गुरुवार, 12 मार्च 2009

"प्रकृति के परिदृश्य का, परिहास करने आ गये..!"

प्रकृति के परिदृश्य का,
परिहास करने आ गये
सागर समीर बह चली,
अचला सुभाष करने आ गये

प्रभात किरण फुट रहा,
प्रत्यंग आलस टूट रहा
खग-कलरव कुल-कुल का,
प्रातः उपहास करने आ गये

प्रकृति के परिदृश्य का,
परिहास करने आ गये

तान मुरली की बजी,
श्यामल सलोने गीत पर
गोपिओं के संग श्याम,
रास करने आ गये

प्रकृति के परिदृश्य का,
परिहास करने आ गये

ओश की बूंदें सजी,
तृण के क्षीण-क्षीण पर
देख कर दिनकर दिवस,
अट्टहास करने आ गये

प्रकृति के परिदृश्य का,
परिहास करने आ गये

चिल-चिलाती धुप में,
हुए कंठों से अधीर
धरा मिलन की आश में,
घटा प्यास करने आ गये

प्रकृति के परिदृश्य का,
परिहास करने आ गये

अनुराग-अलौकिक राग में,
दंभ भरने लगी प्रिया
तो प्रियतम भी प्रेम का,
पिपास करने आ गये

प्रकृति के परिदृश्य का,
परिहास करने आ गये

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