभिन्न प्रवृत्तियों के चलते
जो भिन्न मार्ग मनुष्य अपनाते हैं, वे
भिन्न प्रतीत होने पर भी
सीधे या अन्यथा, तुझ तक ही जाते हैं.'
वर्तमान सम्मेलन, जो अब तक हुई सबसे महान सभाओं में से एक है, स्वयं 'गीत' में बताए उस अद्भुत सिद्धांत का पुष्टीकरण और विश्व के लिए एक घोषणा है -
'जो कोई, किसी भी स्वरूप में
मेरे पास आता है, मुझे पाता है;
सभी मनुष्य उन मार्गो पर
संघर्षरत हैं, जो अंत में उन्हें मुझे तक ही ले आते हैं.'
सांप्रदायिकता कट्टरता और उन्हीं की भयानक उपज धर्माधता ने बहुत समय से इस सुंदर पृथ्वी को ग्रस रखा है. उन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी ही बार उसे मानव रक्त से सराबोर कर दिया है, सभ्यता को नष्ट किया है और समूचे राष्ट्रों को निराशा के गर्त में धकेल दिया है.यदि ये राक्षसी कृत्य नहीं किए जाते तो मानव समाज उससे बहुत अधिकविकसित होता, जितना वह आज है. परंतु उनका अंतकाल आ गया है; और मुझे पूरी आशा है कि इस सम्मेलन के सम्मान में सुबह जो घंटानाद हुआ था, वह सभी प्रकार के कट्टरपन, सभी प्रकार के अत्याचारों, चाहे वे तलवार के जरिए हों या कल के- और व्यक्तियों, जो एक ही उद्देश्य के लिए अग्रसर हैं, के बीच सभी प्रकार की दुर्भावनाओं के लिए मृत्यु का घंटानाद बन जाएगा.
ग्यारह सितम्बर उन्नीस सौ छः को गांधी जी ने सत्याग्रह के अनुपम प्रयोग की शुरुआत की
जोहानसबर्ग , साउथ अफ्रीका में भारतीयों के समूह को उन्होंने एक नए तरह के संघर्ष का पाठ पढ़ाया. नए तरह का आग्रह ; अहिंसात्मक तरीके से सरकार सत्य का आग्रह , न्याय का आग्रह .
वह एक रास्ता था असभ्य युद्धों के स्थान पर एक सभी संघर्ष का रास्ता . भारत ने बाद में देखा, दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य ने भी देखा कि लोगों के जाग कर खड़े होने और चुपचाप apnaa हक़ मांगने में भी बड़ी शक्ति होती है जो बमों और गोलियों से ज्यादा प्रभावी हो सकती है
शुक्रवार, 9 सितंबर 2011
सोमवार, 8 अगस्त 2011
तुम्हारे बग़ैर
रास्तों पर मोड़ हों
तो अच्छे लगते हैं रास्ते
तुम कहते थे ।
गुजरकर सैकड़ों मोड़ों से
आज भी याद है हमें
वो सारी बातें
जो तुम कहते थे।
सुंदर सी तुम्हारी आँखें
हो जाती थीं और भी सुंदर
संजों कर ख़ुद मेँ
ढेर सारे प्यारे-प्यारे सपने
भिगो देतीं थीं
भीतर तक तुम्हारी बातें
और मंत्रमुग्ध से हम
समेटते रहते
तुम्हारी बातें
अपनी बातों मेँ,
तुम्हारे सपने
अपने सपनों मेँ,
और तुम्हारी आँखें
अपनी आँखों मेँ.
आज जब तुम नही हो
आईना दिखाता सा लगता है
हर अकेलापन
देखते रहतें हैं
जिसमे घंटों हम
अपनी ही आँखों मेँ
अब भी खिलते,
तुम्हारे ही सपने,
उनमें डूबी हुई सी
तुम्हारी गहरी आँखें.
घेर लेती हैं हर मोड़ पर
हमें तुम्हारी यादें.
तुम्हारे बाद, अब
कुछ भी नही बदलता
किसी भी मोड़ पर
और अच्छा नही लगता
हमें ये रास्ता
तुम्हारे बग़ैर
शनिवार, 16 अप्रैल 2011
बिकने को तैयार लोग, खरीदारों की खोज और दलाल
तहलका की खोजी पत्रकारिता और सच तक पहुँचने की उसकी जिद के हम हमेशा से कायल रहें हैं. तहलका एक ऐसे स्तम्भ की भांति है जो आज पास की लहरों की चोटों से अनजान सच की खोज और उसको दुनिया के सामने लाने के लिए हमेशा लगा रहता है. इसी क्रम में तहलका की ताज़ी तहकीकात , वोट के बदले नोट कांड पर की तहकीकात पढ़ने को मिली. इसे विस्तार से आप भाग १ व भाग २ में पढ़ सकते हैं . यह तहकीकात विकिलीक्स में किसी छुटभैये सहयोगी की खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की उत्कंठा से कही गई बातों से ज्यादा प्रमाणिक हैं .
जुलाई 2008 के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कई कुचक्र एक साथ काम कर रहे थे. कांग्रेस और उसके सहयोगियों के सरकार बचाने के कुचक्र, वाम दलों की ऐंठ की किसी तरह यह सरकार गिरा कर अपनी ताकत दिखायें , बसपा और भाजपा को सरकार गिरनेके बाद मिल सकने वाली गद्दी की आस और छिटपुट सांसदों को इस मौके में अधिक से अधिक फ़ायदा उठा लेने की आस.
