मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

पिघलानी होगी बर्फ !

रहा करती थी
कसमसाहट सी कभी
उबलते हुए सवालों में,

आकुल रहती थीं ऊर्जाएं
उफनकर बह निकलने को

दहकती आग सी होती थी
हर सख्त-ओ-नर्म कोनों में

सुना भर है हमने ।



नही उठते हैं सर अब तो
बढ़ते नही हैं आगे
तरेरकर आँखें
सुलगते हुए सवाल।

आग तो बहुत दूर
अब तो महसूस नही होती गर्मी तक
कहीं आस पास ।

इससे पहले कि बहता हुआ लहू
जम जाए शिराओं में ही
पिघलानी होगी बर्फ
जो जम चुकी है
हमारे चारो ओर ।

Follow by Email