शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

"मन-मन पवन कछु पावत है"

शशि, चन्द्र विलोचन नयन, मुख|
तोहे पदम् कदम मोहे भावत है||

चर-चारू कंद बदन तोरा|
मन मोरा हर्षय लावत है||

हरणी सी चलत इत-उत ठुमकत|
तोहे देख मोरा मन गावत है||

तोरे नयन कटारी चलत जिधर|
नव किरण कुञ्ज फैलावत है||

चलत पवन, पट सटत बदन|
मन-मन पवन कछु पावत है||

तोरे लट उलझे घट-पनघट|
बदरी घट-घट बरखावत है||

तोहे पायल की खन-खन,सुनी-सुनी|
रज,राग,रंग तंग ढ़ावत है||

चल सजनी आगे-आगे|
"अनुराग" पीछे से आवत है||

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! अतिसुन्दर शब्द चयन और भाव निरूपण......बहुत ही सुन्दर मनोहारी कविता......अद्भुत लेखन......पढाने के लिए आभार.

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  2. बहुत बढ़िया रचना . पढ़कर आनंद आ गया . बधाई

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