गुरुवार, 19 मार्च 2009

विश्वनाथ मन्दिर और आस्थाओं के सवालात

डॉ अनुराग आर्य की बनारस यात्रा और विश्वनाथ मन्दिर के बारे में पढ़ कर हमें अपनी एक विश्वनाथ मन्दिर कीयात्रा याद गई
बारहवीं की बोर्ड परिक्षा देने के बाद हम और हमारे एक मित्र योगेश वाराणसी एक परीक्षा देने गए थेवाराणसीहमेशा से हमें आकर्षित करने वाले शहरों में से रहा हैपरीक्षा देने के बाद हम दोनों ने निश्चय किया कि घर के लिएरवाना होने से पहले थोडा घूम फ़िर लिया जायवाराणसी में यूँ अपने मन से घूमने का विचार कभी दिमाग मेंआया ही नही था सो पता नही था कि अगर घूमना है तो कहाँ घूमना है ऊपर से तुर्रा यह कि हमें बहती धारा की तरहयूँ ही निकल जाने में मज़ा आती है तो किसी से पूछना भी मंज़ूर नही थायोगेश के साथ बड़ी लम्बी बहस के बादतय हुआ कि एक एक करके उसकी और हमारी पसंद की ज़गहों को देखा जायेगापहले हमारा नंबर था तो हमभटकते हुए दशाश्वमेध घाट पहुंचेगंगा का गहरे तक पैठा आकर्षण घाट के किनारे और फ़िर गंगा में इधर उधरफैली गन्दगी देख कर काफूर हो गयाहमारा मन खिन्न हो उठा थाअब योगेश की बारी थी और तब तक वहनास्तिक नही थाहम विश्वनाथ मन्दिर की गलियों में मुड़ चले
विश्वनाथ मन्दिर जैसे जैसे नज़दीक आता गया पण्डे हमें घेरते गएहमने योगेश को सिखा रखा था कि किसी पण्डेको साथ नही लेना है हम ख़ुद से मन्दिर देखेंगेबस हमें बिना इधर उधर देखे मन्दिर की ओर बढ़ते जाना है लेकिनयोगेश जिज्ञासु प्रवृत्ति का होने के चलते एक पण्डे के जाल में फंस ही गयाअब हम पण्डे के मार्गदर्शन में बढ़ने कोविवश थे
चढावा खरीदकर जब हम मन्दिर के अन्दर पहुंचे तो दर्शन के बाद पण्डे ने हमें बाबा विश्वनाथ के नाम पर वहां केपुजारी को कुछ दान देने को कहायोगेश अभिभूत था उसने १०० का एक नोट पुजारी को अर्पण कियाअब पण्डेने हमारी तरफ़ निगाह बढ़ाईहम मन्दिर वन्दिर में चढावे के नाम पर हमेशा से कंजूस रहे हैं पर उसकी नजरों नेहमें भी जेब में हाथ डालने को मजबूर कर दियाहमारी जेब से भी एक नोट बाहर आया फर्क बस इतना था कि वो१० का था
हम दर्शन करके बाहर निकलने को उतावले थे पर पंडा हमें आगे ले गयायहाँ पर उसने हमें अन्नपूर्णा देवी परमाता-पिता के लिए कुछ चढाने को कहाहम योगेश का हाथ पकड़ने को बढे ही थे कि उसने फ़िर से १०० का नोटआगे कर दिया थाअब माता-पिता के नाम पर क्या कंजूसी ! हमें भी मजबूरन १० का नोट बढ़ाना पड़ा
हमें लगा था कि अब हम मन्दिर से निकल जायेंगे पर पंडा तो योगेश की जेब की गहराई नापने की सोच चुका था और हमें लेकर वो मन्दिर में जाने किस ओर एक अंतहीन सी लगने वाली यात्रा पर निकल चुका था। थोडा आगे बढ़ने के बाद मन्दिर में दर्शनार्थी दिखना बंद हो गए। चारों ओर बस सन्नाटा ही सन्नाटा था। मन्दिर में हम किस दिशा में थे, कहाँ थे अंदाजा मिलना बंद हो गया था। हमें एकअनजान सी फ़िल्म याद आने लगी जिसमे पण्डे मन्दिर में आने वालों को लूटा करते थे
अब योगेश भी ५० और फ़िर १० की ओर बढ़ रहा था और हम तो बस सर झुकाने लग गए थे
तीन और जगहों पे जाने के बाद हमने कनखियों से देखा कि थोडी दूर पर पुलिस के दो सिपाही एक जगह पर बैठे हैं हमने तयकर लिया कि अब आगे नही जाना हैपंडा आगे आगे चल रहा था हमने योगेश की जेब से पर्स लिया और अपनाऔर उसका दोनों का पर्स छिपा लियायोगेश को भी डर लगने लगा थाअगला पड़ाव सिपाहियों से ज्यादा दूरनही था जब उसने एक और जगह कुछ चढाने को कहा
योगेश को पीछे करके हम आगे गए और उससे कहा कि अब आपकी दक्षिणा के लिए ही पैसा बचाना हो तोवापस चलिए अब हमारे पास पैसा बिल्कुल नही हैहमने तय किया था कि अगर इसने कुछ आना-कानी की तोअब यहाँ से पुलिस वालों के पास जायेंगेहमने हाथापाई की पूरी तैयारी कर रखी थी
फिलहाल थोडी बहस के बाद वो तैयार हो गया हम वापस लौटेहमने उसे दक्षिणा में ११ रूपये दी तो वो भड़क उठाउसने हम दोनों के १०१-१०१ मांगेपर हम चलते बनेउसने काफ़ी दूर तक हमारा पीछा किया फ़िर गालियाँ देनेलगा । "फ़िर आना मन्दिर देखूंगा " की धमकी देकर उसने हमारा पीछा छोड़ा
इस अनुभव के बाद हमारा मन खट्टा हो चला था और हम सीधे बस स्टैंड की ओर चल पड़े
हम अभी भी आस्तिक बने हुए हैं पर योगेश नास्तिक हो गया है
वैसे वाराणसी हमें अभी भी पसंद है वहाँ अक्सर जाते रहते हैं पर अब विश्वनाथ मन्दिर जाने की इच्छा नही होतीगंगा तट भी जाने का मन नही होता बस संकट मोचन होकर वापस जाते हैं

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