भाजपा को समर्थन न देने की मजबूरी के बाद जब वाम दलों ने बसपा की और रुख किया तो भाजपा को नजर आने लगा कि बसपा तो अनायास ही लाभ की स्थिति में आ गयी. भाजपा उत्तर प्रदेश में बसपा को समर्थन दे कर उसकी कीमत भुगत चुकी है . भाजपा को उम्मीद थी कि केंद्र में वह अगुवाई करेगी और बसपा उसका समर्थन करेगी. पर यहां तो उसका उलटा हो रहा था . वामदलों की शह पर बसपा सरकार बनाने का सपना देखने लगी थी और इसी लिए सरकार गिराने की जोड़तोड़ में वह आगे निकलती नजर आने लगी. वाम दलों को शायद बसपा के खरीद-फरोख्त के तौर तरीके अच्छे नहीं लगे इसलिए अविश्वास प्रस्ताव के आखिरी मुकाम पर पहुँचते पहुँचते उसने संसद के बाहर की सक्रिय भागीदारी छोड़ कर खुद को संसदीय चर्चा तक ही सीमित कर लिया.
तहलका की तहकीकात खुलासा करती है, कि भाजपा सरकार के सामने किस तरह से चारे फेंकने में जुटी थी. भाजपा की पूरी कोशिश थी की बिकने को तैयार उसके नेताओं को किसी तरह कांग्रेस खरीदने में पकड़ी जाए और वह इस बात पर वाहवाही और फिर वोट समेटे . इसके लिए उसने बिकने को तैयार लोगों और दलालों को सक्रिय कर रखा था. इस अभियान को खुद भाजपा के प्रधानमन्त्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवानी व कद्दावर नेता अरुण जेटली की देखरेख में चलाया जा रहा था.
इस तहकीकात के खुलासे के बाद वाजिब सवाल उठते हैं
इस तरह के बनाए हुए मामले में अगर भाजपा का उद्देश्य सिर्फ भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश ही था तो यह जानने के बाद वह कांग्रेस के किसी नेता को नहीं फंसा पायी है और उसके हाथ कुछ ख़ास नहीं लगा है तो उसने संसद नोट लहरा कर व्यर्थ में संसद की गरिमा क्यों गिराई और सुधीन्द्र कुलकर्णी , अरुण जेटली जैसों की भागीदारी की बात भाजपा ने क्यों नहीं स्वीकारी ?
जुलाई 2008 के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कई कुचक्र एक साथ काम कर रहे थे. कांग्रेस और उसके सहयोगियों के सरकार बचाने के कुचक्र, वाम दलों की ऐंठ की किसी तरह यह सरकार गिरा कर अपनी ताकत दिखायें , बसपा और भाजपा को सरकार गिरनेके बाद मिल सकने वाली गद्दी की आस और छिटपुट सांसदों को इस मौके में अधिक से अधिक फ़ायदा उठा लेने की आस.
भाजपा को समर्थन न देने की मजबूरी के बाद जब वाम दलों ने बसपा की और रुख किया तो भाजपा को नजर आने लगा कि बसपा तो अनायास ही लाभ की स्थिति में आ गयी. भाजपा उत्तर प्रदेश में बसपा को समर्थन दे कर उसकी कीमत भुगत चुकी है . भाजपा को उम्मीद थी कि केंद्र में वह अगुवाई करेगी और बसपा उसका समर्थन करेगी. पर यहां तो उसका उलटा हो रहा था . वामदलों की शह पर बसपा सरकार बनाने का सपना देखने लगी थी और इसी लिए सरकार गिराने की जोड़तोड़ में वह आगे निकलती नजर आने लगी. वाम दलों को शायद बसपा के खरीद-फरोख्त के तौर तरीके अच्छे नहीं लगे इसलिए अविश्वास प्रस्ताव के आखिरी मुकाम पर पहुँचते पहुँचते उसने संसद के बाहर की सक्रिय भागीदारी छोड़ कर खुद को संसदीय चर्चा तक ही सीमित कर लिया.
तहलका की तहकीकात खुलासा करती है, कि भाजपा सरकार के सामने किस तरह से चारे फेंकने में जुटी थी. भाजपा की पूरी कोशिश थी की बिकने को तैयार उसके नेताओं को किसी तरह कांग्रेस खरीदने में पकड़ी जाए और वह इस बात पर वाहवाही और फिर वोट समेटे . इसके लिए उसने बिकने को तैयार लोगों और दलालों को सक्रिय कर रखा था. इस अभियान को खुद भाजपा के प्रधानमन्त्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवानी व कद्दावर नेता अरुण जेटली की देखरेख में चलाया जा रहा था.
इस तहकीकात के खुलासे के बाद वाजिब सवाल उठते हैं
इस तरह के बनाए हुए मामले में अगर भाजपा का उद्देश्य सिर्फ भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश ही था तो यह जानने के बाद वह कांग्रेस के किसी नेता को नहीं फंसा पायी है और उसके हाथ कुछ ख़ास नहीं लगा है तो उसने संसद नोट लहरा कर व्यर्थ में संसद की गरिमा क्यों गिराई और सुधीन्द्र कुलकर्णी , अरुण जेटली जैसों की भागीदारी की बात भाजपा ने क्यों नहीं स्वीकारी ?
