शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का...!

अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का,
चलो आसुओं को कफ़न से सजाने
जमी को उठाकर गगन पर बिठाने
सितारों की दूरी न दूरी रहेगी,
नहीं यह आज़ादी अधूरी रहेगी,
नये दीप को आंधिओं में जलाओ,
अंधेरा डगर है, अंधेरे शहर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का

अडे हैं पहाडों के पत्थर पुराने,
लहू से नहाये हैं इनके घराने,
मगर जिन्दगी जोखिमों की कहानी,
विन्धी-कंटकों में ही खिलती जवानी,
मसल पत्थरों को सृजन रह का कर,
बदलता नहीं ऐसे रुतबा कहर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का

सुलगती जवानी न चाहे जमाना,
धधकती जवानी से बदले जमाना,
जवानी तूफानों से झुकती नहीं है,
अगर बढ़ गई, तो फिर रूकती नहीं है,
चलो! देश रौशन बनाने चलो फिर,
बचे कोई सोया न प्राणी नगर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का

वतन में वतन की नीलामी नहीं हो,
किसी को किसी की गुलामी नहीं हो,
नहीं पेट की आग अस्मत उधारे,
नहीं दर्द का राग कोई पुकारे,
बहो! ऐ हवाओं! फिजा मुस्कुराए,
नहीं कोई मौसम बुलाये ज़हर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का

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3 टिप्‍पणियां:

  1. "नहीं कोई मौसम बुलाये ज़हर का
    अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का"
    बहुत बढ़िया, बहुत ही बढ़िया !

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    आशाजनित रहना यूँ तो ठीक बात है
    निराशा न जाने मगर क्यो मेरे साथ है
    पता नही मुझे क्यो लगता है ऐसे
    कि राह मे सफर के अब आने को रात है

    -Godiyal

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  2. आशा और निराशा केवल मात्र हमारी सोच और समझ का किसी पूर्वाग्रह से बंधे होने का परिणाम है| इसे त्याग कर अपने स्वभाव को जान लेने के बाद सम्पूर्ण जीवन ही बिना किसी भय के हर मुसीबतों का सामना करता है, बिल्कुल निर्बाध होकर|
    गोदियाल जी अगर आप मुझसे सहमत हैं तो आपका स्वागत करता हूँ और आगे भी अपनी कवितों पर आपकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा करता हूँ| धन्यवाद!....

    उत्तर देंहटाएं

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