शनिवार, 14 मार्च 2009

स्मृति ओढ़ता जीवन-कण!

वेदना के दंश से,
फिर मन हुआ अधीर|
ये शब्दों के सिलवट नहीं,
हैं मेरे नयनों के नीर|

शब्द बेधते, अचूक लक्ष्य कर,
धुआँ उगलती, बुझी बाती|
क्षण-भर का अभिमान धरा,
है क्षण-भर की मेरी थाती|
स्वयं नहीं जब समझे मुझको,
तो क्या?, लिख भेजूं पाती|

मेरा होना, ना होना,
जैसे बह चले समीर|
ये शब्दों के सिलवट नहीं,
हैं मेरे नयनों के नीर|

चंचल क्षण की स्मृति,
हुक-प्रसव-सा लिये वरण|
कैसी अबूझ पहेली अपनी,
स्मृति ओढ़ता जीवन-कण|
मेरी भाषा, क्या परिभाषा,
निशि-दिशी पावस का क्रंदन|
रक्तिम चक्षु, अश्रु विप्लव,
सन्दर्भ-शेष का सार रुदन|

मेरी भाग्य विधा है जैसे,
शिला पर खिंची लकीर|
ये शब्दों के सिलवट नहीं,
हैं मेरे नयनों के नीर|

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