सोमवार, 19 जुलाई 2010
बारिश, बारिश पानी पानी
मौसम एक ऐसा विषय है जो बातचीत में अक्सर सप्लीमेंट का काम करता रहता है। मसलन आप किसी से मिलते हैं जिससे बात करने के लिए आप के पास ज्यादा कुछ नहीं है तो झट से मौसम के ऊपर एक छोटी सी परिचर्चा आयोजित करवा सकते हैं। ऐसा ही विषय राजनीति भी माना जाता रहा है पर पिछले कुछ महीनो से हमें राजनीति की लोकप्रियता में गिरावट देखने को मिल रही है । हो सकता है यह गिरावट सिर्फ हमें ही नजर आ रही हो पर कुछ तो है।
खैर हम मौसम पर थे। तो मान लीजिये आपको कोई मिला जिससे बात क्या करें आपको समझ में नहीं आ रहा हैतो आप क्या करते हैं ज्यादातर लोग बात की शुरुआत आज बहुत गर्मी है या इस बार बारिश लेट हो रही है से शुरू करते हैं। ऐसा नहीं है कि लोग इस बार गर्मी कम है या इस बार बारिश अच्छी हो रही है नहीं कह सकते लेकिन परेशानी तो यह है कि गर्मी बढती जा रही है और बारिश कम होती जा रही है। हर साल यही होता आ रहा है या तो बारिश कम होती है या फिर होती है तो ऐसी कि सबकुछ तहस नहस कर देने वाली । जैसे कि पिछले ही कुछ दिनों से चीन के कई हिस्सों में हो रही है । आपको याद होगी चीन की ओलम्पिक उदघाटन समारोह में बारिश रोक देने वाली शानदार कहानी
हमें याद आती है एक उपन्यास की नाम था "सामर्थ्य और सीमा "
बारिश या तो कम हो रही है या बहुत ज्यादा
या तो सूखा आता है या फिर बाढ़
अभी कुछ दिन पहले किसी ने हमसे क्योटो प्रोटोकाल के बारे में पूछा था हम उसे समझा रहे थे और खुद सोचते जा रहे थे कि हम क्यों नहीं समझ रहे हैं सीधी सी बात
हमें नहीं समझ में आ रहा है कि हम खुद से ही हारते जा रहे हैं । हमें अंत नजर आ रहा है और हम उसकी ओर बेफिक्री से बढ़ते जा रहे हैं।
तो अगर आपके पास बात करने के लिए कुछ नहीं है तो मौसम पर परिचर्चा कर लीजिये। वैसे तो हम सब बहुत बिज़ी हैं
खैर आज हम छुट्टी पर हैं(खाली हैं कुछ करने को नहीं है तभी मौसम नजर आ रहा है ) और लखनऊ में सुन्दर बारिश हो रही है।
दो साल पहले जब भारी बारिश हुई थी तो कुकरैल नाले (शहर में बहने वाला एक नाला )में आई बाढ़ में उसके किनारे बसी (अवैध या वैध पता नहीं )अकबर नगर कालोनी डूब गयी थी।इस बार नाले के किनारे किनारे डॉ आंबेडकर पथ का निर्माण हो रहा है तो नाले की एक तरफ सीमा ढंग से बाँध दी गयी है । दूसरी तरफ पड़ता है अकबर नगर । अगर ज़रा सी भी ठीक बारिश हुई तो अकबर नगर डूबना तय होगा । उम्मीद है वहां के वाशिंदों ने तैयारी कर रखी होगी। अगर सरकार डॉ आंबेडकर पथ बनाने के साथ साथ नाले के प्रवाह का भी ढंग से इंतजाम करती चलती तो डॉ आंबेडकर बुरा नहीं मानते न ही पहचान से जुड़ा कोई संकट खडा होता। राहत की बात है कि निकाय चुनाव नजदीक हैं अगर बाढ़ आई तो निकाय प्रत्याशी कुछ जनसेवा कर लेंगे ।
राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अंतर्गत गावों में जलाशयों का निर्माण हुआ है जिसमें वर्ष जल संचयन का विचार होगा दूर से देख कर तो लगता है कि अच्छा विचार है कभी पास से देखने का मौक़ा मिला तो पता चलेगा कि कितने कारगर जलाशय होंगे ।
अंततः एक बात जिस बच्चे को हम क्योटो प्रोटोकाल के बारे में बता रहे थे उसने एक सवाल पूछा
अमेरिका जिसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बनती थी ग्रीन हाउस गैसों में कमी की वही क्यों पीछे हटा ?
