शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

कमेन्ट मोडरेशन को तानाशाही मानने वाले विरोध के तरीके का मोडरेशन करना चाहते हैं

नोटपैड नामक ब्लॉग पर सुजाता जी ने एक बड़ी ही सार्थक पहल की - बहस का फोकस तय करना उन्होंने जो कुछ कहा है वह बहुत ही सटीक है मेरा उसे यहाँ दुहराने का कोई मन नही है एक ही चीज बार बार पढाने से क्या फायदा
वहीँ से लिंक मिला एक और ब्लॉग का जहाँ निशा के विरोध के तरीके पर सवाल उठाया गया था सवाल तो वो बहुत से उठाते हैं पर मुझे याद आया की कुछ दिन पहले इन्होने जोरदार ढंग से कमेन्ट मोडरेशन को तानाशाही काप्रतीक बताया था वो अपने ब्लॉग पर कमेन्ट मोडरेशन नही करते होंगे। पर दूसरों के तरीकों का मोडरेशन करनाचाहते हैं। चाहते हैं की स्त्रियाँ एक सीमा का अनुसरण करें, चाहते हैं की विरोध करना ही है तो उनसे सीख लें
भले ही वो विरोध का तरीका वही पुरुषोचित तरीका हो जिसका उन्होंने भी विरोध किया है (?)
शायद उनके लिए कमेन्ट आम आजादी से बड़ी चीज है
सुजाता जी ने सही ही कहा है कि बहस का फोकस तय होना चाहिए। मोडरेशन वाली तानाशाही के विरोधी औरउनका समूह इस पूरी चर्चा को हाइजैक करके संस्कृति वगैरह से जोड़ना चाहता हो जिन्हें महिलाओं के इस विरोधसे परेशानी है उनके पास चारा ही यही है संस्कृति की दुहाई देना , सवाल उठाने वालों पर उँगलियाँ उठाना औरउनकी जानकारियों पर सवाल उठाना
बहस का फोकस लगातार शराब , पब, पेज थ्री की और खींचने की कोशिश हो रही है
शायद उन्हें आजादी सहन नही वो भी महिलाओं की ?

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