सोमवार, 16 मार्च 2009

पाकिस्तान: बुनियाद का दंश

अभी-अभी समाचार मिल रहा है कि पकिस्तान के प्रधान मंत्री की जस्टिस चौधरी सहित अन्य जजों को बहालकरने की घोषणा के बाद नवाज़ शरीफ ने अपना लोंग-मार्च वापस ले लिया है अब सभी निगाहें २१ मार्च कीप्रस्तावित बहाली पर लग गयीं हैं।
जस्टिस चौधरी की बहाली के आगे क्या क्या परिणाम हो सकते हैं यह तो समय ही बताएगा पर आज कीपाकिस्तान की बुरी स्थिति की जिम्मेदारी अगर उसकी बुनियाद पर डाली जाय तो ग़लत नही होगा।
पाकिस्तान के निर्माण के लिए दिए गए तर्कों को अलग रख दें तो भी पाकिस्तान निर्माण के बाद शुरू से हीपकिस्तान के नेताओं ने जो परम्पराएं डालनी शुरू कर दीं वो आगे चल कर परेशानी का सबब बनने वाली ही थीं
मज़हब के आधार पर बने हुए देश में मज़हबी जूनून रखने वालों को सत्ता से अलग कर पाना बहुत ही कठिन था।इसके लिए जरूरी था कि देश के रहनुमा कड़े फैसले लेने वाले होते और अपना उदाहरण सकारात्मक रूप में लोगोंके सामने रख पाते।
जिन्ना इस कसौटी पर खरे नही उतर सके।
जिन्ना डावांडोल प्रकृति वाले नेता थे। विभाजन की घोषणा तक उन्हें पता नही था कि वो जो पाकिस्तान चाहते हैंवो कैसा होना चाहिए। उसे भारत से अलग होना है या एक ढीले ढाले संघ में रहना है उन्हें नही पता था उन्हें ये भीनही पता था कि पाकिस्तान में कौन कौन से इलाके रहने हैं। उन्हें बस पकिस्तान चाहिए था पकिस्तान मिलजाने के बाद भी उसके भविष्य को लेकर उनके पास कोई कार्ययोजना नही थी। कभी मज़हब के आधार पर बने देशको वो सेकुलर बनाना चाहते थे तो कभी तरह तरह के अंदरूनी दबावों के आगे झुक झुक कर इधर उधर के फैसलेलेते रहे।
जिन्ना ने जिस एक चीज की नींव डाली-जो पाकिस्तान को अभी भी परेशान कर रही है- वह थी एकाधिकार कीप्रवृत्ति जिन्ना को माउन्टबेटन ने सलाह दी कि उन्हें गवर्नर जनरल की जगह प्रधान मंत्री बनना चाहिए क्योंकिसंसदीय शासन की प्रणाली में प्रधान मंत्री अधिक महत्त्व पूर्ण होता है। परन्तु जिन्ना ने गवर्नर जनरल बनने केसाथ सत्ता अपने पास रखना चुना। जब शासन का ध्येय किसी तरह से सत्ता बचाए रखना और पूरी सत्ता अपने पासरखना हो जाता है तो चीजें ग़लत होनी शुरू हो जाती हैं इस तरह की जवाबदेही विहीन सत्ता अन्य लोगों कोआकर्षित करती है।
जल्दी ही सत्ता खिसकनी शुरू हो गई। जिन्ना से लियाकत अली और फ़िर धीरे धीरे श्रंखला चल निकली। सेना काराजनीति के लिए प्रयोग हुआ और फ़िर सेना ने राजनीति शुरू कर दी।
२००७ के चुनावों के बाद ज़रदारी ने कहा कि वो पाकिस्तान के सोनिया गांधी बनना चाहते हैं लेकिन सोनियागांधी बनना यूँ आसान नही था ज़ल्दी ही ज़रदारी एक और जिन्ना बन कर राष्ट्रपति बन बैठे। ज़रदारी के राष्ट्रपतिबनने के साथ ही उनके पराभव की कहानी शुरू हो चुकी थी। ये आश्चर्यजनक है कि वो अभी तक सत्ता में बने हुए हैं।

पाकिस्तान का उदहारण यह बताता है कि ग़लत बुनियाद का फल सही हो यह सम्भव नही है अब देखना यहहोगा कि आगे आने वाले नेता इस चीज को समझ पाते हैं या नही।

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