जवाब सीधा है पर फिर भी खटकता है ।
सरकार पीछे हट गई तो क्या महान अमेरिका के नागरिक भी नहीं सोचते कुछ
"एक असुविधाजनक सच" जैसी बाते ही होती रहेंगी या कुछ और भी होगा
नोबल पुरस्कार अंतिम सच है क्या कोई काम हाथ में लेने का
खैर हम मौसम पर थे। तो मान लीजिये आपको कोई मिला जिससे बात क्या करें आपको समझ में नहीं आ रहा हैतो आप क्या करते हैं ज्यादातर लोग बात की शुरुआत आज बहुत गर्मी है या इस बार बारिश लेट हो रही है से शुरू करते हैं। ऐसा नहीं है कि लोग इस बार गर्मी कम है या इस बार बारिश अच्छी हो रही है नहीं कह सकते लेकिन परेशानी तो यह है कि गर्मी बढती जा रही है और बारिश कम होती जा रही है। हर साल यही होता आ रहा है या तो बारिश कम होती है या फिर होती है तो ऐसी कि सबकुछ तहस नहस कर देने वाली । जैसे कि पिछले ही कुछ दिनों से चीन के कई हिस्सों में हो रही है । आपको याद होगी चीन की ओलम्पिक उदघाटन समारोह में बारिश रोक देने वाली शानदार कहानी
हमें याद आती है एक उपन्यास की नाम था "सामर्थ्य और सीमा "
बारिश या तो कम हो रही है या बहुत ज्यादा
या तो सूखा आता है या फिर बाढ़
अभी कुछ दिन पहले किसी ने हमसे क्योटो प्रोटोकाल के बारे में पूछा था हम उसे समझा रहे थे और खुद सोचते जा रहे थे कि हम क्यों नहीं समझ रहे हैं सीधी सी बात
हमें नहीं समझ में आ रहा है कि हम खुद से ही हारते जा रहे हैं । हमें अंत नजर आ रहा है और हम उसकी ओर बेफिक्री से बढ़ते जा रहे हैं।
तो अगर आपके पास बात करने के लिए कुछ नहीं है तो मौसम पर परिचर्चा कर लीजिये। वैसे तो हम सब बहुत बिज़ी हैं
खैर आज हम छुट्टी पर हैं(खाली हैं कुछ करने को नहीं है तभी मौसम नजर आ रहा है ) और लखनऊ में सुन्दर बारिश हो रही है।
दो साल पहले जब भारी बारिश हुई थी तो कुकरैल नाले (शहर में बहने वाला एक नाला )में आई बाढ़ में उसके किनारे बसी (अवैध या वैध पता नहीं )अकबर नगर कालोनी डूब गयी थी।इस बार नाले के किनारे किनारे डॉ आंबेडकर पथ का निर्माण हो रहा है तो नाले की एक तरफ सीमा ढंग से बाँध दी गयी है । दूसरी तरफ पड़ता है अकबर नगर । अगर ज़रा सी भी ठीक बारिश हुई तो अकबर नगर डूबना तय होगा । उम्मीद है वहां के वाशिंदों ने तैयारी कर रखी होगी। अगर सरकार डॉ आंबेडकर पथ बनाने के साथ साथ नाले के प्रवाह का भी ढंग से इंतजाम करती चलती तो डॉ आंबेडकर बुरा नहीं मानते न ही पहचान से जुड़ा कोई संकट खडा होता। राहत की बात है कि निकाय चुनाव नजदीक हैं अगर बाढ़ आई तो निकाय प्रत्याशी कुछ जनसेवा कर लेंगे ।
राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अंतर्गत गावों में जलाशयों का निर्माण हुआ है जिसमें वर्ष जल संचयन का विचार होगा दूर से देख कर तो लगता है कि अच्छा विचार है कभी पास से देखने का मौक़ा मिला तो पता चलेगा कि कितने कारगर जलाशय होंगे ।
अंततः एक बात जिस बच्चे को हम क्योटो प्रोटोकाल के बारे में बता रहे थे उसने एक सवाल पूछा
अमेरिका जिसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बनती थी ग्रीन हाउस गैसों में कमी की वही क्यों पीछे हटा ?
जवाब सीधा है पर फिर भी खटकता है ।
सरकार पीछे हट गई तो क्या महान अमेरिका के नागरिक भी नहीं सोचते कुछ
"एक असुविधाजनक सच" जैसी बाते ही होती रहेंगी या कुछ और भी होगा
नोबल पुरस्कार अंतिम सच है क्या कोई काम हाथ में लेने का
सोमवार, 10 मई 2010
ब्लोगिंग में वापसी की कोशिश!
जब हमने अपनी पिछली पोस्ट डिजिटली बी पी एल होने की व्यथा लिखी तो तो अंदाजा नहीं था कि अगली पोस्ट के लिए यह बी पी एल होना इतना इंतज़ार करायेगा। हमने पिछली पोस्ट १३ नवम्बर को लिखी थी और तब से अब आज जा के लिखने का मौक़ा मिल पा रहा है।
डिजिटली बी पी एल होना मतलब एक ऐसी जगह पर रहना जहां इन्टरनेट का कनेक्शन मिल पाना कठिन हो जाय। हम रिलायंस का डाटा कार्ड इस्तेमाल करते हैं जो कि जिस जगह पर हम रह रहे हैं वहां इतनी थकी हुई चाल से चलता है कि रोना आ जाय उसपर ट्रांसलिटरेशन का दर्द ! इतनी थकी चाल में तो ऑनलाइन ट्रांसलिटरेशन संभव ही नहीं हो पाता। कई बार कोशिश की कि ऑफलाइन ट्रांसलिटरेशन का इस्तेमाल करके लिखें और फिर ब्लॉगर पर पेस्ट कर दें तो लिख कर रखा और ब्लॉगर खोलने कि असफल कोशिशें करते रहे और थक के ये तरीका भी छोड़ दिया।
अगला प्रयास था ऑफलाइन ट्रांसलिटरेशन के जरिये लिखें और फिर उसे ई मेल के जरिये भेजें । ऐसा करने में फोंट साइज क्या रहेगी और पब्लिश होने के बाद पोस्ट पढने में आएगी भी या नहीं इस बात की दिक्कत थी । खैर कोशिश की! पर मामला जमा नहीं ।
पिछले साल जब हमने मोबाइल रहते हुए कनेक्टिविटी की समस्या का हल खोजने की कोशिश में अपने ब्लॉग पर ये पोस्ट लिखी थी तो रवि रतलामी जी ने ई वी डी ओ का विकल्प सुझाया था। ये विकल्प काफी आकर्षक था पर पहले थो लखनऊ में ई वी डी ओ शुरू नहीं हुआ था , जब शुरू हुआ तो शहर के अन्दर ही काम कर रहा है बाहर नहीं ।
तिलहर कस्बा, जहाँ हम रह रहे हैं शाहजहांपुर जिला मुख्यालय से मात्र २४ किमी की दूरी पर है पर शाहजहांपुर में बी एस एन एल की थ्री जी सेवा का वहाँ तक कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है।
खैर ! ब्लॉग लिखने में परेशानी है पर मोबाइल पर ब्लॉग तो पढ़े ही जा सकते हैं । पढने में ट्रांसलिटरेशन बाधा नहीं है , हाँ टिप्पणी देने में फिर बाधा आती है तो फिर हमने टिप्पणी देना भी छोड़ दिया।
देखते हैं इस समस्या का हल कब तक मिल पाता है और कब हम मनमाफिक तरीके ब्लोगिंग फिर से शुरू कर पाते हैं
आपके पास कोई सुझाव हो तो जरूर बताईयेगा
इस बीच में ब्लॉग जगत से बिना बताये गायब रहने के बावजूद हमें याद रखने के लिए चिट्ठाचर्चा और प्रवीण जी को धन्यवाद (बिना कुछ लिखे चिट्ठाचर्चा में जगह! , काश साल में जन्मदिन कई बार आते । वैसे हम दो बार मनाते हैं)
वैसे चिट्ठाचर्चा से एक शिकायत भी है इसका हालिया टेम्पलेट धीमे कनेक्शन पर खुलने में बड़ी देर लेता है । मोबाइल पर साइड बार तो दीखते ही नहीं कि क्या है उनमें । खैर !
डिजिटली बी पी एल होना मतलब एक ऐसी जगह पर रहना जहां इन्टरनेट का कनेक्शन मिल पाना कठिन हो जाय। हम रिलायंस का डाटा कार्ड इस्तेमाल करते हैं जो कि जिस जगह पर हम रह रहे हैं वहां इतनी थकी हुई चाल से चलता है कि रोना आ जाय उसपर ट्रांसलिटरेशन का दर्द ! इतनी थकी चाल में तो ऑनलाइन ट्रांसलिटरेशन संभव ही नहीं हो पाता। कई बार कोशिश की कि ऑफलाइन ट्रांसलिटरेशन का इस्तेमाल करके लिखें और फिर ब्लॉगर पर पेस्ट कर दें तो लिख कर रखा और ब्लॉगर खोलने कि असफल कोशिशें करते रहे और थक के ये तरीका भी छोड़ दिया।
अगला प्रयास था ऑफलाइन ट्रांसलिटरेशन के जरिये लिखें और फिर उसे ई मेल के जरिये भेजें । ऐसा करने में फोंट साइज क्या रहेगी और पब्लिश होने के बाद पोस्ट पढने में आएगी भी या नहीं इस बात की दिक्कत थी । खैर कोशिश की! पर मामला जमा नहीं ।
पिछले साल जब हमने मोबाइल रहते हुए कनेक्टिविटी की समस्या का हल खोजने की कोशिश में अपने ब्लॉग पर ये पोस्ट लिखी थी तो रवि रतलामी जी ने ई वी डी ओ का विकल्प सुझाया था। ये विकल्प काफी आकर्षक था पर पहले थो लखनऊ में ई वी डी ओ शुरू नहीं हुआ था , जब शुरू हुआ तो शहर के अन्दर ही काम कर रहा है बाहर नहीं ।
तिलहर कस्बा, जहाँ हम रह रहे हैं शाहजहांपुर जिला मुख्यालय से मात्र २४ किमी की दूरी पर है पर शाहजहांपुर में बी एस एन एल की थ्री जी सेवा का वहाँ तक कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है।
खैर ! ब्लॉग लिखने में परेशानी है पर मोबाइल पर ब्लॉग तो पढ़े ही जा सकते हैं । पढने में ट्रांसलिटरेशन बाधा नहीं है , हाँ टिप्पणी देने में फिर बाधा आती है तो फिर हमने टिप्पणी देना भी छोड़ दिया।
देखते हैं इस समस्या का हल कब तक मिल पाता है और कब हम मनमाफिक तरीके ब्लोगिंग फिर से शुरू कर पाते हैं
आपके पास कोई सुझाव हो तो जरूर बताईयेगा
इस बीच में ब्लॉग जगत से बिना बताये गायब रहने के बावजूद हमें याद रखने के लिए चिट्ठाचर्चा और प्रवीण जी को धन्यवाद (बिना कुछ लिखे चिट्ठाचर्चा में जगह! , काश साल में जन्मदिन कई बार आते । वैसे हम दो बार मनाते हैं)
वैसे चिट्ठाचर्चा से एक शिकायत भी है इसका हालिया टेम्पलेट धीमे कनेक्शन पर खुलने में बड़ी देर लेता है । मोबाइल पर साइड बार तो दीखते ही नहीं कि क्या है उनमें । खैर !
शुक्रवार, 13 नवंबर 2009
डिजिटली बी पी एल होने की व्यथा
रात के एक बजे थे अचानक मोबाइल की एस एम् एस टोन गुहार लगाती है ।
एस एम् एस एक दोस्त का था जो दिल्ली में बैठा हुआ था । अभी थोडी देर पहले तक वो जिद कर रहा था कि ऑनलाइन आओ कुछ बात करनी है। तमाम कोशिशों के बाद भी जब नेट कनेक्ट नही हो पाया तो हमने हथियार डाल दिए और वो मायूस होकर चुप होगया।
यु आर डिजिटली बी पी एल!
एस एम् एस कहता है।
डिजिटली बी पी एल होना आज के युग में एक बड़ी परेशानी की बात हो गई है।
दिल्ली और लखनऊ में रहने वाले के लिए ३जी न होना बी पी एल होना है डिजिटली बी पी एल !
देश के जिस हिस्से में आजकल हम हैं वहां पर लोग कई तरह से बी पी एल हैं
२००१ की जनगणना के हिसाब से ५१००० के आस पास की आबादी वाले इस इलाके में करीब १०००० के आस-पास बी पी एल राशन कार्ड हैं। पाँच सदस्यों वाले परिवार का हिसाब लगायें तो कोई पचास हज़ार बी पी एल!
राशन कार्ड में गरीबी जम के झलकती है । कोटेदार के कोई बीस हज़ार रूपये खर्च होते हैं अलग अलग लोगों को खुश करने में। अब इसके बाद उसकी कमाई भी होती होगी। तो फ़िर गरीबी कमाई का अच्छा साधन हुआ। एक बी पी एल परिवार कितने लोगों की गरीबी दूर करता है इसका हिसाब लगाने पर पता चलता है कि बी पी एल होना कितना जरूरी है।
लखनऊ में सामजिक परिवर्तन स्थल से गुजरें तो सामाजिक परिवर्तन नजर आता है । चुंधियाती हुई रौशनी ! पूरा इलाका रात में भी दिन को मात देता हुआ सा लगता है।
लखनऊ से बाहर निकलते ही पता चलता है कि बाकी के इलाके बिजली के हिसाब से बी पी एल हैं। अभी हम जहाँ बैठे हैं वहां हफ्ते-वार बिजली की व्यवस्था चलती है । एक हफ्ते में दिन में लाईट आती है (आती जाती है ) , तो अगले हफ्ते रात में (आती-जाती है )। सामाजिक परिवर्तन लखनऊ में नजर आता है लखनऊ से बाहर गायब हो जाता है।
खैर जो चीजें सिर्फ़ दिखाने की हैं वो लखनऊ और दिल्ली में ही शोभा देती हैं । सामाजिक परिवर्तन दिखाने की ही चीज है शायद होने की नही।
एक इलाके में पहुंचे वहाँ बोर्ड लगा हुआ था -
मोबाइल चार्जिंग - पाँच रूपये मात्र।
बिजली नही पहुँची लेकिन मोबाइल मौजूद है अब मोबाइल है तो चार्ज भी होना होगा। लोग डिजिटल बैकवर्ड नेस से बाहर निकल चुके हैं बिजली आए न आए।
मोबाइल कंपनियाँ नए नए मोबाइल निकाल रही हैं बिजली आए न आए मोबाइल चलता जाए!
उन्हें धंधा चलाना है बिजली आए न आए , उन्हें धंधा चलाना है लोगों की जेब में जितना भी पैसा हो उसे ध्यान में रखते हुए ।
कुछ दिन पहले एक थोडा ख़ुद को गिनाने वाले ने हमें धमकी दी थी
-रहना तो यही है न !
हमें सुनकर गुस्सा आ गया
- क्यों यहाँ कौन से सुरखाब के पर लगे हुए हैं ? और यार तुम लोग एक लाईट तो अपनी सही नही करवा पाते आ जाते हो छोटी -छोटी बातों पर धमकी देने
हमारी बात सुनकर वो चुप हो गया हमने उसकी दुखती राग पर हाथ रखा था। वो सामाजिक परिवर्तन स्थल वाले दल का कार्यकर्त्ता था
एस एम् एस एक दोस्त का था जो दिल्ली में बैठा हुआ था । अभी थोडी देर पहले तक वो जिद कर रहा था कि ऑनलाइन आओ कुछ बात करनी है। तमाम कोशिशों के बाद भी जब नेट कनेक्ट नही हो पाया तो हमने हथियार डाल दिए और वो मायूस होकर चुप होगया।
यु आर डिजिटली बी पी एल!
एस एम् एस कहता है।
डिजिटली बी पी एल होना आज के युग में एक बड़ी परेशानी की बात हो गई है।
दिल्ली और लखनऊ में रहने वाले के लिए ३जी न होना बी पी एल होना है डिजिटली बी पी एल !
देश के जिस हिस्से में आजकल हम हैं वहां पर लोग कई तरह से बी पी एल हैं
२००१ की जनगणना के हिसाब से ५१००० के आस पास की आबादी वाले इस इलाके में करीब १०००० के आस-पास बी पी एल राशन कार्ड हैं। पाँच सदस्यों वाले परिवार का हिसाब लगायें तो कोई पचास हज़ार बी पी एल!
राशन कार्ड में गरीबी जम के झलकती है । कोटेदार के कोई बीस हज़ार रूपये खर्च होते हैं अलग अलग लोगों को खुश करने में। अब इसके बाद उसकी कमाई भी होती होगी। तो फ़िर गरीबी कमाई का अच्छा साधन हुआ। एक बी पी एल परिवार कितने लोगों की गरीबी दूर करता है इसका हिसाब लगाने पर पता चलता है कि बी पी एल होना कितना जरूरी है।
लखनऊ में सामजिक परिवर्तन स्थल से गुजरें तो सामाजिक परिवर्तन नजर आता है । चुंधियाती हुई रौशनी ! पूरा इलाका रात में भी दिन को मात देता हुआ सा लगता है।
लखनऊ से बाहर निकलते ही पता चलता है कि बाकी के इलाके बिजली के हिसाब से बी पी एल हैं। अभी हम जहाँ बैठे हैं वहां हफ्ते-वार बिजली की व्यवस्था चलती है । एक हफ्ते में दिन में लाईट आती है (आती जाती है ) , तो अगले हफ्ते रात में (आती-जाती है )। सामाजिक परिवर्तन लखनऊ में नजर आता है लखनऊ से बाहर गायब हो जाता है।
खैर जो चीजें सिर्फ़ दिखाने की हैं वो लखनऊ और दिल्ली में ही शोभा देती हैं । सामाजिक परिवर्तन दिखाने की ही चीज है शायद होने की नही।
एक इलाके में पहुंचे वहाँ बोर्ड लगा हुआ था -
मोबाइल चार्जिंग - पाँच रूपये मात्र।
बिजली नही पहुँची लेकिन मोबाइल मौजूद है अब मोबाइल है तो चार्ज भी होना होगा। लोग डिजिटल बैकवर्ड नेस से बाहर निकल चुके हैं बिजली आए न आए।
मोबाइल कंपनियाँ नए नए मोबाइल निकाल रही हैं बिजली आए न आए मोबाइल चलता जाए!
उन्हें धंधा चलाना है बिजली आए न आए , उन्हें धंधा चलाना है लोगों की जेब में जितना भी पैसा हो उसे ध्यान में रखते हुए ।
कुछ दिन पहले एक थोडा ख़ुद को गिनाने वाले ने हमें धमकी दी थी
-रहना तो यही है न !
हमें सुनकर गुस्सा आ गया
- क्यों यहाँ कौन से सुरखाब के पर लगे हुए हैं ? और यार तुम लोग एक लाईट तो अपनी सही नही करवा पाते आ जाते हो छोटी -छोटी बातों पर धमकी देने
हमारी बात सुनकर वो चुप हो गया हमने उसकी दुखती राग पर हाथ रखा था। वो सामाजिक परिवर्तन स्थल वाले दल का कार्यकर्त्ता था
सोमवार, 2 नवंबर 2009
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां
द्रौपदेय ब्लॉग से साभार
२८-२९ अक्टूबर 2009 की रात में अयोध्या में पञ्च-कोषीपरिक्रमा पुनः इस वर्ष किया, इसके पूर्व जब परिक्रमा की थी तो हम सरकारी अधिकारी थे,एकाध बार तो मेले में ही मजिस्ट्रेट के रूप में तैनात रहे,इस बार हम एक सामान्यआदमी की तरह परिक्रमा- पथ पर चलती हुई अपार भीड़ में बिल्कुल अकेले चल रहे थे,जब साथ कोई न हो,कुछ नहो तो असंग की स्थिति होती है, प्रातः चार बजे का समय था,परिक्रमा -पथ पर चलते समय रामराम कहने केअलावा इधर उधर देखते जा रहे थे,स्त्रीपुरुष ,बच्चे-बूढे,सभी अपनी धुन में सीताराम -सीताराम कहते चले जा रहेथे,निम्न एवं मध्यम बर्ग की कतिपय महिलाएं राम जन्म ,सीता-स्वयंबर,बन-गमन, लक्ष्मण -मूर्छा , आदि काकारुणिक बर्णन लोक-संगीत के माध्यम से कर रहीं थीं उच्च तथा मध्यमोच्च बर्ग के लोग मानों.इस बात काप्रदर्शन कर रहे थे कि इतने बड़े होते हुए भी वह परिक्रमा कर रहे हैं .सब के मन में कुछ न कुछ चाह थी,कामनाथी,याचना थी,तृष्णा थी,लोभ था,मोह था,राग था,द्वेष था.यह अपेक्षा उससे थी जो इससे मुक्त था।
परिक्रमा वस्तुतः एक ब्यावाहारिक.बैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक ब्यवस्था है.जो भुक्ति तथा मुक्ति दोनों को लक्ष्य कर के निर्धारित कीगयी है. कार्तिक माह में मौसम में बदलाव आता है. गर्मी के बाद जाडा आता है. इसलिए कार्तिक की नवमी,एकादशी तथा पूर्णिमा को क्रमशः चौदह कोशी ,पञ्च कोशी परिक्रमा तथा पूर्णिमा-स्नान का निर्धारण किया गया है. नवमी को चौदहकोष की परिक्रमा जो लगभग ४५ किलोमीटर में है, की जाती है. यह काफी श्रमसाध्य है जिसे करने के बाद थकावट आ जाती है, साथ ही नंगे पांव करने के कारण लोग थक कर चूर हो जाते हैं किंतु इसे करने के बाद तितीक्षा तथा सहनशीलता में काफी बृद्धि होती है .यहाँ यह विचारणीय है कि यदि इसी पर छोड़ दिया जाय तो पैरों की क्रियाशीलता दुष्प्रभावित हो जायगी ,अतः एकादशी को पंचकोशी [जो लगभग सोलह किलोमीटर है] परिक्रमा का निर्धारण किया गया है,इसे कर लेने के बाद थकावट एकदम दूर हो जाती है .एकादशी से पूर्णिमा तक अयोध्या मेंरह कर सत्संग,भजन-पूजन,इत्यादि करते हुए पूर्णमासी को सरयू-स्नान कर तथा पूर्णतया स्वस्थ होकर लोग घरजाते हैं।
इस लौकिकता के गर्भ में एक आध्यात्मिक रहस्य छिपा है.वास्तव में कोष का अर्थ यहाँखजाना,मंजूषा,गुहा से है .चौदह कोष का अभिप्राय पञ्च कर्मेन्द्रियाँ,पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ तथा चार अन्तः करणमन,बुद्धि,चित्त तथा अंहकार से है.इसकी परिक्रमा करके यानी इसपर नियंत्रण होने के बाद ब्यक्ति पञ्च कोष केक्षेत्र में प्रबेश करता है.यह पञ्च कोष क्रमशः अन्नमयकोश,प्राणमाय कोष ,मनोमय कोष,विज्ञानमय कोष ,तथाआनंदमय कोष.है जिसे ब्यक्ति क्रमशः पार करता है और तभी पूर्णिमा-स्नान का अधिकारी होता है.पूर्णिमा काअभिप्राय पूर्ण प्रकाश,पूर्ण सूख, पूर्ण आनंद है। यह परम स्थिति है.सुखी मीन जिमी नीर अगाधा,जिमी हरि शरणन एकहू बाधा . किंतु यह अयोध्या में रह कर,साधू-संन्यासी तथा सदगुरू के सानिध्य में रह कर,तथा अयोध्या केउत्तर में बहने वाली सरयू में स्नान करके ही किया जा सकता है.
२८-२९ अक्टूबर 2009 की रात में अयोध्या में पञ्च-कोषीपरिक्रमा पुनः इस वर्ष किया, इसके पूर्व जब परिक्रमा की थी तो हम सरकारी अधिकारी थे,एकाध बार तो मेले में ही मजिस्ट्रेट के रूप में तैनात रहे,इस बार हम एक सामान्यआदमी की तरह परिक्रमा- पथ पर चलती हुई अपार भीड़ में बिल्कुल अकेले चल रहे थे,जब साथ कोई न हो,कुछ नहो तो असंग की स्थिति होती है, प्रातः चार बजे का समय था,परिक्रमा -पथ पर चलते समय रामराम कहने केअलावा इधर उधर देखते जा रहे थे,स्त्रीपुरुष ,बच्चे-बूढे,सभी अपनी धुन में सीताराम -सीताराम कहते चले जा रहेथे,निम्न एवं मध्यम बर्ग की कतिपय महिलाएं राम जन्म ,सीता-स्वयंबर,बन-गमन, लक्ष्मण -मूर्छा , आदि काकारुणिक बर्णन लोक-संगीत के माध्यम से कर रहीं थीं उच्च तथा मध्यमोच्च बर्ग के लोग मानों.इस बात काप्रदर्शन कर रहे थे कि इतने बड़े होते हुए भी वह परिक्रमा कर रहे हैं .सब के मन में कुछ न कुछ चाह थी,कामनाथी,याचना थी,तृष्णा थी,लोभ था,मोह था,राग था,द्वेष था.यह अपेक्षा उससे थी जो इससे मुक्त था।
परिक्रमा वस्तुतः एक ब्यावाहारिक.बैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक ब्यवस्था है.जो भुक्ति तथा मुक्ति दोनों को लक्ष्य कर के निर्धारित कीगयी है. कार्तिक माह में मौसम में बदलाव आता है. गर्मी के बाद जाडा आता है. इसलिए कार्तिक की नवमी,एकादशी तथा पूर्णिमा को क्रमशः चौदह कोशी ,पञ्च कोशी परिक्रमा तथा पूर्णिमा-स्नान का निर्धारण किया गया है. नवमी को चौदहकोष की परिक्रमा जो लगभग ४५ किलोमीटर में है, की जाती है. यह काफी श्रमसाध्य है जिसे करने के बाद थकावट आ जाती है, साथ ही नंगे पांव करने के कारण लोग थक कर चूर हो जाते हैं किंतु इसे करने के बाद तितीक्षा तथा सहनशीलता में काफी बृद्धि होती है .यहाँ यह विचारणीय है कि यदि इसी पर छोड़ दिया जाय तो पैरों की क्रियाशीलता दुष्प्रभावित हो जायगी ,अतः एकादशी को पंचकोशी [जो लगभग सोलह किलोमीटर है] परिक्रमा का निर्धारण किया गया है,इसे कर लेने के बाद थकावट एकदम दूर हो जाती है .एकादशी से पूर्णिमा तक अयोध्या मेंरह कर सत्संग,भजन-पूजन,इत्यादि करते हुए पूर्णमासी को सरयू-स्नान कर तथा पूर्णतया स्वस्थ होकर लोग घरजाते हैं।
इस लौकिकता के गर्भ में एक आध्यात्मिक रहस्य छिपा है.वास्तव में कोष का अर्थ यहाँखजाना,मंजूषा,गुहा से है .चौदह कोष का अभिप्राय पञ्च कर्मेन्द्रियाँ,पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ तथा चार अन्तः करणमन,बुद्धि,चित्त तथा अंहकार से है.इसकी परिक्रमा करके यानी इसपर नियंत्रण होने के बाद ब्यक्ति पञ्च कोष केक्षेत्र में प्रबेश करता है.यह पञ्च कोष क्रमशः अन्नमयकोश,प्राणमाय कोष ,मनोमय कोष,विज्ञानमय कोष ,तथाआनंदमय कोष.है जिसे ब्यक्ति क्रमशः पार करता है और तभी पूर्णिमा-स्नान का अधिकारी होता है.पूर्णिमा काअभिप्राय पूर्ण प्रकाश,पूर्ण सूख, पूर्ण आनंद है। यह परम स्थिति है.सुखी मीन जिमी नीर अगाधा,जिमी हरि शरणन एकहू बाधा . किंतु यह अयोध्या में रह कर,साधू-संन्यासी तथा सदगुरू के सानिध्य में रह कर,तथा अयोध्या केउत्तर में बहने वाली सरयू में स्नान करके ही किया जा सकता है.
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